संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- अध्याय १९ * । १३१
हर्यश्वेषु तु नष्टेषु मायया नारदस्य तु।
शशाप नारदं दक्षः क्रोधसंरक्तलोचनः॥ २१ ॥
नारदकी मायासे हर्यश्वोंके नष्ट हो जानेपर क्रोधसे लाल आँखोंवाले दक्षने नारदको (इस प्रकार) शाप दिया— ॥ २१ ॥
यस्मान्मम सुताः सर्वे भवतो मायया द्विज।
क्षयं नीतास्त्वशेषेण निरपत्यो भविष्यसि॥ २२॥
'द्विज! चूँकि आपकी मायासे मेरे सभी पुत्र सभी प्रकारसे विनाशको प्राप्त हो गये, अतः आप भी संतानरहित होंगे।'
अरुन्धत्यां वसिष्ठस्तु शक्तिमुत्पादयत् सुतम्।
शक्तेः पराशरः श्रीमान् सर्वज्ञस्तपतां वरः॥ २३॥
वसिष्ठने अरुन्धतीसे शक्ति नामक पुत्र उत्पन्न किया। शक्तिके पराशर हुए जो श्रीसम्पन्न, सर्वज्ञ तथा तपस्वियोंमें श्रेष्ठ थे।
आराध्य देवदेवेशमीशानं त्रिपुरान्तकम्।
लेभे त्वप्रतिमं पुत्रं कृष्णद्वैपायनं प्रभुम्॥ २४॥
उन्होंने त्रिपुरका नाश करनेवाले देवाधिदेव शंकरकी आराधनाकर कृष्णद्वैपायन नामवाले अप्रतिम एवं शक्तिसम्पन्न पुत्रको प्राप्त किया॥ २२—२४॥
द्वैपायनाच्छुको जज्ञे भगवानैव शंकरः।
अंशांशेनावतीर्योर्व्यां स्वं प्राप परमं पदम्॥ २५॥
भगवान् शंकर ही शुक नामसे द्वैपायनके पुत्र हुए। पृथ्वीपर अपने अंशांशरूपसे उत्पन्न होकर (पुनः) अपने परम पदको प्राप्त हुए।
शुकस्याप्यभवन् पुत्राः पञ्चात्यन्ततपस्विनः।
भूरिश्रवाः प्रभुः शम्भुः कृष्णो गौरश्च पञ्चमः।
कन्या कीर्तिमती चैव योगमाता धृतव्रता॥ २६॥
शुकके महान् तपस्वी पाँच पुत्र हुए, वे भूरिश्रवा, प्रभु, शम्भु, कृष्ण तथा पाँचवें गौर नामवाले थे। साथ ही कीर्तिमती नामकी एक कन्या भी हुई, जो योगमाता और व्रतपरायणा थी॥ २५-२६॥
एतेऽत्र वंश्याः कथिता ब्राह्मणा ब्रह्मवादिनाम्।
अत ऊर्ध्वं निबोधध्वं कश्यपाद्राजसंततिम्॥ २७॥
इन ब्रह्मवादी ब्राह्मणोंके वंशजोंका यह वर्णन किया गया, अब आगे कश्यपसे उत्पन्न क्षत्रिय संतानोंका वर्णन सुनो— ॥ २७॥
इति श्रीकूर्मपुराणे षत्साहस्र्यां संहितायां पूर्वविभागे अष्टादशोऽध्यायः॥ १८॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें अठारहवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ १८॥
उन्नीसवाँ अध्याय
सूर्यवंश-वर्णनमें वैवस्वत मनुकी संतानोंका वर्णन, युवनाश्वको गौतमका उपदेश, महातपस्वी राजा वसुमनाकी कथा, वसुमनाके अश्वमेध-यज्ञमें ऋषियों तथा देवताओंका आगमन, ऋषियोंद्वारा तपस्याकी आज्ञा प्राप्तकर वसुमनाका हिमालयमें जाकर तप करना और अन्तमें उसे शिवपदकी प्राप्ति
सूत उवाच
सूतजी बोले—
अदितिः सुषुवे पुत्रमादित्यं कश्यपात् प्रभुम्।
तस्यादित्यस्य चैवासीद् भार्याणां तु चतुष्टयम्।
संज्ञा राज्ञी प्रभा छाया पुत्रांस्तासां निबोधत॥ १॥
अदितिने कश्यपसे शक्तिशाली 'आदित्य' नामक पुत्रको उत्पन्न किया। उस आदित्यकी संज्ञा, राज्ञी, प्रभा तथा छाया नामवाली चार पत्नियाँ थीं। उनके पुत्रोंको सुनो—
संज्ञा त्वाष्ट्री च सुषुवे सूर्यन्मनुमनुत्तमम्।
यमं च यमुनां चैव राज्ञी रैवतमेव च॥ २॥
त्वष्टा (विश्वकर्मा)-की पुत्री संज्ञाने सूर्यसे श्रेष्ठ मनु, यम और यमुनाको उत्पन्न किया और राज्ञीने रैवतको उत्पन्न किया।
प्रभा प्रभातमादित्याच्छाया सावर्णिमात्मजम्।
शनिं च तपतीं चैव विष्टिं चैव यथाक्रमम्॥ ३॥
प्रभाने आदित्यसे प्रभातको उत्पन्न किया। छायाने क्रमशः सावर्णि, शनि, तपती और विष्टि नामक संतानोंको जन्म दिया॥ १—३॥