संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
- अध्याय २१ * | १४१ ---|---
विशेष रूपसे उन्होंने सभी ब्राह्मणोंकी पूजा की और अश्वमेध यज्ञके द्वारा यज्ञहन्ता* ईश्वर शंकरकी अर्चना की॥ ५५॥ | विशेषाद्ब्राह्मणान् सर्वान् पूजयामास चेश्वरम्।<br>यज्ञेन यज्ञहन्तारमश्वमेधेन शंकरम्॥ ५५॥ रामके ‘कुश’ नामसे विख्यात तथा सुन्दर महान् भाग्यशाली, सभी तत्त्वार्थोंको जाननेवाले बुद्धिमान् ‘लव’ नामसे विख्यात दो पुत्र हुए। कुशसे अतिथि उत्पन्न हुआ और उसका पुत्र निषध हुआ। निषधका पुत्र नल और उसका पुत्र नभस हुआ। नभससे पुण्डरीक नामवाला पुत्र हुआ और क्षेमधन्वा उसका पुत्र था। उस क्षेमधन्वाका देवानीक नामक वीर एवं प्रतापी पुत्र हुआ। उस (देवानीक)-का पुत्र अहीनगु और उसका पुत्र सहस्वान् हुआ। उससे चन्द्रावलोक तथा उसका पुत्र तारापीड हुआ। तारापीडसे चन्द्रगिरि तथा चन्द्रगिरिका भानुवित्त हुआ। उस (भानुवित्त)-से श्रुतायु नामक पुत्र हुआ। ये सभी इक्ष्वाकुके वंशज हैं। द्विजोत्तमो ! संक्षेपमें इनमें प्रधान-प्रधान (राजाओं)-को बताया गया है॥ ५६-६०॥ | रामस्य तनयो जज्ञे कुश इत्यभिविश्रुतः।<br>लवश्च सुमहाभागः सर्वतत्त्वार्थवित् सुधीः॥ ५६॥<br><br>अतिथिस्तु कुशाज्जज्ञे निषधस्तत्सुतोऽभवत्।<br>नलस्तु निषधस्याभून्नभस्तस्मादजायत॥ ५७॥<br><br>नभसः पुण्डरीकाख्यः क्षेमधन्वा च तत्सुतः।<br>तस्य पुत्रोऽभवद् वीरो देवानीकः प्रतापवान्॥ ५८॥<br><br>अहीनगुस्तस्य सुतो सहस्वांस्तत्सुतोऽभवत्।<br>तस्माच्चन्द्रावलोकस्तु तारापीडस्तु तत्सुतः॥ ५९॥<br><br>तारापीडाच्चन्द्रगिरिर्भानुवित्तस्ततोऽभवत् ।<br>श्रुतायुरभवत् तस्मादेते इक्ष्वाकुवंशजाः।<br>सर्वे प्राधान्यतः प्रोक्ताः समासेन द्विजोत्तमाः॥ ६०॥ जो इस श्रेष्ठ इक्ष्वाकुवंशके वर्णनको सुनेगा, वह सभी पापोंसे निर्मुक्त होकर स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होगा॥ ६१॥ | य इमं शृणुयान्नित्यमिक्ष्वाकोर्वंशमुत्तमम्।<br>सर्वपापविनिर्मुक्तो स्वर्गलोके महीयते॥ ६१॥
इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायां पूर्वविभागे विंशोऽध्यायः॥ २०॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें बीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ २०॥
इक्कीसवाँ अध्याय
चन्द्रवंशके राजाओंका वृत्तान्त, यदुवंश-वर्णनमें कार्तवीर्यार्जुनके पाँच पुत्रोंका आख्यान, परम विष्णुभक्त राजा जयध्वजकी कथा, विदेह दानवका पराक्रम तथा जयध्वजद्वारा विष्णुके अनुग्रहसे उसका वध, विश्वामित्रद्वारा विष्णुकी आराधनाका जयध्वजको उपदेश करना और जयध्वजको विष्णुका दर्शन
| रोमहर्षण उवाच | रोमहर्षणने कहा—इलाका पुत्र राजा पुरूरवा राज्यका पालन करने लगा। उसको इन्द्रके समान तेजस्वी आयु, मायू, अमावायु, वीर्यवान् विश्वायु, शतायु तथा श्रुतायु नामवाले छः पुत्र हुए। ये उर्वशीके दिव्य पुत्र थे॥ १-२॥ |
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| ऐलः पुरूरवाश्चाथ राजा राज्यमपालयत्।<br>तस्य पुत्रा बभूवुर्हि षडिन्द्रसमतेजसः॥ १॥<br>आयुर्मायुरमावायुर्विश्वायुश्चैव वीर्यवान्।<br>शतायुश्च श्रुतायुश्च दिव्याश्चैवोर्वशीसुताः॥ २॥ | |
| आयुषस्तनया वीराः पञ्चैवासन् महौजसः।<br>स्वर्भानुतनुयायां वै प्रभायामिति नः श्रुतम्॥ ३॥<br>नहुषः प्रथमस्तेषां धर्मज्ञो लोकविश्रुतः।<br>नहुषस्य तु दायादाः षडिन्द्रोपमतेजसः॥ ४॥ | हमने सुना है कि आयुको स्वर्भानु (राहु)-की कन्या प्रभासे पाँच महान् ओजस्वी पुत्र हुए थे। उनमें नहुष प्रथम (पुत्र) था, जो धर्मज्ञ और लोकमें विख्यात था। |
* भगवान् शंकरने दक्षके यज्ञका विध्वंस कराया था इसलिये उनको यज्ञहन्ता कहा जाता है।
| १४२ | * कूर्मपुराण * |
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| उत्पन्नाः पितृकन्यायां विरजायां महाबलाः।<br>यतिर्ययातिः संयातिरायतिः पञ्चकोऽश्वकः ॥ ५ ॥ | पितरोंकी कन्या विरजासे नहुषको यति, ययाति, संयाति, आयति तथा पाँचवें अश्वक नामवाले इन्द्रके समान तेजस्वी महाबलशाली पाँच पुत्र उत्पन्न हुए। इन पाँचोंमेंसे ययाति महान् बलशाली और पराक्रमी था। उसने शुक्राचार्यकी पुत्री देवयानी तथा वृषपर्वाकी असुर-वंशमें उत्पन्न शर्मिष्ठा नामकी कन्याको पत्नीरूपमें प्राप्त किया ॥ ३–६ ॥ |
| तेषां ययातिः पञ्चानां महाबलपराक्रमः।<br>देवयानीमुशनसः सुतां भार्यामवाप सः।<br>शर्मिष्ठामासुरीं चैव तनयां वृषपर्वणः ॥ ६ ॥<br>यदुं च तुर्वसुं चैव देवयानी व्यजायत।<br>द्रुह्युं चानुं च पूरुं च शर्मिष्ठा चाप्यजीजनत् ॥ ७ ॥ | देवयानीने यदु तथा तुर्वसुको जन्म दिया। इसी प्रकार शर्मिष्ठाने भी द्रुह्यु, अनु तथा पूरुको उत्पन्न किया। उस (ययाति)–ने अनिन्दित ज्येष्ठ पुत्र यदुका अतिक्रमणकर पिताके वचनका पालन करनेवाले छोटे पुत्र पूरुको ही (राजपदपर) अभिषिक्त किया ॥ ७–८ ॥ |
| सोऽभ्यषिञ्चदतिक्रम्य ज्येष्ठं यदुमनिन्दितम्।<br>पूरुमेव कनीयांसं पितुर्वचनपालकम् ॥ ८ ॥<br>दिशि दक्षिणपूर्वस्यां तुर्वसुं पुत्रमादिशत्।<br>दक्षिणापरयो राजा यदुं ज्येष्ठं न्ययोजयत्।<br>प्रतीच्यामुत्तरायां च द्रुह्युं चानुमकल्पयत् ॥ ९ ॥ | राजा ययातिने दक्षिण-पूर्व दिशामें तुर्वसु नामक पुत्रको, दक्षिण-पश्चिम दिशामें ज्येष्ठ पुत्र यदुको, पश्चिममें द्रुह्युको और उत्तर दिशामें अनुको (राजाके रूपमें) नियुक्त किया। उन्होंने इस सम्पूर्ण पृथ्वीका धर्मपूर्वक पालन किया। महायशस्वी राजा (ययाति) भी पत्नीसहित वन चले गये। यदुके भी देवपुत्रोंके समान सहस्रजित्, क्रोष्टु, नील, अजित तथा रघु नामक पाँच पुत्र हुए, उनमें सहस्रजित् सबसे बड़ा था ॥ ९–११ ॥ |
| तैरियं पृथिवी सर्वा धर्मतः परिपालिता।<br>राजापि दारसहितो वनं प्राप महायशाः ॥ १० ॥ | |
| यदोरप्यभवन् पुत्राः पञ्च देवसुतोपमाः।<br>सहस्रजित् तथा ज्येष्ठः क्रोष्टुर्नीलोऽजितो रघुः ॥ ११ ॥ | |
| सहस्रजित्सुतस्तद्वच्छतजिन्नाम पार्थिवः।<br>सुताः शतजितोऽप्यासंस्त्रयः परमधार्मिकाः ॥ १२ ॥<br>हैहयश्च हयश्चैव राजा वेणुहयः परः।<br>हैहयस्याभवत् पुत्रो धर्म इत्यभिविश्रुतः ॥ १३ ॥ | सहस्रजित्का उसीके समान शतजित् नामका पुत्र राजा था। शतजित्के भी हैहय, हय और वेणुहय नामक परम धार्मिक तीन पुत्र थे। हैहयका पुत्र 'धर्म' नामसे विख्यात हुआ ॥ १२–१३ ॥ |
| तस्य पुत्रोऽभवद् विप्रा धर्मनेत्रः प्रतापवान्।<br>धर्मनेत्रस्य कीर्तिस्तु संजितस्तत्सुतोऽभवत् ॥ १४ ॥ | विप्रो ! उसका (धर्मका) धर्मनेत्र नामवाला प्रतापी पुत्र हुआ। धर्मनेत्रका कीर्ति और उसका पुत्र संजित हुआ। संजितका महिष्मान् हुआ और उसका पुत्र भद्रश्रेण्य था। भद्रश्रेण्यका दुर्दम नामका पुत्र राजा था। दुर्दमका धनक नामवाला बुद्धिमान् और वीर्यवान् पुत्र था। धनकके लोकमें सम्मानित चार पुत्र हुए—कृतवीर्य, कृताग्नि, कृतवर्मा तथा चौथा कृतौजा। कृतवीर्यका पुत्र अर्जुन हुआ। वह हजार बाहुओंवाला, द्युतिमान् तथा धनुर्वेद जाननेवालोंमें श्रेष्ठ था। जमदग्निके पुत्र जनार्दन परशुराम उस (सहस्रार्जुन)–के लिये मृत्युरूप हुए। (अर्थात् परशुरामके द्वारा वह मारा गया) ॥ १४–१८ ॥ |
| महिष्मान् संजितस्याभूद् भद्रश्रेण्यस्तदन्वयः।<br>भद्रश्रेण्यस्य दायादो दुर्दम्रो नाम पार्थिवः ॥ १५ ॥ | |
| दुर्दमस्य सुतो धीमान् धनको नाम वीर्यवान्।<br>धनकस्य तु दायादाश्चत्वारो लोकसम्मिताः ॥ १६ ॥ | |
| कृतवीर्यः कृताग्निश्च कृतवर्मा तथैव च।<br>कृतौजाश्च चतुर्थोऽभूत् कार्तवीर्योऽर्जुनोऽभवत् ॥ १७ ॥ | |
| सहस्रबाहुर्धृतिमान् धनुर्वेदविदां वरः।<br>तस्य रामोऽभवन्मृत्युर्जामदग्न्यो जनार्दनः ॥ १८ ॥ | |
| तस्य पुत्रशतान्यासन् पञ्च तत्र महारथाः।<br>कृतास्त्रा बलिनः शूरा धर्मात्मानो मनस्विनः ॥ १९ ॥ | उस (सहस्रबाहु)–के सौ पुत्र थे, जिनमें पाँच पुत्र महारथी, अस्त्र-सम्पन्न, बली, शूर, धर्मात्मा तथा मनस्वी थे ॥ १९ ॥ |
- अध्याय २१ * । १४३
| शूरश्च शूरसेनश्च धृष्णः कृष्णस्तथैव च।<br>जयध्वजश्च बलवान् नारायणपरो नृपः ॥ २० ॥<br>शूरसेनादयः सर्वे चत्वारः प्रथितौजसः।<br>रुद्रभक्ता महात्मानः पूजयन्ति स्म शंकरम् ॥ २१ ॥<br>जयध्वजस्तु मतिमान् देवं नारायणं हरिम्।<br>जगाम शरणं विष्णुं दैवतं धर्मतत्परः ॥ २२ ॥<br>तमूचुरितरे पुत्रा नायं धर्मस्तवानघ।<br>ईश्वराराधनरतः पितास्माकमभूदिति ॥ २३ ॥ | शूर, शूरसेन, धृष्ण, कृष्ण तथा पाँचवाँ पुत्र राजा जयध्वज बलवान् तथा नारायणका भक्त था। शूरसेन आदि चार पुत्र महात्मा एवं अति तेजस्वी और रुद्रके भक्त थे। वे सभी शंकरकी पूजा करते थे। धर्मपरायण एवं बुद्धिमान् जयध्वज नारायण देव हरि विष्णु देवताकी शरणमें गया। अन्य पुत्रों (उसके चार भाइयों)-ने उससे कहा—अनघ! यह तुम्हारा धर्म नहीं है। हमारे पिता शंकरकी आराधना करते थे ॥ २०—२३ ॥ |
| तानब्रवीन्महातेजा एष धर्मः परो मम।<br>विष्णोरंशेन सम्भूता राजानो यन्महीतले ॥ २४ ॥<br>राज्यं पालयतावश्यं भगवान् पुरुषोत्तमः।<br>पूजनीयो यतो विष्णुः पालको जगतो हरिः ॥ २५ ॥<br>सात्त्विकी राजसी चैव तामसी च स्वयम्भुवः।<br>तिस्रस्तु मूर्तयः प्रोक्ताः सृष्टिस्थित्यन्तहेतवः ॥ २६ ॥<br>सत्त्वात्मा भगवान् विष्णुः संस्थापयति सर्वदा।<br>सृजेद् ब्रह्मा रजोमूर्तिः संहरेत् तामसो हरः ॥ २७ ॥<br>तस्मान्महीपतीनां तु राज्यं पालयतामयम्।<br>आराध्यो भगवान् विष्णुः केशवः केशिमर्दनः ॥ २८ ॥ | इसपर महातेजस्वी (जयध्वज)-ने उनसे कहा—यही मेरा श्रेष्ठ धर्म है। पृथ्वीपर जो भी राजा हुए हैं, वे सभी विष्णुके अंशसे उत्पन्न हुए हैं। राज्यका परिपालन करनेवालोंको चाहिये कि भगवान् पुरुषोत्तमकी अवश्य आराधना करें। क्योंकि हरि विष्णु संसारके पालनकर्ता हैं। स्वयम्भू (विष्णु)-की सात्त्विकी, राजसी तथा तामसी—ये तीन मूर्तियाँ कही गयी हैं, जो क्रमशः सृष्टि, पालन तथा संहार करनेवाली हैं। सत्त्वगुणसम्पन्न भगवान् विष्णु नित्य पालन करते हैं। रजोमूर्ति ब्रह्मा सृष्टि करते हैं और तमोगुणात्मक हर संहार करते हैं। अतएव राज्यका पालन करनेवाले राजाओंके लिये केशीका मर्दन करनेवाले केशव भगवान् विष्णु आराधनीय हैं॥ २४—२८॥ |
| निशम्य तस्य वचनं भ्रातरोऽन्ये मनस्विनः।<br>प्रोचुः संहारकृद् रुद्रः पूजनीयो मुमुक्षुभिः ॥ २९ ॥<br>अयं हि भगवान् रुद्रः सर्वं जगदिदं शिवः।<br>तमोगुणं समाश्रित्य कल्पान्ते संहरेत् प्रभुः ॥ ३० ॥<br>या सा घोरतरा मूर्तिरस्य तेजोमयी परा।<br>संहरेद् विद्यया सर्वं संसारं शूलभृत् तया ॥ ३१ ॥ | उस (जयध्वज)-का वचन सुनकर उसके दूसरे मनस्वी भाइयोंने कहा—मुक्तिप्राप्तिकी इच्छा करनेवालोंके लिये संहार करनेवाले रुद्र ही पूजनीय हैं। ये ही कल्याणकारी प्रभु भगवान् रुद्र कल्पान्तमें तमोगुणका आश्रय लेकर इस सम्पूर्ण जगत्का संहार करते हैं। इनकी जो अति घोर तेजोमयी परा मूर्ति है, वही विद्या (ज्ञान-विवेक)-स्वरूप है। शक्ति-रूपमें उसीके द्वारा त्रिशूल धारण करनेवाले शंकर सम्पूर्ण संसारका संहार करते हैं ॥ २९—३१ ॥ |
| ततस्तानब्रवीद् राजा विचिन्त्यासौ जयध्वजः।<br>सत्त्वेन मुच्यते जन्तुः सत्त्वात्मा भगवान् हरिः ॥ ३२ ॥ | तब वह राजा जयध्वज कुछ विचार करके उनसे बोला—सत्त्वगुणद्वारा ही प्राणी मुक्त होता है और वे भगवान् सत्त्वात्मक हैं ॥ ३२ ॥ |
| तमूचुर्भ्रातरो रुद्रः सेवितः सात्त्विकैर्जनैः।<br>मोचयेत् सत्त्वसंयुक्तः पूजयेशं ततो हरम् ॥ ३३ ॥ | इसपर भाइयोंने उससे कहा—सात्त्विकजनोंके द्वारा सेवित रुद्र सत्त्वगुणसे सम्पन्न होकर मुक्त करते हैं, अतः ईश्वर हरकी पूजा करो। |
| अथाब्रवीद् राजपुत्रः प्रहसन् वै जयध्वजः।<br>स्वधर्मो मुक्तये पन्था नान्यो मुनिभिरिष्यते ॥ ३४ ॥ | तब राजपुत्र जयध्वजने हँसते हुए कहा—मुक्तिके लिये स्वधर्म-पालन ही एकमात्र मार्ग है। मुनिलोग अन्य (धर्म)-की इच्छा नहीं करते ॥ ३३-३४ ॥ |
| १४४ | * कूर्मपुराण * |
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| तथा च वैष्णवी शक्तिर्नृपाणां देवता सदा।<br>आराधनं परो धर्मो मुरारेरमितौजसः॥ ३५॥<br><br>तमब्रवीद् राजपुत्रः कृष्णो मतिमतां वरः।<br>यदर्जुनोऽस्मज्जनकः स्वधर्मं कृतवानिति॥ ३६॥<br><br><br>एवं विवादे वितते शूरसेनोऽब्रवीद् वचः।<br>प्रमाणमृषयो ह्यत्र ब्रूयुस्ते यत् तथैव तत्॥ ३७॥<br>ततस्ते राजशार्दूलाः पप्रच्छुर्ब्रह्मवादिनः।<br>गत्वा सर्वे सुसंरब्धाः सप्तर्षीणां तदाश्रमम्॥ ३८॥<br>तानब्रुवंस्ते मुनयो वसिष्ठाद्या यथार्थतः।<br>या यस्याभिमता पुंसः सा हि तस्यैव देवता॥ ३९॥<br><br>किन्तु कार्यविशेषेण पूजिताश्चेष्टदा नृणाम्।<br>विशेषात् सर्वदा नायं नियमो ह्यन्यथा नृपाः॥ ४०॥<br><br>नृपाणां दैवतं विष्णुस्तथैव च पुरंदरः।<br>विप्राणामग्निरादित्यो ब्रह्मा चैव पिनाकधृक्॥ ४१॥<br><br>देवानां दैवतं विष्णुर्दानवानां त्रिशूलभृत्।<br>गन्धर्वाणां तथा सोमो यक्षाणामपि कथ्यते॥ ४२॥<br>विद्याधराणां वाग्देवी साध्यानां भगवान् रविः।<br>रक्षसां शंकरो रुद्रः किंनराणां च पार्वती॥ ४३॥<br>ऋषीणां दैवतं ब्रह्मा महादेवश्च शूलभृत्।<br>मनूनां स्यादुमा देवी तथा विष्णुः सभास्करः॥ ४४॥<br>गृहस्थानां च सर्वे स्युर्ब्रह्मा वै ब्रह्मचारिणाम्।<br>वैखानसानामर्कः स्याद् यतीनां च महेश्वरः॥ ४५॥<br>भूतानां भगवान् रुद्रः कूष्माण्डानां विनायकः।<br>सर्वेषां भगवान् ब्रह्मा देवदेवः प्रजापतिः॥ ४६॥<br>इत्येवं भगवान् ब्रह्मा स्वयं देवोऽभ्यभाषत।<br>तस्माज्जयध्वजो नूनं विष्ण्वाराधनमर्हति॥ ४७॥<br><br>तान् प्रणम्याथ ते जग्मुः पुरीं परमशोभनाम्।<br>पालयाञ्चक्रिरे पृथ्वीं जित्वा सर्वरिपून् रणे॥ ४८॥ | साथ ही राजाओंके लिये वैष्णवी शक्ति ही सदा देवता-रूप है। अमित तेजस्वी मुरारिकी आराधना करना परम धर्म है॥ ३५॥<br>तब बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ राजपुत्र कृष्ण (जयध्वजके भाई)-ने उससे (जयध्वजसे) कहा—हम लोगोंके पिता अर्जुनने (सहस्रार्जुन या कार्तवीर्यार्जुनने) जिसे स्वधर्म माना है (वही हम लोगोंको भी मान्य होना चाहिये)। इस प्रकार विवादके बढ़ जानेपर शूरसेन (जयध्वजके दूसरे भाई)-ने यह बात कही—इस विषयमें ऋषि ही प्रमाण हैं, अतः वे जैसा कहेंगे, हम लोगोंको वैसा ही करना चाहिये॥ ३६-३७॥<br>तदनन्तर वे सभी राजश्रेष्ठ तैयार होकर सप्तर्षियोंके आश्रममें गये और (उन) ब्रह्मवादियोंसे पूछा—वसिष्ठ आदि उन मुनियोंने तत्त्वकी बात बताते हुए उनसे कहा—जिस पुरुषको जो देवता अभिमत हो, वही उसका अभीष्ट देवता है। किंतु किसी विशेष कार्यसे पूजित (तत्तद्-देवता) मनुष्योंको अभीष्ट फल प्रदान करते हैं। राजाओ! विशेष अर्थात् किसी उद्देश्यसे की जानेवाली पूजा सदा नहीं की जाती, क्योंकि कामनापरक आराधनाके नियम दूसरे प्रकारके होते हैं (वे सदा सब स्थितियोंमें पालनीय नहीं हो सकते)। राजाओंके देवता विष्णु और इन्द्र हैं। ब्राह्मणोंके देवता अग्नि, सूर्य, ब्रह्मा तथा पिनाकधारी शिव हैं। देवताओंके देवता विष्णु और दानवोंके त्रिशूलधारी शिव हैं। गन्धर्वों और यक्षोंके देवता सोम कहे गये हैं॥ ३८–४२॥<br>विद्याधरोंके देवता वाग्देवी तथा साध्योंके भगवान् सूर्य हैं। राक्षसोंके शंकर रुद्र और किंनरोंकी देवता पार्वती हैं। ऋषियोंके देवता ब्रह्मा और त्रिशूलधारी महादेव हैं। मनुष्योंके देवता उमा देवी, विष्णु तथा सूर्य हैं। गृहस्थोंके लिये सभी देवता (पूज्य) हैं। ब्रह्मचारियोंके देवता ब्रह्मा, वैखानसोंके सूर्य तथा संन्यासियोंके महेश्वर देवता हैं। भूतोंके भगवान् रुद्र, कूष्माण्डोंके विनायक और देवाधि-देव प्रजापति भगवान् ब्रह्मा सभीके देवता हैं॥ ४३–४६॥<br>(सप्तर्षियोंने कहा) स्वयं भगवान् ब्रह्माने ही यह कहा है, इसलिये निश्चित ही जयध्वज विष्णुकी आराधना करनेके योग्य हैं। तब वे सभी उन्हें प्रणामकर परम सुन्दर अपनी पुरीको चले गये और युद्धमें सभी शत्रुओंको जीतकर पृथ्वीका पालन करने लगे॥ ४७-४८॥ |
| * अध्याय २१ * | १४५ |
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| ततः कदाचिद् विप्रेन्द्रा विदेहो नाम दानवः ।<br>भीषणः सर्वसत्त्वानां पुरीं तेषां समाययौ ॥ ४९ ॥<br><br>दंष्ट्राकरालो दीप्तात्मा युगान्तदहनोपमः ।<br>शूलमादाय सूर्याभं नादयन् वै दिशो दश ॥ ५० ॥<br><br>तन्नादश्रवणान्मर्त्यास्तत्र ये निवसन्ति ते ।<br>तत्यजुर्जीवितं त्वन्ये दुद्रुवुर्भयविह्वलाः ॥ ५१ ॥<br><br>ततः सर्वे सुसंयत्ताः कार्तवीर्यात्मजास्तदा ।<br>युयुधुर्दानवं शक्तिगिरिकूटासिमुद्गरैः ॥ ५२ ॥<br><br>तान् सर्वान् दानवो विप्राः शूलेन प्रहसन्निव ।<br>वारयामास घोरात्मा कल्पान्ते भैरवो यथा ॥ ५३ ॥<br><br>शूरसेनादयः पञ्च राजानस्तु महाबलाः ।<br>युद्धाय कृतसंरम्भा विदेहं त्वभिदुद्रुवुः ॥ ५४ ॥<br><br>शूरोऽस्त्रं प्राहिणोद् रौद्रं शूरसेनस्तु वारुणम् ।<br>प्राजापत्यं तथा कृष्णो वायव्यं धृष्ण एव च ॥ ५५ ॥<br><br>जयध्वजश्च कौबेरमैन्द्रमाग्नेयमेव च ।<br>भञ्जयामास शूलेन तान्यस्त्राणि स दानवः ॥ ५६ ॥<br><br>ततः कृष्णो महावीर्यो गदामादाय भीषणाम् ।<br>स्पृष्ट्वा मन्त्रेण तरसा चिक्षेप च ननाद च ॥ ५७ ॥<br><br>सम्प्राप्य सा गदाऽस्योरो विदेहस्य शिलोपमम् ।<br>न दानवं चालयितुं शशाकान्तकसंनिभम् ॥ ५८ ॥<br><br>दुद्रुवुस्ते भयग्रस्ता दृष्ट्वा तस्यातिपौरुषम् ।<br>जयध्वजस्तु मतिमान् सस्मार जगतः पतिम् ॥ ५९ ॥<br><br>विष्णुं ग्रसिष्णुं लोकादिमप्रमेयमनामयम् ।<br>त्रातारं पुरुषं पूर्वं श्रीपतिं पीतवाससम् ॥ ६० ॥<br><br>ततः प्रादुरभूच्चक्रं सूर्यायुतसमप्रभम् ।<br>आदेशाद् वासुदेवस्य भक्तानुग्रहकारणात् ॥ ६१ ॥<br><br>जग्राह जगतां योनिं स्मृत्वा नारायणं नृपः ।<br>प्राहिणोद् वै विदेहाय दानवेभ्यो यथा हरिः ॥ ६२ ॥<br><br>सम्प्राप्य तस्य घोरस्य स्कन्धदेशं सुदर्शनम् ।<br>पृथिव्यां पातयामास शिरोऽद्रिशिखराकृति ॥ ६३ ॥<br><br>तस्मिन् हते देवरिपौ शूराद्या भ्रातरो नृपाः ।<br>समाययुः पुरीं रम्यां भ्रातरं चाप्यपूजयन् ॥ ६४ ॥<br><br>श्रुत्वाजगाम भगवान् जयध्वजपराक्रमम् ।<br>कार्तवीर्यसुतं द्रष्टुं विश्वामित्रो महामुनिः ॥ ६५ ॥ | विप्रेन्द्रो ! तदनन्तर किसी दिन सभी प्राणियोंके लिये भयंकर विदेह नामका दानव उनकी पुरीमें चला आया। भयंकर दाढ़ोंवाला, प्रलयकालीन अग्निके समान उद्दीप्त (वह दानव) सूर्यके समान चमकते हुए शूलको लेकर दसों दिशाओंमें गरजने लगा। उसकी (भयंकर) गर्जनाको सुनकर वहाँ रहनेवाले कुछ मनुष्योंने प्राण त्याग दिये और दूसरे भयसे विह्वल होकर भाग पड़े ॥ ४९–५१ ॥<br><br>तब कार्तवीर्यके सभी पुत्र सावधान होकर शक्ति (सेना), पर्वतशिला, तलवार तथा मुद्गरोंसे उस दानवके साथ युद्ध करने लगे। ब्राह्मणो! उस भयंकर दानवने शूलसे उन सभीका हँसते हुए वैसे ही निवारण कर दिया जैसे प्रलयकालमें भैरव करते हैं। तब महाबली शूरसेन आदि वे पाँच राजा युद्धके लिये तैयारी कर विदेह दानवपर टूट पड़े ॥ ५२–५४ ॥<br><br>शूरने रौद्रास्त्र, शूरसेनने वारुणास्त्र, कृष्णने प्राजापत्यास्त्र, धृष्णने वायव्यास्त्र और जयध्वजने कौबेर, ऐन्द्र तथा आग्नेयास्त्र चलाया, किंतु उस दानवने शूलसे उन सभी अस्त्रोंको तोड़ डाला। तब महावीर्यशाली कृष्णने भीषण गदा लेकर मन्त्रसे उसे अभिमन्त्रित कर वेगपूर्वक फेंका और गर्जना की। वह गदा उस विदेहकी पत्थरके समान छातीपर लगकर भी यमराज-तुल्य उस दानवको विचलित करनेमें समर्थ न हो सकी ॥ ५५–५८ ॥<br><br>उसके महान् पौरुषको देखकर भयग्रस्त हो वे सभी भागने लगे। तब बुद्धिमान् जयध्वजने अप्रमेय, अनामय, लोकादि, ग्रसिष्णु, त्राणकर्ता, पूर्वपुरुष, श्रीपति और पीताम्बरधारी जगत्पति विष्णुका स्मरण किया। स्मरण करते ही भक्तपर अनुग्रह करनेके लिये वासुदेवकी आज्ञासे दस हजार सूर्योंके समान प्रकाशमान चक्र प्रकट हुआ। राजा (जयध्वज)-ने जगद्योनि नारायणका ध्यानकर उस चक्रको ग्रहण किया और विदेह (दानव)-पर उसी प्रकार चलाया जैसे विष्णु दानवोंपर चलाते हैं ॥ ५९–६२ ॥<br><br>सुदर्शनचक्र उस भयंकर दानवके कंधेपर लगा और उसने उसके पर्वत-शिखरके समान सिरको पृथ्वीपर गिरा दिया। देवताओंके शत्रु उस (विदेह दानव)-के मारे जानेपर राजा शूर आदि सभी भाई अपनी रमणीय पुरीमें चले आये और उन्होंने भाई (जयध्वज)-की पूजा की। महामुनि भगवान् विश्वामित्र जयध्वजके पराक्रमको सुनकर उस कीर्तवीर्यपुत्रको देखने आये ॥ ६३–६५ ॥ |
१४६ * कूर्मपुराण *
| तमागतमथो दृष्ट्वा राजा सम्भ्रान्तमानसः।<br>समावेश्यासने रम्ये पूजयामास भावतः॥ ६६॥ | उनको (विश्वामित्रको) आया देखकर आश्चर्यचकित मनवाले राजा (जयध्वज)-ने सुन्दर आसनपर उन्हें बिठाया और भक्तिभावसे उनकी पूजा की तथा कहा— |
| उवाच भगवान् घोरः प्रसादाद् भवतोऽसुरः।<br>निपातितो मया संख्ये विदेहो दानवेश्वरः॥ ६७॥ | भगवन्! आपकी ही कृपासे मैंने युद्धमें भयंकर असुर दानवेश्वर विदेहको मार गिराया। आपके कहनेसे मैं |
| त्वद्वाक्याच्छिन्नसंदेहो विष्णुं सत्यपराक्रमम्।<br>प्रपन्नः शरणं तेन प्रसादो मे कृतः शुभः॥ ६८॥ | संशयमुक्त होकर सत्यपराक्रमी विष्णुकी शरणमें गया और उन्होंने मेरे ऊपर शुभ अनुग्रह किया। कमलदलके |
| यक्ष्यामि परमेशानं विष्णुं पद्मदलेक्षणम्।<br>कथं केन विधानेन सम्पूज्यो हरिरीश्वरः॥ ६९॥ | समान नेत्रवाले, परम ईशान विष्णुका मैं पूजन करूँगा, उन ईश्वर हरिका किस विधानसे किस प्रकार पूजन किया जाना चाहिये। सुव्रत! ये नारायण देव कौन हैं? |
| कोऽयं नारायणो देवः किम्प्रभावश्च सुव्रत।<br>सर्वमेतन्ममाचक्ष्व परं कौतूहलं हि मे॥ ७०॥ | उनका क्या प्रभाव है? यह सब मुझे बतलाइये, मुझे (इस विषयमें) अत्यधिक कौतूहल है॥ ६६—७०॥ |
| विश्वामित्र उवाच | विश्वामित्रने कहा—जिनसे सभी प्राणियोंकी प्रवृत्ति होती है और जिनमें यह सम्पूर्ण जगत् (प्रतिष्ठित) है, |
| यतः प्रवृत्तिर्भूतानां यस्मिन् सर्वमिदं जगत्।<br>स विष्णुः सर्वभूतात्मा तमाश्रित्य विमुच्यते॥ ७१॥ | वे विष्णु सभी प्राणियोंके आत्मरूप हैं, उनका आश्रय ग्रहण करनेसे मुक्ति प्राप्त होती है। अपने-अपने वर्ण और आश्रमधर्ममें स्थित रहते हुए केवल निष्कामभावसे |
| स्ववर्णाश्रमधर्मेण पूज्योऽयं पुरुषोत्तमः।<br>अकामहत्तभावेन समाराध्यो न चान्यथा॥ ७२॥ | उन पुरुषोत्तम (विष्णु)-का पूजन करना चाहिये अन्य किसी भावसे नहीं॥ ७१-७२॥ |
| एतावदुक्त्वा भगवान् विश्वामित्रो महामुनिः।<br>शूराद्यैः पूजितो विप्रा जगामाथ स्वमालयम्॥ ७३॥ | इतना कहकर महामुनि भगवान् विश्वामित्र उन शूरसेन आदिके द्वारा पूजित होकर अपने निवास-स्थानको चले गये। तदनन्तर शूरसेन आदिने यज्ञके द्वारा |
| अथ शूरादयो देवमयजन्त महेश्वरम्।<br>यज्ञेन यज्ञगम्यं तं निष्कामा रुद्रमव्ययम्॥ ७४॥ | कामनारहित होकर यज्ञ-गम्य उन अव्यय रुद्रदेव महेश्वरका यजन किया॥ ७३-७४॥ |
| तान् वसिष्ठस्तु भगवान् याजयामास सर्ववित्।<br>गौतमोऽत्रिरगस्त्यश्च सर्वे रुद्रपरायणाः॥ ७५॥ | सर्वज्ञ भगवान् वसिष्ठ तथा रुद्रभक्त, गौतम, अत्रि तथा अगस्त्यने उन लोगोंका यज्ञ कराया। भगवान् |
| विश्वामित्रस्तु भगवान् जयध्वजमरिंदमम्।<br>याजयामास भूतादिमादिदेवं जनार्दनम्॥ ७६॥ | विश्वामित्रने शत्रुओंका दमन करनेवाले जयध्वजसे प्राणियोंके आदि कारण आदिदेव जनार्दन-सम्बन्धी (विष्णु) यज्ञ कराया। उस (जयध्वज)-के यज्ञमें |
| तस्य यज्ञे महायोगी साक्षात् देवः स्वयं हरिः।<br>आविरासीत् स भगवान् तदद्भुतमिवाभवत्॥ ७७॥ | महायोगी देव स्वयं भगवान् हरि साक्षात् प्रकट हुए। यह एक अद्भुत बात हुई॥ ७५-७७॥ |
| य इमं शृणुयान्नित्यं जयध्वजपराक्रमम्।<br>सर्वपापविमुक्तात्मा विष्णुलोकं स गच्छति॥ ७८॥ | जो जयध्वजके इस पराक्रमको नित्य सुनेगा, वह सभी पापोंसे मुक्त होकर विष्णुलोकको प्राप्त करेगा॥ ७८॥ |
इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायां पूर्वविभागे एकविंशोऽध्यायः॥ २१॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें इक्कीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ २१॥
- अध्याय २२ * । १४७
बाईसवाँ अध्याय
जयध्वजके वंश-वर्णनमें राजा दुर्जयका आख्यान, महामुनि कण्वद्वारा दुर्जयको वाराणसीके विश्वेश्वर-लिंगका माहात्म्य बतलाना, दुर्जयका वाराणसी जाकर पाप-मुक्त होना तथा सहस्रजित्-वंशका वर्णन
| सूत उवाच | सूतजीने कहा— |
|---|---|
| जयध्वजस्य पुत्रोऽभूत् तालजङ्घ इति स्मृतः।<br>शतपुत्रास्तु तस्यासन् तालजङ्घाः प्रकीर्तिताः॥ १ ॥<br>तेषां ज्येष्ठो महावीर्यो वीतिहोत्रोऽभवन्नृपः।<br>वृषप्रभृतयश्चान्ये यादवाः पुण्यकर्मिणः॥ २ ॥<br>वृषो वंशकरस्तेषां तस्य पुत्रोऽभवन्मधुः।<br>मधोः पुत्रशतं त्वासीद् वृषणस्तस्य वंशभाक्॥ ३ ॥<br>वीतिहोत्रसुतश्चापि विश्रुतोऽनन्त इत्युत।<br>दुर्जयस्तस्य पुत्रोऽभूत् सर्वशास्त्रविशारदः॥ ४ ॥<br>तस्य भार्या रूपवती गुणैः सर्वैरलंकृता।<br>पतिव्रतासीत् पतिना स्वधर्मपरिपालिका॥ ५ ॥<br>स कदाचिन्महाभागः कालिन्दीतीरसंस्थिताम्।<br>अपश्यदुर्वशीं देवीं गायन्तीं मधुरस्वनाम्॥ ६ ॥ | जयध्वजका एक पुत्र था जो तालजङ्घ नामसे प्रसिद्ध था। उसके सौ पुत्र हुए जो तालजङ्घ ही कहलाते थे। उनमें वीतिहोत्र नामका महान् बलवान् राजा सबसे बड़ा था। दूसरे वृष इत्यादि नामवाले यादव पुण्यकर्मा थे। उनमें वृष वंशको बढ़ानेवाला था, उसका मधु नामक पुत्र हुआ। मधुके सौ पुत्र हुए, किंतु उनमें वृषण ही उस (मधु)-का वंशधर हुआ। वीतिहोत्रका भी विश्रुत अथवा अनन्त नामवाला एक पुत्र हुआ। उसका पुत्र दुर्जय हुआ जो सभी शास्त्रोंका ज्ञाता था। उसकी भार्या रूपवती तथा सभी गुणोंसे अलंकृत तथा पतिव्रता थी, वह पति दुर्जयके साथ अपने धर्मका पालन करती थी॥ १—५ ॥<br><br>किसी समय उस महाभाग्यशाली (दुर्जय)-ने कालिन्दी नदीके किनारे बैठी हुई मधुर स्वरमें गीत गाती हुई देवी उर्वशीको देखा। तब कामके द्वारा विचलित मनवाला वह उसके समीपमें गया और कहने लगा—'देवि! चिरकालतक मेरे साथ रमण करो'। रूप और लावण्यसे सम्पन्न तथा दूसरे कामदेवके समान उस राजाको देखकर उस देवीने चिरकालतक उसके साथ रमण किया॥ ६—८ ॥ |
| ततः कामाहतमनास्तत्समीपमुपेत्य वै।<br>प्रोवाच सुचिरं कालं देवि रन्तुं मयार्हसि॥ ७ ॥<br><br>सा देवी नृपतिं दृष्ट्वा रूपलावण्यसंयुतम्।<br>रेमे तेन चिरं कालं कामदेवमिवापरम्॥ ८ ॥<br>कालात् प्रबुद्धो राजा तामूर्वशीं प्राह शोभनाम्।<br>गमिष्यामि पुरीं रम्यां हसन्ती साब्रवीद् वचः॥ ९ ॥ | |
| न ह्यानेनोपभोगेन भवता राजसुन्दर।<br>प्रीतिः संजायते मह्यं स्थातव्यं वत्सरं पुनः॥ १० ॥ | बहुत समयके बाद ज्ञान होनेपर राजाने उस रमणीय उर्वशीसे कहा—'अब मैं अपनी सुन्दर पुरीको जाऊँगा।' इसपर वह हँसते हुए कहने लगी—राजसुन्दर! आपके साथ इतने उपभोगसे मुझे प्रसन्नता (संतुष्टि) नहीं हुई है, अतः पुनः एक वर्षतक यहाँ और ठहरें॥ ९-१०॥ |
| तामब्रवीत् स मतिमान् गत्वा शीघ्रतरं पुरीम्।<br>आगमिष्यामि भूयोऽत्र तन्मेऽनुज्ञातुमर्हसि॥ ११ ॥ | इसपर बुद्धिमान् (राजा)-ने उस (उर्वशी)-से कहा—मैं अपनी पुरीमें जाकर पुनः शीघ्र ही यहाँ वापस लौटूँगा, इसलिये मुझे जानेकी आज्ञा दो। उस सुभागाने उससे कहा—राजन्! वैसा ही कीजिये, किंतु तबतक आप पुनः किसी अन्य अप्सराके साथ रमण न करें। 'अच्छा' ऐसा कहकर वह शीघ्र ही परम शोभन अपनी पुरीको चला गया। (पुरीमें) जाकर अपनी पतिव्रता पत्नीको देखकर वह राजा भयभीत हो गया॥ ११—१३॥ |
| तमब्रवीत् सा सुभगा तथा कुरु विशाम्पते।<br>नान्ययाप्सरसा तावद् रन्तव्यं भवता पुनः॥ १२ ॥<br><br>ओमित्युक्त्वा ययौ तूर्णं पुरीं परमशोभनाम्।<br>गत्वा पतिव्रतां पत्नीं दृष्ट्वा भीतोऽभवन्नृपः॥ १३ ॥ |
१४८ * कूर्मपुराण *
| सम्प्रेक्ष्य सा गुणवती भार्या तस्य पतिव्रता। <br> भीतं प्रसन्नया प्राह वाचा पीनपयोधरा ॥ १४ ॥ <br><br> स्वामिन् किमत्र भवतो भीतिरद्य प्रवर्तते । <br> तद् ब्रूहि मे यथा तत्त्वं न राज्ञां कीर्तये त्विदम् ॥ १५ ॥ <br> स तस्या वाक्यमाकर्ण्य लज्जावनतचेतनः । <br> नोवाच किंचिन्नृपतिर्ज्ञानदृष्ट्या विवेद सा ॥ १६ ॥ <br><br> न भेतव्यं त्वया स्वामिन् कार्यं पापविशोधनम्। <br> भीते त्वयि महाराज राष्ट्रं ते नाशमेष्यति ॥ १७ ॥ <br> तदा स राजा द्युतिमान् निर्गत्य तु पुरात् ततः । <br> गत्वा कण्वाश्रमं पुण्यं दृष्ट्वा तत्र महामुनिम् ॥ १८ ॥ <br><br> निशम्य कण्ववदनात् प्रायश्चित्तविधिं शुभम्। <br> जगाम हिमवत्पृष्ठं समुद्दिश्य महाबलः ॥ १९ ॥ <br><br> सोऽपश्यत् पथि राजेन्द्रो गन्धर्ववरमुत्तमम्। <br> भ्राजमानं श्रिया व्योम्नि भूषितं दिव्यमालया ॥ २० ॥ <br><br> वीक्ष्य मालाममित्रघ्नः सस्मराप्सरसां वराम्। <br> उर्वशीं तां मनश्चक्रे तस्या एवेयमर्हति ॥ २१ ॥ <br> सोऽतीव कामुको राजा गन्धर्वेणाथ तेन हि । <br> चकार सुमहद् युद्धं मालामादातुमुद्यतः ॥ २२ ॥ <br> विजित्य समरे मालां गृहीत्वा दुर्जयो द्विजाः । <br> जगाम तामप्सरसं कालिन्दीं द्रष्टुमादरात् ॥ २३ ॥ <br> अदृष्ट्वाप्सरसं तत्र कामबाणाभिपीडितः । <br> बभ्राम सकलां पृथ्वीं सप्तद्वीपसमन्विताम् ॥ २४ ॥ <br> आक्रम्य हिमवत्पार्श्वमुर्वशीदर्शनोत्सुकः । <br> जगाम शैलप्रवरं हेमकूटमिति श्रुतम् ॥ २५ ॥ <br> तत्र तत्राप्सरोवर्या दृष्ट्वा तं सिंहविक्रमम्। <br> कामं संदधिरे घोरं भूषितं चित्रमालया ॥ २६ ॥ <br><br> संस्मरन्नुर्वशीवाक्यं तस्यां संसक्तमानसः । <br> न पश्यति स्म ताः सर्वा गिरिशृङ्गाणि जग्मिवान् ॥ २७ ॥ | उस राजाकी पीन पयोधरोंवाली उस गुणवती तथा पतिव्रता भार्याने डरे हुए (पति)-को देखकर प्रसन्न वाणीसे कहा—स्वामिन् ! आज आप डर क्यों रहे हैं, जो भी बात हो मुझे सत्य-सत्य बतलायें। इस प्रकारका भय राजाओंके लिये कीर्तिकर नहीं है॥ १४-१५॥ <br> उसकी बात सुनकर उस (राजा)-का मन लज्जासे झुक गया। राजा कुछ भी नहीं बोला, किंतु उस (रानी)-ने ज्ञानदृष्टिसे (सब कुछ) जान लिया। (वह बोली—) स्वामिन् ! आपको डरना नहीं चाहिये। पापका प्रायश्चित्त (शोधन) करना चाहिये। हे महाराज ! आपके भयभीत रहनेसे आपका राष्ट्र नष्ट हो जायगा ॥ १६-१७॥ <br> तब वह द्युतिमान् राजा अपने नगरसे बाहर निकलकर पवित्र कण्वके आश्रममें गया। वहाँ महामुनि (कण्व)-का दर्शनकर तथा कण्वके मुखसे प्रायश्चित्तकी कल्याणकारी विधि सुनकर प्रायश्चित्तके द्वारा आत्मशुद्धिके उद्देश्यसे वह महाबलवान् (राजा दुर्जय) हिमालय पर्वतकी ओर गया। उस राजेन्द्रने मार्गमें (जाते समय) आकाशमें अपने तेजसे प्रकाशित होते हुए गन्धर्वश्रेष्ठोंमें उत्तम एक गन्धर्वको देखा, जो दिव्य मालासे विभूषित था। मालाको देखकर शत्रुओंका विनाश करनेवाले (उस राजाको) श्रेष्ठ अप्सरा उर्वशीका स्मरण हो आया। उसने मनमें विचार किया कि यह (माला) तो उस (उर्वशी)-के ही योग्य है॥ १८-२१॥ <br> तब माला प्राप्त करनेको उद्यत उस अत्यन्त कामुक राजाने उस गन्धर्वके साथ महान् युद्ध किया। ब्राह्मणो! युद्धमें गन्धर्वोंको जीतकर और माला लेकर वह दुर्जय उस अप्सराको देखनेके लिये आदरपूर्वक कालिन्दीके किनारे गया। वहाँ अप्सराको न देखकर कामदेवके बाणसे अत्यन्त पीड़ित वह सात द्वीपोंसे युक्त सम्पूर्ण पृथ्वीपर घूमने लगा। उर्वशीके दर्शनके लिये उत्सुक वह हिमालयके पार्श्वभागको पारकर उस श्रेष्ठ पर्वतपर पहुँचा जो 'हेमकूट' नामसे विख्यात है॥ २२-२५॥ <br> वहाँ उन-उन स्थानोंमें रहनेवाली वे श्रेष्ठ अप्सराएँ उस विचित्र मालासे विभूषित एवं सिंहके समान पराक्रमवाले राजाको देखकर अत्यन्त कामासक्त हो गयीं। उर्वशीके वाक्यका स्मरण करते हुए और उसीमें आसक्त मनवाले उस राजाने उन सभी (अप्सराओं)-को नहीं देखा और वह पर्वतोंके शिखरोंपर चला गया ॥ २६-२७॥ |
| * अध्याय २२ * | १४९ |
|---|---|
| तत्राप्सरसं दिव्यामदृष्ट्वा कामपीडितः ।<br>देवलोकं महामेरुं ययौ देवपराक्रमः ॥ २८ ॥<br><br>स तत्र मानसं नाम सरस्त्रैलोक्यविश्रुतम् ।<br>भेजे शृङ्गाण्यतिक्रम्य स्वबाहुबलभावितः ॥ २९ ॥<br><br>स तस्य तीरे सुभगां चरन्तीमतिलालसाम् ।<br>दृष्टवाननवद्याङ्गीं तस्यै मालां ददौ पुनः ॥ ३० ॥<br>स मालया तदा देवीं भूषितां प्रेक्ष्य मोहितः ।<br>रेमे कृतार्थमात्मानं जानानः सुचिरं तया ॥ ३१ ॥<br><br>अथोर्वशी राजवर्यं रतान्ते वाक्यमब्रवीत् ।<br>किं कृतं भवता पूर्वं पुरीं गत्वा वृथा नृप ॥ ३२ ॥<br><br>स तस्यै सर्वमाचष्ट पत्न्या यत् समुदीरितम् ।<br>कण्वस्य दर्शनं चैव मालापहरणं तथा ॥ ३३ ॥<br>श्रुत्वैतद् व्याहृतं तेन गच्छेत्याह हितैषिणी ।<br>शापं दास्यति ते कण्वो ममापि भवतः प्रिया ॥ ३४ ॥<br><br>तयासकृन्महाराजः प्रोक्तोऽपि मदमोहितः ।<br>न तत्याजाथ तत्पार्श्वं तत्र संन्यस्तमानसः ॥ ३५ ॥<br>तदोर्वशी कामरूपा राज्ञे स्वं रूपमुत्कटम् ।<br>सरोमशं पिङ्गलाक्षं दर्शयामास सर्वदा ॥ ३६ ॥<br><br>तस्यां विरक्तचेतस्कः स्मृत्वा कण्वाभिभाषितम् ।<br>धिङ्मामिति विनिश्चित्य तपः कर्तुं समारभत् ॥ ३७ ॥<br><br>संवत्सरद्वादशकं कन्दमूलफलाशनः ।<br>भूय एव द्वादशकं वायुभक्षोऽभवन्नृपः ॥ ३८ ॥<br>गत्वा कण्वाश्रमं भीत्या तस्मै सर्वं न्यवेदयत् ।<br>वासमप्सरसा भूयस्तपोयोगमनुत्तमम् ॥ ३९ ॥<br><br>वीक्ष्य तं राजशार्दूलं प्रसन्नो भगवानृषिः ।<br>कर्तुकामो हि निर्बीजं तस्याघमिदमब्रवीत् ॥ ४० ॥ | वहाँ भी दिव्य अप्सरा (उर्वशी)-को न देखकर देवताओंके समान पराक्रमवाला वह कामपीड़ित (राजा) देवताओंके स्थान महामेरुपर गया। अपने बाहुबलके प्रभावसे गिरिशिखरोंको पार करता हुआ वह तीनों लोकोंमें विख्यात 'मानस' नामक सरोवरपर पहुँचा। उसने उसके (मानसरोवरके) किनारेपर विचरण करती हुई सुन्दर अङ्गोंवाली अत्यन्त स्नेहमयी सुन्दरी (उर्वशी)-को देखा और वह माला उसे दे दी॥ २८-३०॥<br><br>तब उस देवीको मालासे विभूषित देखकर वह मोहित हो गया तथा अपनेको कृतार्थ समझते हुए उसने चिरकालतक उसके साथ रमण किया। अनन्तर उर्वशीने श्रेष्ठ राजासे कहा—राजन्! आपने पहले पुरीमें जाकर क्या किया, व्यर्थ ही आप वहाँ गये॥ ३१-३२॥<br><br>तब उसने पत्नीद्वारा कही गयी वह बात, कण्व ऋषिका दर्शन तथा मालाका अपहरण—सभी कुछ उसे बता दिया॥ ३३॥<br><br>उसके द्वारा कही गयी इन बातोंको सुनकर हित चाहनेवाली (उस उर्वशी)-ने 'आप चले जायँ'—ऐसा कहा। अन्यथा आपको कण्व शाप दे देंगे और आपकी प्रिया भी मुझे शाप दे देगी। बार-बार उसके कहनेपर भी (कामरूपी) मदसे मोहित हुए महाराजने उसका साथ नहीं छोड़ा, उसमें ही मन लगाये रखा॥ ३४-३५॥<br><br>तदनन्तर इच्छानुसार रूप धारण कर लेनेवाली उर्वशी राजाको रोमोंसे युक्त, पिङ्गल वर्णके नेत्रोंवाला अपना उत्कट रूप सदा दिखलाने लगी। (उसका वह वीभत्स रूप देखकर) उसके प्रति विरक्त मनवाले राजाने कण्व (मुनि)-द्वारा कही गयी बातका स्मरणकर 'मुझे धिक्कार है' ऐसा निश्चयकर तप करना प्रारम्भ किया। राजाने बारह वर्षतक कन्द-मूल और फलका आहार किया और पुनः बारह वर्षोतक केवल वायुका ही भक्षण किया॥ ३६-३८॥<br><br>कण्वके आश्रममें जाकर राजाने डरते-डरते अप्सराके साथ निवास करने और पुनः उत्तम तपस्या करनेकी सारी बातें उन्हें बता दीं। उस श्रेष्ठ राजाको देखकर प्रसन्न हुए भगवान् ऋषि (कण्व)-ने उसके पापको समूल नष्ट करनेकी इच्छासे यह कहा—॥ ३९-४०॥ |
| १५० | * कूर्मपुराण * |
|---|
| कण्व उवाच | कण्व बोले— (राजन्! तुम) ईश्वर जहाँ विशेषरूपसे |
|---|---|
| गच्छ वाराणसीं दिव्यामीश्वराध्युषितां पुरीम्।<br>आस्ते मोचयितुं लोकं तत्र देवो महेश्वरः ॥ ४१ ॥ | निवास करते हैं, उस दिव्य वाराणसीपुरीमें जाओ। संसारको मुक्त करनेके लिये महेश्वर देव वहाँ रहते हैं। |
| स्नात्वा संतर्प्य विधिवद् गङ्गायां देवताः पितॄन्।<br>दृष्ट्वा विश्वेश्वरं लिङ्गं किल्बिषान्मोक्ष्यसेऽखिलात् ॥ ४२ ॥ | गङ्गामें स्नानकर विधिपूर्वक देवताओं एवं पितरोंका तर्पणकर विश्वेश्वर लिङ्गका दर्शन करनेसे तुम सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो जाओगे ॥ ४१-४२ ॥ |
| प्रणम्य शिरसा कण्वमनुज्ञाप्य च दुर्जयः।<br>वाराणस्यां हरं दृष्ट्वा पापान्मुक्तोऽभवत् ततः ॥ ४३ ॥ | इसके बाद कण्वको सिरसे प्रणामकर और उनकी आज्ञा प्राप्तकर वह दुर्जय वाराणसीमें गया और भगवान् शंकरका दर्शनकर पापसे मुक्त हो गया ॥ ४३ ॥ |
| जगाम स्वपुरीं शुभ्रां पालयामास मेदिनीम्।<br>याजयामास तं कण्वो याचितो घृणया मुनिः ॥ ४४ ॥ | (तदनन्तर वह) अपनी सुन्दर पुरीमें जाकर पृथ्वीका पालन करने लगा। प्रार्थना करनेपर कण्व मुनिने कृपा करके उसका यज्ञ कराया। उसका बुद्धिमान् पुत्र |
| तस्य पुत्रोऽथ मतिमान् सुप्रतीक इति श्रुतः।<br>बभूव जातमात्रं तं राजानमुपतस्थिरे ॥ ४५ ॥ | 'सुप्रतीक' इस नामसे विख्यात हुआ। उत्पन्न होते ही उसे (लोगोंने) राजा मान लिया। ब्राह्मणो! उर्वशीसे |
| उर्वश्यां च महावीर्याः सप्त देवसुतोपमाः।<br>कन्या जगृहिरे सर्वा गन्धर्वदयिता द्विजाः ॥ ४६ ॥ | देवपुत्रोंके समान महान् वीर्यवान् सात पुत्र हुए। उन्होंने गन्धर्वोंकी कन्याओंको अपनी पत्नी बनाया ॥ ४४-४६ ॥ |
| एष वः कथितः सम्यक् सहस्रजित उत्तमः।<br>वंशः पापहरो नॄणां क्रोष्टोरपि निबोधत ॥ ४७ ॥ | आप लोगोंसे (मैंने) यह मनुष्योंके पापको नष्ट करनेवाला सहस्रजित्का उत्तम वंश भलीभाँति बतलाया। अब क्रोष्टुके वंशको भी सुनें ॥ ४७ ॥ |
इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायां पूर्वविभागे द्वाविंशोऽध्यायः ॥ २२ ॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें बाइसवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ २२ ॥
तेईसवाँ अध्याय
यदुवंश-वर्णनमें क्रोष्टुवंशी राजाओंका वृत्तान्त, राजा नवरथकी कथा, सात्त्वतवंश-वर्णनमें अक्रूरकी उत्पत्ति, राजा आनकदुन्दुभिका आख्यान, कंस एवं वसुदेव-देवकीकी उत्पत्ति, वसुदेवका वंश-वर्णन, देवकीके अन्य पुत्रोंकी उत्पत्ति, रोहिणीसे संकर्षण-बलराम तथा देवकीसे श्रीकृष्णका आविर्भाव, वासुदेव कृष्णका वंश-वर्णन
| सूत उवाच | सूतजीने कहा— क्रोष्टुका एक पुत्र हुआ जो वृजिनीवान् |
|---|---|
| क्रोष्टोरेकोऽभवत् पुत्रो वृजिनीवानिति श्रुतिः।<br>तस्य पुत्रो महान् स्वातिरुशद्गुस्तत्सुतोऽभवत् ॥ १ ॥ | नामसे प्रसिद्ध हुआ। उसका महान् पुत्र स्वाति हुआ और उसका पुत्र उशद्गु हुआ। उशद्गुका चित्ररथ नामका |
| उशद्गोरभवत् पुत्रो नाम्ना चित्ररथो बली।<br>अथ चैत्ररथिर्लोके शशबिन्दुरिति स्मृतः ॥ २ ॥ | बलवान् पुत्र हुआ। चित्ररथका पुत्र लोकमें शशबिन्दु नामसे विख्यात हुआ। उसका पृथुयशा नामवाला पुत्र |
| तस्य पुत्रः पृथुयशा राजाभूद् धर्मतत्परः।<br>पृथुकर्मा च तत्पुत्रस्तस्मात् पृथुजयोऽभवत् ॥ ३ ॥ | धर्मपरायण राजा हुआ। उसका पुत्र पृथुकर्मा और उससे पृथुजय हुआ ॥ १-३ ॥ |
| * अध्याय २३ * | १५१ |
|---|
| संस्कृत | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| पृथुकीर्तिरभूत् तस्मात् पृथुदानस्ततोऽभवत्।<br>पृथुश्रवास्तस्य पुत्रस्तस्यासीत् पृथुसत्तमः ॥ ४ ॥ | उससे पृथुकीर्ति और उससे पृथुदान हुआ। उसका पुत्र पृथुश्रवा और उसका पुत्र था—पृथुसत्तम ॥ ४ ॥ |
| उशना तस्य पुत्रोऽभूत् सितेषुस्तत्सुतोऽभवत्।<br>तस्याभूद् रुक्मकवचः परावृत् तस्य सत्तमः ॥ ५ ॥ | हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! उस (पृथुसत्तम)-का पुत्र उशना हुआ और उसका सितेषु पुत्र हुआ। फिर उसका रुक्मकवच और उस (रुक्मकवच)-का परावृत् हुआ ॥ ५ ॥ |
| परावृतः सुतो जज्ञे ज्यामघो लोकविश्रुतः।<br>तस्माद् विदर्भः संजज्ञे विदर्भात् क्रथकैशिकौ ॥ ६ ॥<br><br>रोमपादस्तृतीयस्तु बभ्रुस्तस्यात्मजो नृपः।<br>धृतिस्तस्याभवत् पुत्रः संस्तस्तस्याप्यभूत् सुतः॥ ७ ॥<br><br>संस्तस्य पुत्रो बलवान् नाम्ना विश्वसहस्तु सः।<br>तस्य पुत्रो महावीर्यः प्रजावान् कौशिकस्ततः।<br>अभूत् तस्य सुतो धीमान् सुमन्तुस्तत्सुतोऽनलः ॥ ८ ॥<br><br>कैशिकस्य सुतश्चेदिश्चैद्यास्तस्याभवन् सुताः।<br>तेषां प्रधानो ज्योतिष्मान् वपुष्मांस्तत्सुतोऽभवत् ॥ ९ ॥<br><br>वपुष्मतो बृहन्मेधा श्रीदेवस्तत्सुतोऽभवत्।<br>तस्य वीतरथो विप्रा रुद्रभक्तो महाबलः ॥ १० ॥ | परावृत्ने संसारमें विख्यात ज्यामघ नामक पुत्र उत्पन्न किया। उससे विदर्भ उत्पन्न हुआ और विदर्भसे क्रथ, कैशिक और तीसरा रोमपाद नामक पुत्र हुआ। उस (रोमपाद)-का पुत्र बभ्रु राजा था। धृति उसका पुत्र हुआ और उसका भी संस्त नामक पुत्र उत्पन्न हुआ। संस्तका विश्वसह नामवाला बलवान् पुत्र था। उसका पुत्र महान् पराक्रमी प्रजावान् और उसका पुत्र कौशिक हुआ। उस (कौशिक)-का बुद्धिमान् सुमन्तु नामक पुत्र था और उसका पुत्र अनल था। कैशिकका पुत्र चेदि था और उस चेदिके पुत्र चैद्य हुए। उन चैद्योंमें ज्योतिष्मान् प्रधान था और वपुष्मान् उसका पुत्र हुआ। वपुष्मान्से बृहन्मेधा और श्रीदेव उसका पुत्र हुआ। ब्राह्मणो! उसका वीतरथ नामक पुत्र महान् बलशाली और रुद्रका भक्त था ॥ ६—१० ॥ |
| क्रथस्याप्यभवत् कुन्तिर्वृष्णिस्तस्याभवत् सुतः।<br>वृष्णेर्निवृत्तिरुत्पन्नो दशार्हस्तस्य तु द्विजाः ॥ ११ ॥<br><br>दशार्हपुत्रोऽप्यारोहो जीमूतस्तत्सुतोऽभवत्।<br>जैमूतिरभवद् वीरो विकृतिः परवीरहा ॥ १२ ॥<br><br>तस्य भीमरथः पुत्रः तस्मान्नवरथोऽभवत्।<br>दानधर्मरतो नित्यं सम्यक्शीलपरायणः ॥ १३ ॥ | ब्राह्मणो! क्रथका पुत्र कुन्ति और उसका पुत्र वृष्णि हुआ। वृष्णिसे निवृत्ति उत्पन्न हुआ और दशार्ह उसका पुत्र हुआ। दशार्हका पुत्र आरोह था और उसका जीमूत पुत्र हुआ। जीमूतका विकृति नामक बलवान् पुत्र शत्रु-वीरोंका नाशक था। उसका भीमरथ नामक पुत्र हुआ, उससे नवरथ हुआ, जो नित्य दानधर्ममें परायण तथा पूर्णरूपसे शील-सम्पन्न था ॥ ११—१३ ॥ |
| कदाचिन्मृगयां यातो दृष्ट्वा राक्षसमूर्जितम्।<br>दुद्राव महताविष्टो भयेन मुनिपुंगवाः ॥ १४ ॥<br><br>अन्वधावत संक्रुद्धो राक्षसस्तं महाबलः।<br>दुर्योधनोऽग्निसंकाशः शूलासक्तमहाकरः ॥ १५ ॥ | श्रेष्ठ मुनियो! किसी समय आखेटके लिये जाते हुए वह (नवरथ) एक बलवान् राक्षसको देखकर अत्यन्त भयभीत होकर भागने लगा। अग्निके समान प्रज्वलित वह महाबलवान् दुर्योधन नामक राक्षस क्रुद्ध होकर अपने विशाल हाथमें शूल लेकर उसके पीछे दौड़ा ॥ १४-१५ ॥ |
| राजा नवरथो भीत्या नातिदूरादनुत्तमम्।<br>अपश्यत् परमं स्थानं सरस्वत्या सुगोपितम् ॥ १६ ॥<br><br>स तद्वेगेन महता सम्प्राप्य मतिमान् नृपः।<br>ववन्दे शिरसा दृष्ट्वा साक्षाद् देवीं सरस्वतीम् ॥ १७ ॥ | भयभीत राजा नवरथने समीपमें ही (देवी) सरस्वतीसे रक्षित एक परम श्रेष्ठ स्थान देखा। वह बुद्धिमान् राजा अति शीघ्र ही वहाँ पहुँचा और साक्षात् देवी सरस्वतीका दर्शन करके उसने सिर झुकाकर प्रणाम किया ॥ १६-१७ ॥ |
| १५२ | * कूर्मपुराण * |
|---|---|
| तुष्टाव वाग्भिरिष्टाभिर्बद्धाञ्जलिरमित्रजित्।<br>पपात दण्डवद् भूमौ त्वामहं शरणं गतः॥ १८॥<br><br>नमस्यामि महादेवीं साक्षाद् देवीं सरस्वतीम्।<br>वाग्देवतामनाद्यन्तामीश्वरीं ब्रह्मचारिणीम्॥ १९॥<br><br>नमस्ते जगतां योनिं योगिनीं परमां कलाम्।<br>हिरण्यगर्भमहिषीं त्रिनेत्रां चन्द्रशेखराम्॥ २०॥ | उस शत्रुजयीने हाथ जोड़ते हुए अभीष्ट स्तुतियोंद्वारा स्तुति की, वह भूमिपर दण्डवत् गिर पड़ा और कहा—'मैं आपकी शरणमें आया हूँ। आप अनादि, अनन्त, ब्रह्मचारिणी, ईश्वरी, महादेवी, वाग्देवता साक्षात् देवी सरस्वतीको नमस्कार करता हूँ। जगत्की मूल कारणरूपा, परम कलास्वरूपा, तीन नेत्रवाली, मस्तकपर चन्द्रमाको धारण करनेवाली एवं हिरण्यगर्भकी महिषी योगिनीको नमस्कार है॥ १८-२०॥ |
| नमस्ये परमानन्दां चित्कलां ब्रह्मरूपिणीम्।<br>पाहि मां परमेशानि भीतं शरणमागतम्॥ २१॥ | चित्कलारूप, परमानन्दरूपा ब्रह्मरूपिणीको नमस्कार है। परमेशानि! भयभीत होकर मैं आपकी शरणमें आया हूँ, मेरी रक्षा करो॥ २१॥ |
| एतस्मिन्नन्तरे क्रुद्धो राजानं राक्षसेश्वरः।<br>हन्तुं समागतः स्थानं यत्र देवी सरस्वती॥ २२॥<br><br>समुद्यम्य तदा शूलं प्रवेष्टुं बलदर्पितः।<br>त्रिलोकमातुस्तत्स्थानं शशाङ्कादित्यसंनिभम्॥ २३॥<br><br>तदन्तरे महत् भूतं युगान्तादित्यसंनिभम्।<br>शूलेनोरसि निर्भिद्य पातयामास तं भुवि॥ २४॥<br><br>गच्छेत्याह महाराज न स्थातव्यं त्वया पुनः।<br>इदानीं निर्भयस्तूर्णं स्थानेऽस्मिन् राक्षसो हतः॥ २५॥ | इसी बीच क्रुद्ध वह राक्षसराज राजाको मारनेके लिये उसी स्थानपर आ पहुँचा, जहाँ देवी सरस्वती थीं। बलसे दर्पित वह राक्षस शूल उठाकर तीनों लोकोंकी जननीके उस सूर्य और चन्द्रमाके समान प्रकाशित स्थानमें प्रवेश करनेकी चेष्टा करने लगा। इसी बीच किसी प्रलयकालीन सूर्यके समान महान् बलशालीने शूलसे उसके वक्षःस्थलको विदीर्ण कर पृथ्वीपर गिरा दिया और कहा—महाराज! आप अब निर्भय होकर शीघ्र ही इस स्थानसे चले जायँ, यहाँ अब फिर रुकें नहीं, राक्षस मारा जा चुका है॥ २२-२५॥ |
| ततः प्रणम्य हृष्टात्मा राजा नवरथः पराम्।<br>पुरीं जगाम विप्रेन्द्राः पुरंदरपुरोपमाम्॥ २६॥<br><br>स्थापयामास देवेशीं तत्र भक्तिसमन्वितः।<br>ईजे च विविधैर्यज्ञैर्होमैर्देवीं सरस्वतीम्॥ २७॥<br><br>तस्य चासीद् दशरथः पुत्रः परमधार्मिकः।<br>देव्या भक्तो महातेजाः शकुनिस्तस्य चात्मजः॥ २८॥<br><br>तस्मात् करम्भः संभूतो देवरातोऽभवत् ततः।<br>ईजे स चाश्वमेधेन देवक्षत्रश्च तत्सुतः॥ २९॥<br><br>मधुस्तस्य तु दायादस्तस्मात् कुरुवशोऽभवत्।<br>पुत्रद्वयमभूत् तस्य सुत्रामा चानुरेव च॥ ३०॥ | ब्राह्मणो! तब प्रसन्न मनवाला वह नवरथ उन परादेवीको प्रणामकर इन्द्रकी नगरीके समान अपनी नगरीको चला गया। वहाँ उसने भक्तियुक्त होकर देवेश्वरी सरस्वतीकी स्थापना की और विविध यज्ञों तथा होमोंके द्वारा उन देवीका यजन किया। उसका दशरथ नामक परम धार्मिक पुत्र था। वह महातेजस्वी देवीका भक्त था। उसका पुत्र शकुनि था। उससे करम्भ हुआ, उसका देवरात हुआ, उसने अश्वमेध यज्ञ किया (जिसके फलस्वरूप) उसको देवक्षत्र नामक पुत्र हुआ। उस (देवक्षत्र)-का पुत्र मधु हुआ, उससे कुरुवश हुआ। उसके सुत्रामा तथा अनु नामक दो पुत्र हुए॥ २६-३०॥ |
| अनोस्तु पुरुकुत्सोऽभूदंशुस्तस्य च रिक्थभाक्।<br>अथांशोः सत्त्वतो नाम विष्णुभक्तः प्रतापवान्।<br>महात्मा दाननिरतो धनुर्वेदविदां वरः॥ ३१॥<br><br>स नारदस्य वचनाद् वासुदेवार्चनान्वितम्।<br>शास्त्रं प्रवर्तयामास कुण्डगोलादिभिः श्रुतम्॥ ३२॥ | अनुका पुरुकुत्स हुआ तथा उसका पुत्र अंशु था। अंशुका पुत्र सत्त्वत था, जो विष्णुभक्त, प्रतापी, महात्मा, दानशील और धनुर्वेद जाननेवालोंमें श्रेष्ठ था। उसने नारदजीके कहनेपर वासुदेवकी पूजासे युक्त शास्त्रका प्रवर्तन किया, जिसे कुण्डगोलकोंने* सुना॥ ३१-३२॥ |
* कुण्डगोलक—कुण्ड—पतिके जीवित रहते हुए परपुरुषसे उत्पन्न पुत्र। गोलक—पतिके मर जानेपर परपुरुषसे उत्पन्न पुत्र।
- अध्याय २३ * १५३
तस्य नाम्ना तु विख्यातं सात्त्वतं नाम शोभनम्।
प्रवर्तते महाशास्त्रं कुण्डादीनां हितावहम्॥ ३३॥
सात्त्वतस्तस्य पुत्रोऽभूत् सर्वशास्त्रविशारदः।
पुण्यश्लोको महाराजस्तेन वै तत्प्रवर्तितम्॥ ३४॥
सात्त्वतः सत्त्वसम्पन्नः कौशल्यां सुषुवे सुतान्।
अन्धकं वै महाभोजं वृष्णिं देवावृधं नृपम्।
ज्येष्ठं च भजमानाख्यं धनुर्वेदविदां वरम्॥ ३५॥
तेषां देवावृधो राजा चचार परमं तपः।
पुत्रः सर्वगुणोपेतो मम भूयादिति प्रभुः॥ ३६॥
तस्य बभ्रुरिति ख्यातः पुण्यश्लोकोऽभवन्नृपः।
धार्मिको रूपसम्पन्नस्तत्त्वज्ञानरतः सदा॥ ३७॥
भजमानस्य सृञ्जयां भजमाना विजज्ञिरे।
तेषां प्रधानौ विख्यातौ निमिः कृकण एव च॥ ३८॥
महाभोजकुले जाता भोजा वैमार्तिकास्तथा।
वृष्णेः सुमित्रो बलवाननमित्रः शिनिस्तथा॥ ३९॥
अनमित्रादभून्निघ्नो निघ्नस्य द्वौ बभूवतुः।
प्रसेनस्तु महाभागः सत्राजिन्नाम चोत्तमः॥ ४०॥
अनमित्राच्छिनिर्जज्ञे कनिष्ठाद् वृष्णिनन्दनात्।
सत्यवान् सत्यसम्पन्नः सत्यकस्तत्सुतोऽभवत्॥ ४१॥
सात्यकिर्युयुधानस्तु तस्यासङ्गोऽभवत् सुतः।
कुणिस्तस्य सुतो धीमांस्तस्य पुत्रो युगंधरः॥ ४२॥
माद्र्या वृष्णेः सुतो जज्ञे पृश्निर्वै यदुनन्दनः।
जज्ञाते तनयौ पृश्नेः श्वफल्कश्चित्रकश्च ह॥ ४३॥
श्वफल्कः काशिराजस्य सुतां भार्यामविन्दत।
तस्यामजनयत् पुत्रमक्रूरं नाम धार्मिकम्।
उपमङ्गुस्तथा मङ्गुरन्ये च बहवः सुताः॥ ४४॥
अक्रूरस्य स्मृतः पुत्रो देववानिव विश्रुतः।
उपदेवश्च पुण्यात्मा तयोर्विश्वप्रमाथिनौ॥ ४५॥
चित्रकस्याभवत् पुत्रः पृथुर्विपृथुरेव च।
अश्वग्रीवः सुबाहुश्च सुपार्श्वकगवेषणौ॥ ४६॥
अन्धकात् काश्यदुहिता लेभे च चतुरः सुतान्।
कुकुरं भजमानं च शुचिं कम्बलवर्हिषम्॥ ४७॥
कुकुरस्य सुतो वृष्णिर्वृष्णेस्तु तनयोऽभवत्।
कपोतरोमा विपुलस्तस्य पुत्रो विलोमकः॥ ४८॥
अनुवाद
उसके नामसे सात्त्वत ऐसा विख्यात कुण्डादिकोंके लिये कल्याणकारी सुन्दर शास्त्र प्रवर्तित हुआ। उस (सत्त्वत)-का सभी शास्त्रोंमें पारंगत सात्त्वत नामक पुत्र हुआ, वह महाराज पुण्यश्लोक था। उसने उस सात्त्वत शास्त्रका प्रवर्तन किया। सत्त्वसम्पन्न सात्त्वतकी पत्नी कौशल्याने अन्धक, महाभोज, वृष्णि, राजा देवावृध तथा धनुर्वेदज्ञोंमें श्रेष्ठ भजमान नामक ज्येष्ठ पुत्रको जन्म दिया॥ ३३-३५॥
उनमेंसे राजा देवावृधने 'मुझे सभी गुणोंसे सम्पन्न शक्तिशाली पुत्र हो' इस आशयसे परम तप किया। उसका पुत्र बभ्रु नामसे विख्यात पुण्यश्लोक राजा हुआ। वह धर्मात्मा, रूप-सम्पन्न तथा सदा तत्त्वज्ञान-परायण रहता था। भजमानके सृञ्जयी (पत्नी)-से भजमान ही नामवाले (अनेक) पुत्र हुए। उनमेंसे निमि तथा कृकण—ये दो प्रधान तथा विख्यात थे। महाभोजके वंशमें भोज तथा वैमार्तिक उत्पन्न हुए। वृष्णिके बलवान् सुमित्र, अनमित्र तथा शिनि हुए। अनमित्रसे निघ्न हुआ और निघ्नके महाभाग्यवान् प्रसेन तथा श्रेष्ठ सत्राजित् नामवाले दो पुत्र हुए॥ ३६-४०॥
कनिष्ठ वृष्णिनन्दन अनमित्रसे शिनि उत्पन्न हुआ। उसका सत्यक नामक पुत्र हुआ जो सत्य बोलनेवाला तथा सत्यसम्पन्न था। सत्यकका पुत्र युयुधान और उसका पुत्र असङ्ग हुआ। उसका पुत्र बुद्धिमान् कुणि था और युगन्धर उसका पुत्र हुआ। वृष्णिको माद्रीसे यदुनन्दन पृश्नि नामक पुत्र उत्पन्न हुआ। पृश्निको श्वफल्क तथा चित्रक नामवाले दो पुत्र हुए। श्वफल्कने काशिराजकी पुत्रीको अपनी भार्या बनाया और उससे अक्रूर नामक धार्मिक पुत्र उत्पन्न किया। उपमङ्गु तथा मङ्गु नामवाले उनके बहुतसे पुत्र थे। अक्रूरका देववान् इस नामसे प्रसिद्ध पुत्र कहा गया है। पुण्यात्मा उपदेव भी उसका पुत्र हुआ। उन दोनोंको विश्व तथा प्रमाथी नामक दो पुत्र हुए॥ ४१-४५॥
चित्रकके पृथु, विपृथु, अश्वग्रीव, सुबाहु, सुपार्श्वक तथा गवेषण नामक पुत्र हुए। काश्यकी पुत्रीने अन्धकसे कुकुर, भजमान, शुचि तथा कम्बलवर्हिष नामक चार पुत्रोंको प्राप्त किया। कुकुरका पुत्र वृष्णि हुआ और वृष्णिका पुत्र कपोतरोमा विपुल हुआ। उसका पुत्र विलोमक हुआ॥ ४६-४८॥
१५४ * कूर्मपुराण *
| तस्यासीत् तुम्बुरुसखा विद्वान् पुत्रो नलः किल।<br>ख्यायते तस्य नामानुरनोरानकदुन्दुभिः॥ ४९॥ | उस (विलोमक)-का विद्वान् नल नामक पुत्र हुआ जो तुम्बुरुका मित्र था, अनु भी उसका नाम हुआ। अनुका पुत्र आनकदुन्दुभि हुआ॥ ४९॥ |
| स गोवर्धनमासाद्य तताप विपुलं तपः।<br>वरं तस्मै ददौ देवो ब्रह्मा लोकमहेश्वरः॥ ५०॥ | ब्राह्मणो! उसने गोवर्धन पर्वतपर जाकर महान् तप किया। तब लोकमहेश्वर देव ब्रह्माने उसे वर प्रदान किया और कहा—तुम्हारे वंशकी अक्षय कीर्ति होगी तथा तुम्हें गुरुसे भी अधिक श्रेष्ठ गानयोग (संगीत-कलाकी स्वाभाविक प्रतिभा) और इच्छानुसार रूप धारण करनेकी योग्यता प्राप्त होगी॥ ५०-५१॥ |
| वंशस्य चाक्षयां कीर्तिं गानयोगमनुत्तमम्।<br>गुरोरभ्यधिकं विप्राः कामरूपित्वमेव च॥ ५१॥<br>स लब्ध्वा वरमव्यग्रो वरेण्यं वृषवाहनम्।<br>पूजयामास गानेन स्थाणुं त्रिदशपूजितम्॥ ५२॥ | वर प्राप्तकर प्रशान्त (मनवाले) उसने देवताओंद्वारा पूजित, वरणीय और वृषवाहन स्थाणु (शंकर)-की गान (संगीत)-द्वारा पूजा की। गानमें रत उस (आनकदुन्दुभि)-को भगवान् देव अम्बिकापति (शंकर)-ने देवताओंके लिये भी दुर्लभ विवाह करने योग्य कन्यारूपी रत्न प्रदान किया। भार्या-रूपमें उसका साथ प्राप्तकर शत्रुनाशक राजाने उस चञ्चल आँखोंवाली अपनी प्रिया भ्रान्तलोचनाको श्रेष्ठ गानयोग सिखलाया। (राजाने) उससे सुन्दर भुजावाले शोभन नामक पुत्र तथा रूप और लावण्यसे सम्पन्न ह्रीमती नामकी कन्याको उत्पन्न किया॥ ५२-५५॥ |
| तस्य गानरतस्याथ भगवानम्बिकापतिः।<br>कन्यारत्नं ददौ देवो दुर्लभं त्रिदशैरपि॥ ५३॥ | |
| तया स सङ्गतो राजा गानयोगमनुत्तमम्।<br>अशिक्षयदमित्रघ्नः प्रियां तां भ्रान्तलोचनाम्॥ ५४॥ | |
| तस्यामुत्पादयामास सुभुजं नाम शोभनम्।<br>रूपलावण्यसम्पन्नां ह्रीमतीमपि कन्यकाम्॥ ५५॥ | |
| ततस्तं जननी पुत्रं बाल्ये वयसि शोभनम्।<br>शिक्षयामास विधिवद् गानविद्यां च कन्यकाम्॥ ५६॥ | तब माता (भ्रान्तलोचना)-ने बाल्यावस्थामें ही उस शोभन नामक पुत्रको तथा कन्या (ह्रीमती)-को भी विधिवत् गानविद्याकी शिक्षा प्रदान की। उपनयन होनेके अनन्तर विधिपूर्वक गुरुसे वेदोंका अध्ययनकर (शोभनने) गन्धर्वोंकी मानसी नामक कन्यासे विवाह किया और उससे वीणा बजानेका तत्त्व जाननेवाले तथा संगीतशास्त्रमें पारंगत पाँच श्रेष्ठ पुत्रोंको उत्पन्न किया॥ ५६-५८॥ |
| कृतोपनयनो वेदानधीत्य विधिवद् गुरोः।<br>उद्ववाहात्मजां कन्यां गन्धर्वाणां तु मानसीम्॥ ५७॥ | |
| तस्यामुत्पादयामास पञ्च पुत्राननुत्तमान्।<br>वीणावादनतत्त्वज्ञान् गानशास्त्रविशारदान्॥ ५८॥ | |
| पुत्रैः पौत्रैः सपत्नीको राजा गानविशारदः।<br>पूजयामास गानेन देवं त्रिपुरनाशनम्॥ ५९॥ | पुत्र-पौत्र तथा पत्नीसहित गानविद्यामें पारंगत उस राजाने गायनद्वारा त्रिपुरका नाश करनेवाले देव (शंकर)-की पूजा की। लक्ष्मीके सदृश विशाल नेत्रोंवाली जो ह्रीमती नामकी कन्या थी, सुबाहु नामक गन्धर्व उसे लेकर अपनी पुरीमें चला गया। अत्यन्त तेजस्वी गन्धर्वको भी उस (ह्रीमती)-से सुषेण, वीर, सुग्रीव, सुभोज तथा नरवाहन नामके पुत्र हुए॥ ५९-६१॥ |
| ह्रीमती चापि या कन्या श्रीरिवायतलोचना।<br>सुबाहुर्नाम गन्धर्वस्तामादाय ययौ पुरीम्॥ ६०॥ | |
| तस्यामप्यभवन् पुत्रा गन्धर्वस्य सुतेजसः।<br>सुषेणवीरसुग्रीवसुभोजनरवाहनाः ॥ ६१॥ | |
| अथासीदभिजित् पुत्रो वीरस्वानकदुन्दुभेः।<br>पुनर्वसुश्चाभिजितः सम्बभूवाहुकः सुतः॥ ६२॥ | आनकदुन्दुभिका अभिजित् नामक एक वीर पुत्र था। अभिजित्का पुनर्वसु और उससे आहुकका जन्म हुआ॥ ६२॥ |
* अध्याय २३ * । १५५
आहुकस्योग्रसेनश्च देवकश्च द्विजोत्तमाः।
देवकस्य सुता वीरा जज्ञिरे त्रिदशोपमाः॥ ६३॥
देववानुपदेवश्च सुदेवो देवरक्षितः।
तेषां स्वसारः समासन् वसुदेवाय ता ददौ॥ ६४॥
वृकदेवोपदेवा च तथान्या देवरक्षिता।
श्रीदेवा शान्तिदेवा च सहदेवा च सुव्रता।
देवकी चापि तासां तु वरिष्ठाभूत् सुमध्यमा॥ ६५॥
उग्रसेनस्य पुत्रोऽभून्न्यग्रोधः कंस एव च।
सुभूमी राष्ट्रपालश्च तुष्टिमाञ्छङ्कुरेव च॥ ६६॥
भजमानादभूत् पुत्रः प्रख्यातोऽसौ विदूरथः।
तस्य शूरः शमिस्तस्मात् प्रतिक्षत्रस्ततोऽभवत्॥ ६७॥
स्वयम्भोजस्ततस्तस्माद् हृदिकः शत्रुतापनः।
कृतवर्माथ तत्पुत्रो देवरस्तत्सुतः स्मृतः।
स शूरस्तत्सुतो धीमान् वसुदेवोऽथ तत्सुतः॥ ६८॥
वसुदेवान्महाबाहुर्वासुदेवो जगद्गुरुः।
बभूव देवकीपुत्रो देवैरभ्यर्थितो हरिः॥ ६९॥
रोहिणी च महाभागा वसुदेवस्य शोभना।
असूत् पत्नी संकर्षं रामं ज्येष्ठं हलायुधम्॥ ७०॥
स एव परमात्मासौ वासुदेवो जगन्मयः।
हलायुधः स्वयं साक्षाच्छेषः संकर्षणः प्रभुः॥ ७१॥
भृगुशापच्छलेनैव मानयन् मानुषीं तनुम्।
बभूव तस्यां देवक्यां रोहिण्यामपि माधवः॥ ७२॥
उमादेहसमुद्भूता योगनिद्रा च कौशिकी।
नियोगाद् वासुदेवस्य यशोदातनया ह्यभूत्॥ ७३॥
ये चान्ये वसुदेवस्य वासुदेवाग्रजाः सुताः।
प्रागेव कंसस्तान् सर्वान् जघान मुनिपुंगवाः॥ ७४॥
सुषेणश्च तथोदायी भद्रसेनो महाबलः।
ऋजुदासो भद्रदासः कीर्तिमानपि पूर्वजः॥ ७५॥
हतेष्वेतेषु सर्वेषु रोहिणी वसुदेवतः।
असूत् रामं लोकेशं बलभद्रं हलायुधम्॥ ७६॥
जातेऽथ रामे देवानामादिमात्मानमच्युतम्।
असूत् देवकी कृष्णं श्रीवत्साङ्कितवक्षसम्॥ ७७॥
रेवती नाम रामस्य भार्यासीत् सुगुणान्विता।
तस्यामुत्पादयामास पुत्रौ द्वौ निशठोल्मुकौ॥ ७८॥
द्विजोत्तमो! आहुकके दो पुत्र हुए—उग्रसेन और देवक। देवकके देवताओंके समान देववान्, उपदेव, सुदेव तथा देवरक्षित नामवाले चार वीर पुत्र हुए। इनकी सात बहनें थीं—वृकदेवा, उपदेवा, देवरक्षिता, श्रीदेवा, शान्तिदेवा, सहदेवा, सुव्रता तथा देवकी। इनमें सुन्दर मध्यभागवाली देवकी सबसे बड़ी थी। ये सभी वसुदेवको दी गयीं॥ ६३—६५॥
उग्रसेनके न्यग्रोध, कंस, सुभूमि, राष्ट्रपाल, तुष्टिमान् तथा शङ्कु नामवाले पुत्र थे। भजमानका प्रख्यात विदूरथ नामवाला पुत्र हुआ। उसका पुत्र शूर, उससे शमि और शमिका प्रतिक्षत्र नामक पुत्र हुआ। उस (प्रतिक्षत्र)-से स्वयम्भोज और उससे शत्रुओंको ताप पहुँचानेवाला पुत्र हृदिक हुआ। उसका पुत्र कृतवर्मा और उसका पुत्र देवर कहलाया। उस शूरसे धीमान् हुआ और उसका पुत्र वसुदेव था॥ ६६—६८॥
देवताओंके प्रार्थना करनेपर महाबाहु जगद्गुरु वासुदेव विष्णु वसुदेवसे देवकी-पुत्रके रूपमें प्रकट हुए। वसुदेवकी महाभाग्यशालिनी सुन्दर रोहिणी नामक पत्नीने हलको आयुधके रूपमें धारण करनेवाले ज्येष्ठ पुत्र संकर्षण राम (बलराम)-को जन्म दिया। वह परमात्मा (विष्णु) ही ये जगन्मय (वसुदेवपुत्र) वासुदेव हैं। हलायुध (बलराम) संकर्षण स्वयं साक्षात् प्रभु शेष हैं॥ ६९—७१॥
भृगुके शापके कारण वे माधव विष्णु भी मनुष्य-शरीर स्वीकार कर उन देवकी तथा रोहिणीसे उत्पन्न हुए। उमाकी देहसे उत्पन्न योगनिद्रारूप कौशिकीदेवी वासुदेवकी आज्ञासे यशोदाकी पुत्री हुई॥ ७२-७३॥
मुनिश्रेष्ठो! वसुदेवके अन्य जो वासुदेव नामवाले ज्येष्ठ पुत्र थे उन सबको कंसने पहले ही मार डाला। सुषेण, उदायी, भद्रसेन, महाबल, ऋजुदास, भद्रदास और पूर्वमें उत्पन्न कीर्तिमान्—इन सभी (वसुदेवके बड़े भाइयों)-के मारे जानेपर रोहिणीने वसुदेवसे संसारके स्वामी हलायुध बलभद्र राम (बलराम)-को जन्म दिया॥ ७४—७६॥
राम (बलराम)-के उत्पन्न होनेके पश्चात् देवकीने देवताओंके आदि कारण, आत्मरूप, श्रीवत्स-चिह्नसे सुशोभित वक्षःस्थलवाले अच्युत कृष्णको जन्म दिया॥ ७७॥
बलरामकी सुन्दर गुणोंसे युक्त रेवती नामकी भार्या थीं। उन्होंने उनसे निशठ तथा उल्मुक नामक दो पुत्रोंको उत्पन्न किया॥ ७८॥
१५६ * कूर्मपुराण *
षोडशस्त्रीसहस्राणि कृष्णस्याक्लिष्टकर्मणः । बभूवुरात्मजास्तासु शतशोऽथ सहस्रशः ॥ ७९ ॥ चारुदेष्णः सुचारुश्च चारुवेषो यशोधरः । चारुश्रवाश्चारुयशाः प्रद्युम्नः शंख एव च ॥ ८० ॥ रुक्मिण्यां वासुदेवस्य महाबलपराक्रमाः । विशिष्टाः सर्वपुत्राणां सम्बभूवुरिमे सुताः ॥ ८१ ॥ तान् दृष्ट्वा तनयान् वीरान् रौक्मिणेयाञ्जनार्दनम् । जाम्बवत्यब्रवीत् कृष्णं भार्या तस्य शुचिस्मिता ॥ ८२ ॥ मम त्वं पुण्डरीकाक्ष विशिष्टं गुणवत्तमम् । सुरेशसदृशं पुत्रं देहि दानवसूदन ॥ ८३ ॥ जाम्बवत्या वचः श्रुत्वा जगन्नाथः स्वयं हरिः । समारेभे तपः कर्तुं तपोनिधिररिंदमः ॥ ८४ ॥
(वसुदेव-देवकीसे उत्पन्न साक्षात् विष्णु) अक्लिष्टकर्मा श्रीकृष्णकी सोलह हजार पत्नियाँ थीं और उनसे सैकड़ों हजारों पुत्र हुए। वासुदेव श्रीकृष्णकी पत्नी रुक्मिणीसे चारुदेष्ण, सुचारु, चारुवेष, यशोधर, चारुश्रवा, चारुयशा, प्रद्युम्न तथा शङ्ख नामवाले महान् बलशाली और पराक्रम-सम्पन्न पुत्र हुए। ये पुत्र सभी पुत्रोंमें विशिष्ट हुए ॥ ७९–८१ ॥
रुक्मिणीसे उत्पन्न इन वीर पुत्रोंको देखकर पवित्र मुसकानवाली पत्नी जाम्बवतीने अपने पति जनार्दन श्रीकृष्णसे कहा—पुण्डरीकाक्ष! दानवसूदन! आप मुझे इन्द्रके समान विशिष्ट गुणवानोंमें श्रेष्ठ पुत्र प्रदान करें। जाम्बवतीका कथन सुनकर शत्रुओंका दमन करनेवाले तपोनिधि जगन्नाथ स्वयं हरिने तप करना प्रारम्भ किया ॥ ८२–८४ ॥
तच्छृणुध्वं मुनिश्रेष्ठा यथासौ देवकीसुतः । दृष्ट्वा लेभे सुतं रुद्रं तप्त्वा तीव्रं महत् तपः ॥ ८५ ॥
मुनिश्रेष्ठो ! उन देवकीपुत्र (श्रीकृष्ण)-ने जिस प्रकार अत्यन्त तीव्र महान् तपके द्वारा रुद्रका दर्शनकर पुत्र प्राप्त किया, उस (वृत्तान्त)-को आपलोग सुनें ॥ ८५ ॥
इति श्रीकूर्मपुराणे षट्साहस्र्यां संहितायां पूर्वविभागे त्रयोविंशोऽध्यायः ॥ २३ ॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें तेईसवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ २३ ॥
चौबीसवाँ अध्याय
पुत्र-प्राप्तिके लिये तपस्या करने-हेतु भगवान् श्रीकृष्णका महामुनि उपमन्युके आश्रममें जाना, महामुनि उपमन्युद्वारा उन्हें पाशुपत-योग प्रदान करना, तपस्यामें निरत कृष्णको शिव-पार्वतीका दर्शन और श्रीकृष्णद्वारा उनकी स्तुति करना, शिवद्वारा पुत्रप्राप्तिका वर देना तथा माता पार्वतीद्वारा अनेक वर देना और शिवके साथ श्रीकृष्णका कैलास-गमन
सूत उवाच
अथ देवो हृषीकेशो भगवान् पुरुषोत्तमः ।
तताप घोरं पुत्रार्थं निदानं तपसस्तपः ॥ १ ॥
स्वेच्छयाप्यावतीर्णोऽसौ कृतकृत्योऽपि विश्वधृक् ।
चचार स्वात्मनो मूलं बोधयन् भावमैश्वरम् ॥ २ ॥
जगाम योगिभिर्जुष्टं नानापक्षिसमाकुलम् ।
आश्रमं तूपमन्योर्वै मुनीन्द्रस्य महात्मनः ॥ ३ ॥
पतत्त्रिराजमारूढः सुपर्णमतितेजसम् ।
शङ्खचक्रगदापाणिः श्रीवत्सकृतलक्षणः ॥ ४ ॥
सूतजी बोले— हृषीकेश भगवान् पुरुषोत्तम देवने पुत्र-प्राप्तिके लिये तपस्याके निदान*-रूपमें (सर्वोत्कृष्ट) घोर तपस्या की। अपनी इच्छासे ही अवतीर्ण कृतकृत्य, विश्वको धारण करनेवाले ये श्रीकृष्ण (अपने) स्वरूपके मूल ईश्वर-भावका परिज्ञान करानेके लिये (उत्तम तपः-स्थलके अन्वेषणके बहाने पक्षिराज गरुड़पर आरूढ़ होकर) विचरण करने लगे। हाथोंमें शङ्ख, चक्र, गदा लिये तथा श्रीवत्सके चिह्नसे चिह्नित (श्रीकृष्ण) योगियोंद्वारा सेवित, अनेक प्रकारके पक्षिसमूहोंसे व्याप्त मुनीन्द्र महात्मा उपमन्युके आश्रममें पहुँचे ॥ १–४ ॥
* जो तपस्या उत्कृष्ट तपस्याके लिये दृष्टान्त होती है, तपस्याकी सत्यताका निकष (कसौटी) होती है, उसे तपस्याका निदान कहते हैं।
* अध्याय २४ *
१५७
| नानाद्रुमलताकीर्णं नानापुष्पोपशोभितम्।<br>ऋषीणामाश्रमैर्जुष्टं वेदघोषनिनादितम्॥ ५ ॥<br>सिंहर्क्षशरभाकीर्णं शार्दूलगजसंयुतम्।<br>विमलस्वादुपानीयैः सरोभिरुपशोभितम्॥ ६ ॥<br>आरामैर्विविधैर्जुष्टं देवतायतनैः शुभैः।<br>ऋषिकैर्ऋषिपुत्रैश्च महामुनिगणैस्तथा॥ ७ ॥<br>वेदाध्ययनसम्पन्नैः सेवितं चाग्निहोत्रिभिः।<br>योगिभिर्ध्याननिरतैर्नासाग्रगतलोचनैः ॥ ८ ॥<br>उपेतं सर्वतः पुण्यं ज्ञानिभिस्तत्त्वदर्शिभिः।<br>नदीभिरभितो जुष्टं जापकैर्ब्रह्मवादिभिः॥ ९ ॥<br>सेवितं तापसैः पुण्यैरीशाराधनतत्परैः।<br>प्रशान्तैः सत्यसंकल्पैर्निःशोकैर्निरुपद्रवैः॥ १०॥<br>भस्मावदातसर्वाङ्गैः रुद्रजाप्यपरायणैः।<br>मुण्डैस्तैर्जटिलैः शुद्धैस्तथान्यैश्च शिखाजटैः।<br>सेवितं तापसैर्नित्यं ज्ञानिभिर्ब्रह्मचारिभिः॥ ११॥ | वह आश्रम विविध प्रकारके वृक्ष और लताओंसे व्याप्त, अनेक प्रकारके पुष्पोंसे सुशोभित, ऋषियोंके आश्रमोंसे युक्त तथा वेदमन्त्रोंकी ध्वनियोंसे निनादित था। सिंह, भालू, शरभ, व्याघ्र और हाथियोंसे व्याप्त था; स्वच्छ, स्वादुयुक्त, पीने योग्य जलवाले सरोवरोंसे सुशोभित था; विविध प्रकारके उद्यानों तथा शुभ देवमन्दिरोंसे सम्पन्न था। ऋषियों, ऋषिपुत्रों, महामुनिगणों, वेदाध्ययनसम्पन्न तथा अग्निहोत्र करनेवालोंसे सेवित था। नासिकाके अग्रभागमें जिनकी दृष्टि लगी हुई है, ऐसे ध्यानपरायण योगियोंसे युक्त, सभी प्रकारसे पवित्र, तत्त्वदर्शी ज्ञानियोंसे सेवित और चारों ओर नदियोंसे घिरा था। वह आश्रम ब्रह्मवादी जापकों, शंकरकी आराधनामें निरत पवित्र तपस्वियोंसे सेवित, सत्यसंकल्पवाले, परम शान्त, शोक तथा उपद्रवरहित, यथाविधि सभी अङ्गोंमें भस्म लगाये हुए रुद्रके जपमें परायण, मुण्डित या मात्र जटा रखे हुए तथा जटाके समान शिखावाले अन्य तपस्वियों, ज्ञानियों और ब्रह्मचारियोंसे नित्य सेवित था॥ ५-११॥ |
| तत्राश्रमवरे रम्ये सिद्धाश्रमविभूषिते।<br>गङ्गा भगवती नित्यं वहत्येवाघनाशिनी ॥ १२॥<br>स तानन्विष्य विश्वात्मा तापसान् वीतकल्मषान्।<br>प्रणामेनाथ वचसा पूजयामास माधवः॥ १३॥ | वहाँ सिद्धोंके आश्रमोंसे सुशोभित उस रमणीय श्रेष्ठ आश्रममें पापोंका नाश करनेवाली भगवती गङ्गा नित्य प्रवाहित रहती थीं। उन विश्वात्मा माधवने उन कल्मषरहित तपस्वियोंको ढूँढ़-ढूँढ़कर उनके समीप जाकर उन्हें सविधि प्रणाम किया और स्तुतिपूर्वक उनकी पूजा की॥ १२-१३॥ |
| तं ते दृष्ट्वा जगद्योनिं शङ्खचक्रगदाधरम्।<br>प्रणेमुर्भक्तिसंयुक्ता योगिनां परमं गुरुम्॥ १४॥<br>स्तुवन्ति वैदिकैर्मन्त्रैः कृत्वा हृदि सनातनम्।<br>प्रोचुरन्योन्यमव्यक्तमादिदेवं महामुनिम्॥ १५॥ | उन शङ्ख, चक्र, गदाधारी, योगियोंके परम गुरु, जगद्योनि (श्रीकृष्ण)-को देखकर उन्होंने (तपस्वियोंने) भक्तिपूर्वक प्रणाम किया और अव्यक्त, आदिदेव, महामुनि तथा उन सनातन (देव)-का हृदयमें ध्यानकर वैदिक मन्त्रोंसे उनकी स्तुति करने लगे और आपसमें कहने लगे-॥ १४-१५॥ |
| अयं स भगवान्नेकः साक्षान्नारायणः परः।<br>आगच्छत्यधुना देवः पुराणपुरुषः स्वयम्॥ १६॥<br>अयमेवाव्ययः स्रष्टा संहर्ता चैव रक्षकः।<br>अमूर्तो मूर्तिमान् भूत्वा मुनीन् द्रष्टुमिहागतः॥ १७॥<br>एष धाता विधाता च समागच्छति सर्वगः।<br>अनादिरक्षयोऽनन्तो महाभूतो महेश्वरः॥ १८॥ | ये वही अद्वितीय परम साक्षात् नारायण भगवान् हैं। स्वयं पुराणपुरुष देव ही इस समय आये हुए हैं। ये ही अव्यय हैं, सृष्टि करनेवाले, संहार करनेवाले तथा पालन करनेवाले ये ही हैं। अमूर्त होते हुए भी ये मूर्तिमान् होकर मुनियोंको देखनेके लिये यहाँ आये हुए हैं। ये धाता, विधाता और सर्वव्यापी ही आ रहे हैं। ये अनादि, अक्षय, अनन्त, महाभूत और महेश्वर हैं॥ १६-१८॥ |
| श्रुत्वा श्रुत्वा हरिस्तेषां वचांसि वचनातिगः।<br>ययौ स तूर्णं गोविन्दः स्थानं तस्य महात्मनः॥ १९॥ | वाणीके अगोचर गोविन्द हरि उन (तपस्वियों)-के वचनोंको सुनते हुए शीघ्र ही उन महात्मा (उपमन्यु)-के स्थानपर गये॥ १९॥ |
१५८ * कूर्मपुराण *
उपस्पृश्याथ भावेन तीर्थे तीर्थे स यादवः।
चकार देवकीसूनुर्देवर्षिपितृतर्पणम्॥ २०॥
नदीनां तीरसंस्थानि स्थापितानि मुनीश्वरैः।
लिङ्गानि पूजयामास शम्भोरमिततेजसः॥ २१॥
दृष्ट्वा दृष्ट्वा समायान्तं यत्र यत्र जनार्दनम्।
पूजयाञ्चक्रिरे पुष्पैरक्षतैस्तत्र वासिनः॥ २२॥
समीक्ष्य वासुदेवं तं शार्ङ्गशङ्खासिधारिणम्।
तस्थिरे निश्चलाः सर्वे शुभाङ्गं तन्निवासिनः॥ २३॥
यानि तत्रारुरुक्षूणां मानसानि जनार्दनम्।
दृष्ट्वा समाहितान्यासन् निष्क्रामन्ति पुरा हरिम्॥ २४॥
अथावगाह्य गङ्गायां कृत्वा देवादितर्पणम्।
आदाय पुष्पवर्याणि मुनीन्द्रस्याविशद् गृहम्॥ २५॥
दृष्ट्वा तं योगिनां श्रेष्ठं भस्मोद्धूलितविग्रहम्।
जटाचीरधरं शान्तं ननाम शिरसा मुनिम्॥ २६॥
आलोक्य कृष्णमायान्तं पूजयामास तत्त्ववित्।
आसने चासयामास योगिनां प्रथममतिथिम्॥ २७॥
उवाच वचसां योनिं जानीमः परमं पदम्।
विष्णुमव्यक्तसंस्थानं शिष्यभावेन संस्थितम्॥ २८॥
स्वागतं ते हृषीकेश सफलानि तपांसि नः।
यत् साक्षादेव विश्वात्मा मद्गेहं विष्णुरागतः॥ २९॥
त्वां न पश्यन्ति मुनयो यतन्तोऽपि हि योगिनः।
तादृशस्याथ भवतः किमागमनकारणम्॥ ३०॥
श्रुत्वोपमन्योस्तद् वाक्यं भगवान् केशिमर्दनः।
व्याजहार महायोगी वचनं प्रणिपत्य तम्॥ ३१॥
श्रीकृष्ण उवाच
भगवन् द्रष्टुमिच्छामि गिरीशं कृत्तिवाससम्।
सम्प्राप्तो भवतः स्थानं भगवद्दर्शनोत्सुकः॥ ३२॥
कथं स भगवानीशो दृश्यो योगविदां वरः।
मयाचिरेण कुत्राहं द्रक्ष्यामि तमुमापतिम्॥ ३३॥
उन यदुवंशी देवकीपुत्र श्रीकृष्णने प्रत्येक तीर्थमें श्रद्धापूर्वक आचमनकर (मार्जनकर) देवता, ऋषि और पितरोंका तर्पण किया और मुनीश्वरोंके द्वारा नदियोंके किनारे स्थापित अमिततेजस्वी शंकरके लिङ्गोंकी पूजा की॥ २०-२१॥
वहाँके निवासियोंने जहाँ-जहाँ भी जनार्दनको आते हुए देखा, वहाँ-वहाँ पुष्पों तथा अक्षतोंसे उनकी पूजा की। शार्ङ्गधनुष, शङ्ख तथा असि धारण करनेवाले एवं शुभ अङ्गोंवाले उन वासुदेवका दर्शनकर वहाँ रहनेवाले सभी निश्चल-से खड़े हो गये। वहाँ (योगमें) आरूढ़ होनेके इच्छुक जिन लोगोंके मन समाधिस्थ थे, वे भी जनार्दन हरिको अपने सम्मुख देखकर उनका दर्शन करनेके लिये अपनी इन्द्रियोंको बहिर्मुख कर लिये॥ २२-२४॥
इधर श्रीकृष्णने गङ्गामें अवगाहन करनेके पश्चात् देवताओं, पितरों आदिका दर्शन, तर्पण आदि कर उत्तमोत्तम पुष्प आदि लेकर श्रेष्ठ मुनि (उपमन्यु)-के गृहमें प्रवेश किया। योगियोंमें श्रेष्ठ, भस्मसे अवलिप्त शरीरवाले, जटा और चीरधारी उन शान्त मुनिको देखकर (श्रीकृष्णने) सिर झुकाकर उन्हें प्रणाम किया॥ २५-२६॥
कृष्णको आते हुए देखकर तत्त्वज्ञ उन मुनिने योगियोंके प्रथम पूज्य उन्हें आसनपर बिठाया और उनकी पूजा की॥ २७॥
(मुनिने कहा—) हम जानते हैं कि वाणीके उत्पत्ति-स्थान, परमपदरूप, अव्यक्त शरीरवाले विष्णु शिष्यके रूपमें उपस्थित हुए हैं। हृषीकेश! आपका स्वागत है, हमारे तप सफल हुए जो साक्षात् विश्वात्मा विष्णु ही मेरे घर आये हैं। प्रयत्न करते हुए भी योगी तथा मुनिजन आपको देख नहीं पाते, ऐसे आपके यहाँ आनेका प्रयोजन क्या है? उपमन्युके उस वाक्यको सुनकर केशीका मर्दन करनेवाले महायोगी भगवान्ने उन्हें प्रणामकर कहा—॥ २८-३१॥
श्रीकृष्ण बोले— भगवन्! भगवान् शंकरके दर्शनोंके लिये उत्सुक मैं आया हूँ। कृत्तिवासा गिरीश (भगवान् शंकर)-का दर्शन करनेकी मेरी उत्कट इच्छा है। योगविदोंमें श्रेष्ठ भगवान् ईशका शीघ्र ही कैसे दर्शन कर सकता हूँ, उन उमापतिको मैं कहाँ देख पाऊँगा॥ ३२-३३॥
- अध्याय २४ * | १५९ ---|---
| इत्याह भगवानुक्तो दृश्यते परमेश्वरः।<br>भक्त्या चोग्रेण तपसा तत्कुरुष्वेह यत्नतः॥ ३४॥<br><br>इहेश्वरं देवदेवं मुनीन्द्रा ब्रह्मवादिनः।<br>ध्यायन्तोऽत्रासते देवं जापिनस्तापसाश्च ये॥ ३५॥<br><br>इह देवः सपत्नीको भगवान् वृषभध्वजः।<br>क्रीडते विविधैर्भूतैर्योगिभिः परिवारितः॥ ३६॥<br><br>इहाश्रमे पुरा रुद्रात् तपस्तप्त्वा सुदारुणम्।<br>लेभे महेश्वराद् योगं वसिष्ठो भगवानृषिः॥ ३७॥<br><br>इहैव भगवान् व्यासः कृष्णद्वैपायनः प्रभुः।<br>दृष्ट्वा तं परमं ज्ञानं लब्ध्वानीश्वरेश्वरम्॥ ३८॥<br><br>इहाश्रमवरे रम्ये तपस्तप्त्वा कपर्दिनः।<br>अविन्दत् पुत्रकान् रुद्रात् सुरभिर्भक्तिसंयुता॥ ३९॥<br><br>इहैव देवताः पूर्वं कालाद् भीता महेश्वरम्।<br>दृष्टवन्तो हरं श्रीमन्निर्भया निर्वृतिं ययुः॥ ४०॥<br><br>इहाराध्य महादेवं सावर्णिस्तपतां वरः।<br>लब्धवान् परमं योगं ग्रन्थकारत्वमुत्तमम्॥ ४१॥<br><br>प्रवर्तयामास शुभां कृत्वा वै संहितां द्विजः।<br>पौराणिकीं सुपुण्यार्थां सच्छिष्येषु द्विजातिषु॥ ४२॥<br><br>इहैव संहितां दृष्ट्वा कापेयः शांशपायनः।<br>महादेवं चकारेमां पौराणीं तन्नियोगतः।<br>द्वादशैव सहस्राणि श्लोकानां पुरुषोत्तम॥ ४३॥<br><br>इह प्रवर्तिता पुण्या द्व्यष्टसाहस्रिकोत्तरा।<br>वायवीयोत्तरं नाम पुराणं वेदसम्मितम्।<br>इहैव ख्यापितं शिष्यैः शांशपायनभाषितम्॥ ४४॥<br><br>याज्ञवल्क्यो महायोगी दृष्ट्वात्र तपसा हरम्।<br>चकार तन्नियोगेन योगशास्त्रमनुत्तमम्॥ ४५॥<br><br>इहैव भृगुणा पूर्वं तप्त्वा वै परमं तपः।<br>शुक्रो महेश्वरात् पुत्रो लब्धो योगविदां वरः॥ ४६॥<br><br>तस्मादिहैव देवेशं तपस्तप्त्वा महेश्वरम्।<br>द्रष्टुमर्हसि विश्वेशमुग्रं भीमं कपर्दिनम्॥ ४७॥<br><br>एवमुक्त्वा ददौ ज्ञानमुपमन्युर्महामुनिः।<br>व्रतं पाशुपतं योगं कृष्णायाक्लिष्टकर्मणे॥ ४८॥ | ऐसा कहे जानेपर भगवान् (उपमन्यु)-ने कहा—तीव्र भक्ति एवं तपस्याके द्वारा वे परमेश्वर देखे जा सकते हैं, इसलिये ऐसा ही प्रयत्न करो। ब्रह्मवादी मुनीन्द्र, जप करनेवाले तथा जो तपस्वी हैं वे, यहाँ उन देव ईश्वर देवाधिदेवका ध्यान करते हुए निवास कर रहे हैं। यहाँ भगवान् देव वृषभध्वज पत्नी (पार्वती)-सहित तथा विविध भूतों और योगियोंसे घिरे हुए सदा क्रीड़ा करते हैं॥ ३४-३६॥<br><br>प्राचीन कालमें इस आश्रममें कठोर तप करके भगवान् वसिष्ठ ऋषिने महेश्वर रुद्रसे योग प्राप्त किया था। यहीं प्रभु कृष्णद्वैपायन भगवान् व्यासने उन ईश्वरोंके भी ईश्वर (भगवान् शंकर)-का दर्शनकर परम ज्ञान प्राप्त किया था। इसी रमणीय श्रेष्ठ आश्रममें सुरभिने भक्तिपूर्वक तपस्या करके जटाधारी रुद्रसे पुत्रोंको प्राप्त किया था। पूर्वकालमें कालसे भयभीत देवताओंने यहींपर श्रीमान् हर (महाकाल)-का दर्शनकर भयसे रहित होकर शान्ति प्राप्त की थी। तपस्वियोंमें श्रेष्ठ द्विज सावर्णिने यहींपर महादेवकी आराधना करके परम योग तथा उत्तम ग्रन्थरचनाकी शक्ति प्राप्त की थी। तभी उन्होंने कल्याणकारिणी सुन्दर पुण्य प्रदान करनेवाली पुराणसंहिताका निर्माणकर सत्-शिष्यों और द्विजातियोंमें उसका प्रवर्तन किया॥ ३७-४२॥<br><br>पुरुषोत्तम ! इसी स्थानपर कापेय शांशपायनने महादेवका दर्शनकर उनकी आज्ञा प्राप्त करके बारह हजार श्लोकोंवाली इस (कूर्मरूपधारी भगवान् विष्णुके द्वारा वर्णित) पुराणसंहिताका निर्माण किया। वेदसम्मत पुण्य वायवीयपुराणसंहिताका सोलह हजार श्लोकोंवाला उत्तरभाग यहींपर प्रवर्तित हुआ। यहींपर शांशपायनद्वारा कही गयी पुराणसंहिताका प्रचार उनके शिष्योंने किया॥ ४३-४४॥<br><br>महायोगी याज्ञवल्क्यने यहींपर तपस्याद्वारा शंकरका दर्शन करके उनकी आज्ञासे श्रेष्ठ योगशास्त्रका निर्माण किया था। पूर्वकालमें भृगुने यहीं परम तप करके महेश्वरसे योगज्ञोंमें श्रेष्ठ शुक्र नामक पुत्रको प्राप्त किया था। इसलिये यहींपर तपस्या करके देवताओंके ईश, महेश्वर विश्वेश, उग्र, भीम कपर्दीका आप दर्शन करें। ऐसा कहकर महामुनि उपमन्युने सुन्दर कर्म करनेवाले कृष्णको पाशुपत-योग, पाशुपत-व्रत और पाशुपत-ज्ञान प्रदान किया॥ ४५-४८॥ |
१६० * कूर्मपुराण *
स तेन मुनिवर्येण व्याहतो मधुसूदनः ।
तत्रैव तपसा देवं रुद्रमाराधयत् प्रभुः ॥ ४९ ॥
भस्मोद्धूलितसर्वाङ्गो मुण्डो वल्कलसंयुतः ।
जजाप रुद्रमनिशं शिवैकाहितमानसः ॥ ५० ॥
ततो बहुतिथे काले सोमः सोमार्धभूषणः ।
अदृश्यत महादेवो व्योम्नि देव्या महेश्वरः ॥ ५१ ॥
किरीटिनं गदिनं चित्रमालं
पिनाकिनं शूलिनं देवदेवम् ।
शार्दूलचर्माम्बरसंवृताङ्गं
देव्या महादेवमसौ ददर्श ॥ ५२ ॥
परश्वधासक्तकरं त्रिनेत्रं
नृसिंहचर्मावृतसर्वगात्रम् ।
समुद्गिरन्तं प्रणवं बृहन्तं
सहस्रसूर्यप्रतिमं ददर्श ॥ ५३ ॥
प्रभुं पुराणं पुरुषं पुरस्तात्
सनातनं योगिनमीशितारम् ।
अणोरणीयांसमनन्तशक्तिं
प्राणेश्वरं शम्भुमसौ ददर्श ॥ ५४ ॥
न यस्य देवा न पितामहोऽपि
नेन्द्रो न चाग्निर्वरुणो न मृत्युः ।
प्रभावमद्यापि वदन्ति रुद्रं
तमादिदेवं पुरतो ददर्श ॥ ५५ ॥
तदान्वपश्यद् गिरिशस्य वामे
स्वात्मानमव्यक्तमनन्तरूपम् ।
स्तुवन्तमीशं बहुभिर्वचोभिः
शङ्खासिचक्रार्पितहस्तमाद्यम् ॥ ५६ ॥
कृताञ्जलिं दक्षिणतः सुरेशं
हंसाधिरूढं पुरुषं ददर्श ।
स्तुवानमीशस्य परं प्रभावं
पितामहं लोकगुरुं दिविस्थम् ॥ ५७ ॥
गणेश्वरानर्कसहस्रकल्पान्
नन्दीश्वरादीनमितप्रभावान् ।
त्रिलोकभर्तुः पुरतोऽन्वपश्यत्
कुमारमग्निप्रतिमं सशाखम् ॥ ५८ ॥
उन श्रेष्ठ मुनिके कहनेसे वे प्रभु मधुसूदन वहींपर तपस्याद्वारा रुद्रकी आराधना करने लगे। सभी अङ्गोंमें यथाविधि भस्म धारण करके, मुण्डित एवं वल्कल वस्त्रधारी होकर अनन्य-मनसे शिवमें चित्तको समाहितकर निरन्तर रुद्रसम्बन्धी मन्त्रोंका जप करने लगे। तदनन्तर बहुत समय बीत जानेके बाद अर्धचन्द्रमाको आभूषणरूपमें धारण किये सोमरूप महादेव महेश्वर देवी पार्वतीके साथ आकाशमें दिखलायी पड़े॥ ४९-५१॥
उन श्रीकृष्णने मुकुट, गदा, त्रिशूल, पिनाकधनुष तथा चित्र-विचित्र माला धारण किये हुए, सिंहके चर्म-रूपी वस्त्रसे समस्त अङ्गोंको आच्छादित किये हुए देवाधिदेव महादेवको देवी पार्वतीके साथ देखा। हाथमें परशु धारण किये हुए, नृसिंहके चर्मसे आच्छादित शरीरवाले, प्रणवका उच्चारण कर रहे तथा सहस्रों सूर्योंके समान श्रेष्ठ त्रिलोचन—भगवान् शंकरका श्रीकृष्णने दर्शन किया। उन्होंने (श्रीकृष्णने) अपने समक्ष पुराणपुरुष, सनातन प्रभु, योगी, ईश्वर, अणुसे भी सूक्ष्म, अनन्तशक्तियुक्त प्राणेश्वर शम्भुको देखा। जिन (रुद्र)-के प्रभावका देवता, पितामह, इन्द्र, अग्नि, वरुण तथा यम भी आजतक वर्णन नहीं कर पाये, उन आदिदेवको श्रीकृष्णने सामने देखा। उस समय उन्होंने भगवान् शंकरके वामभागमें शङ्ख, तलवार तथा चक्र धारण किये आत्मरूप, अव्यक्त, अनन्त तथा अनन्तरूपवाले आदिदेव (विष्णु)-को देखा। वे भी बहुत-सी स्तुतियोंके द्वारा ईश (शंकर)-की ही स्तुति कर रहे थे॥ ५२—५६॥
उन (भगवान् शंकर)-के दक्षिण भागमें उन्होंने (श्रीकृष्णने) हंसपर आसीन, अत्यन्त प्रभाववाले, देवताओंके स्वामी लोकगुरु पितामहको आकाशमें हाथ जोड़े हुए ईशकी स्तुति करते देखा। उन्होंने (श्रीकृष्णने) तीनों लोकोंके स्वामी (श्रीशंकर)-के सम्मुख हजारों सूर्योंके समान गणेश्वरों, अमित प्रभाववाले नन्दीश्वरादिकों तथा मयूरसहित अग्नि-सदृश कुमार कार्तिकेयको देखा॥ ५७-५८॥