भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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  • अध्याय २१ * | १४१ ---|---

विशेष रूपसे उन्होंने सभी ब्राह्मणोंकी पूजा की और अश्वमेध यज्ञके द्वारा यज्ञहन्ता* ईश्वर शंकरकी अर्चना की॥ ५५॥ | विशेषाद्ब्राह्मणान् सर्वान् पूजयामास चेश्वरम्।<br>यज्ञेन यज्ञहन्तारमश्वमेधेन शंकरम्॥ ५५॥ रामके ‘कुश’ नामसे विख्यात तथा सुन्दर महान् भाग्यशाली, सभी तत्त्वार्थोंको जाननेवाले बुद्धिमान् ‘लव’ नामसे विख्यात दो पुत्र हुए। कुशसे अतिथि उत्पन्न हुआ और उसका पुत्र निषध हुआ। निषधका पुत्र नल और उसका पुत्र नभस हुआ। नभससे पुण्डरीक नामवाला पुत्र हुआ और क्षेमधन्वा उसका पुत्र था। उस क्षेमधन्वाका देवानीक नामक वीर एवं प्रतापी पुत्र हुआ। उस (देवानीक)-का पुत्र अहीनगु और उसका पुत्र सहस्वान् हुआ। उससे चन्द्रावलोक तथा उसका पुत्र तारापीड हुआ। तारापीडसे चन्द्रगिरि तथा चन्द्रगिरिका भानुवित्त हुआ। उस (भानुवित्त)-से श्रुतायु नामक पुत्र हुआ। ये सभी इक्ष्वाकुके वंशज हैं। द्विजोत्तमो ! संक्षेपमें इनमें प्रधान-प्रधान (राजाओं)-को बताया गया है॥ ५६-६०॥ | रामस्य तनयो जज्ञे कुश इत्यभिविश्रुतः।<br>लवश्च सुमहाभागः सर्वतत्त्वार्थवित् सुधीः॥ ५६॥<br><br>अतिथिस्तु कुशाज्जज्ञे निषधस्तत्सुतोऽभवत्।<br>नलस्तु निषधस्याभून्नभस्तस्मादजायत॥ ५७॥<br><br>नभसः पुण्डरीकाख्यः क्षेमधन्वा च तत्सुतः।<br>तस्य पुत्रोऽभवद् वीरो देवानीकः प्रतापवान्॥ ५८॥<br><br>अहीनगुस्तस्य सुतो सहस्वांस्तत्सुतोऽभवत्।<br>तस्माच्चन्द्रावलोकस्तु तारापीडस्तु तत्सुतः॥ ५९॥<br><br>तारापीडाच्चन्द्रगिरिर्भानुवित्तस्ततोऽभवत् ।<br>श्रुतायुरभवत् तस्मादेते इक्ष्वाकुवंशजाः।<br>सर्वे प्राधान्यतः प्रोक्ताः समासेन द्विजोत्तमाः॥ ६०॥ जो इस श्रेष्ठ इक्ष्वाकुवंशके वर्णनको सुनेगा, वह सभी पापोंसे निर्मुक्त होकर स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होगा॥ ६१॥ | य इमं शृणुयान्नित्यमिक्ष्वाकोर्वंशमुत्तमम्।<br>सर्वपापविनिर्मुक्तो स्वर्गलोके महीयते॥ ६१॥

इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायां पूर्वविभागे विंशोऽध्यायः॥ २०॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें बीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ २०॥


इक्कीसवाँ अध्याय

चन्द्रवंशके राजाओंका वृत्तान्त, यदुवंश-वर्णनमें कार्तवीर्यार्जुनके पाँच पुत्रोंका आख्यान, परम विष्णुभक्त राजा जयध्वजकी कथा, विदेह दानवका पराक्रम तथा जयध्वजद्वारा विष्णुके अनुग्रहसे उसका वध, विश्वामित्रद्वारा विष्णुकी आराधनाका जयध्वजको उपदेश करना और जयध्वजको विष्णुका दर्शन

रोमहर्षण उवाचरोमहर्षणने कहा—इलाका पुत्र राजा पुरूरवा राज्यका पालन करने लगा। उसको इन्द्रके समान तेजस्वी आयु, मायू, अमावायु, वीर्यवान् विश्वायु, शतायु तथा श्रुतायु नामवाले छः पुत्र हुए। ये उर्वशीके दिव्य पुत्र थे॥ १-२॥
ऐलः पुरूरवाश्चाथ राजा राज्यमपालयत्।<br>तस्य पुत्रा बभूवुर्हि षडिन्द्रसमतेजसः॥ १॥<br>आयुर्मायुरमावायुर्विश्वायुश्चैव वीर्यवान्।<br>शतायुश्च श्रुतायुश्च दिव्याश्चैवोर्वशीसुताः॥ २॥
आयुषस्तनया वीराः पञ्चैवासन् महौजसः।<br>स्वर्भानुतनुयायां वै प्रभायामिति नः श्रुतम्॥ ३॥<br>नहुषः प्रथमस्तेषां धर्मज्ञो लोकविश्रुतः।<br>नहुषस्य तु दायादाः षडिन्द्रोपमतेजसः॥ ४॥हमने सुना है कि आयुको स्वर्भानु (राहु)-की कन्या प्रभासे पाँच महान् ओजस्वी पुत्र हुए थे। उनमें नहुष प्रथम (पुत्र) था, जो धर्मज्ञ और लोकमें विख्यात था।

* भगवान् शंकरने दक्षके यज्ञका विध्वंस कराया था इसलिये उनको यज्ञहन्ता कहा जाता है।