संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- अध्याय १९ * १३३
तस्य पुत्रोऽभवद् वीरः श्रावस्तिरिति विश्रुतः।
निर्मिता येन श्रावस्तिर्गौडदेशे महापुरी॥ १८॥
(आराधनाके फलस्वरूप) उसका वीर पुत्र हुआ जो 'श्रावस्ति' इस नामसे विख्यात हुआ। उसने गौडदेशमें श्रावस्ति नामक महापुरीका निर्माण किया॥ १८॥
तस्माच्च बृहदश्वोऽभूत् तस्मात् कुवलयाश्वकः।
धुन्धुमारत्वमगमद् धुन्धुं हत्वा महासुरम्॥ १९॥
धुन्धुमारस्य तनयास्त्रयः प्रोक्ता द्विजोत्तमाः।
दृढाश्वश्चैव दण्डाश्वः कपिलाश्वस्तथैव च॥ २०॥
दृढाश्वस्य प्रमोदस्त्व हर्यश्वस्तस्य चात्मजः।
हर्यश्वस्य निकुम्भस्तु निकुम्भात् संहताश्वकः॥ २१॥
कृशाश्वश्च रणाश्वश्च संहताश्वस्य वै सुतौ।
युवनाश्वो रणाश्वस्य शक्रतुल्यबलो युधि॥ २२॥
उससे (श्रावस्तिसे) बृहदश्व उत्पन्न हुए और उससे कुवलयाश्वक उत्पन्न हुए। धुन्धु नामक महान् असुरको मारनेके कारण वे धुन्धुमारके नामसे प्रसिद्ध हुए। श्रेष्ठ द्विजो! धुन्धुमारके तीन पुत्र कहे गये हैं—दृढाश्व, दण्डाश्व तथा कपिलाश्व। दृढाश्वका प्रमोद और प्रमोदका पुत्र हर्यश्व था। हर्यश्वका पुत्र निकुम्भ था और निकुम्भसे संहताश्वक उत्पन्न हुआ। संहताश्वकके कृशाश्व तथा रणाश्व—ये दो पुत्र हुए। रणाश्वका युद्धमें इन्द्रके तुल्य बलशाली युवनाश्व नामक पुत्र हुआ॥ १९—२२॥
कृत्वा तु वारुणीमिष्टिम्मृषीणां वै प्रसादतः।
लेभे त्वप्रतिमं पुत्रं विष्णुभक्तमनुत्तमम्।
मान्धातारं महाप्राज्ञं सर्वशस्त्रभृतां वरम्॥ २३॥
मान्धातुः पुरुकुत्सोऽभूदम्बरीषश्च वीर्यवान्।
मुचुकुन्दश्च पुण्यात्मा सर्वे शक्रसमा युधि॥ २४॥
अम्बरीषस्य दायादो युवनाश्वोऽपरः स्मृतः।
हरितो युवनाश्वस्य हरितस्तत्सुतोऽभवत्॥ २५॥
युवनाश्वने ऋषियोंकी कृपासे वारुणी नामक यागका (वारुणी नामकी इष्टिका) अनुष्ठान करके अप्रतिम महान् बुद्धिमान्, शस्त्रधारियोंमें सर्वश्रेष्ठ तथा उत्तम विष्णुभक्त मान्धाता नामक पुत्रको प्राप्त किया। मान्धाताके पुरुकुत्स, वीर्यवान् अम्बरीष तथा पुण्यात्मा मुचुकुन्द नामक पुत्र हुए। युद्धमें वे सभी इन्द्रके समान थे। अम्बरीषका पुत्र दूसरा युवनाश्व* कहलाता है। युवनाश्वका पुत्र हरित और उसका पुत्र हारित हुआ॥ २३—२५॥
पुरुकुत्सस्य दायादस्त्रसदस्युर्महायशाः।
नर्मदायां समुत्पन्नः सम्भूतिस्तत्सुतोऽभवत्॥ २६॥
विष्णुवृद्धः सुतस्तस्य त्वनरण्योऽभवत् परः।
बृहदश्वोऽनरण्यस्य हर्यश्वस्तत्सुतोऽभवत्॥ २७॥
सोऽतीव धार्मिको राजा कर्दमस्य प्रजापतेः।
प्रसादाद्धार्मिकं पुत्रं लेभे सूर्यपरायणम्॥ २८॥
स तु सूर्य्यं समभ्यर्च्य राजा वसुमनाः शुभम्।
लेभे त्वप्रतिमं पुत्रं त्रिधन्वानमरिंदमम्॥ २९॥
अयजच्चाश्वमेधेन शत्रून् जित्वा द्विजोत्तमाः।
स्वाध्यायवान् दानशीलस्तितिक्षुर्धर्मतत्परः॥ ३०॥
पुरुकुत्सका नर्मदा (नामक पत्नी)-से महायशस्वी त्रसदस्यु नामक पुत्र उत्पन्न हुआ और उसका पुत्र सम्भूति हुआ। उसका (सम्भूतिका) विष्णुवृद्ध तथा दूसरा अनरण्य नामक पुत्र हुआ। अनरण्यका बृहदश्व और उसका पुत्र हर्यश्व हुआ। यही हर्यश्व अत्यन्त धार्मिक राजारूपमें विख्यात हुआ। इसने कर्दम प्रजापतिकी कृपासे धार्मिक सूर्यभक्त (वसुमना नामक) पुत्रको प्राप्त किया। इस वसुमना नामक राजाने सूर्यकी आराधनासे शत्रुओंका दमन करनेवाले अप्रतिम कल्याणकारी त्रिधन्वा नामक पुत्रको प्राप्त किया। श्रेष्ठ द्विजो! स्वाध्यायनिरत, दानशील, सहिष्णु तथा धर्मपरायण (उस) राजाने शत्रुओंको जीतकर अश्वमेध नामक यज्ञ किया॥ २६—३०॥
ऋषयस्तु समाजग्मुर्यज्ञवाटं महात्मनः।
वसिष्ठकश्यपमुखा देवाश्चेन्द्रपुरोगमाः॥ ३१॥
तान् प्रणम्य महाराजः पप्रच्छ विनयान्वितः।
समाप्य विधिवद् यज्ञं वसिष्ठादीन् द्विजोत्तमान्॥ ३२॥
उस महात्माके यज्ञस्थलमें वसिष्ठ तथा कश्यप आदि प्रमुख ऋषिगण तथा इन्द्र आदि देवता आये। विधिपूर्वक यज्ञ पूर्ण करके उन वसिष्ठ आदि द्विजोत्तमोंको प्रणामकर महाराज (वसुमना)-ने विनयपूर्वक उनसे पूछा—॥ ३१-३२॥
* इस वंशवर्णनके अनुसार यह तीसरा युवनाश्व है। पहला आर्द्रकका पुत्र, दूसरा रणाश्वका पुत्र और तीसरा यह अम्बरीषका पुत्र।