भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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१५४ * कूर्मपुराण *


तस्यासीत् तुम्बुरुसखा विद्वान् पुत्रो नलः किल।<br>ख्यायते तस्य नामानुरनोरानकदुन्दुभिः॥ ४९॥उस (विलोमक)-का विद्वान् नल नामक पुत्र हुआ जो तुम्बुरुका मित्र था, अनु भी उसका नाम हुआ। अनुका पुत्र आनकदुन्दुभि हुआ॥ ४९॥
स गोवर्धनमासाद्य तताप विपुलं तपः।<br>वरं तस्मै ददौ देवो ब्रह्मा लोकमहेश्वरः॥ ५०॥ब्राह्मणो! उसने गोवर्धन पर्वतपर जाकर महान् तप किया। तब लोकमहेश्वर देव ब्रह्माने उसे वर प्रदान किया और कहा—तुम्हारे वंशकी अक्षय कीर्ति होगी तथा तुम्हें गुरुसे भी अधिक श्रेष्ठ गानयोग (संगीत-कलाकी स्वाभाविक प्रतिभा) और इच्छानुसार रूप धारण करनेकी योग्यता प्राप्त होगी॥ ५०-५१॥
वंशस्य चाक्षयां कीर्तिं गानयोगमनुत्तमम्।<br>गुरोरभ्यधिकं विप्राः कामरूपित्वमेव च॥ ५१॥<br>स लब्ध्वा वरमव्यग्रो वरेण्यं वृषवाहनम्।<br>पूजयामास गानेन स्थाणुं त्रिदशपूजितम्॥ ५२॥वर प्राप्तकर प्रशान्त (मनवाले) उसने देवताओंद्वारा पूजित, वरणीय और वृषवाहन स्थाणु (शंकर)-की गान (संगीत)-द्वारा पूजा की। गानमें रत उस (आनकदुन्दुभि)-को भगवान् देव अम्बिकापति (शंकर)-ने देवताओंके लिये भी दुर्लभ विवाह करने योग्य कन्यारूपी रत्न प्रदान किया। भार्या-रूपमें उसका साथ प्राप्तकर शत्रुनाशक राजाने उस चञ्चल आँखोंवाली अपनी प्रिया भ्रान्तलोचनाको श्रेष्ठ गानयोग सिखलाया। (राजाने) उससे सुन्दर भुजावाले शोभन नामक पुत्र तथा रूप और लावण्यसे सम्पन्न ह्रीमती नामकी कन्याको उत्पन्न किया॥ ५२-५५॥
तस्य गानरतस्याथ भगवानम्बिकापतिः।<br>कन्यारत्नं ददौ देवो दुर्लभं त्रिदशैरपि॥ ५३॥
तया स सङ्गतो राजा गानयोगमनुत्तमम्।<br>अशिक्षयदमित्रघ्नः प्रियां तां भ्रान्तलोचनाम्॥ ५४॥
तस्यामुत्पादयामास सुभुजं नाम शोभनम्।<br>रूपलावण्यसम्पन्नां ह्रीमतीमपि कन्यकाम्॥ ५५॥
ततस्तं जननी पुत्रं बाल्ये वयसि शोभनम्।<br>शिक्षयामास विधिवद् गानविद्यां च कन्यकाम्॥ ५६॥तब माता (भ्रान्तलोचना)-ने बाल्यावस्थामें ही उस शोभन नामक पुत्रको तथा कन्या (ह्रीमती)-को भी विधिवत् गानविद्याकी शिक्षा प्रदान की। उपनयन होनेके अनन्तर विधिपूर्वक गुरुसे वेदोंका अध्ययनकर (शोभनने) गन्धर्वोंकी मानसी नामक कन्यासे विवाह किया और उससे वीणा बजानेका तत्त्व जाननेवाले तथा संगीतशास्त्रमें पारंगत पाँच श्रेष्ठ पुत्रोंको उत्पन्न किया॥ ५६-५८॥
कृतोपनयनो वेदानधीत्य विधिवद् गुरोः।<br>उद्ववाहात्मजां कन्यां गन्धर्वाणां तु मानसीम्॥ ५७॥
तस्यामुत्पादयामास पञ्च पुत्राननुत्तमान्।<br>वीणावादनतत्त्वज्ञान् गानशास्त्रविशारदान्॥ ५८॥
पुत्रैः पौत्रैः सपत्नीको राजा गानविशारदः।<br>पूजयामास गानेन देवं त्रिपुरनाशनम्॥ ५९॥पुत्र-पौत्र तथा पत्नीसहित गानविद्यामें पारंगत उस राजाने गायनद्वारा त्रिपुरका नाश करनेवाले देव (शंकर)-की पूजा की। लक्ष्मीके सदृश विशाल नेत्रोंवाली जो ह्रीमती नामकी कन्या थी, सुबाहु नामक गन्धर्व उसे लेकर अपनी पुरीमें चला गया। अत्यन्त तेजस्वी गन्धर्वको भी उस (ह्रीमती)-से सुषेण, वीर, सुग्रीव, सुभोज तथा नरवाहन नामके पुत्र हुए॥ ५९-६१॥
ह्रीमती चापि या कन्या श्रीरिवायतलोचना।<br>सुबाहुर्नाम गन्धर्वस्तामादाय ययौ पुरीम्॥ ६०॥
तस्यामप्यभवन् पुत्रा गन्धर्वस्य सुतेजसः।<br>सुषेणवीरसुग्रीवसुभोजनरवाहनाः ॥ ६१॥
अथासीदभिजित् पुत्रो वीरस्वानकदुन्दुभेः।<br>पुनर्वसुश्चाभिजितः सम्बभूवाहुकः सुतः॥ ६२॥आनकदुन्दुभिका अभिजित् नामक एक वीर पुत्र था। अभिजित्‌का पुनर्वसु और उससे आहुकका जन्म हुआ॥ ६२॥