भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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  • अध्याय २३ * १५३

तस्य नाम्ना तु विख्यातं सात्त्वतं नाम शोभनम्।
प्रवर्तते महाशास्त्रं कुण्डादीनां हितावहम्॥ ३३॥

सात्त्वतस्तस्य पुत्रोऽभूत् सर्वशास्त्रविशारदः।
पुण्यश्लोको महाराजस्तेन वै तत्प्रवर्तितम्॥ ३४॥

सात्त्वतः सत्त्वसम्पन्नः कौशल्यां सुषुवे सुतान्।
अन्धकं वै महाभोजं वृष्णिं देवावृधं नृपम्।
ज्येष्ठं च भजमानाख्यं धनुर्वेदविदां वरम्॥ ३५॥

तेषां देवावृधो राजा चचार परमं तपः।
पुत्रः सर्वगुणोपेतो मम भूयादिति प्रभुः॥ ३६॥

तस्य बभ्रुरिति ख्यातः पुण्यश्लोकोऽभवन्नृपः।
धार्मिको रूपसम्पन्नस्तत्त्वज्ञानरतः सदा॥ ३७॥

भजमानस्य सृञ्जयां भजमाना विजज्ञिरे।
तेषां प्रधानौ विख्यातौ निमिः कृकण एव च॥ ३८॥

महाभोजकुले जाता भोजा वैमार्तिकास्तथा।
वृष्णेः सुमित्रो बलवाननमित्रः शिनिस्तथा॥ ३९॥

अनमित्रादभून्निघ्नो निघ्नस्य द्वौ बभूवतुः।
प्रसेनस्तु महाभागः सत्राजिन्नाम चोत्तमः॥ ४०॥

अनमित्राच्छिनिर्जज्ञे कनिष्ठाद् वृष्णिनन्दनात्।
सत्यवान् सत्यसम्पन्नः सत्यकस्तत्सुतोऽभवत्॥ ४१॥

सात्यकिर्युयुधानस्तु तस्यासङ्गोऽभवत् सुतः।
कुणिस्तस्य सुतो धीमांस्तस्य पुत्रो युगंधरः॥ ४२॥

माद्र्या वृष्णेः सुतो जज्ञे पृश्निर्वै यदुनन्दनः।
जज्ञाते तनयौ पृश्नेः श्वफल्कश्चित्रकश्च ह॥ ४३॥

श्वफल्कः काशिराजस्य सुतां भार्यामविन्दत।
तस्यामजनयत् पुत्रमक्रूरं नाम धार्मिकम्।
उपमङ्गुस्तथा मङ्गुरन्ये च बहवः सुताः॥ ४४॥

अक्रूरस्य स्मृतः पुत्रो देववानिव विश्रुतः।
उपदेवश्च पुण्यात्मा तयोर्विश्वप्रमाथिनौ॥ ४५॥

चित्रकस्याभवत् पुत्रः पृथुर्विपृथुरेव च।
अश्वग्रीवः सुबाहुश्च सुपार्श्वकगवेषणौ॥ ४६॥

अन्धकात् काश्यदुहिता लेभे च चतुरः सुतान्।
कुकुरं भजमानं च शुचिं कम्बलवर्हिषम्॥ ४७॥

कुकुरस्य सुतो वृष्णिर्वृष्णेस्तु तनयोऽभवत्।
कपोतरोमा विपुलस्तस्य पुत्रो विलोमकः॥ ४८॥


अनुवाद

उसके नामसे सात्त्वत ऐसा विख्यात कुण्डादिकोंके लिये कल्याणकारी सुन्दर शास्त्र प्रवर्तित हुआ। उस (सत्त्वत)-का सभी शास्त्रोंमें पारंगत सात्त्वत नामक पुत्र हुआ, वह महाराज पुण्यश्लोक था। उसने उस सात्त्वत शास्त्रका प्रवर्तन किया। सत्त्वसम्पन्न सात्त्वतकी पत्नी कौशल्याने अन्धक, महाभोज, वृष्णि, राजा देवावृध तथा धनुर्वेदज्ञोंमें श्रेष्ठ भजमान नामक ज्येष्ठ पुत्रको जन्म दिया॥ ३३-३५॥

उनमेंसे राजा देवावृधने 'मुझे सभी गुणोंसे सम्पन्न शक्तिशाली पुत्र हो' इस आशयसे परम तप किया। उसका पुत्र बभ्रु नामसे विख्यात पुण्यश्लोक राजा हुआ। वह धर्मात्मा, रूप-सम्पन्न तथा सदा तत्त्वज्ञान-परायण रहता था। भजमानके सृञ्जयी (पत्नी)-से भजमान ही नामवाले (अनेक) पुत्र हुए। उनमेंसे निमि तथा कृकण—ये दो प्रधान तथा विख्यात थे। महाभोजके वंशमें भोज तथा वैमार्तिक उत्पन्न हुए। वृष्णिके बलवान् सुमित्र, अनमित्र तथा शिनि हुए। अनमित्रसे निघ्न हुआ और निघ्नके महाभाग्यवान् प्रसेन तथा श्रेष्ठ सत्राजित् नामवाले दो पुत्र हुए॥ ३६-४०॥

कनिष्ठ वृष्णिनन्दन अनमित्रसे शिनि उत्पन्न हुआ। उसका सत्यक नामक पुत्र हुआ जो सत्य बोलनेवाला तथा सत्यसम्पन्न था। सत्यकका पुत्र युयुधान और उसका पुत्र असङ्ग हुआ। उसका पुत्र बुद्धिमान् कुणि था और युगन्धर उसका पुत्र हुआ। वृष्णिको माद्रीसे यदुनन्दन पृश्नि नामक पुत्र उत्पन्न हुआ। पृश्निको श्वफल्क तथा चित्रक नामवाले दो पुत्र हुए। श्वफल्कने काशिराजकी पुत्रीको अपनी भार्या बनाया और उससे अक्रूर नामक धार्मिक पुत्र उत्पन्न किया। उपमङ्गु तथा मङ्गु नामवाले उनके बहुतसे पुत्र थे। अक्रूरका देववान् इस नामसे प्रसिद्ध पुत्र कहा गया है। पुण्यात्मा उपदेव भी उसका पुत्र हुआ। उन दोनोंको विश्व तथा प्रमाथी नामक दो पुत्र हुए॥ ४१-४५॥

चित्रकके पृथु, विपृथु, अश्वग्रीव, सुबाहु, सुपार्श्वक तथा गवेषण नामक पुत्र हुए। काश्यकी पुत्रीने अन्धकसे कुकुर, भजमान, शुचि तथा कम्बलवर्हिष नामक चार पुत्रोंको प्राप्त किया। कुकुरका पुत्र वृष्णि हुआ और वृष्णिका पुत्र कपोतरोमा विपुल हुआ। उसका पुत्र विलोमक हुआ॥ ४६-४८॥