भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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१५०* कूर्मपुराण *
कण्व उवाचकण्व बोले— (राजन्! तुम) ईश्वर जहाँ विशेषरूपसे
गच्छ वाराणसीं दिव्यामीश्वराध्युषितां पुरीम्।<br>आस्ते मोचयितुं लोकं तत्र देवो महेश्वरः ॥ ४१ ॥निवास करते हैं, उस दिव्य वाराणसीपुरीमें जाओ। संसारको मुक्त करनेके लिये महेश्वर देव वहाँ रहते हैं।
स्नात्वा संतर्प्य विधिवद् गङ्गायां देवताः पितॄन्।<br>दृष्ट्वा विश्वेश्वरं लिङ्गं किल्बिषान्मोक्ष्यसेऽखिलात् ॥ ४२ ॥गङ्गामें स्नानकर विधिपूर्वक देवताओं एवं पितरोंका तर्पणकर विश्वेश्वर लिङ्गका दर्शन करनेसे तुम सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो जाओगे ॥ ४१-४२ ॥
प्रणम्य शिरसा कण्वमनुज्ञाप्य च दुर्जयः।<br>वाराणस्यां हरं दृष्ट्वा पापान्मुक्तोऽभवत् ततः ॥ ४३ ॥इसके बाद कण्वको सिरसे प्रणामकर और उनकी आज्ञा प्राप्तकर वह दुर्जय वाराणसीमें गया और भगवान् शंकरका दर्शनकर पापसे मुक्त हो गया ॥ ४३ ॥
जगाम स्वपुरीं शुभ्रां पालयामास मेदिनीम्।<br>याजयामास तं कण्वो याचितो घृणया मुनिः ॥ ४४ ॥(तदनन्तर वह) अपनी सुन्दर पुरीमें जाकर पृथ्वीका पालन करने लगा। प्रार्थना करनेपर कण्व मुनिने कृपा करके उसका यज्ञ कराया। उसका बुद्धिमान् पुत्र
तस्य पुत्रोऽथ मतिमान् सुप्रतीक इति श्रुतः।<br>बभूव जातमात्रं तं राजानमुपतस्थिरे ॥ ४५ ॥'सुप्रतीक' इस नामसे विख्यात हुआ। उत्पन्न होते ही उसे (लोगोंने) राजा मान लिया। ब्राह्मणो! उर्वशीसे
उर्वश्यां च महावीर्याः सप्त देवसुतोपमाः।<br>कन्या जगृहिरे सर्वा गन्धर्वदयिता द्विजाः ॥ ४६ ॥देवपुत्रोंके समान महान् वीर्यवान् सात पुत्र हुए। उन्होंने गन्धर्वोंकी कन्याओंको अपनी पत्नी बनाया ॥ ४४-४६ ॥
एष वः कथितः सम्यक् सहस्रजित उत्तमः।<br>वंशः पापहरो नॄणां क्रोष्टोरपि निबोधत ॥ ४७ ॥आप लोगोंसे (मैंने) यह मनुष्योंके पापको नष्ट करनेवाला सहस्रजित्का उत्तम वंश भलीभाँति बतलाया। अब क्रोष्टुके वंशको भी सुनें ॥ ४७ ॥

इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायां पूर्वविभागे द्वाविंशोऽध्यायः ॥ २२ ॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें बाइसवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ २२ ॥


तेईसवाँ अध्याय

यदुवंश-वर्णनमें क्रोष्टुवंशी राजाओंका वृत्तान्त, राजा नवरथकी कथा, सात्त्वतवंश-वर्णनमें अक्रूरकी उत्पत्ति, राजा आनकदुन्दुभिका आख्यान, कंस एवं वसुदेव-देवकीकी उत्पत्ति, वसुदेवका वंश-वर्णन, देवकीके अन्य पुत्रोंकी उत्पत्ति, रोहिणीसे संकर्षण-बलराम तथा देवकीसे श्रीकृष्णका आविर्भाव, वासुदेव कृष्णका वंश-वर्णन

सूत उवाचसूतजीने कहा— क्रोष्टुका एक पुत्र हुआ जो वृजिनीवान्
क्रोष्टोरेकोऽभवत् पुत्रो वृजिनीवानिति श्रुतिः।<br>तस्य पुत्रो महान् स्वातिरुशद्गुस्तत्सुतोऽभवत् ॥ १ ॥नामसे प्रसिद्ध हुआ। उसका महान् पुत्र स्वाति हुआ और उसका पुत्र उशद्गु हुआ। उशद्गुका चित्ररथ नामका
उशद्गोरभवत् पुत्रो नाम्ना चित्ररथो बली।<br>अथ चैत्ररथिर्लोके शशबिन्दुरिति स्मृतः ॥ २ ॥बलवान् पुत्र हुआ। चित्ररथका पुत्र लोकमें शशबिन्दु नामसे विख्यात हुआ। उसका पृथुयशा नामवाला पुत्र
तस्य पुत्रः पृथुयशा राजाभूद् धर्मतत्परः।<br>पृथुकर्मा च तत्पुत्रस्तस्मात् पृथुजयोऽभवत् ॥ ३ ॥धर्मपरायण राजा हुआ। उसका पुत्र पृथुकर्मा और उससे पृथुजय हुआ ॥ १-३ ॥