संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished506 पृष्ठ
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- अध्याय २२ * । १४७
बाईसवाँ अध्याय
जयध्वजके वंश-वर्णनमें राजा दुर्जयका आख्यान, महामुनि कण्वद्वारा दुर्जयको वाराणसीके विश्वेश्वर-लिंगका माहात्म्य बतलाना, दुर्जयका वाराणसी जाकर पाप-मुक्त होना तथा सहस्रजित्-वंशका वर्णन
| सूत उवाच | सूतजीने कहा— |
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| जयध्वजस्य पुत्रोऽभूत् तालजङ्घ इति स्मृतः।<br>शतपुत्रास्तु तस्यासन् तालजङ्घाः प्रकीर्तिताः॥ १ ॥<br>तेषां ज्येष्ठो महावीर्यो वीतिहोत्रोऽभवन्नृपः।<br>वृषप्रभृतयश्चान्ये यादवाः पुण्यकर्मिणः॥ २ ॥<br>वृषो वंशकरस्तेषां तस्य पुत्रोऽभवन्मधुः।<br>मधोः पुत्रशतं त्वासीद् वृषणस्तस्य वंशभाक्॥ ३ ॥<br>वीतिहोत्रसुतश्चापि विश्रुतोऽनन्त इत्युत।<br>दुर्जयस्तस्य पुत्रोऽभूत् सर्वशास्त्रविशारदः॥ ४ ॥<br>तस्य भार्या रूपवती गुणैः सर्वैरलंकृता।<br>पतिव्रतासीत् पतिना स्वधर्मपरिपालिका॥ ५ ॥<br>स कदाचिन्महाभागः कालिन्दीतीरसंस्थिताम्।<br>अपश्यदुर्वशीं देवीं गायन्तीं मधुरस्वनाम्॥ ६ ॥ | जयध्वजका एक पुत्र था जो तालजङ्घ नामसे प्रसिद्ध था। उसके सौ पुत्र हुए जो तालजङ्घ ही कहलाते थे। उनमें वीतिहोत्र नामका महान् बलवान् राजा सबसे बड़ा था। दूसरे वृष इत्यादि नामवाले यादव पुण्यकर्मा थे। उनमें वृष वंशको बढ़ानेवाला था, उसका मधु नामक पुत्र हुआ। मधुके सौ पुत्र हुए, किंतु उनमें वृषण ही उस (मधु)-का वंशधर हुआ। वीतिहोत्रका भी विश्रुत अथवा अनन्त नामवाला एक पुत्र हुआ। उसका पुत्र दुर्जय हुआ जो सभी शास्त्रोंका ज्ञाता था। उसकी भार्या रूपवती तथा सभी गुणोंसे अलंकृत तथा पतिव्रता थी, वह पति दुर्जयके साथ अपने धर्मका पालन करती थी॥ १—५ ॥<br><br>किसी समय उस महाभाग्यशाली (दुर्जय)-ने कालिन्दी नदीके किनारे बैठी हुई मधुर स्वरमें गीत गाती हुई देवी उर्वशीको देखा। तब कामके द्वारा विचलित मनवाला वह उसके समीपमें गया और कहने लगा—'देवि! चिरकालतक मेरे साथ रमण करो'। रूप और लावण्यसे सम्पन्न तथा दूसरे कामदेवके समान उस राजाको देखकर उस देवीने चिरकालतक उसके साथ रमण किया॥ ६—८ ॥ |
| ततः कामाहतमनास्तत्समीपमुपेत्य वै।<br>प्रोवाच सुचिरं कालं देवि रन्तुं मयार्हसि॥ ७ ॥<br><br>सा देवी नृपतिं दृष्ट्वा रूपलावण्यसंयुतम्।<br>रेमे तेन चिरं कालं कामदेवमिवापरम्॥ ८ ॥<br>कालात् प्रबुद्धो राजा तामूर्वशीं प्राह शोभनाम्।<br>गमिष्यामि पुरीं रम्यां हसन्ती साब्रवीद् वचः॥ ९ ॥ | |
| न ह्यानेनोपभोगेन भवता राजसुन्दर।<br>प्रीतिः संजायते मह्यं स्थातव्यं वत्सरं पुनः॥ १० ॥ | बहुत समयके बाद ज्ञान होनेपर राजाने उस रमणीय उर्वशीसे कहा—'अब मैं अपनी सुन्दर पुरीको जाऊँगा।' इसपर वह हँसते हुए कहने लगी—राजसुन्दर! आपके साथ इतने उपभोगसे मुझे प्रसन्नता (संतुष्टि) नहीं हुई है, अतः पुनः एक वर्षतक यहाँ और ठहरें॥ ९-१०॥ |
| तामब्रवीत् स मतिमान् गत्वा शीघ्रतरं पुरीम्।<br>आगमिष्यामि भूयोऽत्र तन्मेऽनुज्ञातुमर्हसि॥ ११ ॥ | इसपर बुद्धिमान् (राजा)-ने उस (उर्वशी)-से कहा—मैं अपनी पुरीमें जाकर पुनः शीघ्र ही यहाँ वापस लौटूँगा, इसलिये मुझे जानेकी आज्ञा दो। उस सुभागाने उससे कहा—राजन्! वैसा ही कीजिये, किंतु तबतक आप पुनः किसी अन्य अप्सराके साथ रमण न करें। 'अच्छा' ऐसा कहकर वह शीघ्र ही परम शोभन अपनी पुरीको चला गया। (पुरीमें) जाकर अपनी पतिव्रता पत्नीको देखकर वह राजा भयभीत हो गया॥ ११—१३॥ |
| तमब्रवीत् सा सुभगा तथा कुरु विशाम्पते।<br>नान्ययाप्सरसा तावद् रन्तव्यं भवता पुनः॥ १२ ॥<br><br>ओमित्युक्त्वा ययौ तूर्णं पुरीं परमशोभनाम्।<br>गत्वा पतिव्रतां पत्नीं दृष्ट्वा भीतोऽभवन्नृपः॥ १३ ॥ |