भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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  • अध्याय २४ * | १५९ ---|---

| इत्याह भगवानुक्तो दृश्यते परमेश्वरः।<br>भक्त्या चोग्रेण तपसा तत्कुरुष्वेह यत्नतः॥ ३४॥<br><br>इहेश्वरं देवदेवं मुनीन्द्रा ब्रह्मवादिनः।<br>ध्यायन्तोऽत्रासते देवं जापिनस्तापसाश्च ये॥ ३५॥<br><br>इह देवः सपत्नीको भगवान् वृषभध्वजः।<br>क्रीडते विविधैर्भूतैर्योगिभिः परिवारितः॥ ३६॥<br><br>इहाश्रमे पुरा रुद्रात् तपस्तप्त्वा सुदारुणम्।<br>लेभे महेश्वराद् योगं वसिष्ठो भगवानृषिः॥ ३७॥<br><br>इहैव भगवान् व्यासः कृष्णद्वैपायनः प्रभुः।<br>दृष्ट्वा तं परमं ज्ञानं लब्ध्वानीश्वरेश्वरम्॥ ३८॥<br><br>इहाश्रमवरे रम्ये तपस्तप्त्वा कपर्दिनः।<br>अविन्दत् पुत्रकान् रुद्रात् सुरभिर्भक्तिसंयुता॥ ३९॥<br><br>इहैव देवताः पूर्वं कालाद् भीता महेश्वरम्।<br>दृष्टवन्तो हरं श्रीमन्निर्भया निर्वृतिं ययुः॥ ४०॥<br><br>इहाराध्य महादेवं सावर्णिस्तपतां वरः।<br>लब्धवान् परमं योगं ग्रन्थकारत्वमुत्तमम्॥ ४१॥<br><br>प्रवर्तयामास शुभां कृत्वा वै संहितां द्विजः।<br>पौराणिकीं सुपुण्यार्थां सच्छिष्येषु द्विजातिषु॥ ४२॥<br><br>इहैव संहितां दृष्ट्वा कापेयः शांशपायनः।<br>महादेवं चकारेमां पौराणीं तन्नियोगतः।<br>द्वादशैव सहस्राणि श्लोकानां पुरुषोत्तम॥ ४३॥<br><br>इह प्रवर्तिता पुण्या द्व्यष्टसाहस्रिकोत्तरा।<br>वायवीयोत्तरं नाम पुराणं वेदसम्मितम्।<br>इहैव ख्यापितं शिष्यैः शांशपायनभाषितम्॥ ४४॥<br><br>याज्ञवल्क्यो महायोगी दृष्ट्वात्र तपसा हरम्।<br>चकार तन्नियोगेन योगशास्त्रमनुत्तमम्॥ ४५॥<br><br>इहैव भृगुणा पूर्वं तप्त्वा वै परमं तपः।<br>शुक्रो महेश्वरात् पुत्रो लब्धो योगविदां वरः॥ ४६॥<br><br>तस्मादिहैव देवेशं तपस्तप्त्वा महेश्वरम्।<br>द्रष्टुमर्हसि विश्वेशमुग्रं भीमं कपर्दिनम्॥ ४७॥<br><br>एवमुक्त्वा ददौ ज्ञानमुपमन्युर्महामुनिः।<br>व्रतं पाशुपतं योगं कृष्णायाक्लिष्टकर्मणे॥ ४८॥ | ऐसा कहे जानेपर भगवान् (उपमन्यु)-ने कहा—तीव्र भक्ति एवं तपस्याके द्वारा वे परमेश्वर देखे जा सकते हैं, इसलिये ऐसा ही प्रयत्न करो। ब्रह्मवादी मुनीन्द्र, जप करनेवाले तथा जो तपस्वी हैं वे, यहाँ उन देव ईश्वर देवाधिदेवका ध्यान करते हुए निवास कर रहे हैं। यहाँ भगवान् देव वृषभध्वज पत्नी (पार्वती)-सहित तथा विविध भूतों और योगियोंसे घिरे हुए सदा क्रीड़ा करते हैं॥ ३४-३६॥<br><br>प्राचीन कालमें इस आश्रममें कठोर तप करके भगवान् वसिष्ठ ऋषि‍ने महेश्वर रुद्रसे योग प्राप्त किया था। यहीं प्रभु कृष्णद्वैपायन भगवान् व्यासने उन ईश्वरोंके भी ईश्वर (भगवान् शंकर)-का दर्शनकर परम ज्ञान प्राप्त किया था। इसी रमणीय श्रेष्ठ आश्रममें सुरभिने भक्तिपूर्वक तपस्या करके जटाधारी रुद्रसे पुत्रोंको प्राप्त किया था। पूर्वकालमें कालसे भयभीत देवताओंने यहींपर श्रीमान् हर (महाकाल)-का दर्शनकर भयसे रहित होकर शान्ति प्राप्त की थी। तपस्वियोंमें श्रेष्ठ द्विज सावर्णिने यहींपर महादेवकी आराधना करके परम योग तथा उत्तम ग्रन्थरचनाकी शक्ति प्राप्त की थी। तभी उन्होंने कल्याणकारिणी सुन्दर पुण्य प्रदान करनेवाली पुराणसंहिताका निर्माणकर सत्-शिष्यों और द्विजातियोंमें उसका प्रवर्तन किया॥ ३७-४२॥<br><br>पुरुषोत्तम ! इसी स्थानपर कापेय शांशपायनने महादेवका दर्शनकर उनकी आज्ञा प्राप्त करके बारह हजार श्लोकोंवाली इस (कूर्मरूपधारी भगवान् विष्णुके द्वारा वर्णित) पुराणसंहिताका निर्माण किया। वेदसम्मत पुण्य वायवीयपुराणसंहिताका सोलह हजार श्लोकोंवाला उत्तरभाग यहींपर प्रवर्तित हुआ। यहींपर शांशपायनद्वारा कही गयी पुराणसंहिताका प्रचार उनके शिष्योंने किया॥ ४३-४४॥<br><br>महायोगी याज्ञवल्क्यने यहींपर तपस्याद्वारा शंकरका दर्शन करके उनकी आज्ञासे श्रेष्ठ योगशास्त्रका निर्माण किया था। पूर्वकालमें भृगुने यहीं परम तप करके महेश्वरसे योगज्ञोंमें श्रेष्ठ शुक्र नामक पुत्रको प्राप्त किया था। इसलिये यहींपर तपस्या करके देवताओंके ईश, महेश्वर विश्वेश, उग्र, भीम कपर्दीका आप दर्शन करें। ऐसा कहकर महामुनि उपमन्युने सुन्दर कर्म करनेवाले कृष्णको पाशुपत-योग, पाशुपत-व्रत और पाशुपत-ज्ञान प्रदान किया॥ ४५-४८॥ |