भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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* अध्याय २१ *१४५

| ततः कदाचिद् विप्रेन्द्रा विदेहो नाम दानवः ।<br>भीषणः सर्वसत्त्वानां पुरीं तेषां समाययौ ॥ ४९ ॥<br><br>दंष्ट्राकरालो दीप्तात्मा युगान्तदहनोपमः ।<br>शूलमादाय सूर्याभं नादयन् वै दिशो दश ॥ ५० ॥<br><br>तन्नादश्रवणान्मर्त्यास्तत्र ये निवसन्ति ते ।<br>तत्यजुर्जीवितं त्वन्ये दुद्रुवुर्भयविह्वलाः ॥ ५१ ॥<br><br>ततः सर्वे सुसंयत्ताः कार्तवीर्यात्मजास्तदा ।<br>युयुधुर्दानवं शक्तिगिरिकूटासिमुद्गरैः ॥ ५२ ॥<br><br>तान् सर्वान् दानवो विप्राः शूलेन प्रहसन्निव ।<br>वारयामास घोरात्मा कल्पान्ते भैरवो यथा ॥ ५३ ॥<br><br>शूरसेनादयः पञ्च राजानस्तु महाबलाः ।<br>युद्धाय कृतसंरम्भा विदेहं त्वभिदुद्रुवुः ॥ ५४ ॥<br><br>शूरोऽस्त्रं प्राहिणोद् रौद्रं शूरसेनस्तु वारुणम् ।<br>प्राजापत्यं तथा कृष्णो वायव्यं धृष्ण एव च ॥ ५५ ॥<br><br>जयध्वजश्च कौबेरमैन्द्रमाग्नेयमेव च ।<br>भञ्जयामास शूलेन तान्यस्त्राणि स दानवः ॥ ५६ ॥<br><br>ततः कृष्णो महावीर्यो गदामादाय भीषणाम् ।<br>स्पृष्ट्वा मन्त्रेण तरसा चिक्षेप च ननाद च ॥ ५७ ॥<br><br>सम्प्राप्य सा गदाऽस्योरो विदेहस्य शिलोपमम् ।<br>न दानवं चालयितुं शशाकान्तकसंनिभम् ॥ ५८ ॥<br><br>दुद्रुवुस्ते भयग्रस्ता दृष्ट्वा तस्यातिपौरुषम् ।<br>जयध्वजस्तु मतिमान् सस्मार जगतः पतिम् ॥ ५९ ॥<br><br>विष्णुं ग्रसिष्णुं लोकादिमप्रमेयमनामयम् ।<br>त्रातारं पुरुषं पूर्वं श्रीपतिं पीतवाससम् ॥ ६० ॥<br><br>ततः प्रादुरभूच्चक्रं सूर्यायुतसमप्रभम् ।<br>आदेशाद् वासुदेवस्य भक्तानुग्रहकारणात् ॥ ६१ ॥<br><br>जग्राह जगतां योनिं स्मृत्वा नारायणं नृपः ।<br>प्राहिणोद् वै विदेहाय दानवेभ्यो यथा हरिः ॥ ६२ ॥<br><br>सम्प्राप्य तस्य घोरस्य स्कन्धदेशं सुदर्शनम् ।<br>पृथिव्यां पातयामास शिरोऽद्रिशिखराकृति ॥ ६३ ॥<br><br>तस्मिन् हते देवरिपौ शूराद्या भ्रातरो नृपाः ।<br>समाययुः पुरीं रम्यां भ्रातरं चाप्यपूजयन् ॥ ६४ ॥<br><br>श्रुत्वाजगाम भगवान् जयध्वजपराक्रमम् ।<br>कार्तवीर्यसुतं द्रष्टुं विश्वामित्रो महामुनिः ॥ ६५ ॥ | विप्रेन्द्रो ! तदनन्तर किसी दिन सभी प्राणियोंके लिये भयंकर विदेह नामका दानव उनकी पुरीमें चला आया। भयंकर दाढ़ोंवाला, प्रलयकालीन अग्निके समान उद्दीप्त (वह दानव) सूर्यके समान चमकते हुए शूलको लेकर दसों दिशाओंमें गरजने लगा। उसकी (भयंकर) गर्जनाको सुनकर वहाँ रहनेवाले कुछ मनुष्योंने प्राण त्याग दिये और दूसरे भयसे विह्वल होकर भाग पड़े ॥ ४९–५१ ॥<br><br>तब कार्तवीर्यके सभी पुत्र सावधान होकर शक्ति (सेना), पर्वतशिला, तलवार तथा मुद्गरोंसे उस दानवके साथ युद्ध करने लगे। ब्राह्मणो! उस भयंकर दानवने शूलसे उन सभीका हँसते हुए वैसे ही निवारण कर दिया जैसे प्रलयकालमें भैरव करते हैं। तब महाबली शूरसेन आदि वे पाँच राजा युद्धके लिये तैयारी कर विदेह दानवपर टूट पड़े ॥ ५२–५४ ॥<br><br>शूरने रौद्रास्त्र, शूरसेनने वारुणास्त्र, कृष्णने प्राजापत्यास्त्र, धृष्णने वायव्यास्त्र और जयध्वजने कौबेर, ऐन्द्र तथा आग्नेयास्त्र चलाया, किंतु उस दानवने शूलसे उन सभी अस्त्रोंको तोड़ डाला। तब महावीर्यशाली कृष्णने भीषण गदा लेकर मन्त्रसे उसे अभिमन्त्रित कर वेगपूर्वक फेंका और गर्जना की। वह गदा उस विदेहकी पत्थरके समान छातीपर लगकर भी यमराज-तुल्य उस दानवको विचलित करनेमें समर्थ न हो सकी ॥ ५५–५८ ॥<br><br>उसके महान् पौरुषको देखकर भयग्रस्त हो वे सभी भागने लगे। तब बुद्धिमान् जयध्वजने अप्रमेय, अनामय, लोकादि, ग्रसिष्णु, त्राणकर्ता, पूर्वपुरुष, श्रीपति और पीताम्बरधारी जगत्पति विष्णुका स्मरण किया। स्मरण करते ही भक्तपर अनुग्रह करनेके लिये वासुदेवकी आज्ञासे दस हजार सूर्योंके समान प्रकाशमान चक्र प्रकट हुआ। राजा (जयध्वज)-ने जगद्योनि नारायणका ध्यानकर उस चक्रको ग्रहण किया और विदेह (दानव)-पर उसी प्रकार चलाया जैसे विष्णु दानवोंपर चलाते हैं ॥ ५९–६२ ॥<br><br>सुदर्शनचक्र उस भयंकर दानवके कंधेपर लगा और उसने उसके पर्वत-शिखरके समान सिरको पृथ्वीपर गिरा दिया। देवताओंके शत्रु उस (विदेह दानव)-के मारे जानेपर राजा शूर आदि सभी भाई अपनी रमणीय पुरीमें चले आये और उन्होंने भाई (जयध्वज)-की पूजा की। महामुनि भगवान् विश्वामित्र जयध्वजके पराक्रमको सुनकर उस कीर्तवीर्यपुत्रको देखने आये ॥ ६३–६५ ॥ |