संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| १४४ | * कूर्मपुराण * |
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| तथा च वैष्णवी शक्तिर्नृपाणां देवता सदा।<br>आराधनं परो धर्मो मुरारेरमितौजसः॥ ३५॥<br><br>तमब्रवीद् राजपुत्रः कृष्णो मतिमतां वरः।<br>यदर्जुनोऽस्मज्जनकः स्वधर्मं कृतवानिति॥ ३६॥<br><br><br>एवं विवादे वितते शूरसेनोऽब्रवीद् वचः।<br>प्रमाणमृषयो ह्यत्र ब्रूयुस्ते यत् तथैव तत्॥ ३७॥<br>ततस्ते राजशार्दूलाः पप्रच्छुर्ब्रह्मवादिनः।<br>गत्वा सर्वे सुसंरब्धाः सप्तर्षीणां तदाश्रमम्॥ ३८॥<br>तानब्रुवंस्ते मुनयो वसिष्ठाद्या यथार्थतः।<br>या यस्याभिमता पुंसः सा हि तस्यैव देवता॥ ३९॥<br><br>किन्तु कार्यविशेषेण पूजिताश्चेष्टदा नृणाम्।<br>विशेषात् सर्वदा नायं नियमो ह्यन्यथा नृपाः॥ ४०॥<br><br>नृपाणां दैवतं विष्णुस्तथैव च पुरंदरः।<br>विप्राणामग्निरादित्यो ब्रह्मा चैव पिनाकधृक्॥ ४१॥<br><br>देवानां दैवतं विष्णुर्दानवानां त्रिशूलभृत्।<br>गन्धर्वाणां तथा सोमो यक्षाणामपि कथ्यते॥ ४२॥<br>विद्याधराणां वाग्देवी साध्यानां भगवान् रविः।<br>रक्षसां शंकरो रुद्रः किंनराणां च पार्वती॥ ४३॥<br>ऋषीणां दैवतं ब्रह्मा महादेवश्च शूलभृत्।<br>मनूनां स्यादुमा देवी तथा विष्णुः सभास्करः॥ ४४॥<br>गृहस्थानां च सर्वे स्युर्ब्रह्मा वै ब्रह्मचारिणाम्।<br>वैखानसानामर्कः स्याद् यतीनां च महेश्वरः॥ ४५॥<br>भूतानां भगवान् रुद्रः कूष्माण्डानां विनायकः।<br>सर्वेषां भगवान् ब्रह्मा देवदेवः प्रजापतिः॥ ४६॥<br>इत्येवं भगवान् ब्रह्मा स्वयं देवोऽभ्यभाषत।<br>तस्माज्जयध्वजो नूनं विष्ण्वाराधनमर्हति॥ ४७॥<br><br>तान् प्रणम्याथ ते जग्मुः पुरीं परमशोभनाम्।<br>पालयाञ्चक्रिरे पृथ्वीं जित्वा सर्वरिपून् रणे॥ ४८॥ | साथ ही राजाओंके लिये वैष्णवी शक्ति ही सदा देवता-रूप है। अमित तेजस्वी मुरारिकी आराधना करना परम धर्म है॥ ३५॥<br>तब बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ राजपुत्र कृष्ण (जयध्वजके भाई)-ने उससे (जयध्वजसे) कहा—हम लोगोंके पिता अर्जुनने (सहस्रार्जुन या कार्तवीर्यार्जुनने) जिसे स्वधर्म माना है (वही हम लोगोंको भी मान्य होना चाहिये)। इस प्रकार विवादके बढ़ जानेपर शूरसेन (जयध्वजके दूसरे भाई)-ने यह बात कही—इस विषयमें ऋषि ही प्रमाण हैं, अतः वे जैसा कहेंगे, हम लोगोंको वैसा ही करना चाहिये॥ ३६-३७॥<br>तदनन्तर वे सभी राजश्रेष्ठ तैयार होकर सप्तर्षियोंके आश्रममें गये और (उन) ब्रह्मवादियोंसे पूछा—वसिष्ठ आदि उन मुनियोंने तत्त्वकी बात बताते हुए उनसे कहा—जिस पुरुषको जो देवता अभिमत हो, वही उसका अभीष्ट देवता है। किंतु किसी विशेष कार्यसे पूजित (तत्तद्-देवता) मनुष्योंको अभीष्ट फल प्रदान करते हैं। राजाओ! विशेष अर्थात् किसी उद्देश्यसे की जानेवाली पूजा सदा नहीं की जाती, क्योंकि कामनापरक आराधनाके नियम दूसरे प्रकारके होते हैं (वे सदा सब स्थितियोंमें पालनीय नहीं हो सकते)। राजाओंके देवता विष्णु और इन्द्र हैं। ब्राह्मणोंके देवता अग्नि, सूर्य, ब्रह्मा तथा पिनाकधारी शिव हैं। देवताओंके देवता विष्णु और दानवोंके त्रिशूलधारी शिव हैं। गन्धर्वों और यक्षोंके देवता सोम कहे गये हैं॥ ३८–४२॥<br>विद्याधरोंके देवता वाग्देवी तथा साध्योंके भगवान् सूर्य हैं। राक्षसोंके शंकर रुद्र और किंनरोंकी देवता पार्वती हैं। ऋषियोंके देवता ब्रह्मा और त्रिशूलधारी महादेव हैं। मनुष्योंके देवता उमा देवी, विष्णु तथा सूर्य हैं। गृहस्थोंके लिये सभी देवता (पूज्य) हैं। ब्रह्मचारियोंके देवता ब्रह्मा, वैखानसोंके सूर्य तथा संन्यासियोंके महेश्वर देवता हैं। भूतोंके भगवान् रुद्र, कूष्माण्डोंके विनायक और देवाधि-देव प्रजापति भगवान् ब्रह्मा सभीके देवता हैं॥ ४३–४६॥<br>(सप्तर्षियोंने कहा) स्वयं भगवान् ब्रह्माने ही यह कहा है, इसलिये निश्चित ही जयध्वज विष्णुकी आराधना करनेके योग्य हैं। तब वे सभी उन्हें प्रणामकर परम सुन्दर अपनी पुरीको चले गये और युद्धमें सभी शत्रुओंको जीतकर पृथ्वीका पालन करने लगे॥ ४७-४८॥ |