भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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१३२* कूर्मपुराण *

| मनोस्तु प्रथमस्यासन् नव पुत्रास्तु संयमाः।<br>इक्ष्वाकुर्नभगश्चैव धृष्टः शर्यातिरेव च॥ ४ ॥<br>नरिष्यन्तश्च नाभागो हारिष्टः कारुषकस्तथा।<br>पृषध्रश्च महातेजा नवैते शक्रसंनिभाः॥ ५ ॥<br>इला ज्येष्ठा वरिष्ठा च सोमवंशविवृद्धये।<br>बुधस्य गत्वा भवनं सोमपुत्रेण संगता॥ ६ ॥ | प्रथम मनुके नौ पुत्र थे जो इक्ष्वाकु, नभग, धृष्ट, शर्याति, नरिष्यन्त, नाभाग, अरिष्ट, कारुषक तथा पृषध्र नामवाले थे। ये नवों पुत्र इन्द्रियजयी, महान् तेजसे सम्पन्न तथा इन्द्रके समान थे॥ ४-५॥<br>(मनुकी) ज्येष्ठ एवं वरिष्ठ (पुत्री) इलाने* सोमवंशकी अभिवृद्धिके लिये बुधके भवनमें जाकर सोमपुत्र (बुध)-के साथ संगति की और हमने सुना है कि उस | | असूत सौम्यजं देवी पुरूरवसमुत्तमम्।<br>पितॄणां तृप्तिकर्तारं बुधादिति हि नः श्रुतम्॥ ७ ॥ | देवीने बुधसे श्रेष्ठ पुरूरवाको उत्पन्न किया। वह पितरोंको तृप्ति प्रदान करनेवाला था। (पुत्र प्राप्त करनेके उपरान्त इलाको) विशुद्ध पुरुषत्वकी प्राप्ति हुई जो | | सम्प्राप्य पुंस्त्वममलं सुद्युम्न इति विश्रुतः।<br>इला पुत्रत्रयं लेभे पुनः स्त्रीत्वमविन्दत॥ ८ ॥ | सुद्युम्न नामसे विख्यात हुआ। (पुरुषरूपमें) इलाने उत्कल, गय तथा विनताश्व नामक तीन पुत्रोंको प्राप्त | | उत्कलश्च गयश्चैव विनताश्वस्तथैव च।<br>सर्वे तेऽप्रतिमप्रख्याः प्रपन्नाः कमलोद्भवम्॥ ९ ॥<br>इक्ष्वाकोश्चाभवद् वीरो विकुक्षिर्नाम पार्थिवः।<br>ज्येष्ठः पुत्रशतस्यापि दश पञ्च च तत्सुताः॥ १० ॥ | किया, तदनन्तर वह पुनः स्त्री हो गयी, वे सभी अतुलनीय कीर्तिमान् तथा ब्रह्मपरायण थे॥ ६-९॥<br>मनुके ज्येष्ठ पुत्र इक्ष्वाकुसे विकुक्षि नामक वीर राजा हुए। विकुक्षि सौ पुत्रोंमें ज्येष्ठ थे। उनके पंद्रह पुत्र | | तेषां ज्येष्ठः ककुत्स्थोऽभूत् काकुत्स्थो हि सुयोधनः।<br>सुयोधनात् पृथुः श्रीमान् विश्वकश्च पृथोः सुतः॥ ११ ॥ | हुए। उनमें ककुत्स्थ सबसे बड़े थे। ककुत्स्थका पुत्र सुयोधन था। सुयोधनसे श्रीमान् पृथु उत्पन्न हुए और विश्वक पृथुके पुत्र थे। विश्वकसे बुद्धिमान् आर्द्रक हुए | | विश्वकादार्द्रको धीमान् युवनाश्वस्तु तत्सुतः।<br>स गोकर्णमनुप्राप्य युवनाश्वः प्रतापवान्॥ १२ ॥ | और उनके पुत्र युवनाश्व हुए। प्रतापी वे युवनाश्व गोकर्ण तीर्थमें गये॥ १०-१२॥ | | दृष्ट्वा तु गौतमं विप्रं तपन्तममलप्रभम्।<br>प्रणम्य दण्डवद् भूमौ पुत्रकामो महीपतिः।<br>अपृच्छत् कर्मणा केन धार्मिकं प्राप्नुयात् सुतम्॥ १३॥ | वहाँ तप कर रहे अग्नि-सदृश विप्र गौतमका दर्शन-कर पुत्र-प्राप्तिकी इच्छासे युवनाश्वने भूमिमें दण्डवत् प्रणाम किया और उनसे (गौतमसे) पूछा- (भगवन्!) किस कर्मके द्वारा धर्मात्मा पुत्रको प्राप्त किया जा सकता है—॥ १३॥ | | गौतम उवाच | गौतमने कहा— आदि और अन्तसे रहित, अनामय, | | आराध्य पूर्वपुरुषं नारायणमनामयम्।<br>अनादिनिधनं देवं धार्मिकं प्राप्नुयात् सुतम्॥ १४ ॥<br>यस्य पुत्रः स्वयं ब्रह्मा पौत्रः स्यान्नीललोहितः।<br>तमादिकृष्णामीशानमाराध्याप्नोति सत्सुतम्॥ १५ ॥<br>न यस्य भगवान् ब्रह्मा प्रभावं वेत्ति तत्त्वतः।<br>तमाराध्य हृषीकेशं प्राप्नुयाद्धार्मिकं सुतम्॥ १६॥<br>स गौतमवचः श्रुत्वा युवनाश्वो महीपतिः।<br>आराधयन्महायोगं वासुदेवं सनातनम्॥ १७ ॥ | पूर्वपुरुष नारायणदेवकी आराधनासे धर्मात्मा पुत्रकी प्राप्ति होती है। जिनके पुत्र स्वयं ब्रह्मा हैं और (जिनके) पौत्र नीललोहित शंकर हैं, उन आदिकृष्ण ईशानकी आराधनासे (मनुष्य) सत्पुत्र प्राप्त करता है। भगवान् ब्रह्मा भी जिनके प्रभावको तत्त्वतः नहीं जानते हैं, उन हृषीकेशकी आराधनासे धार्मिक पुत्रको प्राप्त करना चाहिये॥ १४-१६॥<br>गौतमके वचनको सुनकर उस पृथिवीपति युवनाश्वने महायोगी सनातन वासुदेवकी आराधना प्रारम्भ की॥ १७॥ |


* राजा सुद्युम्नकी कथामें 'इला' की उत्पत्तिका वर्णन है।