संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| १५२ | * कूर्मपुराण * |
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| तुष्टाव वाग्भिरिष्टाभिर्बद्धाञ्जलिरमित्रजित्।<br>पपात दण्डवद् भूमौ त्वामहं शरणं गतः॥ १८॥<br><br>नमस्यामि महादेवीं साक्षाद् देवीं सरस्वतीम्।<br>वाग्देवतामनाद्यन्तामीश्वरीं ब्रह्मचारिणीम्॥ १९॥<br><br>नमस्ते जगतां योनिं योगिनीं परमां कलाम्।<br>हिरण्यगर्भमहिषीं त्रिनेत्रां चन्द्रशेखराम्॥ २०॥ | उस शत्रुजयीने हाथ जोड़ते हुए अभीष्ट स्तुतियोंद्वारा स्तुति की, वह भूमिपर दण्डवत् गिर पड़ा और कहा—'मैं आपकी शरणमें आया हूँ। आप अनादि, अनन्त, ब्रह्मचारिणी, ईश्वरी, महादेवी, वाग्देवता साक्षात् देवी सरस्वतीको नमस्कार करता हूँ। जगत्की मूल कारणरूपा, परम कलास्वरूपा, तीन नेत्रवाली, मस्तकपर चन्द्रमाको धारण करनेवाली एवं हिरण्यगर्भकी महिषी योगिनीको नमस्कार है॥ १८-२०॥ |
| नमस्ये परमानन्दां चित्कलां ब्रह्मरूपिणीम्।<br>पाहि मां परमेशानि भीतं शरणमागतम्॥ २१॥ | चित्कलारूप, परमानन्दरूपा ब्रह्मरूपिणीको नमस्कार है। परमेशानि! भयभीत होकर मैं आपकी शरणमें आया हूँ, मेरी रक्षा करो॥ २१॥ |
| एतस्मिन्नन्तरे क्रुद्धो राजानं राक्षसेश्वरः।<br>हन्तुं समागतः स्थानं यत्र देवी सरस्वती॥ २२॥<br><br>समुद्यम्य तदा शूलं प्रवेष्टुं बलदर्पितः।<br>त्रिलोकमातुस्तत्स्थानं शशाङ्कादित्यसंनिभम्॥ २३॥<br><br>तदन्तरे महत् भूतं युगान्तादित्यसंनिभम्।<br>शूलेनोरसि निर्भिद्य पातयामास तं भुवि॥ २४॥<br><br>गच्छेत्याह महाराज न स्थातव्यं त्वया पुनः।<br>इदानीं निर्भयस्तूर्णं स्थानेऽस्मिन् राक्षसो हतः॥ २५॥ | इसी बीच क्रुद्ध वह राक्षसराज राजाको मारनेके लिये उसी स्थानपर आ पहुँचा, जहाँ देवी सरस्वती थीं। बलसे दर्पित वह राक्षस शूल उठाकर तीनों लोकोंकी जननीके उस सूर्य और चन्द्रमाके समान प्रकाशित स्थानमें प्रवेश करनेकी चेष्टा करने लगा। इसी बीच किसी प्रलयकालीन सूर्यके समान महान् बलशालीने शूलसे उसके वक्षःस्थलको विदीर्ण कर पृथ्वीपर गिरा दिया और कहा—महाराज! आप अब निर्भय होकर शीघ्र ही इस स्थानसे चले जायँ, यहाँ अब फिर रुकें नहीं, राक्षस मारा जा चुका है॥ २२-२५॥ |
| ततः प्रणम्य हृष्टात्मा राजा नवरथः पराम्।<br>पुरीं जगाम विप्रेन्द्राः पुरंदरपुरोपमाम्॥ २६॥<br><br>स्थापयामास देवेशीं तत्र भक्तिसमन्वितः।<br>ईजे च विविधैर्यज्ञैर्होमैर्देवीं सरस्वतीम्॥ २७॥<br><br>तस्य चासीद् दशरथः पुत्रः परमधार्मिकः।<br>देव्या भक्तो महातेजाः शकुनिस्तस्य चात्मजः॥ २८॥<br><br>तस्मात् करम्भः संभूतो देवरातोऽभवत् ततः।<br>ईजे स चाश्वमेधेन देवक्षत्रश्च तत्सुतः॥ २९॥<br><br>मधुस्तस्य तु दायादस्तस्मात् कुरुवशोऽभवत्।<br>पुत्रद्वयमभूत् तस्य सुत्रामा चानुरेव च॥ ३०॥ | ब्राह्मणो! तब प्रसन्न मनवाला वह नवरथ उन परादेवीको प्रणामकर इन्द्रकी नगरीके समान अपनी नगरीको चला गया। वहाँ उसने भक्तियुक्त होकर देवेश्वरी सरस्वतीकी स्थापना की और विविध यज्ञों तथा होमोंके द्वारा उन देवीका यजन किया। उसका दशरथ नामक परम धार्मिक पुत्र था। वह महातेजस्वी देवीका भक्त था। उसका पुत्र शकुनि था। उससे करम्भ हुआ, उसका देवरात हुआ, उसने अश्वमेध यज्ञ किया (जिसके फलस्वरूप) उसको देवक्षत्र नामक पुत्र हुआ। उस (देवक्षत्र)-का पुत्र मधु हुआ, उससे कुरुवश हुआ। उसके सुत्रामा तथा अनु नामक दो पुत्र हुए॥ २६-३०॥ |
| अनोस्तु पुरुकुत्सोऽभूदंशुस्तस्य च रिक्थभाक्।<br>अथांशोः सत्त्वतो नाम विष्णुभक्तः प्रतापवान्।<br>महात्मा दाननिरतो धनुर्वेदविदां वरः॥ ३१॥<br><br>स नारदस्य वचनाद् वासुदेवार्चनान्वितम्।<br>शास्त्रं प्रवर्तयामास कुण्डगोलादिभिः श्रुतम्॥ ३२॥ | अनुका पुरुकुत्स हुआ तथा उसका पुत्र अंशु था। अंशुका पुत्र सत्त्वत था, जो विष्णुभक्त, प्रतापी, महात्मा, दानशील और धनुर्वेद जाननेवालोंमें श्रेष्ठ था। उसने नारदजीके कहनेपर वासुदेवकी पूजासे युक्त शास्त्रका प्रवर्तन किया, जिसे कुण्डगोलकोंने* सुना॥ ३१-३२॥ |
* कुण्डगोलक—कुण्ड—पतिके जीवित रहते हुए परपुरुषसे उत्पन्न पुत्र। गोलक—पतिके मर जानेपर परपुरुषसे उत्पन्न पुत्र।