भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished506 पृष्ठ

पृष्ठ 148, कुल 506 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 148
१३८* कूर्मपुराण *

| भगीरथसुतश्चापि श्रुतो नाम बभूव ह।<br>नाभागस्तस्य दायादः सिन्धुद्वीपस्ततोऽभवत् ॥ ११ ॥<br>अयुतायुः सुतस्तस्य ऋतुपर्णस्तु तत्सुतः।<br>ऋतुपर्णस्य पुत्रोऽभूत् सुदासो नाम धार्मिकः।<br>सौदासस्तस्य तनयः ख्यातः कल्माषपादकः ॥ १२ ॥<br>वसिष्ठस्तु महातेजाः क्षेत्रे कल्माषपादके।<br>अश्मकं जनयामास तमिक्ष्वाकुकुलध्वजम् ॥ १३ ॥<br>अश्मकस्योत्कलायां तु नकुलो नाम पार्थिवः।<br>स हि रामभयाद् राजा वनं प्राप सुदुःखितः ॥ १४ ॥<br>विभ्रत् स नारीकवचं तस्माच्छतरथोऽभवत्।<br>तस्माद् बिलिबिश्रिः श्रीमान् वृद्धशर्मा च तत्सुतः ॥ १५ ॥<br>तस्माद् विश्वसहस्तस्मात् खट्वाङ्ग इति विश्रुतः।<br>दीर्घबाहुः सुतस्तस्य रघुस्तस्मादजायत ॥ १६ ॥<br>रघोरजः समुत्पन्नो राजा दशरथस्ततः।<br>रामो दाशरथिर्वीरो धर्मज्ञो लोकविश्रुतः ॥ १७ ॥<br><br>भरतो लक्ष्मणश्चैव शत्रुघ्नश्च महाबलः।<br>सर्वे शक्रसमा युद्धे विष्णुशक्तिसमन्विताः।<br>जज्ञे रावणनाशार्थं विष्णुरंशेन विश्वकृत् ॥ १८ ॥<br>रामस्य सुभगा भार्या जनकस्यात्मजा शुभा।<br>सीता त्रिलोकविख्याता शीलौदार्यगुणान्विता ॥ १९ ॥<br><br>तपसा तोषिता देवी जनकेन गिरीन्द्रजा।<br>प्रायच्छज्जानकीं सीतां राममेवाश्रिता पतिम् ॥ २० ॥<br>प्रीतश्च भगवानीशस्त्रिशूली नीललोहितः।<br>प्रददौ शत्रुनाशार्थं जनकायाद्भुतं धनुः ॥ २१ ॥<br>स राजा जनको विद्वान् दातुकामः सुतामिमाम्।<br>अघोषयदमित्रघ्नो लोकेऽस्मिन् द्विजपुंगवाः ॥ २२ ॥<br>इदं धनुः समादातुं यः शक्नोति जगत्त्रये।<br>देवो वा दानवो वापि स सीतां लब्धुमर्हति ॥ २३ ॥ | भगीरथका भी श्रुत नामक पुत्र हुआ और उसका पुत्र हुआ नाभाग। उससे सिन्धुद्वीप हुआ। उस सिन्धुद्वीपका पुत्र अयुतायु और उसका पुत्र ऋतुपर्ण हुआ। ऋतुपर्णका सुदास नामका धार्मिक पुत्र हुआ। उसका पुत्र सौदास हुआ जो कल्माषपाद नामसे विख्यात हुआ॥ ११-१२॥<br>कल्माषपादके क्षेत्रमें महातेजस्वी वसिष्ठने इक्ष्वाकु-वंशके पताकारूप अश्मक नामक पुत्रको उत्पन्न कराया।<br>अश्मककी उत्कला नामक पत्नीसे नकुल नामक राजा उत्पन्न हुआ। वह राजा परशुरामके भयसे अत्यन्त दुःखित होकर वन चला गया। उसने ‘नारी-कवच’* धारण कर रखा था। उस (नकुल)-से शतरथ हुआ और उससे श्रीमान् बिलिबिश्रि उत्पन्न हुआ। उसका पुत्र वृद्धशर्मा था। उस वृद्धशर्मासे विश्वसह और उसका पुत्र खट्वाङ्ग नामसे विख्यात हुआ। उसका पुत्र दीर्घबाहु और उससे रघु उत्पन्न हुआ॥ १३-१६॥<br>रघुका अज उत्पन्न हुआ और उससे राजा दशरथ हुए। दशरथके पुत्र राम वीर, धर्मज्ञ और लोकमें प्रसिद्ध हुए। दशरथके ही पुत्र भरत, लक्ष्मण तथा शत्रुघ्न भी थे। ये सभी महान् बलशाली, युद्धमें इन्द्रके समान और विष्णुकी शक्तिसे सम्पन्न थे। रावणका विनाश करनेके लिये विश्वकर्ता विष्णु ही इन लोगोंके रूपमें अंशरूपसे प्रकट हुए थे॥ १७-१८॥<br>रामकी सौभाग्यशालिनी कल्याणी पत्नी जनककी पुत्री सीता थीं। वे शील एवं उदारता आदि गुणोंसे सम्पन्न और तीनों लोकोंमें विख्यात थीं। जनकके द्वारा तपस्यासे संतुष्ट की गयी गिरिराजपुत्री पार्वतींने उन्हें जानकी सीताको प्रदान किया। सीताने रामको ही पति बनाया॥ १९-२०॥<br>त्रिशूल धारण करनेवाले, नीललोहित भगवान् ईश (शंकर)-ने प्रसन्न होकर शत्रुओंके विनाशके लिये जनकको अद्भुत धनुष प्रदान किया था। श्रेष्ठ द्विजो! उस विद्वान् शत्रुनाशक राजा जनकने इस कन्याका दान करनेकी इच्छासे संसारमें यह घोषणा करवायी कि देवता या दानव जो कोई भी इस धनुषको उठानेमें समर्थ होगा, वह सीताको प्राप्त कर सकता है॥ २१-२३॥ |


* परशुरामद्वारा पृथ्वीके क्षत्रियशून्य किये जानेके समय स्त्रियोंके मध्य रहकर नकुलने अपनी रक्षा की थी, इसलिये उसे 'नारी-कवच' कहा जाता है।