भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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१५६ * कूर्मपुराण *

षोडशस्त्रीसहस्राणि कृष्णस्याक्लिष्टकर्मणः । बभूवुरात्मजास्तासु शतशोऽथ सहस्रशः ॥ ७९ ॥ चारुदेष्णः सुचारुश्च चारुवेषो यशोधरः । चारुश्रवाश्चारुयशाः प्रद्युम्नः शंख एव च ॥ ८० ॥ रुक्मिण्यां वासुदेवस्य महाबलपराक्रमाः । विशिष्टाः सर्वपुत्राणां सम्बभूवुरिमे सुताः ॥ ८१ ॥ तान् दृष्ट्वा तनयान् वीरान् रौक्मिणेयाञ्जनार्दनम् । जाम्बवत्यब्रवीत् कृष्णं भार्या तस्य शुचिस्मिता ॥ ८२ ॥ मम त्वं पुण्डरीकाक्ष विशिष्टं गुणवत्तमम् । सुरेशसदृशं पुत्रं देहि दानवसूदन ॥ ८३ ॥ जाम्बवत्या वचः श्रुत्वा जगन्नाथः स्वयं हरिः । समारेभे तपः कर्तुं तपोनिधिररिंदमः ॥ ८४ ॥

(वसुदेव-देवकीसे उत्पन्न साक्षात् विष्णु) अक्लिष्टकर्मा श्रीकृष्णकी सोलह हजार पत्नियाँ थीं और उनसे सैकड़ों हजारों पुत्र हुए। वासुदेव श्रीकृष्णकी पत्नी रुक्मिणीसे चारुदेष्ण, सुचारु, चारुवेष, यशोधर, चारुश्रवा, चारुयशा, प्रद्युम्न तथा शङ्ख नामवाले महान् बलशाली और पराक्रम-सम्पन्न पुत्र हुए। ये पुत्र सभी पुत्रोंमें विशिष्ट हुए ॥ ७९–८१ ॥

रुक्मिणीसे उत्पन्न इन वीर पुत्रोंको देखकर पवित्र मुसकानवाली पत्नी जाम्बवतीने अपने पति जनार्दन श्रीकृष्णसे कहा—पुण्डरीकाक्ष! दानवसूदन! आप मुझे इन्द्रके समान विशिष्ट गुणवानोंमें श्रेष्ठ पुत्र प्रदान करें। जाम्बवतीका कथन सुनकर शत्रुओंका दमन करनेवाले तपोनिधि जगन्नाथ स्वयं हरिने तप करना प्रारम्भ किया ॥ ८२–८४ ॥

तच्छृणुध्वं मुनिश्रेष्ठा यथासौ देवकीसुतः । दृष्ट्वा लेभे सुतं रुद्रं तप्त्वा तीव्रं महत् तपः ॥ ८५ ॥

मुनिश्रेष्ठो ! उन देवकीपुत्र (श्रीकृष्ण)-ने जिस प्रकार अत्यन्त तीव्र महान् तपके द्वारा रुद्रका दर्शनकर पुत्र प्राप्त किया, उस (वृत्तान्त)-को आपलोग सुनें ॥ ८५ ॥

इति श्रीकूर्मपुराणे षट्साहस्र्यां संहितायां पूर्वविभागे त्रयोविंशोऽध्यायः ॥ २३ ॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें तेईसवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ २३ ॥


चौबीसवाँ अध्याय

पुत्र-प्राप्तिके लिये तपस्या करने-हेतु भगवान् श्रीकृष्णका महामुनि उपमन्युके आश्रममें जाना, महामुनि उपमन्युद्वारा उन्हें पाशुपत-योग प्रदान करना, तपस्यामें निरत कृष्णको शिव-पार्वतीका दर्शन और श्रीकृष्णद्वारा उनकी स्तुति करना, शिवद्वारा पुत्रप्राप्तिका वर देना तथा माता पार्वतीद्वारा अनेक वर देना और शिवके साथ श्रीकृष्णका कैलास-गमन

सूत उवाच

अथ देवो हृषीकेशो भगवान् पुरुषोत्तमः ।
तताप घोरं पुत्रार्थं निदानं तपसस्तपः ॥ १ ॥
स्वेच्छयाप्यावतीर्णोऽसौ कृतकृत्योऽपि विश्वधृक् ।
चचार स्वात्मनो मूलं बोधयन् भावमैश्वरम् ॥ २ ॥
जगाम योगिभिर्जुष्टं नानापक्षिसमाकुलम् ।
आश्रमं तूपमन्योर्वै मुनीन्द्रस्य महात्मनः ॥ ३ ॥
पतत्त्रिराजमारूढः सुपर्णमतितेजसम् ।
शङ्खचक्रगदापाणिः श्रीवत्सकृतलक्षणः ॥ ४ ॥

सूतजी बोले— हृषीकेश भगवान् पुरुषोत्तम देवने पुत्र-प्राप्तिके लिये तपस्याके निदान*-रूपमें (सर्वोत्कृष्ट) घोर तपस्या की। अपनी इच्छासे ही अवतीर्ण कृतकृत्य, विश्वको धारण करनेवाले ये श्रीकृष्ण (अपने) स्वरूपके मूल ईश्वर-भावका परिज्ञान करानेके लिये (उत्तम तपः-स्थलके अन्वेषणके बहाने पक्षिराज गरुड़पर आरूढ़ होकर) विचरण करने लगे। हाथोंमें शङ्ख, चक्र, गदा लिये तथा श्रीवत्सके चिह्नसे चिह्नित (श्रीकृष्ण) योगियोंद्वारा सेवित, अनेक प्रकारके पक्षिसमूहोंसे व्याप्त मुनीन्द्र महात्मा उपमन्युके आश्रममें पहुँचे ॥ १–४ ॥


* जो तपस्या उत्कृष्ट तपस्याके लिये दृष्टान्त होती है, तपस्याकी सत्यताका निकष (कसौटी) होती है, उसे तपस्याका निदान कहते हैं।