भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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  • अध्याय २४ * । १६१

मरीचिमत्रिं पुलहं पुलस्त्यं<br>प्रचेतसं दक्षमथापि कण्वम्।<br>पाराशरं तत्परतो वसिष्ठं<br>स्वायम्भुवं चापि मनुं ददर्श॥ ५९॥उनके पीछेकी ओर मरीचि, अत्रि, पुलह, पुलस्त्य, प्रचेता, दक्ष, कण्व, पराशर, वसिष्ठ तथा स्वायम्भुव मनुको भी देखा॥ ५९॥
तुष्टाव मन्त्रैरमरप्रधानं<br>बद्धाञ्जलिर्विष्णुरुदारबुद्धिः ।<br>प्रणम्य देव्या गिरिशं सभक्त्या<br>स्वात्मन्यथात्मानमसौ विचिन्त्य ॥ ६०॥उन उदार बुद्धिवाले विष्णु (कृष्ण)-ने भक्तिपूर्वक हाथ जोड़ते हुए देवी पार्वतीसहित शंकरको प्रणाम किया तथा अपने हृदयमें आत्म-स्वरूपका ध्यानकर देवताओंमें प्रधान शंकरकी मन्त्रोंद्वारा स्तुति की— ॥ ६०॥
श्रीकृष्ण उवाच<br>नमोऽस्तु ते शाश्वत सर्वयोने<br>ब्रह्माधिपं त्वामृषयो वदन्ति।<br>तपश्च सत्त्वं च रजस्तमश्च<br>त्वामेव सर्वं प्रवदन्ति सन्तः ॥ ६१ ॥<br>त्वं ब्रह्मा हरिरथ विश्वयोनिरग्निः<br>संहर्ता दिनकरमण्डलाधिवासः।<br>प्राणस्त्वं हुतवहवासवादिभेद-<br>स्त्वामेकं शरणमुपैमि देवमीशम्॥ ६२॥<br>सांख्यास्त्वां विगुणमथाहुरेकरूपं<br>योगास्त्वां सततमुपासते हृदिस्थम्।<br>वेदास्त्वामभिदधतीह रुद्रमग्निं<br>त्वामेकं शरणमुपैमि देवमीशम् ॥ ६३ ॥श्रीकृष्ण बोले— शाश्वत ! सबके मूलकारण ! आपको नमस्कार है। ऋषिलोग आपको ब्रह्माका भी अधिपति कहते हैं। संतजन तप, सत्त्व, रज एवं तमोगुण और सब कुछ आपको ही बतलाते हैं। आप ब्रह्मा, विष्णु, विश्वयोनि, अग्नि, संहर्ता और सूर्यमण्डलमें निवास करनेवाले हैं। प्राण, हुतवह (अग्नि) तथा इन्द्रादि विविध देव आप ही हैं। मैं अद्वितीय देव ईशकी शरणमें आया हूँ। सांख्यशास्त्रवाले आपको एकरूप और गुणातीत कहते हैं। योगिजन हृदयमें रहनेवाले आपकी सतत उपासना करते हैं। वेद आपको रुद्र, अग्नि नामसे कहते हैं। मैं आप ईशदेवकी शरणमें आया हूँ ॥ ६१–६३ ॥
त्वत्पादे कुसुममथापि पत्रमेकं<br>दत्त्वासौ भवति विमुक्तविश्वबन्धः।<br>सर्वाघं प्रणुदति सिद्धयोगिजुष्टं<br>स्मृत्वा ते पदयुगलं भवत्प्रसादात् ॥ ६४ ॥मनुष्य आपके चरणमें मात्र एक पुष्प अथवा एक बिल्वपत्र ही चढ़ाकर संसार-बन्धनसे विमुक्त हो जाता है। सिद्धों तथा योगियोंद्वारा सेवित आपके चरणकमलोंका स्मरणकर आपकी कृपासे मनुष्य सभी पापोंको विनष्ट कर डालता है।
यस्याशेषविभागहीनममलं हृद्यन्तरावस्थितं<br>तत्त्वं ज्योतिरनन्तमेकमचलं सत्यं परं सर्वगम्।<br>स्थानं प्राहुरनादिमध्यनिधनं यस्मादिदं जायते<br>नित्यं त्वामुपैमि सत्यविभवं विश्वेश्वरं तं शिवम्॥ ६५॥तत्त्वज्ञ लोग जिन्हें सभी प्रकारके विभागसे रहित, निर्मल, अन्तर्हृदयमें अवस्थित, ज्योति, अनन्त, अद्वितीय, अचल, सत्य, पर, सर्वव्यापी तथा आदि, मध्य और अन्तसे रहित स्थानरूप कहते हैं और यह (संसार) जिनसे उत्पन्न होता है, ऐसे आप सत्यविभव, सनातन विश्वेश्वर शिवकी शरणमें मैं आया हूँ॥ ६४-६५॥
ॐ नमो नीलकण्ठाय त्रिनेत्राय च रंहसे।<br>महादेवाय ते नित्यमीशानाय नमो नमः॥ ६६॥प्रणवरूप नीलकण्ठ, त्रिलोचन और शक्तिरूप आपको नमस्कार है। आप महादेव तथा नित्य ईशानको बार-बार नमस्कार है।
नमः पिनाकिने तुभ्यं नमो मुण्डाय दण्डिने।<br>नमस्ते वज्रहस्ताय दिग्वस्त्राय कपर्दिने ॥ ६७ ॥पिनाक नामक धनुष धारण करनेवाले आपको नमस्कार है, मुण्ड और दण्ड धारण करनेवाले आपको नमस्कार है। हाथमें वज्र धारण करनेवाले, दिशारूपी वस्त्रवाले कपर्दी (जटाधारी) आपको नमस्कार है ॥ ६६-६७॥