भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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१४६ * कूर्मपुराण *


तमागतमथो दृष्ट्वा राजा सम्भ्रान्तमानसः।<br>समावेश्यासने रम्ये पूजयामास भावतः॥ ६६॥उनको (विश्वामित्रको) आया देखकर आश्चर्यचकित मनवाले राजा (जयध्वज)-ने सुन्दर आसनपर उन्हें बिठाया और भक्तिभावसे उनकी पूजा की तथा कहा—
उवाच भगवान् घोरः प्रसादाद् भवतोऽसुरः।<br>निपातितो मया संख्ये विदेहो दानवेश्वरः॥ ६७॥भगवन्! आपकी ही कृपासे मैंने युद्धमें भयंकर असुर दानवेश्वर विदेहको मार गिराया। आपके कहनेसे मैं
त्वद्वाक्याच्छिन्नसंदेहो विष्णुं सत्यपराक्रमम्।<br>प्रपन्नः शरणं तेन प्रसादो मे कृतः शुभः॥ ६८॥संशयमुक्त होकर सत्यपराक्रमी विष्णुकी शरणमें गया और उन्होंने मेरे ऊपर शुभ अनुग्रह किया। कमलदलके
यक्ष्यामि परमेशानं विष्णुं पद्मदलेक्षणम्।<br>कथं केन विधानेन सम्पूज्यो हरिरीश्वरः॥ ६९॥समान नेत्रवाले, परम ईशान विष्णुका मैं पूजन करूँगा, उन ईश्वर हरिका किस विधानसे किस प्रकार पूजन किया जाना चाहिये। सुव्रत! ये नारायण देव कौन हैं?
कोऽयं नारायणो देवः किम्प्रभावश्च सुव्रत।<br>सर्वमेतन्ममाचक्ष्व परं कौतूहलं हि मे॥ ७०॥उनका क्या प्रभाव है? यह सब मुझे बतलाइये, मुझे (इस विषयमें) अत्यधिक कौतूहल है॥ ६६—७०॥
विश्वामित्र उवाचविश्वामित्रने कहा—जिनसे सभी प्राणियोंकी प्रवृत्ति होती है और जिनमें यह सम्पूर्ण जगत् (प्रतिष्ठित) है,
यतः प्रवृत्तिर्भूतानां यस्मिन् सर्वमिदं जगत्।<br>स विष्णुः सर्वभूतात्मा तमाश्रित्य विमुच्यते॥ ७१॥वे विष्णु सभी प्राणियोंके आत्मरूप हैं, उनका आश्रय ग्रहण करनेसे मुक्ति प्राप्त होती है। अपने-अपने वर्ण और आश्रमधर्ममें स्थित रहते हुए केवल निष्कामभावसे
स्ववर्णाश्रमधर्मेण पूज्योऽयं पुरुषोत्तमः।<br>अकामहत्तभावेन समाराध्यो न चान्यथा॥ ७२॥उन पुरुषोत्तम (विष्णु)-का पूजन करना चाहिये अन्य किसी भावसे नहीं॥ ७१-७२॥
एतावदुक्त्वा भगवान् विश्वामित्रो महामुनिः।<br>शूराद्यैः पूजितो विप्रा जगामाथ स्वमालयम्॥ ७३॥इतना कहकर महामुनि भगवान् विश्वामित्र उन शूरसेन आदिके द्वारा पूजित होकर अपने निवास-स्थानको चले गये। तदनन्तर शूरसेन आदिने यज्ञके द्वारा
अथ शूरादयो देवमयजन्त महेश्वरम्।<br>यज्ञेन यज्ञगम्यं तं निष्कामा रुद्रमव्ययम्॥ ७४॥कामनारहित होकर यज्ञ-गम्य उन अव्यय रुद्रदेव महेश्वरका यजन किया॥ ७३-७४॥
तान् वसिष्ठस्तु भगवान् याजयामास सर्ववित्।<br>गौतमोऽत्रिरगस्त्यश्च सर्वे रुद्रपरायणाः॥ ७५॥सर्वज्ञ भगवान् वसिष्ठ तथा रुद्रभक्त, गौतम, अत्रि तथा अगस्त्यने उन लोगोंका यज्ञ कराया। भगवान्
विश्वामित्रस्तु भगवान् जयध्वजमरिंदमम्।<br>याजयामास भूतादिमादिदेवं जनार्दनम्॥ ७६॥विश्वामित्रने शत्रुओंका दमन करनेवाले जयध्वजसे प्राणियोंके आदि कारण आदिदेव जनार्दन-सम्बन्धी (विष्णु) यज्ञ कराया। उस (जयध्वज)-के यज्ञमें
तस्य यज्ञे महायोगी साक्षात् देवः स्वयं हरिः।<br>आविरासीत् स भगवान् तदद्भुतमिवाभवत्॥ ७७॥महायोगी देव स्वयं भगवान् हरि साक्षात् प्रकट हुए। यह एक अद्भुत बात हुई॥ ७५-७७॥
य इमं शृणुयान्नित्यं जयध्वजपराक्रमम्।<br>सर्वपापविमुक्तात्मा विष्णुलोकं स गच्छति॥ ७८॥जो जयध्वजके इस पराक्रमको नित्य सुनेगा, वह सभी पापोंसे मुक्त होकर विष्णुलोकको प्राप्त करेगा॥ ७८॥

इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायां पूर्वविभागे एकविंशोऽध्यायः॥ २१॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें इक्कीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ २१॥