भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished506 पृष्ठ

पृष्ठ 146, कुल 506 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 146
१३६* कूर्मपुराण *
सोऽपि लब्धवरः श्रीमान् जजापातिप्रसन्नधीः।<br>शान्तस्त्रिषवणस्नायी कन्दमूलफलाशनः ॥ ५८ ॥वर-प्राप्त वह श्रीमान् (राजा) भी तीनों समयोंमें स्नान करते हुए तथा कन्दमूल एवं फलोंका आहार करते हुए अत्यन्त प्रसन्न-मनसे शान्तिपूर्वक जप करने लगे।
तस्य पूर्णे वर्षशते भगवानुग्रदीधितिः।<br>प्रादुरासीन्महायोगी भानोर्मण्डलमध्यतः॥ ५९॥उनके (जप करते हुए) सौ वर्ष पूरा होनेपर सूर्यमण्डलके मध्यसे प्रज्वलित किरणोंवाले महायोगी भगवान् प्रकट हुए।
तं दृष्ट्वा वेदविदुषं मण्डलस्थं सनातनम्।<br>स्वयम्भुवमनाद्यन्तं ब्रह्माणं विस्मयं गतः॥ ६० ॥मण्डलमें स्थित उन सनातन, स्वयम्भू, अनादि, अनन्त तथा वेदज्ञ ब्रह्माको देखकर वे राजा आश्चर्यचकित हुए।
तुष्टाव वैदिकैर्मन्त्रैः सावित्र्या च विशेषतः।<br>क्षणादपश्यत् पुरुषं तमेव परमेश्वरम् ॥ ६१ ॥उन्होंने वैदिक मन्त्रों तथा विशेषरूपसे गायत्री (मन्त्र)-द्वारा उनकी स्तुति की। क्षणभरमें ही उन्होंने उन परमेश्वर पुरुषको
चतुर्मुखं जटामौलिमष्टहस्तं त्रिलोचनम्।<br>चन्द्रावयवलक्ष्माणं नरनारीतनुं हरम्॥ ६२ ॥चार मुखवाले, जटा तथा मुकुटधारी, आठ हाथ तथा तीन नेत्रवाले, चन्द्रकलाओंसे चिह्नित अर्धनारीश्वर शरीरवाले,
भासयन्तं जगत् कृत्स्नं नीलकण्ठं स्वरश्मिभिः।<br>रक्ताम्बरधरं रक्तं रक्तमाल्यानुलेपनम्॥ ६३॥अपनी किरणोंद्वारा सम्पूर्ण जगत्को प्रकाशित करते हुए, रक्तवस्त्र धारण किये, रक्तवर्णवाले तथा रक्तमाला और रक्त अनुलेपन धारण किये नीलकण्ठ हरके रूपमें देखा ॥ ५८-६३ ॥
तद्भावभावितो दृष्ट्वा सद्भावेन परेण हि।<br>ननाम शिरसा रुद्रं सावित्र्यानेन चैव हि॥ ६४ ॥उन्हें देखकर उन्हींके भावसे भावित होकर परम सद्भावसे राजाने सिरसे रुद्रको प्रणाम किया और सावित्री-मन्त्र तथा इस स्तोत्रसे स्तुति की।
नमस्ते नीलकण्ठाय भास्वते परमेष्ठिने।<br>त्रयीमयाय रुद्राय कालरूपाय हेतवे ॥ ६५ ॥वेदत्रयीरूप, रुद्र, कालरूप, कारणस्वरूप भासमान परमेष्ठी नीलकण्ठको नमस्कार है ॥ ६४-६५ ॥
तदा प्राह महादेवो राजानं प्रीतमानसः।<br>इमानि मे रहस्यानि नामानि शृणु चानघ॥ ६६॥तब प्रसन्न मनवाले महादेवने राजासे कहा— हे निष्पाप ! मेरे इन गोपनीय नामोंको सुनो।
सर्ववेदेषु गीतानि संसारशमनानि तु।<br>नमस्कुरुष्व नृपते एभिर्मां सततं शुचिः॥ ६७ ॥ये सभी वेदोंमें वर्णित हैं तथा संसार (सागर)-का नाश करनेवाले हैं। राजन् ! पवित्र होकर इन नामोंसे मुझे निरन्तर नमस्कार करो।
अध्यायं शतरुद्रीयं यजुषां सारमुद्धृतम्।<br>जपस्वानन्यचेतस्को मय्यासक्तमना नृप॥ ६८ ॥राजन् ! यजुर्वेदसे साररूपमें उद्धृत शतरुद्रीका अनन्यमन होकर मुझमें मन लगाकर जप करो।
ब्रह्मचारी मिताहारो भस्मनिष्ठः समाहितः।<br>जपेदामरणाद् रुद्रं स याति परमं पदम्॥ ६९ ॥जो ब्रह्मचर्य धारणकर, संयमित आहार ग्रहणकर, भस्मका लेपकर एकाग्रतापूर्वक मरणपर्यन्त रुद्रका जप करता है, वह परम पद प्राप्त करता है।
इत्युक्त्वा भगवान् रुद्रो भक्तानुग्रहकाम्यया।<br>पुनः संवत्सरशतं राज्ञे ह्यायुरकल्पयत् ॥ ७० ॥ऐसा कहकर भक्तपर अनुग्रह करनेकी इच्छासे भगवान् रुद्रने राजाकी आयु पुनः सौ वर्षोंतक कर दी ॥ ६६-७० ॥
दत्त्वास्मै तत् परं ज्ञानं वैराग्यं परमेश्वरः।<br>क्षणादन्तर्दधे रुद्रस्तदद्भुतमिवाभवत् ॥ ७१ ॥राजा वसुमनाको परम ज्ञान और वैराग्य प्रदानकर परमेश्वर रुद्र क्षणभरमें ही अन्तर्धान हो गये। यह एक आश्चर्य ही हुआ।
राजापि तपसा रुद्रं जजापानन्यमानसः।<br>भस्मच्छन्नस्त्रिषवणं स्नात्वा शान्तः समाहितः ॥ ७२ ॥राजाने भी तीनों कालोंमें स्नानकर, भस्म धारणकर, शान्त और एकाग्रतापूर्वक अनन्य-मनसे तपस्याद्वारा रुद्रका जप किया।
जपतस्तस्य नृपतेः पूर्णे वर्षशते पुनः।<br>योगप्रवृत्तिरभवत् कालात् कालात्मकं परम्॥ ७३ ॥जप करते हुए उन राजाके पुनः सौ वर्ष पूरे हो जानेपर उसमें योगकी प्रवृत्ति हुई और यथासमय उन्होंने श्रेष्ठ