संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished506 पृष्ठ
पृष्ठ 159, कुल 506 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 159
| * अध्याय २२ * | १४९ |
|---|---|
| तत्राप्सरसं दिव्यामदृष्ट्वा कामपीडितः ।<br>देवलोकं महामेरुं ययौ देवपराक्रमः ॥ २८ ॥<br><br>स तत्र मानसं नाम सरस्त्रैलोक्यविश्रुतम् ।<br>भेजे शृङ्गाण्यतिक्रम्य स्वबाहुबलभावितः ॥ २९ ॥<br><br>स तस्य तीरे सुभगां चरन्तीमतिलालसाम् ।<br>दृष्टवाननवद्याङ्गीं तस्यै मालां ददौ पुनः ॥ ३० ॥<br>स मालया तदा देवीं भूषितां प्रेक्ष्य मोहितः ।<br>रेमे कृतार्थमात्मानं जानानः सुचिरं तया ॥ ३१ ॥<br><br>अथोर्वशी राजवर्यं रतान्ते वाक्यमब्रवीत् ।<br>किं कृतं भवता पूर्वं पुरीं गत्वा वृथा नृप ॥ ३२ ॥<br><br>स तस्यै सर्वमाचष्ट पत्न्या यत् समुदीरितम् ।<br>कण्वस्य दर्शनं चैव मालापहरणं तथा ॥ ३३ ॥<br>श्रुत्वैतद् व्याहृतं तेन गच्छेत्याह हितैषिणी ।<br>शापं दास्यति ते कण्वो ममापि भवतः प्रिया ॥ ३४ ॥<br><br>तयासकृन्महाराजः प्रोक्तोऽपि मदमोहितः ।<br>न तत्याजाथ तत्पार्श्वं तत्र संन्यस्तमानसः ॥ ३५ ॥<br>तदोर्वशी कामरूपा राज्ञे स्वं रूपमुत्कटम् ।<br>सरोमशं पिङ्गलाक्षं दर्शयामास सर्वदा ॥ ३६ ॥<br><br>तस्यां विरक्तचेतस्कः स्मृत्वा कण्वाभिभाषितम् ।<br>धिङ्मामिति विनिश्चित्य तपः कर्तुं समारभत् ॥ ३७ ॥<br><br>संवत्सरद्वादशकं कन्दमूलफलाशनः ।<br>भूय एव द्वादशकं वायुभक्षोऽभवन्नृपः ॥ ३८ ॥<br>गत्वा कण्वाश्रमं भीत्या तस्मै सर्वं न्यवेदयत् ।<br>वासमप्सरसा भूयस्तपोयोगमनुत्तमम् ॥ ३९ ॥<br><br>वीक्ष्य तं राजशार्दूलं प्रसन्नो भगवानृषिः ।<br>कर्तुकामो हि निर्बीजं तस्याघमिदमब्रवीत् ॥ ४० ॥ | वहाँ भी दिव्य अप्सरा (उर्वशी)-को न देखकर देवताओंके समान पराक्रमवाला वह कामपीड़ित (राजा) देवताओंके स्थान महामेरुपर गया। अपने बाहुबलके प्रभावसे गिरिशिखरोंको पार करता हुआ वह तीनों लोकोंमें विख्यात 'मानस' नामक सरोवरपर पहुँचा। उसने उसके (मानसरोवरके) किनारेपर विचरण करती हुई सुन्दर अङ्गोंवाली अत्यन्त स्नेहमयी सुन्दरी (उर्वशी)-को देखा और वह माला उसे दे दी॥ २८-३०॥<br><br>तब उस देवीको मालासे विभूषित देखकर वह मोहित हो गया तथा अपनेको कृतार्थ समझते हुए उसने चिरकालतक उसके साथ रमण किया। अनन्तर उर्वशीने श्रेष्ठ राजासे कहा—राजन्! आपने पहले पुरीमें जाकर क्या किया, व्यर्थ ही आप वहाँ गये॥ ३१-३२॥<br><br>तब उसने पत्नीद्वारा कही गयी वह बात, कण्व ऋषिका दर्शन तथा मालाका अपहरण—सभी कुछ उसे बता दिया॥ ३३॥<br><br>उसके द्वारा कही गयी इन बातोंको सुनकर हित चाहनेवाली (उस उर्वशी)-ने 'आप चले जायँ'—ऐसा कहा। अन्यथा आपको कण्व शाप दे देंगे और आपकी प्रिया भी मुझे शाप दे देगी। बार-बार उसके कहनेपर भी (कामरूपी) मदसे मोहित हुए महाराजने उसका साथ नहीं छोड़ा, उसमें ही मन लगाये रखा॥ ३४-३५॥<br><br>तदनन्तर इच्छानुसार रूप धारण कर लेनेवाली उर्वशी राजाको रोमोंसे युक्त, पिङ्गल वर्णके नेत्रोंवाला अपना उत्कट रूप सदा दिखलाने लगी। (उसका वह वीभत्स रूप देखकर) उसके प्रति विरक्त मनवाले राजाने कण्व (मुनि)-द्वारा कही गयी बातका स्मरणकर 'मुझे धिक्कार है' ऐसा निश्चयकर तप करना प्रारम्भ किया। राजाने बारह वर्षतक कन्द-मूल और फलका आहार किया और पुनः बारह वर्षोतक केवल वायुका ही भक्षण किया॥ ३६-३८॥<br><br>कण्वके आश्रममें जाकर राजाने डरते-डरते अप्सराके साथ निवास करने और पुनः उत्तम तपस्या करनेकी सारी बातें उन्हें बता दीं। उस श्रेष्ठ राजाको देखकर प्रसन्न हुए भगवान् ऋषि (कण्व)-ने उसके पापको समूल नष्ट करनेकी इच्छासे यह कहा—॥ ३९-४०॥ |