भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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१४८ * कूर्मपुराण *

| सम्प्रेक्ष्य सा गुणवती भार्या तस्य पतिव्रता। <br> भीतं प्रसन्नया प्राह वाचा पीनपयोधरा ॥ १४ ॥ <br><br> स्वामिन् किमत्र भवतो भीतिरद्य प्रवर्तते । <br> तद् ब्रूहि मे यथा तत्त्वं न राज्ञां कीर्तये त्विदम् ॥ १५ ॥ <br> स तस्या वाक्यमाकर्ण्य लज्जावनतचेतनः । <br> नोवाच किंचिन्नृपतिर्ज्ञानदृष्ट्या विवेद सा ॥ १६ ॥ <br><br> न भेतव्यं त्वया स्वामिन् कार्यं पापविशोधनम्। <br> भीते त्वयि महाराज राष्ट्रं ते नाशमेष्यति ॥ १७ ॥ <br> तदा स राजा द्युतिमान् निर्गत्य तु पुरात् ततः । <br> गत्वा कण्वाश्रमं पुण्यं दृष्ट्वा तत्र महामुनिम् ॥ १८ ॥ <br><br> निशम्य कण्ववदनात् प्रायश्चित्तविधिं शुभम्। <br> जगाम हिमवत्पृष्ठं समुद्दिश्य महाबलः ॥ १९ ॥ <br><br> सोऽपश्यत् पथि राजेन्द्रो गन्धर्ववरमुत्तमम्। <br> भ्राजमानं श्रिया व्योम्नि भूषितं दिव्यमालया ॥ २० ॥ <br><br> वीक्ष्य मालाममित्रघ्नः सस्मराप्सरसां वराम्। <br> उर्वशीं तां मनश्चक्रे तस्या एवेयमर्हति ॥ २१ ॥ <br> सोऽतीव कामुको राजा गन्धर्वेणाथ तेन हि । <br> चकार सुमहद् युद्धं मालामादातुमुद्यतः ॥ २२ ॥ <br> विजित्य समरे मालां गृहीत्वा दुर्जयो द्विजाः । <br> जगाम तामप्सरसं कालिन्दीं द्रष्टुमादरात् ॥ २३ ॥ <br> अदृष्ट्वाप्सरसं तत्र कामबाणाभिपीडितः । <br> बभ्राम सकलां पृथ्वीं सप्तद्वीपसमन्विताम् ॥ २४ ॥ <br> आक्रम्य हिमवत्पार्श्वमुर्वशीदर्शनोत्सुकः । <br> जगाम शैलप्रवरं हेमकूटमिति श्रुतम् ॥ २५ ॥ <br> तत्र तत्राप्सरोवर्या दृष्ट्वा तं सिंहविक्रमम्। <br> कामं संदधिरे घोरं भूषितं चित्रमालया ॥ २६ ॥ <br><br> संस्मरन्नुर्वशीवाक्यं तस्यां संसक्तमानसः । <br> न पश्यति स्म ताः सर्वा गिरिशृङ्गाणि जग्मिवान् ॥ २७ ॥ | उस राजाकी पीन पयोधरोंवाली उस गुणवती तथा पतिव्रता भार्याने डरे हुए (पति)-को देखकर प्रसन्न वाणीसे कहा—स्वामिन् ! आज आप डर क्यों रहे हैं, जो भी बात हो मुझे सत्य-सत्य बतलायें। इस प्रकारका भय राजाओंके लिये कीर्तिकर नहीं है॥ १४-१५॥ <br> उसकी बात सुनकर उस (राजा)-का मन लज्जासे झुक गया। राजा कुछ भी नहीं बोला, किंतु उस (रानी)-ने ज्ञानदृष्टिसे (सब कुछ) जान लिया। (वह बोली—) स्वामिन् ! आपको डरना नहीं चाहिये। पापका प्रायश्चित्त (शोधन) करना चाहिये। हे महाराज ! आपके भयभीत रहनेसे आपका राष्ट्र नष्ट हो जायगा ॥ १६-१७॥ <br> तब वह द्युतिमान् राजा अपने नगरसे बाहर निकलकर पवित्र कण्वके आश्रममें गया। वहाँ महामुनि (कण्व)-का दर्शनकर तथा कण्वके मुखसे प्रायश्चित्तकी कल्याणकारी विधि सुनकर प्रायश्चित्तके द्वारा आत्मशुद्धिके उद्देश्यसे वह महाबलवान् (राजा दुर्जय) हिमालय पर्वतकी ओर गया। उस राजेन्द्रने मार्गमें (जाते समय) आकाशमें अपने तेजसे प्रकाशित होते हुए गन्धर्वश्रेष्ठोंमें उत्तम एक गन्धर्वको देखा, जो दिव्य मालासे विभूषित था। मालाको देखकर शत्रुओंका विनाश करनेवाले (उस राजाको) श्रेष्ठ अप्सरा उर्वशीका स्मरण हो आया। उसने मनमें विचार किया कि यह (माला) तो उस (उर्वशी)-के ही योग्य है॥ १८-२१॥ <br> तब माला प्राप्त करनेको उद्यत उस अत्यन्त कामुक राजाने उस गन्धर्वके साथ महान् युद्ध किया। ब्राह्मणो! युद्धमें गन्धर्वोंको जीतकर और माला लेकर वह दुर्जय उस अप्सराको देखनेके लिये आदरपूर्वक कालिन्दीके किनारे गया। वहाँ अप्सराको न देखकर कामदेवके बाणसे अत्यन्त पीड़ित वह सात द्वीपोंसे युक्त सम्पूर्ण पृथ्वीपर घूमने लगा। उर्वशीके दर्शनके लिये उत्सुक वह हिमालयके पार्श्वभागको पारकर उस श्रेष्ठ पर्वतपर पहुँचा जो 'हेमकूट' नामसे विख्यात है॥ २२-२५॥ <br> वहाँ उन-उन स्थानोंमें रहनेवाली वे श्रेष्ठ अप्सराएँ उस विचित्र मालासे विभूषित एवं सिंहके समान पराक्रमवाले राजाको देखकर अत्यन्त कामासक्त हो गयीं। उर्वशीके वाक्यका स्मरण करते हुए और उसीमें आसक्त मनवाले उस राजाने उन सभी (अप्सराओं)-को नहीं देखा और वह पर्वतोंके शिखरोंपर चला गया ॥ २६-२७॥ |