संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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- अध्याय २१ * । १४३
| शूरश्च शूरसेनश्च धृष्णः कृष्णस्तथैव च।<br>जयध्वजश्च बलवान् नारायणपरो नृपः ॥ २० ॥<br>शूरसेनादयः सर्वे चत्वारः प्रथितौजसः।<br>रुद्रभक्ता महात्मानः पूजयन्ति स्म शंकरम् ॥ २१ ॥<br>जयध्वजस्तु मतिमान् देवं नारायणं हरिम्।<br>जगाम शरणं विष्णुं दैवतं धर्मतत्परः ॥ २२ ॥<br>तमूचुरितरे पुत्रा नायं धर्मस्तवानघ।<br>ईश्वराराधनरतः पितास्माकमभूदिति ॥ २३ ॥ | शूर, शूरसेन, धृष्ण, कृष्ण तथा पाँचवाँ पुत्र राजा जयध्वज बलवान् तथा नारायणका भक्त था। शूरसेन आदि चार पुत्र महात्मा एवं अति तेजस्वी और रुद्रके भक्त थे। वे सभी शंकरकी पूजा करते थे। धर्मपरायण एवं बुद्धिमान् जयध्वज नारायण देव हरि विष्णु देवताकी शरणमें गया। अन्य पुत्रों (उसके चार भाइयों)-ने उससे कहा—अनघ! यह तुम्हारा धर्म नहीं है। हमारे पिता शंकरकी आराधना करते थे ॥ २०—२३ ॥ |
| तानब्रवीन्महातेजा एष धर्मः परो मम।<br>विष्णोरंशेन सम्भूता राजानो यन्महीतले ॥ २४ ॥<br>राज्यं पालयतावश्यं भगवान् पुरुषोत्तमः।<br>पूजनीयो यतो विष्णुः पालको जगतो हरिः ॥ २५ ॥<br>सात्त्विकी राजसी चैव तामसी च स्वयम्भुवः।<br>तिस्रस्तु मूर्तयः प्रोक्ताः सृष्टिस्थित्यन्तहेतवः ॥ २६ ॥<br>सत्त्वात्मा भगवान् विष्णुः संस्थापयति सर्वदा।<br>सृजेद् ब्रह्मा रजोमूर्तिः संहरेत् तामसो हरः ॥ २७ ॥<br>तस्मान्महीपतीनां तु राज्यं पालयतामयम्।<br>आराध्यो भगवान् विष्णुः केशवः केशिमर्दनः ॥ २८ ॥ | इसपर महातेजस्वी (जयध्वज)-ने उनसे कहा—यही मेरा श्रेष्ठ धर्म है। पृथ्वीपर जो भी राजा हुए हैं, वे सभी विष्णुके अंशसे उत्पन्न हुए हैं। राज्यका परिपालन करनेवालोंको चाहिये कि भगवान् पुरुषोत्तमकी अवश्य आराधना करें। क्योंकि हरि विष्णु संसारके पालनकर्ता हैं। स्वयम्भू (विष्णु)-की सात्त्विकी, राजसी तथा तामसी—ये तीन मूर्तियाँ कही गयी हैं, जो क्रमशः सृष्टि, पालन तथा संहार करनेवाली हैं। सत्त्वगुणसम्पन्न भगवान् विष्णु नित्य पालन करते हैं। रजोमूर्ति ब्रह्मा सृष्टि करते हैं और तमोगुणात्मक हर संहार करते हैं। अतएव राज्यका पालन करनेवाले राजाओंके लिये केशीका मर्दन करनेवाले केशव भगवान् विष्णु आराधनीय हैं॥ २४—२८॥ |
| निशम्य तस्य वचनं भ्रातरोऽन्ये मनस्विनः।<br>प्रोचुः संहारकृद् रुद्रः पूजनीयो मुमुक्षुभिः ॥ २९ ॥<br>अयं हि भगवान् रुद्रः सर्वं जगदिदं शिवः।<br>तमोगुणं समाश्रित्य कल्पान्ते संहरेत् प्रभुः ॥ ३० ॥<br>या सा घोरतरा मूर्तिरस्य तेजोमयी परा।<br>संहरेद् विद्यया सर्वं संसारं शूलभृत् तया ॥ ३१ ॥ | उस (जयध्वज)-का वचन सुनकर उसके दूसरे मनस्वी भाइयोंने कहा—मुक्तिप्राप्तिकी इच्छा करनेवालोंके लिये संहार करनेवाले रुद्र ही पूजनीय हैं। ये ही कल्याणकारी प्रभु भगवान् रुद्र कल्पान्तमें तमोगुणका आश्रय लेकर इस सम्पूर्ण जगत्का संहार करते हैं। इनकी जो अति घोर तेजोमयी परा मूर्ति है, वही विद्या (ज्ञान-विवेक)-स्वरूप है। शक्ति-रूपमें उसीके द्वारा त्रिशूल धारण करनेवाले शंकर सम्पूर्ण संसारका संहार करते हैं ॥ २९—३१ ॥ |
| ततस्तानब्रवीद् राजा विचिन्त्यासौ जयध्वजः।<br>सत्त्वेन मुच्यते जन्तुः सत्त्वात्मा भगवान् हरिः ॥ ३२ ॥ | तब वह राजा जयध्वज कुछ विचार करके उनसे बोला—सत्त्वगुणद्वारा ही प्राणी मुक्त होता है और वे भगवान् सत्त्वात्मक हैं ॥ ३२ ॥ |
| तमूचुर्भ्रातरो रुद्रः सेवितः सात्त्विकैर्जनैः।<br>मोचयेत् सत्त्वसंयुक्तः पूजयेशं ततो हरम् ॥ ३३ ॥ | इसपर भाइयोंने उससे कहा—सात्त्विकजनोंके द्वारा सेवित रुद्र सत्त्वगुणसे सम्पन्न होकर मुक्त करते हैं, अतः ईश्वर हरकी पूजा करो। |
| अथाब्रवीद् राजपुत्रः प्रहसन् वै जयध्वजः।<br>स्वधर्मो मुक्तये पन्था नान्यो मुनिभिरिष्यते ॥ ३४ ॥ | तब राजपुत्र जयध्वजने हँसते हुए कहा—मुक्तिके लिये स्वधर्म-पालन ही एकमात्र मार्ग है। मुनिलोग अन्य (धर्म)-की इच्छा नहीं करते ॥ ३३-३४ ॥ |