भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished506 पृष्ठ

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१४० * कूर्मपुराण *


निवेद्यित्वा चात्मानं सीतायै रहसि स्वयम्।
असंशयाय प्रददावस्यै रामाङ्गुलीयकम्॥ ४०॥

दृष्ट्वाङ्गुलीयकं सीता पत्युः परमशोभनम्।
मेने समागतं रामं प्रीतिविस्फारितेक्षणा॥ ४१॥

समाश्वास्य तदा सीतां दृष्ट्वा रामस्य चान्तिकम्।
नयिष्ये त्वां महाबाहुरुक्त्वा रामं ययौ पुनः॥ ४२॥

निवेद्यित्वा रामाय सीतादर्शनमात्मवान्।
तस्थौ रामेण पुरतो लक्ष्मणेन च पूजितः॥ ४३॥
ततः स रामो बलवान् सार्धं हनुमता स्वयम्।
लक्ष्मणेन च युद्धाय बुद्धिं चक्रे हि रक्षसाम्॥ ४४॥
कृत्वाथ वानरशतैर्लङ्कामार्गं महोदधेः।
सेतुं परमधर्मात्मा रावणं हतवान् प्रभुः॥ ४५॥

सपत्नीकं च ससुतं सभ्रातृकमरिंदमः।
आनयामास तां सीतां वायुपुत्रसहायवान्॥ ४६॥
सेतुमध्ये महादेवमीशानं कृत्तिवाससम्।
स्थापयामास लिङ्गस्थं पूजयामास राघवः॥ ४७॥
तस्य देवो महादेवः पार्वत्या सह शंकरः।
प्रत्यक्षमेव भगवान् दत्तवान् वरमुत्तमम्॥ ४८॥

यत् त्वया स्थापितं लिङ्गं द्रक्ष्यन्तीह द्विजातयः।
महापातकसंयुक्तास्तेषां पापं विनश्यतु॥ ४९॥

अन्यानि चैव पापानि स्नातस्यात्र महोदधौ।
दर्शनादेव लिङ्गस्य नाशं यान्ति न संशयः॥ ५०॥

यावत् स्थास्यन्ति गिरयो यावदेषा च मेदिनी।
यावत् सेतुश्च तावच्च स्थास्याम्यत्र तिरोहितः॥ ५१॥

स्नानं दानं जपः श्राद्धं भविष्यत्यक्षयं कृतम्।
स्मरणादेव लिङ्गस्य दिनपापं प्रणश्यति॥ ५२॥
इत्युक्त्वा भगवाञ्छम्भुः परिष्वज्य तु राघवम्।
सनन्दी सगणो रुद्रस्तत्रैवान्तरधीयत॥ ५३॥

रामोऽपि पालयामास राज्यं धर्मपरायणः।
अभिषिक्तो महातेजा भरतेन महाबलः॥ ५४॥


एकान्तमें सीताको स्वयं अपना परिचय देकर उनका संदेह मिटानेके लिये उन्होंने (श्रीहनुमान्‌ने) रामकी अंगूठी उन्हें प्रदान की॥ ४०॥

पतिकी परम सुन्दर अँगूठीको देखकर प्रीतिके कारण विस्फारित नेत्रोंवाली सीताने रामको (ही) आया हुआ माना। तब सीताको देखकर उन्होंने आश्वासन दिया और कहा—'मैं आपको रामके पास ले चलूँगा।' ऐसा कहकर महाबाहु (हनुमान्) पुनः रामके पास चले आये। आत्मवान् (हनुमान्) रामसे सीता-दर्शनकी बात बताकर सामने खड़े हो गये। राम-लक्ष्मणने उनको साधुवादसे सत्कृत किया॥ ४१–४३॥

तदनन्तर बलवान् रामने हनुमान् तथा लक्ष्मणके साथ राक्षसोंसे स्वयं युद्ध करनेका निश्चय किया। और सैकड़ों वानरोंद्वारा महासमुद्रमें लंका जानेके लिये मार्गके रूपमें पुलका निर्माण किया गया तथा उसी पुलके सहारे महासमुद्रको पारकर शत्रुहन्ता परम धर्मात्मा प्रभु (श्रीराम)-ने वायुपुत्र हनुमान्‌की सहायतासे पत्नियों, पुत्रों तथा भाइयोंसहित रावणको मार डाला और भगवती सीताको वापस ले आये॥ ४४–४६॥

राघवने सेतुके मध्यमें चर्माम्बर धारण करनेवाले महादेव ईशानकी लिङ्गरूपमें प्रतिष्ठाकर उनकी पूजा की। (इस रामेश्वर-प्रतिष्ठाके समय) पार्वतीसहित महादेव भगवान् शंकरदेवने प्रत्यक्ष रूपमें श्रेष्ठ वर प्रदान करते हुए श्रीरामसे कहा—'जो द्विजाति तुम्हारे द्वारा स्थापित इस (रामेश्वर) लिंगका दर्शन करेंगे उनके बड़े-से-बड़े पाप नष्ट हो जायँगे। महासमुद्रमें स्नान करनेवालेके अन्य जो भी पाप (अर्थात् उपपातक आदि) हैं वे इस लिंगके दर्शनमात्रसे ही नष्ट हो जायँगे, इसमें संदेह नहीं है। जबतक पर्वत स्थित रहेंगे, जबतक यह पृथ्वी रहेगी और जबतक यह सेतु रहेगा, तबतक मैं गुप्तरूपसे यहाँ प्रतिष्ठित रहूँगा। यहाँ किया गया स्नान, दान, जप तथा श्राद्ध अक्षय होगा। इस (रामेश्वर) लिंगके स्मरण करने मात्रसे ही दिनभरका पाप नष्ट हो जायगा॥ ४७–५२॥

ऐसा कहकर भगवान् शम्भुने रघुवंशी रामका आलिंगन किया और नन्दी तथा अपने गणोंके साथ वे रुद्र (शम्भु) वहीं अन्तर्धान हो गये। भरतके द्वारा अभिषिक्त होकर महाबली, महातेजस्वी तथा धर्मपरायण रामने भी राज्यका पालन किया॥ ५३-५४॥

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