भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished506 पृष्ठ

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१६० * कूर्मपुराण *


स तेन मुनिवर्येण व्याहतो मधुसूदनः ।
तत्रैव तपसा देवं रुद्रमाराधयत् प्रभुः ॥ ४९ ॥

भस्मोद्धूलितसर्वाङ्गो मुण्डो वल्कलसंयुतः ।
जजाप रुद्रमनिशं शिवैकाहितमानसः ॥ ५० ॥

ततो बहुतिथे काले सोमः सोमार्धभूषणः ।
अदृश्यत महादेवो व्योम्नि देव्या महेश्वरः ॥ ५१ ॥

किरीटिनं गदिनं चित्रमालं
पिनाकिनं शूलिनं देवदेवम् ।
शार्दूलचर्माम्बरसंवृताङ्गं
देव्या महादेवमसौ ददर्श ॥ ५२ ॥

परश्वधासक्तकरं त्रिनेत्रं
नृसिंहचर्मावृतसर्वगात्रम् ।
समुद्गिरन्तं प्रणवं बृहन्तं
सहस्रसूर्यप्रतिमं ददर्श ॥ ५३ ॥

प्रभुं पुराणं पुरुषं पुरस्तात्
सनातनं योगिनमीशितारम् ।
अणोरणीयांसमनन्तशक्तिं
प्राणेश्वरं शम्भुमसौ ददर्श ॥ ५४ ॥

न यस्य देवा न पितामहोऽपि
नेन्द्रो न चाग्निर्वरुणो न मृत्युः ।
प्रभावमद्यापि वदन्ति रुद्रं
तमादिदेवं पुरतो ददर्श ॥ ५५ ॥

तदान्वपश्यद् गिरिशस्य वामे
स्वात्मानमव्यक्तमनन्तरूपम् ।
स्तुवन्तमीशं बहुभिर्वचोभिः
शङ्खासिचक्रार्पितहस्तमाद्यम् ॥ ५६ ॥

कृताञ्जलिं दक्षिणतः सुरेशं
हंसाधिरूढं पुरुषं ददर्श ।
स्तुवानमीशस्य परं प्रभावं
पितामहं लोकगुरुं दिविस्थम् ॥ ५७ ॥

गणेश्वरानर्कसहस्रकल्पान्
नन्दीश्वरादीनमितप्रभावान् ।
त्रिलोकभर्तुः पुरतोऽन्वपश्यत्
कुमारमग्निप्रतिमं सशाखम् ॥ ५८ ॥


उन श्रेष्ठ मुनिके कहनेसे वे प्रभु मधुसूदन वहींपर तपस्याद्वारा रुद्रकी आराधना करने लगे। सभी अङ्गोंमें यथाविधि भस्म धारण करके, मुण्डित एवं वल्कल वस्त्रधारी होकर अनन्य-मनसे शिवमें चित्तको समाहितकर निरन्तर रुद्रसम्बन्धी मन्त्रोंका जप करने लगे। तदनन्तर बहुत समय बीत जानेके बाद अर्धचन्द्रमाको आभूषणरूपमें धारण किये सोमरूप महादेव महेश्वर देवी पार्वतीके साथ आकाशमें दिखलायी पड़े॥ ४९-५१॥

उन श्रीकृष्णने मुकुट, गदा, त्रिशूल, पिनाकधनुष तथा चित्र-विचित्र माला धारण किये हुए, सिंहके चर्म-रूपी वस्त्रसे समस्त अङ्गोंको आच्छादित किये हुए देवाधिदेव महादेवको देवी पार्वतीके साथ देखा। हाथमें परशु धारण किये हुए, नृसिंहके चर्मसे आच्छादित शरीरवाले, प्रणवका उच्चारण कर रहे तथा सहस्रों सूर्योंके समान श्रेष्ठ त्रिलोचन—भगवान् शंकरका श्रीकृष्णने दर्शन किया। उन्होंने (श्रीकृष्णने) अपने समक्ष पुराणपुरुष, सनातन प्रभु, योगी, ईश्वर, अणुसे भी सूक्ष्म, अनन्तशक्तियुक्त प्राणेश्वर शम्भुको देखा। जिन (रुद्र)-के प्रभावका देवता, पितामह, इन्द्र, अग्नि, वरुण तथा यम भी आजतक वर्णन नहीं कर पाये, उन आदिदेवको श्रीकृष्णने सामने देखा। उस समय उन्होंने भगवान् शंकरके वामभागमें शङ्ख, तलवार तथा चक्र धारण किये आत्मरूप, अव्यक्त, अनन्त तथा अनन्तरूपवाले आदिदेव (विष्णु)-को देखा। वे भी बहुत-सी स्तुतियोंके द्वारा ईश (शंकर)-की ही स्तुति कर रहे थे॥ ५२—५६॥

उन (भगवान् शंकर)-के दक्षिण भागमें उन्होंने (श्रीकृष्णने) हंसपर आसीन, अत्यन्त प्रभाववाले, देवताओंके स्वामी लोकगुरु पितामहको आकाशमें हाथ जोड़े हुए ईशकी स्तुति करते देखा। उन्होंने (श्रीकृष्णने) तीनों लोकोंके स्वामी (श्रीशंकर)-के सम्मुख हजारों सूर्योंके समान गणेश्वरों, अमित प्रभाववाले नन्दीश्वरादिकों तथा मयूरसहित अग्नि-सदृश कुमार कार्तिकेयको देखा॥ ५७-५८॥

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