संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished506 पृष्ठ
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| * अध्याय २३ * | १५१ |
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| संस्कृत | हिन्दी अनुवाद |
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| पृथुकीर्तिरभूत् तस्मात् पृथुदानस्ततोऽभवत्।<br>पृथुश्रवास्तस्य पुत्रस्तस्यासीत् पृथुसत्तमः ॥ ४ ॥ | उससे पृथुकीर्ति और उससे पृथुदान हुआ। उसका पुत्र पृथुश्रवा और उसका पुत्र था—पृथुसत्तम ॥ ४ ॥ |
| उशना तस्य पुत्रोऽभूत् सितेषुस्तत्सुतोऽभवत्।<br>तस्याभूद् रुक्मकवचः परावृत् तस्य सत्तमः ॥ ५ ॥ | हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! उस (पृथुसत्तम)-का पुत्र उशना हुआ और उसका सितेषु पुत्र हुआ। फिर उसका रुक्मकवच और उस (रुक्मकवच)-का परावृत् हुआ ॥ ५ ॥ |
| परावृतः सुतो जज्ञे ज्यामघो लोकविश्रुतः।<br>तस्माद् विदर्भः संजज्ञे विदर्भात् क्रथकैशिकौ ॥ ६ ॥<br><br>रोमपादस्तृतीयस्तु बभ्रुस्तस्यात्मजो नृपः।<br>धृतिस्तस्याभवत् पुत्रः संस्तस्तस्याप्यभूत् सुतः॥ ७ ॥<br><br>संस्तस्य पुत्रो बलवान् नाम्ना विश्वसहस्तु सः।<br>तस्य पुत्रो महावीर्यः प्रजावान् कौशिकस्ततः।<br>अभूत् तस्य सुतो धीमान् सुमन्तुस्तत्सुतोऽनलः ॥ ८ ॥<br><br>कैशिकस्य सुतश्चेदिश्चैद्यास्तस्याभवन् सुताः।<br>तेषां प्रधानो ज्योतिष्मान् वपुष्मांस्तत्सुतोऽभवत् ॥ ९ ॥<br><br>वपुष्मतो बृहन्मेधा श्रीदेवस्तत्सुतोऽभवत्।<br>तस्य वीतरथो विप्रा रुद्रभक्तो महाबलः ॥ १० ॥ | परावृत्ने संसारमें विख्यात ज्यामघ नामक पुत्र उत्पन्न किया। उससे विदर्भ उत्पन्न हुआ और विदर्भसे क्रथ, कैशिक और तीसरा रोमपाद नामक पुत्र हुआ। उस (रोमपाद)-का पुत्र बभ्रु राजा था। धृति उसका पुत्र हुआ और उसका भी संस्त नामक पुत्र उत्पन्न हुआ। संस्तका विश्वसह नामवाला बलवान् पुत्र था। उसका पुत्र महान् पराक्रमी प्रजावान् और उसका पुत्र कौशिक हुआ। उस (कौशिक)-का बुद्धिमान् सुमन्तु नामक पुत्र था और उसका पुत्र अनल था। कैशिकका पुत्र चेदि था और उस चेदिके पुत्र चैद्य हुए। उन चैद्योंमें ज्योतिष्मान् प्रधान था और वपुष्मान् उसका पुत्र हुआ। वपुष्मान्से बृहन्मेधा और श्रीदेव उसका पुत्र हुआ। ब्राह्मणो! उसका वीतरथ नामक पुत्र महान् बलशाली और रुद्रका भक्त था ॥ ६—१० ॥ |
| क्रथस्याप्यभवत् कुन्तिर्वृष्णिस्तस्याभवत् सुतः।<br>वृष्णेर्निवृत्तिरुत्पन्नो दशार्हस्तस्य तु द्विजाः ॥ ११ ॥<br><br>दशार्हपुत्रोऽप्यारोहो जीमूतस्तत्सुतोऽभवत्।<br>जैमूतिरभवद् वीरो विकृतिः परवीरहा ॥ १२ ॥<br><br>तस्य भीमरथः पुत्रः तस्मान्नवरथोऽभवत्।<br>दानधर्मरतो नित्यं सम्यक्शीलपरायणः ॥ १३ ॥ | ब्राह्मणो! क्रथका पुत्र कुन्ति और उसका पुत्र वृष्णि हुआ। वृष्णिसे निवृत्ति उत्पन्न हुआ और दशार्ह उसका पुत्र हुआ। दशार्हका पुत्र आरोह था और उसका जीमूत पुत्र हुआ। जीमूतका विकृति नामक बलवान् पुत्र शत्रु-वीरोंका नाशक था। उसका भीमरथ नामक पुत्र हुआ, उससे नवरथ हुआ, जो नित्य दानधर्ममें परायण तथा पूर्णरूपसे शील-सम्पन्न था ॥ ११—१३ ॥ |
| कदाचिन्मृगयां यातो दृष्ट्वा राक्षसमूर्जितम्।<br>दुद्राव महताविष्टो भयेन मुनिपुंगवाः ॥ १४ ॥<br><br>अन्वधावत संक्रुद्धो राक्षसस्तं महाबलः।<br>दुर्योधनोऽग्निसंकाशः शूलासक्तमहाकरः ॥ १५ ॥ | श्रेष्ठ मुनियो! किसी समय आखेटके लिये जाते हुए वह (नवरथ) एक बलवान् राक्षसको देखकर अत्यन्त भयभीत होकर भागने लगा। अग्निके समान प्रज्वलित वह महाबलवान् दुर्योधन नामक राक्षस क्रुद्ध होकर अपने विशाल हाथमें शूल लेकर उसके पीछे दौड़ा ॥ १४-१५ ॥ |
| राजा नवरथो भीत्या नातिदूरादनुत्तमम्।<br>अपश्यत् परमं स्थानं सरस्वत्या सुगोपितम् ॥ १६ ॥<br><br>स तद्वेगेन महता सम्प्राप्य मतिमान् नृपः।<br>ववन्दे शिरसा दृष्ट्वा साक्षाद् देवीं सरस्वतीम् ॥ १७ ॥ | भयभीत राजा नवरथने समीपमें ही (देवी) सरस्वतीसे रक्षित एक परम श्रेष्ठ स्थान देखा। वह बुद्धिमान् राजा अति शीघ्र ही वहाँ पहुँचा और साक्षात् देवी सरस्वतीका दर्शन करके उसने सिर झुकाकर प्रणाम किया ॥ १६-१७ ॥ |