संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१५८ * कूर्मपुराण *
उपस्पृश्याथ भावेन तीर्थे तीर्थे स यादवः।
चकार देवकीसूनुर्देवर्षिपितृतर्पणम्॥ २०॥
नदीनां तीरसंस्थानि स्थापितानि मुनीश्वरैः।
लिङ्गानि पूजयामास शम्भोरमिततेजसः॥ २१॥
दृष्ट्वा दृष्ट्वा समायान्तं यत्र यत्र जनार्दनम्।
पूजयाञ्चक्रिरे पुष्पैरक्षतैस्तत्र वासिनः॥ २२॥
समीक्ष्य वासुदेवं तं शार्ङ्गशङ्खासिधारिणम्।
तस्थिरे निश्चलाः सर्वे शुभाङ्गं तन्निवासिनः॥ २३॥
यानि तत्रारुरुक्षूणां मानसानि जनार्दनम्।
दृष्ट्वा समाहितान्यासन् निष्क्रामन्ति पुरा हरिम्॥ २४॥
अथावगाह्य गङ्गायां कृत्वा देवादितर्पणम्।
आदाय पुष्पवर्याणि मुनीन्द्रस्याविशद् गृहम्॥ २५॥
दृष्ट्वा तं योगिनां श्रेष्ठं भस्मोद्धूलितविग्रहम्।
जटाचीरधरं शान्तं ननाम शिरसा मुनिम्॥ २६॥
आलोक्य कृष्णमायान्तं पूजयामास तत्त्ववित्।
आसने चासयामास योगिनां प्रथममतिथिम्॥ २७॥
उवाच वचसां योनिं जानीमः परमं पदम्।
विष्णुमव्यक्तसंस्थानं शिष्यभावेन संस्थितम्॥ २८॥
स्वागतं ते हृषीकेश सफलानि तपांसि नः।
यत् साक्षादेव विश्वात्मा मद्गेहं विष्णुरागतः॥ २९॥
त्वां न पश्यन्ति मुनयो यतन्तोऽपि हि योगिनः।
तादृशस्याथ भवतः किमागमनकारणम्॥ ३०॥
श्रुत्वोपमन्योस्तद् वाक्यं भगवान् केशिमर्दनः।
व्याजहार महायोगी वचनं प्रणिपत्य तम्॥ ३१॥
श्रीकृष्ण उवाच
भगवन् द्रष्टुमिच्छामि गिरीशं कृत्तिवाससम्।
सम्प्राप्तो भवतः स्थानं भगवद्दर्शनोत्सुकः॥ ३२॥
कथं स भगवानीशो दृश्यो योगविदां वरः।
मयाचिरेण कुत्राहं द्रक्ष्यामि तमुमापतिम्॥ ३३॥
उन यदुवंशी देवकीपुत्र श्रीकृष्णने प्रत्येक तीर्थमें श्रद्धापूर्वक आचमनकर (मार्जनकर) देवता, ऋषि और पितरोंका तर्पण किया और मुनीश्वरोंके द्वारा नदियोंके किनारे स्थापित अमिततेजस्वी शंकरके लिङ्गोंकी पूजा की॥ २०-२१॥
वहाँके निवासियोंने जहाँ-जहाँ भी जनार्दनको आते हुए देखा, वहाँ-वहाँ पुष्पों तथा अक्षतोंसे उनकी पूजा की। शार्ङ्गधनुष, शङ्ख तथा असि धारण करनेवाले एवं शुभ अङ्गोंवाले उन वासुदेवका दर्शनकर वहाँ रहनेवाले सभी निश्चल-से खड़े हो गये। वहाँ (योगमें) आरूढ़ होनेके इच्छुक जिन लोगोंके मन समाधिस्थ थे, वे भी जनार्दन हरिको अपने सम्मुख देखकर उनका दर्शन करनेके लिये अपनी इन्द्रियोंको बहिर्मुख कर लिये॥ २२-२४॥
इधर श्रीकृष्णने गङ्गामें अवगाहन करनेके पश्चात् देवताओं, पितरों आदिका दर्शन, तर्पण आदि कर उत्तमोत्तम पुष्प आदि लेकर श्रेष्ठ मुनि (उपमन्यु)-के गृहमें प्रवेश किया। योगियोंमें श्रेष्ठ, भस्मसे अवलिप्त शरीरवाले, जटा और चीरधारी उन शान्त मुनिको देखकर (श्रीकृष्णने) सिर झुकाकर उन्हें प्रणाम किया॥ २५-२६॥
कृष्णको आते हुए देखकर तत्त्वज्ञ उन मुनिने योगियोंके प्रथम पूज्य उन्हें आसनपर बिठाया और उनकी पूजा की॥ २७॥
(मुनिने कहा—) हम जानते हैं कि वाणीके उत्पत्ति-स्थान, परमपदरूप, अव्यक्त शरीरवाले विष्णु शिष्यके रूपमें उपस्थित हुए हैं। हृषीकेश! आपका स्वागत है, हमारे तप सफल हुए जो साक्षात् विश्वात्मा विष्णु ही मेरे घर आये हैं। प्रयत्न करते हुए भी योगी तथा मुनिजन आपको देख नहीं पाते, ऐसे आपके यहाँ आनेका प्रयोजन क्या है? उपमन्युके उस वाक्यको सुनकर केशीका मर्दन करनेवाले महायोगी भगवान्ने उन्हें प्रणामकर कहा—॥ २८-३१॥
श्रीकृष्ण बोले— भगवन्! भगवान् शंकरके दर्शनोंके लिये उत्सुक मैं आया हूँ। कृत्तिवासा गिरीश (भगवान् शंकर)-का दर्शन करनेकी मेरी उत्कट इच्छा है। योगविदोंमें श्रेष्ठ भगवान् ईशका शीघ्र ही कैसे दर्शन कर सकता हूँ, उन उमापतिको मैं कहाँ देख पाऊँगा॥ ३२-३३॥