संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished506 पृष्ठ
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- अध्याय २० * | १३७ ---|---
विवेश तद् वेदसारं स्थानं वै परमेष्ठिनः।
भानोः स मण्डलं शुभ्रं ततो यातो महेश्वरम्॥ ७४॥
यः पठेच्छृणुयाद् वापि राज्ञश्चरितमुत्तमम्।
सर्वपापविनिर्मुक्तो ब्रह्मलोके महीयते॥ ७५॥ | कालात्मक परमेष्ठीके उस वेदसार नामक स्थानको प्राप्त किया जो सूर्यका शुभ्र मण्डल है। तदनन्तर वे महेश्वरको प्राप्त हुए॥ ७१—७४॥
राजाके इस उत्तम चरितको जो पढ़ता है अथवा सुनता है, वह सभी पापोंसे मुक्त होकर ब्रह्मलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है॥ ७५॥
इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायां पूर्वविभागे एकोनविंशोऽध्यायः॥ १९॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें उन्नीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ १९॥
बीसवाँ अध्याय
इक्ष्वाकु-वंश-वर्णनके प्रसंगमें श्रीराम-कथाका प्रतिपादन, श्रीरामद्वारा सेतु-बन्धन और रामेश्वर-लिंगकी स्थापना, शंकर-पार्वतीका प्रकट होकर रामेश्वर-लिंगके माहात्म्यको बतलाना, श्रीरामको लव-कुश-पुत्रोंकी प्राप्ति तथा इक्ष्वाकु-वंशके अन्तिम राजाओंका वंश-वर्णन
| सूत उवाच | सूतजी बोले— |
|---|---|
| त्रिधन्वा राजपुत्रस्तु धर्मेणापालयन्महीम्। | |
| तस्य पुत्रोऽभवद् विद्वांस्त्रय्यारुण इति स्मृतः॥ १॥ | |
| तस्य सत्यव्रतो नाम कुमारोऽभून्महाबलः। | |
| भार्या सत्यधना नाम हरिश्चन्द्रमजीजनत्॥ २॥ | |
| हरिश्चन्द्रस्य पुत्रोऽभूद् रोहितो नाम वीर्यवान्। | |
| हरितो रोहितस्याथ धुन्धुस्तस्य सुतोऽभवत्॥ ३॥ | |
| विजयश्च सुदेवश्च धुन्धुपुत्रौ बभूवतुः। | |
| विजयस्याभवत् पुत्रः कारुको नाम वीर्यवान्॥ ४॥ | |
| कारुकस्य वृकः पुत्रस्तस्माद् बाहुरजायत। | |
| सगरस्तस्य पुत्रोऽभूद् राजा परमधार्मिकः॥ ५॥ | |
| द्वे भार्ये सगरस्यापि प्रभा भानुमती तथा। | |
| ताभ्यामाराधितः प्रादादौर्वाग्निवर्रमुत्तमम्॥ ६॥ | |
| एकं भानुमती पुत्रमगृह्णादसमञ्जसम्। | |
| प्रभा षष्टिसहस्रं तु पुत्राणां जगृहे शुभा॥ ७॥ | |
| असमञ्जस्य तनयो ह्यंशुमान् नाम पार्थिवः। | |
| तस्य पुत्रो दिलीपस्तु दिलीपात् तु भगीरथः॥ ८॥ | |
| येन भागीरथी गङ्गा तपः कृत्वावतारिता। | |
| प्रसादाद् देवदेवस्य महादेवस्य धीमतः॥ ९॥ | |
| भगीरथस्य तपसा देवः प्रीतमना हरः। | |
| बभार शिरसा गङ्गां सोमान्ते सोमभूषणः॥ १०॥ | राजपुत्र त्रिधन्वाने पृथ्वीका धर्मपूर्वक पालन किया। उसका एक विद्वान् पुत्र हुआ जो त्रय्यारुण नामसे प्रसिद्ध हुआ। उसको (त्रय्यारुणको) सत्यव्रत नामका महान् बलवान् पुत्र हुआ। सत्यधना नामक उसकी पत्नीने हरिश्चन्द्रको जन्म दिया। हरिश्चन्द्रको रोहित नामवाला पराक्रमी पुत्र हुआ। रोहितका हरित और उसका पुत्र धुन्धु हुआ। धुन्धुके विजय और सुदेव—ये दो पुत्र हुए। विजयका कारुक नामका वीर पुत्र हुआ। कारुकका पुत्र वृक और उससे बाहु (नामक पुत्र) उत्पन्न हुआ। उस बाहुका पुत्र सगर हुआ जो परम धार्मिक था। सगरकी दो पत्नियाँ थीं—प्रभा और भानुमती। और्वाग्निने उन दोनोंसे पूजित होकर उन्हें श्रेष्ठ वर प्रदान किया॥ १–६॥<br><br>(वरके फलस्वरूप) भानुमतीने असमञ्जस नामक पुत्रको ग्रहण किया और कल्याणी प्रभाने साठ हजार पुत्रोंको प्राप्त किया। असमञ्जसके पुत्र अंशुमान् नामक राजा थे, उनके पुत्र दिलीप तथा दिलीपसे भगीरथ हुए, जिन्होंने तपस्या करके देवाधिदेव धीमान् महादेवकी कृपासे भागीरथी गङ्गाको (पृथ्वीपर) अवतारित किया॥ ७–९॥<br><br>भगीरथकी तपस्यासे प्रसन्न हुए मनवाले चन्द्रभूषण देव हरने अपने सिरपर स्थित चन्द्रमाके अग्रभागमें गङ्गाको धारण किया॥ १०॥ |