भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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१३४* कूर्मपुराण *

| वसुमना उवाच | वसुमनाने कहा—श्रेष्ठ ब्राह्मणो! आप सब कुछ | | किंस्विच्छ्रेयस्करतरं लोकेऽस्मिन् ब्राह्मणर्षभाः। | जाननेवाले हैं। मुझे यह बतलाइये कि इस संसारमें यज्ञ, | | यज्ञस्तपो वा संन्यासो ब्रूत मे सर्ववेदिनः॥ ३३॥ | तप अथवा संन्यासमें कौन अधिक श्रेयस्कर है?॥ ३३॥ | | वसिष्ठ उवाच | वसिष्ठ बोले—आत्मवान्‌को चाहिये कि वह वेदोंका | | अधीत्य वेदान् विधिवत् पुत्रानुत्पाद्य धर्मतः। | विधिवत् अध्ययन करके धर्मपूर्वक पुत्रोंको उत्पन्न करे | | इष्ट्वा यज्ञेश्वरं यज्ञैर्गच्छेद् वनमथात्मवान् ॥ ३४ ॥ | और यज्ञोंद्वारा यज्ञेश्वरका यजनकर वनमें जाय॥ ३४॥ | | पुलस्त्य उवाच | पुलस्त्यने कहा—सर्वप्रथम श्रेष्ठ देवोंकी यज्ञद्वारा | | आराध्य तपसा देवं योगिनं परमेष्ठिनम्। | अर्चना करके और तपस्याद्वारा योगी देव परमेश्वरकी आराधना करके विधिपूर्वक संन्यास ग्रहण करना | | प्रव्रजेद् विधिवद् यज्ञैरिष्ट्वा पूर्वं सुरोत्तमान् ॥ ३५ ॥ | चाहिये॥ ३५॥ | | पुलह उवाच | पुलह बोले—जिन्हें अद्वितीय, पुराणपुरुष तथा | | यमाहुरेकं पुरुषं पुराणं परमेश्वरम्। | परमेश्वर कहा गया है, उन सहस्रकिरण (सूर्य)-की | | तमाराध्य सहस्रांशुं तपसा मोक्षमाप्नुयात् ॥ ३६ ॥ | तपस्याद्वारा आराधना करके मोक्ष प्राप्त करना चाहिये॥ ३६॥ | | जमदग्निरुवाच | जमदग्निने कहा—जिन भगवान् ईश्वरने अजन्मा | | अजस्य नाभावध्येकमीश्वरेण समर्पितम्। | (ब्रह्मा)-की नाभिमें अद्वितीय बीज (जगत्कारण ब्रह्मा)-को स्थापित किया, उन देवकी तपस्याद्वारा आराधना की | | बीजं भगवता येन स देवस्तपसेज्यते॥ ३७॥ | जानी चाहिये॥ ३७॥ | | विश्वामित्र उवाच | विश्वामित्रने कहा—जो अग्निस্বরূপ, सर्वात्मक, | | योऽग्निः सर्वात्मकोऽनन्तः स्वयम्भूविश्वतोमुखः। | अनन्त, स्वयम्भू तथा सर्वतोमुख हैं, वे रुद्र उग्र | | स रुद्रस्तपसोग्रेण पूज्यते नेतैर्र्मखैः॥ ३८॥ | तपस्याद्वारा पूजनीय हैं न कि अन्य किसी दूसरे यज्ञ आदि साधनोंद्वारा॥ ३८॥ | | भरद्वाज उवाच | भरद्वाज बोले—यज्ञोंद्वारा जिन सनातन अग्निदेवकी | | यो यज्ञैरिज्यते देवो जातवेदाः सनातनः। | पूजा की जाती है, वे सभी देवताओंके विग्रहरूप | | स सर्वदैवततनुः पूज्यते तपसेश्वरः॥ ३९॥ | परमेश्वर ही तपके द्वारा पूजित होते हैं॥ ३९॥ | | अत्रिरुवाच | अत्रि बोले—वे महेश्वर अत्यन्त महान् तपके | | यतः सर्वमिदं जातं यस्यापत्यं प्रजापतिः। | द्वारा पूजे जाते हैं, जिनसे यह सब उत्पन्न हुआ है और | | तपः सुमहदास्थाय पूज्यते स महेश्वरः ॥ ४० ॥ | प्रजापति जिनकी संतान हैं॥ ४०॥ | | गौतम उवाच | गौतमने कहा—जिससे प्रधान अर्थात् पुरुष और | | यतः प्रधानपुरुषौ यस्य शक्तिमयं जगत्। | प्रकृति उत्पन्न हुए हैं और जिनकी शक्तिसे यह जगत् (उत्पन्न) हुआ है, वे सनातन देवाधिदेव तपस्याद्वारा | | स देवदेवस्तपसा पूजनीयः सनातनः ॥ ४१ ॥ | पूजनीय हैं॥ ४१॥ | | कश्यप उवाच | कश्यपने कहा—तपद्वारा आराधना करनेसे वे | | सहस्रनयनो देवः साक्षी स तु प्रजापतिः। | हजारों नेत्रवाले, साक्षी, महायोगी, प्रजापति प्रभु प्रसन्न | | प्रसीदति महायोगी पूजितस्तपसा परः॥ ४२॥ | होते हैं॥ ४२॥ | | ऋतुरुवाच | ऋतु बोले—अध्ययनरूपी यज्ञ पूर्ण कर पुत्र प्राप्त | | प्राप्ताध्ययनयज्ञस्य लब्धपुत्रस्य चैव हि। | कर लेनेवाले पुरुषके लिये तपस्याके अतिरिक्त कोई | | नान्तरेण तपः कश्चिद्धर्मः शास्त्रेषु दृश्यते ॥ ४३ ॥ | और दूसरा धर्म शास्त्रोंमें दिखायी नहीं देता ॥ ४३ ॥ |