संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें* अध्याय २३ * । १५५
आहुकस्योग्रसेनश्च देवकश्च द्विजोत्तमाः।
देवकस्य सुता वीरा जज्ञिरे त्रिदशोपमाः॥ ६३॥
देववानुपदेवश्च सुदेवो देवरक्षितः।
तेषां स्वसारः समासन् वसुदेवाय ता ददौ॥ ६४॥
वृकदेवोपदेवा च तथान्या देवरक्षिता।
श्रीदेवा शान्तिदेवा च सहदेवा च सुव्रता।
देवकी चापि तासां तु वरिष्ठाभूत् सुमध्यमा॥ ६५॥
उग्रसेनस्य पुत्रोऽभून्न्यग्रोधः कंस एव च।
सुभूमी राष्ट्रपालश्च तुष्टिमाञ्छङ्कुरेव च॥ ६६॥
भजमानादभूत् पुत्रः प्रख्यातोऽसौ विदूरथः।
तस्य शूरः शमिस्तस्मात् प्रतिक्षत्रस्ततोऽभवत्॥ ६७॥
स्वयम्भोजस्ततस्तस्माद् हृदिकः शत्रुतापनः।
कृतवर्माथ तत्पुत्रो देवरस्तत्सुतः स्मृतः।
स शूरस्तत्सुतो धीमान् वसुदेवोऽथ तत्सुतः॥ ६८॥
वसुदेवान्महाबाहुर्वासुदेवो जगद्गुरुः।
बभूव देवकीपुत्रो देवैरभ्यर्थितो हरिः॥ ६९॥
रोहिणी च महाभागा वसुदेवस्य शोभना।
असूत् पत्नी संकर्षं रामं ज्येष्ठं हलायुधम्॥ ७०॥
स एव परमात्मासौ वासुदेवो जगन्मयः।
हलायुधः स्वयं साक्षाच्छेषः संकर्षणः प्रभुः॥ ७१॥
भृगुशापच्छलेनैव मानयन् मानुषीं तनुम्।
बभूव तस्यां देवक्यां रोहिण्यामपि माधवः॥ ७२॥
उमादेहसमुद्भूता योगनिद्रा च कौशिकी।
नियोगाद् वासुदेवस्य यशोदातनया ह्यभूत्॥ ७३॥
ये चान्ये वसुदेवस्य वासुदेवाग्रजाः सुताः।
प्रागेव कंसस्तान् सर्वान् जघान मुनिपुंगवाः॥ ७४॥
सुषेणश्च तथोदायी भद्रसेनो महाबलः।
ऋजुदासो भद्रदासः कीर्तिमानपि पूर्वजः॥ ७५॥
हतेष्वेतेषु सर्वेषु रोहिणी वसुदेवतः।
असूत् रामं लोकेशं बलभद्रं हलायुधम्॥ ७६॥
जातेऽथ रामे देवानामादिमात्मानमच्युतम्।
असूत् देवकी कृष्णं श्रीवत्साङ्कितवक्षसम्॥ ७७॥
रेवती नाम रामस्य भार्यासीत् सुगुणान्विता।
तस्यामुत्पादयामास पुत्रौ द्वौ निशठोल्मुकौ॥ ७८॥
द्विजोत्तमो! आहुकके दो पुत्र हुए—उग्रसेन और देवक। देवकके देवताओंके समान देववान्, उपदेव, सुदेव तथा देवरक्षित नामवाले चार वीर पुत्र हुए। इनकी सात बहनें थीं—वृकदेवा, उपदेवा, देवरक्षिता, श्रीदेवा, शान्तिदेवा, सहदेवा, सुव्रता तथा देवकी। इनमें सुन्दर मध्यभागवाली देवकी सबसे बड़ी थी। ये सभी वसुदेवको दी गयीं॥ ६३—६५॥
उग्रसेनके न्यग्रोध, कंस, सुभूमि, राष्ट्रपाल, तुष्टिमान् तथा शङ्कु नामवाले पुत्र थे। भजमानका प्रख्यात विदूरथ नामवाला पुत्र हुआ। उसका पुत्र शूर, उससे शमि और शमिका प्रतिक्षत्र नामक पुत्र हुआ। उस (प्रतिक्षत्र)-से स्वयम्भोज और उससे शत्रुओंको ताप पहुँचानेवाला पुत्र हृदिक हुआ। उसका पुत्र कृतवर्मा और उसका पुत्र देवर कहलाया। उस शूरसे धीमान् हुआ और उसका पुत्र वसुदेव था॥ ६६—६८॥
देवताओंके प्रार्थना करनेपर महाबाहु जगद्गुरु वासुदेव विष्णु वसुदेवसे देवकी-पुत्रके रूपमें प्रकट हुए। वसुदेवकी महाभाग्यशालिनी सुन्दर रोहिणी नामक पत्नीने हलको आयुधके रूपमें धारण करनेवाले ज्येष्ठ पुत्र संकर्षण राम (बलराम)-को जन्म दिया। वह परमात्मा (विष्णु) ही ये जगन्मय (वसुदेवपुत्र) वासुदेव हैं। हलायुध (बलराम) संकर्षण स्वयं साक्षात् प्रभु शेष हैं॥ ६९—७१॥
भृगुके शापके कारण वे माधव विष्णु भी मनुष्य-शरीर स्वीकार कर उन देवकी तथा रोहिणीसे उत्पन्न हुए। उमाकी देहसे उत्पन्न योगनिद्रारूप कौशिकीदेवी वासुदेवकी आज्ञासे यशोदाकी पुत्री हुई॥ ७२-७३॥
मुनिश्रेष्ठो! वसुदेवके अन्य जो वासुदेव नामवाले ज्येष्ठ पुत्र थे उन सबको कंसने पहले ही मार डाला। सुषेण, उदायी, भद्रसेन, महाबल, ऋजुदास, भद्रदास और पूर्वमें उत्पन्न कीर्तिमान्—इन सभी (वसुदेवके बड़े भाइयों)-के मारे जानेपर रोहिणीने वसुदेवसे संसारके स्वामी हलायुध बलभद्र राम (बलराम)-को जन्म दिया॥ ७४—७६॥
राम (बलराम)-के उत्पन्न होनेके पश्चात् देवकीने देवताओंके आदि कारण, आत्मरूप, श्रीवत्स-चिह्नसे सुशोभित वक्षःस्थलवाले अच्युत कृष्णको जन्म दिया॥ ७७॥
बलरामकी सुन्दर गुणोंसे युक्त रेवती नामकी भार्या थीं। उन्होंने उनसे निशठ तथा उल्मुक नामक दो पुत्रोंको उत्पन्न किया॥ ७८॥