संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished506 पृष्ठ
पृष्ठ 167, कुल 506 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 167
* अध्याय २४ *
१५७
| नानाद्रुमलताकीर्णं नानापुष्पोपशोभितम्।<br>ऋषीणामाश्रमैर्जुष्टं वेदघोषनिनादितम्॥ ५ ॥<br>सिंहर्क्षशरभाकीर्णं शार्दूलगजसंयुतम्।<br>विमलस्वादुपानीयैः सरोभिरुपशोभितम्॥ ६ ॥<br>आरामैर्विविधैर्जुष्टं देवतायतनैः शुभैः।<br>ऋषिकैर्ऋषिपुत्रैश्च महामुनिगणैस्तथा॥ ७ ॥<br>वेदाध्ययनसम्पन्नैः सेवितं चाग्निहोत्रिभिः।<br>योगिभिर्ध्याननिरतैर्नासाग्रगतलोचनैः ॥ ८ ॥<br>उपेतं सर्वतः पुण्यं ज्ञानिभिस्तत्त्वदर्शिभिः।<br>नदीभिरभितो जुष्टं जापकैर्ब्रह्मवादिभिः॥ ९ ॥<br>सेवितं तापसैः पुण्यैरीशाराधनतत्परैः।<br>प्रशान्तैः सत्यसंकल्पैर्निःशोकैर्निरुपद्रवैः॥ १०॥<br>भस्मावदातसर्वाङ्गैः रुद्रजाप्यपरायणैः।<br>मुण्डैस्तैर्जटिलैः शुद्धैस्तथान्यैश्च शिखाजटैः।<br>सेवितं तापसैर्नित्यं ज्ञानिभिर्ब्रह्मचारिभिः॥ ११॥ | वह आश्रम विविध प्रकारके वृक्ष और लताओंसे व्याप्त, अनेक प्रकारके पुष्पोंसे सुशोभित, ऋषियोंके आश्रमोंसे युक्त तथा वेदमन्त्रोंकी ध्वनियोंसे निनादित था। सिंह, भालू, शरभ, व्याघ्र और हाथियोंसे व्याप्त था; स्वच्छ, स्वादुयुक्त, पीने योग्य जलवाले सरोवरोंसे सुशोभित था; विविध प्रकारके उद्यानों तथा शुभ देवमन्दिरोंसे सम्पन्न था। ऋषियों, ऋषिपुत्रों, महामुनिगणों, वेदाध्ययनसम्पन्न तथा अग्निहोत्र करनेवालोंसे सेवित था। नासिकाके अग्रभागमें जिनकी दृष्टि लगी हुई है, ऐसे ध्यानपरायण योगियोंसे युक्त, सभी प्रकारसे पवित्र, तत्त्वदर्शी ज्ञानियोंसे सेवित और चारों ओर नदियोंसे घिरा था। वह आश्रम ब्रह्मवादी जापकों, शंकरकी आराधनामें निरत पवित्र तपस्वियोंसे सेवित, सत्यसंकल्पवाले, परम शान्त, शोक तथा उपद्रवरहित, यथाविधि सभी अङ्गोंमें भस्म लगाये हुए रुद्रके जपमें परायण, मुण्डित या मात्र जटा रखे हुए तथा जटाके समान शिखावाले अन्य तपस्वियों, ज्ञानियों और ब्रह्मचारियोंसे नित्य सेवित था॥ ५-११॥ |
| तत्राश्रमवरे रम्ये सिद्धाश्रमविभूषिते।<br>गङ्गा भगवती नित्यं वहत्येवाघनाशिनी ॥ १२॥<br>स तानन्विष्य विश्वात्मा तापसान् वीतकल्मषान्।<br>प्रणामेनाथ वचसा पूजयामास माधवः॥ १३॥ | वहाँ सिद्धोंके आश्रमोंसे सुशोभित उस रमणीय श्रेष्ठ आश्रममें पापोंका नाश करनेवाली भगवती गङ्गा नित्य प्रवाहित रहती थीं। उन विश्वात्मा माधवने उन कल्मषरहित तपस्वियोंको ढूँढ़-ढूँढ़कर उनके समीप जाकर उन्हें सविधि प्रणाम किया और स्तुतिपूर्वक उनकी पूजा की॥ १२-१३॥ |
| तं ते दृष्ट्वा जगद्योनिं शङ्खचक्रगदाधरम्।<br>प्रणेमुर्भक्तिसंयुक्ता योगिनां परमं गुरुम्॥ १४॥<br>स्तुवन्ति वैदिकैर्मन्त्रैः कृत्वा हृदि सनातनम्।<br>प्रोचुरन्योन्यमव्यक्तमादिदेवं महामुनिम्॥ १५॥ | उन शङ्ख, चक्र, गदाधारी, योगियोंके परम गुरु, जगद्योनि (श्रीकृष्ण)-को देखकर उन्होंने (तपस्वियोंने) भक्तिपूर्वक प्रणाम किया और अव्यक्त, आदिदेव, महामुनि तथा उन सनातन (देव)-का हृदयमें ध्यानकर वैदिक मन्त्रोंसे उनकी स्तुति करने लगे और आपसमें कहने लगे-॥ १४-१५॥ |
| अयं स भगवान्नेकः साक्षान्नारायणः परः।<br>आगच्छत्यधुना देवः पुराणपुरुषः स्वयम्॥ १६॥<br>अयमेवाव्ययः स्रष्टा संहर्ता चैव रक्षकः।<br>अमूर्तो मूर्तिमान् भूत्वा मुनीन् द्रष्टुमिहागतः॥ १७॥<br>एष धाता विधाता च समागच्छति सर्वगः।<br>अनादिरक्षयोऽनन्तो महाभूतो महेश्वरः॥ १८॥ | ये वही अद्वितीय परम साक्षात् नारायण भगवान् हैं। स्वयं पुराणपुरुष देव ही इस समय आये हुए हैं। ये ही अव्यय हैं, सृष्टि करनेवाले, संहार करनेवाले तथा पालन करनेवाले ये ही हैं। अमूर्त होते हुए भी ये मूर्तिमान् होकर मुनियोंको देखनेके लिये यहाँ आये हुए हैं। ये धाता, विधाता और सर्वव्यापी ही आ रहे हैं। ये अनादि, अक्षय, अनन्त, महाभूत और महेश्वर हैं॥ १६-१८॥ |
| श्रुत्वा श्रुत्वा हरिस्तेषां वचांसि वचनातिगः।<br>ययौ स तूर्णं गोविन्दः स्थानं तस्य महात्मनः॥ १९॥ | वाणीके अगोचर गोविन्द हरि उन (तपस्वियों)-के वचनोंको सुनते हुए शीघ्र ही उन महात्मा (उपमन्यु)-के स्थानपर गये॥ १९॥ |