संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें* अध्याय २० * । १३९
| विज्ञाय रामो बलवान् जनकस्य गृहं प्रभुः ।<br>भञ्जयामास चादाय गत्वासौ लीलयैव हि ॥ २४ ॥<br><br>उद्बवाह च तां कन्यां पार्वतीमिव शंकरः ।<br>रामः परमधर्मात्मा सेनामिव च षण्मुखः ॥ २५ ॥<br>ततो बहुतिथे काले राजा दशरथः स्वयम् ।<br>रामं ज्येष्ठं सुतं वीरं राजानं कर्तुमारभत् ॥ २६ ॥<br><br>तस्याथ पत्नी सुभगा कैकेयी चारुभाषिणी ।<br>निवारयामास पतिं प्राह सम्भ्रान्तमानसा ॥ २७ ॥<br><br>मत्सुतं भरतं वीरं राजानं कर्तुमर्हसि ।<br>पूर्वमेव वरो यस्माद् दत्तो मे भवता यतः ॥ २८ ॥<br>स तस्या वचनं श्रुत्वा राजा दुःखितमानसः ।<br>बाढमित्यब्रवीद् वाक्यं तथा रामोऽपि धर्मवित् ॥ २९ ॥<br><br>प्रणम्याथ पितुः पादौ लक्ष्मणेन सहाच्युतः ।<br>ययौ वनं सपत्नीकः कृत्वा समयमात्मवान् ॥ ३० ॥<br><br>संवत्सराणां चत्वारि दश चैव महाबलः ।<br>उवास तत्र मतिमान् लक्ष्मणेन सह प्रभुः ॥ ३१ ॥<br><br>कदाचिद् वसतोऽरण्ये रावणो नाम राक्षसः ।<br>परिव्राजकवेषेण सीतां हृत्वा ययौ पुरीम् ॥ ३२ ॥<br><br>अदृष्ट्वा लक्ष्मणो रामः सीतामाकुलितेन्द्रियौ ।<br>दुःखशोकाभिसंतप्तौ बभूवतुररिंदमौ ॥ ३३ ॥<br>ततः कदाचित् कपिना सुग्रीवेण द्विजोत्तमाः ।<br>वानराणामभूत् सख्यं रामस्याक्लिष्टकर्मणः ॥ ३४ ॥<br>सुग्रीवस्यानुगो वीरो हनुमान् नाम वानरः ।<br>वायुपुत्रो महातेजा रामस्यासीत् प्रियः सदा ॥ ३५ ॥<br>स कृत्वा परमं धैर्यं रामाय कृतनिश्चयः ।<br>आनयिष्यामि तां सीतामित्युक्त्वा विचचार ह ॥ ३६ ॥<br>महीं सागरपर्यन्तां सीतादर्शनतत्परः ।<br>जगाम रावणपुरीं लङ्कां सागरसंस्थिताम् ॥ ३७ ॥<br>तत्राथ निर्जने देशे वृक्षमूले शुचिस्मिताम् ।<br>अपश्यदमलां सीतां राक्षसीभिः समावृताम् ॥ ३८ ॥<br>अश्रुपूर्णेक्षणां हृद्यां संस्मरन्तीमनिन्दिताम् ।<br>राममिन्दीवरश्यामं लक्ष्मणं चात्मसंस्थितम् ॥ ३९ ॥ | ऐसा जानकर बलवान् प्रभु रामने जनकके घर जाकर उस धनुषको उठाकर खेल-खेलमें ही तोड़ डाला। तदनन्तर परम धर्मात्मा रामने उस कन्याका उसी प्रकार पाणिग्रहण किया, जैसे शंकरने पार्वतीका और कार्तिकेयने सेना (देवसेना)-का पाणिग्रहण किया ॥ २४-२५ ॥<br><br>तदनन्तर बहुत दिन बीत जानेपर राजा दशरथने स्वयं अपने बड़े पुत्र वीर रामको युवराज बनानेका कार्य आरम्भ किया। तब उनकी सौभाग्यशालिनी मधुरभाषिणी कैकेयी नामक पत्नीने भ्रान्तमन होकर पतिको (रामके राज्याभिषेकसे) रोका और कहा कि मेरे वीर पुत्र भरतको राजा बनायें, क्योंकि आपने पहले मुझे वर दे रखा है ॥ २६-२८ ॥<br><br>उसका वचन सुनकर उस राजाने अत्यन्त दुःखित-मनसे कहा—‘अच्छा, ऐसा ही हो’। तब धर्मको जाननेवाले आत्मवान् अच्युत राम भी पिताके चरणोंमें प्रणामकर (वनवासकी) प्रतिज्ञा कर लक्ष्मणके साथ सपत्नीक वनको चले गये। बुद्धिमान् तथा महाबलवान् प्रभु (श्रीराम) भी चौदह वर्षतक लक्ष्मणके साथ वहाँ (वनमें) रहे। वनमें निवास करते समय कभी रावण नामका राक्षस संन्यासीका वेष धारणकर सीताका हरण कर लिया और उन्हें अपनी पुरी (लंका)-में ले गया ॥ २९-३२ ॥<br><br>शत्रुनाशक राम और लक्ष्मण सीताको न देखकर दुःख एवं शोकसे अत्यन्त संतप्त हो गये और उनकी इन्द्रियाँ व्याकुल हो गयीं ॥ ३३ ॥<br><br>द्विजोत्तमो ! यथासमय अक्लिष्टकर्मा रामकी कपि सुग्रीव तथा वानरोंसे मित्रता हो गयी। वायुपुत्र महातेजस्वी वीर हनुमान् नामक वानर सुग्रीवके अनुगामी और सदा रामके प्रिय थे। वे परम धैर्य धारणकर 'उन सीताको लाऊँगा' इस प्रकार रामसे प्रतिज्ञापूर्वक कहकर सीताको देखनेके लिये तत्पर हो गये तथा सागरपर्यन्त सारी पृथ्वीपर विचरण करने लगे। (इस प्रकार सीताको ढूँढ़ते-ढूँढ़ते) सागरमें बसी हुई रावणकी पुरी लंकामें गये। वहाँ उन्होंने राक्षसियोंसे घिरी हुई पवित्र, अश्रुपूर्ण आँखोंवाली, अनिन्दित, रमणीय तथा पवित्र सीताको निर्जन देशमें एक वृक्षके नीचे स्थित देखा। वहाँ भगवती सीता नीलकमलके समान श्यामवर्णवाले राम तथा आत्मसंयमी लक्ष्मणका स्मरण कर रही थीं ॥ ३४-३९ ॥ |