भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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  • अध्याय १९ * | १३५ ---|---

इत्याकर्ण्य स राजर्षिस्तान् प्रणम्यातिहृष्टधीः।
विसर्जयित्वा सम्पूज्य त्रिधन्वानमथाब्रवीत्॥ ४४॥

आराधयिष्ये तपसा देवमेकाक्षराह्वयम्।
प्राणं बृहन्तं पुरुषमादित्यान्तरसंस्थितम्॥ ४५॥

त्वं तु धर्मरतो नित्यं पालयैतदतन्द्रितः।
चातुर्वर्ण्यसमायुक्तमशेषं क्षितिमण्डलम्॥ ४६॥

एवमुक्त्वा स तद्राज्यं निधायात्मभवे नृपः।
जगामारण्यमनघस्तपश्कर्तुमनुत्तमम् ॥ ४७॥

हिमवच्छिखरे रम्ये देवदारुवने शुभे।
कन्दमूलफलाहारो मुन्यन्नैरयजत् सुरान्॥ ४८॥

संवत्सरशतं साग्रं तपोनिर्धूतकल्मषः।
जजाप मनसा देवीं सावित्रीं वेदमातरम्॥ ४९॥

तस्यैवं जपतो देवः स्वयम्भूः परमेश्वरः।
हिरण्यगर्भो विश्वात्मा तं देशमगमत् स्वयम्॥ ५०॥

दृष्ट्वा देवं समायान्तं ब्रह्माणं विश्वतोमुखम्।
ननाम शिरसा तस्य पादयोर्नाम कीर्तयन्॥ ५१॥

नमो देवाधिदेवाय ब्रह्मणे परमात्मने।
हिरण्यमूर्तये तुभ्यं सहस्राक्षाय वेधसे॥ ५२॥

नमो धात्रे विधात्रे च नमो वेदात्ममूर्तये।
सांख्ययोगाधिगम्याय नमस्ते ज्ञानमूर्तये॥ ५३॥

नमस्त्रिमूर्तये तुभ्यं स्रष्ट्रे सर्वार्थवेदिने।
पुरुषाय पुराणाय योगिनां गुरवे नमः॥ ५४॥

ततः प्रसन्नो भगवान् विरिञ्चो विश्वभावनः।
वरं वरय भद्रं ते वरदोऽस्मीत्यभाषत॥ ५५॥

राजोवाच
जपेयं देवदेवेश गायत्रीं वेदमातरम्।
भूयो वर्षशतं साग्रं तावदायुर्र्भवेन्मम॥ ५६॥

बाढमित्याह विश्वात्मा समालोक्य नराधिपम्।
स्पृष्ट्वा कराभ्यां सुप्रीतस्तत्रैवान्तरधीयत॥ ५७॥

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ऐसा सुनकर अत्यन्त प्रसन्न मनवाले उस वसुमना राजर्षिने उन द्विजश्रेष्ठोंको प्रणाम किया और पूजनकर उन्हें बिदा किया। तदनन्तर (उसने अपने पुत्र) त्रिधन्वासे (इस प्रकार) कहा—तपद्वारा मैं सूर्यमण्डलके मध्यमें स्थित, प्राणरूप अद्वितीय अक्षर नामक ब्रह्म पुरुषकी आराधना करूँगा। तुम धर्ममें निरत होकर चातुर्वर्ण्यसे समन्वित इस सम्पूर्ण पृथ्वीमण्डलका आलस्यरहित होकर पालन करो॥ ४४—४६॥

ऐसा कहकर वह अनघ राजा वसुमना अपने पुत्र (त्रिधन्वा)-को राज्य सौंपकर सर्वोत्तम तपस्या करनेके लिये वनमें चला गया। ये वसुमना राजा हिमालयके शिखरपर स्थित रमणीय शुभ देवदारु वनमें रहते हुए कन्दमूल एवं फलोंका आहार करते हुए मुनियोंके अन्न (नीवार आदि)-से देवताओंकी प्रसन्नताके लिये यज्ञ (आराधना) करने लगे। तपस्याद्वारा नष्ट हुए पापोंवाले उन्होंने सौ वर्षोंसे भी अधिक समयतक वेदमाता देवी सावित्रीका मानसिक जप किया। उनके इस प्रकार जप करते रहनेपर ही स्वयम्भू देव परमेश्वर हिरण्यगर्भ विश्वात्मा स्वयं उस स्थानपर गये। विश्वतोमुख ब्रह्मदेवको आते हुए देखकर उन्होंने अपना नाम बोलते हुए उनके चरणोंमें सिरसे प्रणाम किया और इस प्रकार कहा— ॥ ४७–५१॥

देवाधिदेव परमात्मा ब्रह्मको नमस्कार है। सहस्र नेत्रोंवाले हिरण्यमूर्ति आप वेधाको नमस्कार है। धाता और विधाताको नमस्कार है, वेदात्ममूर्तिको नमस्कार है। सांख्य तथा योगद्वारा ज्ञात होनेवाले ज्ञान-मूर्तिको नमस्कार है। सभी अर्थोंके ज्ञाता, सृष्टिकर्ता, त्रिमूर्तिरूप आपको नमस्कार है। योगियोंके गुरु पुराणपुरुषको नमस्कार है॥ ५२–५४॥

तब प्रसन्न होकर विश्वभावन भगवान् ब्रह्माने कहा—'वर माँगो, तुम्हारा कल्याण हो, मैं तुम्हें वर दूँगा'॥ ५५॥

**राजाने कहा—**देवदेवेश! मैं पुनः सौ वर्षसे अधिक समयतक इस वेदमाता गायत्रीका जप कर सकूँ, इसके लिये उतनी ही मेरी आयु हो। राजाको देखकर विश्वात्माने 'बहुत अच्छा' ऐसा कहा और प्रसन्न होकर हाथोंसे (राजाका) स्पर्शकर वे वहीं अन्तर्धान हो गये॥ ५६-५७॥