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संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished506 पृष्ठ
  • अध्याय २४ * । १६१

मरीचिमत्रिं पुलहं पुलस्त्यं<br>प्रचेतसं दक्षमथापि कण्वम्।<br>पाराशरं तत्परतो वसिष्ठं<br>स्वायम्भुवं चापि मनुं ददर्श॥ ५९॥उनके पीछेकी ओर मरीचि, अत्रि, पुलह, पुलस्त्य, प्रचेता, दक्ष, कण्व, पराशर, वसिष्ठ तथा स्वायम्भुव मनुको भी देखा॥ ५९॥
तुष्टाव मन्त्रैरमरप्रधानं<br>बद्धाञ्जलिर्विष्णुरुदारबुद्धिः ।<br>प्रणम्य देव्या गिरिशं सभक्त्या<br>स्वात्मन्यथात्मानमसौ विचिन्त्य ॥ ६०॥उन उदार बुद्धिवाले विष्णु (कृष्ण)-ने भक्तिपूर्वक हाथ जोड़ते हुए देवी पार्वतीसहित शंकरको प्रणाम किया तथा अपने हृदयमें आत्म-स्वरूपका ध्यानकर देवताओंमें प्रधान शंकरकी मन्त्रोंद्वारा स्तुति की— ॥ ६०॥
श्रीकृष्ण उवाच<br>नमोऽस्तु ते शाश्वत सर्वयोने<br>ब्रह्माधिपं त्वामृषयो वदन्ति।<br>तपश्च सत्त्वं च रजस्तमश्च<br>त्वामेव सर्वं प्रवदन्ति सन्तः ॥ ६१ ॥<br>त्वं ब्रह्मा हरिरथ विश्वयोनिरग्निः<br>संहर्ता दिनकरमण्डलाधिवासः।<br>प्राणस्त्वं हुतवहवासवादिभेद-<br>स्त्वामेकं शरणमुपैमि देवमीशम्॥ ६२॥<br>सांख्यास्त्वां विगुणमथाहुरेकरूपं<br>योगास्त्वां सततमुपासते हृदिस्थम्।<br>वेदास्त्वामभिदधतीह रुद्रमग्निं<br>त्वामेकं शरणमुपैमि देवमीशम् ॥ ६३ ॥श्रीकृष्ण बोले— शाश्वत ! सबके मूलकारण ! आपको नमस्कार है। ऋषिलोग आपको ब्रह्माका भी अधिपति कहते हैं। संतजन तप, सत्त्व, रज एवं तमोगुण और सब कुछ आपको ही बतलाते हैं। आप ब्रह्मा, विष्णु, विश्वयोनि, अग्नि, संहर्ता और सूर्यमण्डलमें निवास करनेवाले हैं। प्राण, हुतवह (अग्नि) तथा इन्द्रादि विविध देव आप ही हैं। मैं अद्वितीय देव ईशकी शरणमें आया हूँ। सांख्यशास्त्रवाले आपको एकरूप और गुणातीत कहते हैं। योगिजन हृदयमें रहनेवाले आपकी सतत उपासना करते हैं। वेद आपको रुद्र, अग्नि नामसे कहते हैं। मैं आप ईशदेवकी शरणमें आया हूँ ॥ ६१–६३ ॥
त्वत्पादे कुसुममथापि पत्रमेकं<br>दत्त्वासौ भवति विमुक्तविश्वबन्धः।<br>सर्वाघं प्रणुदति सिद्धयोगिजुष्टं<br>स्मृत्वा ते पदयुगलं भवत्प्रसादात् ॥ ६४ ॥मनुष्य आपके चरणमें मात्र एक पुष्प अथवा एक बिल्वपत्र ही चढ़ाकर संसार-बन्धनसे विमुक्त हो जाता है। सिद्धों तथा योगियोंद्वारा सेवित आपके चरणकमलोंका स्मरणकर आपकी कृपासे मनुष्य सभी पापोंको विनष्ट कर डालता है।
यस्याशेषविभागहीनममलं हृद्यन्तरावस्थितं<br>तत्त्वं ज्योतिरनन्तमेकमचलं सत्यं परं सर्वगम्।<br>स्थानं प्राहुरनादिमध्यनिधनं यस्मादिदं जायते<br>नित्यं त्वामुपैमि सत्यविभवं विश्वेश्वरं तं शिवम्॥ ६५॥तत्त्वज्ञ लोग जिन्हें सभी प्रकारके विभागसे रहित, निर्मल, अन्तर्हृदयमें अवस्थित, ज्योति, अनन्त, अद्वितीय, अचल, सत्य, पर, सर्वव्यापी तथा आदि, मध्य और अन्तसे रहित स्थानरूप कहते हैं और यह (संसार) जिनसे उत्पन्न होता है, ऐसे आप सत्यविभव, सनातन विश्वेश्वर शिवकी शरणमें मैं आया हूँ॥ ६४-६५॥
ॐ नमो नीलकण्ठाय त्रिनेत्राय च रंहसे।<br>महादेवाय ते नित्यमीशानाय नमो नमः॥ ६६॥प्रणवरूप नीलकण्ठ, त्रिलोचन और शक्तिरूप आपको नमस्कार है। आप महादेव तथा नित्य ईशानको बार-बार नमस्कार है।
नमः पिनाकिने तुभ्यं नमो मुण्डाय दण्डिने।<br>नमस्ते वज्रहस्ताय दिग्वस्त्राय कपर्दिने ॥ ६७ ॥पिनाक नामक धनुष धारण करनेवाले आपको नमस्कार है, मुण्ड और दण्ड धारण करनेवाले आपको नमस्कार है। हाथमें वज्र धारण करनेवाले, दिशारूपी वस्त्रवाले कपर्दी (जटाधारी) आपको नमस्कार है ॥ ६६-६७॥

१६२ * कूर्मपुराण *


नमो भैरवनादाय कालरूपाय दंष्ट्रिणे।<br>नागयज्ञोपवीताय नमस्ते वह्निरेतसे॥ ६८॥भयंकर नाद करनेवाले तथा दाढ़वाले कालस्वरूप आपको नमस्कार है। नागोंको यज्ञोपवीतके रूपमें धारण करनेवाले और अग्निस্বরূপ वीर्यवाले आपको नमस्कार है। गिरीश! आपको नमस्कार है, स्वाहाकार! आपको नमस्कार है, उन्मुक्त अट्टहास करनेवाले आपको नमस्कार है और भीमरूप आपको बार-बार नमस्कार है। कामदेवका विनाश करनेवाले आपको नमस्कार है, कालका मन्थन करनेवाले आपको नमस्कार है, भयानक वेष धारण करनेवाले आपको नमस्कार है और निषङ्ग (तरकस)-धारी हरको नमस्कार है॥ ६८–७०॥
नमोऽस्तु ते गिरीशाय स्वाहाकाराय ते नमः।<br>नमो मुक्ताट्टहासाय भीमाय च नमो नमः॥ ६९॥
नमस्ते कामनाशाय नमः कालप्रमाथिने।<br>नमो भैरववेषाय हराय च निषङ्गिणे॥ ७०॥
नमोऽस्तु ते त्र्यम्बकाय नमस्ते कृत्तिवाससे।<br>नमोऽम्बिकाधिपतये पशूनां पतये नमः॥ ७१॥तीन आँखोंवाले आपको नमस्कार है, गजचर्म धारण करनेवाले आपको नमस्कार है। अम्बिकाके स्वामीको नमस्कार है और पशुपतिको नमस्कार है। आकाशरूप आपको और आकाशके अधिपति‌को नमस्कार है। नर और नारीका शरीर धारण करनेवाले अर्धनारीश्वर तथा सांख्य और योगका प्रवर्तन करनेवाले आपको नमस्कार है। देवताओंके स्वामी और देवताओं‌द्वारा आराधित लिङ्गवाले आपको नमस्कार है। कुमारके गुरु (कार्तिकेयके पिता) आपको तथा देवाधिदेव आपको नमस्कार है। यज्ञके अधिपति‌को नमस्कार है, ब्रह्मचारीको नमस्कार है। महान् मृगव्याध तथा ब्रह्माधिपति‌को नमस्कार है। हंसरूपको नमस्कार है, विश्वरूप तथा मोहित करनेवालेको बार-बार नमस्कार है। योगी, योगसे प्राप्त होने योग्य तथा योग ही जिनकी माया है ऐसे आपको नमस्कार है॥ ७१–७५॥
नमस्ते व्योमरूपाय व्योमाधिपतये नमः।<br>नरनारीशरीराय सांख्ययोगप्रवर्तिने॥ ७२॥
नमो दैवतनाथाय देवानुगतलिङ्गिने।<br>कुमारगुरवे तुभ्यं देवदेवाय ते नमः॥ ७३॥
नमो यज्ञाधिपतये नमस्ते ब्रह्मचारिणे।<br>मृगव्याधाय महते ब्रह्माधिपतये नमः॥ ७४॥
नमो हंसाय विश्वाय मोहनाय नमो नमः।<br>योगिने योगगम्याय योगमायाय ते नमः॥ ७५॥
नमस्ते प्राणपालाय घण्टानादप्रियाय च।<br>कपालिने नमस्तुभ्यं ज्योतिषां पतये नमः॥ ७६॥प्राणोंका पालन करनेवाले (प्राणिमात्रके प्राणरक्षक) और घण्टानादप्रियको नमस्कार है। कपाली आपको नमस्कार है, नक्षत्रोंके स्वामीको नमस्कार है। आपको नमस्कार है, नमस्कार है, नमस्कार है, पुनः आपको बार-बार नमस्कार है। परमेश्वर! आप मेरी अभीष्ट इच्छाओंको सभी प्रकारसे मुझे प्रदान करें॥ ७६–७७॥
नमो नमो नमस्तुभ्यं भूय एव नमो नमः।<br>मह्यं सर्वात्मना कामान् प्रयच्छ परमेश्वर॥ ७७॥
एवं हि भक्त्या देवेशमभिष्टूय स माधवः।<br>पपात पादयोर्विप्रा देवदेव्योः स दण्डवत्॥ ७८॥विप्रो! इस प्रकार वे माधव भक्तिपूर्वक देवेशकी स्तुतिकर देव और देवी अर्थात् शंकर-पार्वतीके चरणोंमें दण्डवत् गिर पड़े। मेघके समान गम्भीर ध्वनिवाले भगवान् शंकरने केशीको मारनेवाले कृष्णको उठाकर मधुर वचन कहा—॥ ७८–७९॥
उत्थाप्य भगवान् सोमः कृष्णं केशिनिषूदनम्।<br>बभाषे मधुरं वाक्यं मेघगम्भीरनिःस्वनः॥ ७९॥
  • अध्याय २४ * १६३

किमर्थं पुण्डरीकाक्ष तपस्तप्तं त्वयाव्यय।
त्वमेव दाता सर्वेषां कामानां कामिनामिह ॥ ८० ॥

त्वं हि सा परमा मूर्त्तिर्मम नारायणाह्वया।
नानवाप्तं त्वया तात विद्यते पुरुषोत्तम ॥ ८१ ॥

वेत्थ नारायणानन्तमात्मानं परमेश्वरम्।
महादेवं महायोगं स्वेन योगेन केशव ॥ ८२ ॥

श्रुत्वा तद्वचनं कृष्णः प्रहसन् वै वृषध्वजम्।
उवाच वीक्ष्य विश्वेशं देवीं च हिमशैलजाम् ॥ ८३ ॥

ज्ञातं हि भवता सर्वं स्वेन योगेन शंकर।
इच्छाम्यात्मसमं पुत्रं त्वद्भक्तं देहि शंकर ॥ ८४ ॥

तथास्त्वित्याह विश्वात्मा प्रहृष्टमनसा हरः।
देवीमालोक्य गिरिजां केशवं परिषस्वजे ॥ ८५ ॥

ततः सा जगतां माता शंकरार्धशरीरिणी।
व्याजहार हृषीकेशं देवी हिमगिरीन्द्रजा ॥ ८६ ॥

वत्स जाने तवानन्तां निश्चलां सर्वदाच्युत।
अनन्यामीश्वरे भक्तिमात्मन्यपि च केशव ॥ ८७ ॥

त्वं हि नारायणः साक्षात् सर्वात्मा पुरुषोत्तमः।
प्रार्थितो दैवतैः पूर्वं संजातो देवकीसुतः ॥ ८८ ॥

पश्य त्वमात्मनात्मानमात्मीयममलं पदम्।
नावयोर्विद्यते भेद एकं पश्यन्ति सूरयः ॥ ८९ ॥

इमानिमान् वरानिष्टान् मत्तो गृह्णीष्व केशव।
सर्वज्ञत्वं तथैश्वर्यं ज्ञानं तत् पारमेश्वरम्।
ईश्वरे निश्चलां भक्तिमात्मन्यपि परं बलम् ॥ ९० ॥

एवमुक्तस्तया कृष्णो महादेव्या जनार्दनः।
आशिषं शिरसागृह्लाद् देवोऽप्याह महेश्वरः ॥ ९१ ॥

प्रगृह्य कृष्णं भगवानथेशः
करेण देव्या सह देवदेवः।
सम्पूज्यमानो मुनिभिः सुरैश्र्च-
र्जगाम कैलासगिरिं गिरीशः ॥ ९२ ॥


पुण्डरीकाक्ष! अव्यय! आपने तप क्यों किया है। (क्योंकि) आप ही कामना करनेवालोंकी सभी कामनाओंको पूर्ण करनेवाले हैं। आप ही मेरी नारायण नामवाली परम मूर्त्ति हैं। पुरुषोत्तम! तात! आपके लिये कुछ भी अप्राप्य नहीं है। केशव! अपने योगद्वारा आप अपनेको नारायण, अनन्त, परमेश्वर, महादेव और महायोगी जानें ॥ ८०-८२ ॥

उनका वह वचन सुनकर हँसते हुए श्रीकृष्णने विश्वेश्वर तथा हिमालय-पुत्री देवी पार्वतीकी ओर देखकर वृषध्वज शंकरसे कहा—प्रभो शंकर! आपको अपने योगद्वारा सब कुछ ज्ञात है। मैं अपने ही समान ऐसा पुत्र चाहता हूँ, जो आपका भक्त हो, श्रीशंकर! आप मुझे प्रदान करें। प्रसन्न-मन होकर विश्वात्मा हरने 'तथास्तु' ऐसा कहकर और देवी पार्वतीकी ओर देखकर केशवका आलिङ्गन किया ॥ ८३-८५ ॥

तदनन्तर शंकरके आधे शरीरमें स्थित, संसारकी माता हिमालय पर्वतकी पुत्री देवी (पार्वती) हृषीकेशसे बोलीं। अच्युत! केशव! वत्स! मैं ईश्वर (शंकर)-में तथा मुझमें भी सर्वदा रहनेवाली आपकी अनन्त, निश्चल और अनन्य भक्तिको जानती हूँ। आप ही साक्षात् नारायण और सर्वात्मा पुरुषोत्तम हैं। पूर्वकालमें देवताओंके द्वारा प्रार्थना किये जानेपर आप देवकीके पुत्रके रूपमें उत्पन्न हुए थे। आप अपने आत्मरूपको तथा अपने निर्मल पदको स्वयं देखें। हम दोनोंमें कोई भेद नहीं है। विद्वान् लोग (हम दोनोंको) एक रूपसे देखते हैं। केशव! आप इन अभीष्ट वरोंको मुझसे ग्रहण करें। आपको सर्वज्ञता, ऐश्वर्य, वह परमेश्वर-सम्बन्धी ज्ञान, शिवमें निश्चल भक्ति तथा अपनेमें श्रेष्ठ बल प्राप्त हो ॥ ८६-९० ॥

उन महादेवीके द्वारा ऐसा कहे जानेपर जनार्दन कृष्णने उनके (वररूपी) आशीर्वादको शिरोधार्य किया। देव महेश्वरने भी कृष्णसे ऐसा ही कहा अर्थात् आशीर्वाद प्रदान किया। तब देवताओं तथा मुनियोंसे पूजित होते हुए देवाधिदेव गिरीश भगवान् शंकर कृष्णका हाथ पकड़कर देवी पार्वतीके साथ कैलास पर्वतपर चले गये ॥ ९१-९२ ॥

इति श्रीकूर्मपुराणे षट्‌साहस्र्यां संहितायां पूर्वविभागे चतुर्विंशोऽध्यायः ॥ २४ ॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें चौबीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ २४ ॥

१६४ | * कूर्मपुराण *


पचीसवाँ अध्याय

श्रीकृष्णका कैलास पर्वतपर विहार करना, श्रीकृष्णको द्वारका बुलानेके लिये गरुडका कैलासपर जाना, श्रीकृष्णका द्वारका-आगमन, द्वारकामें श्रीकृष्णका स्वागत तथा उनका दर्शन करनेके लिये देवताओं तथा मार्कण्डेय आदि मुनियोंका आना, कृष्णके द्वारा महर्षि मार्कण्डेयको शिव-तत्त्व तथा लिङ्ग-तत्त्वका माहात्म्य बतलाना तथा स्वयं शिवका पूजन करना, ब्रह्मा-विष्णुद्वारा शिवके महालिङ्गका दर्शन तथा लिङ्गस्तुति, लिङ्गार्चनका प्रवर्तन


सूत उवाचसूतजी बोले—
प्रविश्य मेरुशिखरं कैलासं कनकप्रभम्।<br>रराम भगवान् सोमः केशवेन महेश्वरः॥ १ ॥मेरु शिखरके स्वर्णिम कैलास पर्वतपर पहुँचकर महेश्वर भगवान् शंकर केशव (श्रीकृष्ण)-के साथ विहार करने लगे। कैलास पर्वतपर निवास करनेवालोंने उन देवाधिदेव, अच्युत, महात्मा श्रीकृष्णको देखकर उनकी पूजा की। उन्होंने चार भुजावाले, उदार अङ्गोंवाले, प्रलयकालीन मेघके समान प्रभाववाले, मुकुटधारी, हाथमें धनुष धारण किये, श्रीवत्ससे सुशोभित वक्षःस्थलवाले, दीर्घ भुजावाले, विशाल नेत्रोंवाले, पीताम्बर धारण किये, वक्षःस्थलपर उत्तम वैजयन्तीकी माला धारण किये, शोभासे सुशोभित दिव्य अति कोमल, युवावस्थावाले, कमल (वर्ण)-के समान (रक्त) चरण एवं नेत्रवाले, अत्यन्त सुन्दर, मुसकराते हुए अच्छी गति प्रदान करनेवाले अच्युत (श्रीकृष्ण)-की पूजा की॥ १-५॥
अपश्यंस्तं महात्मानं कैलासगिरिवासिनः।<br>पूजयाञ्चक्रिरे कृष्णं देवदेवमथाच्युतम्॥ २ ॥
चतुर्बाहुमुदाराङ्गं कालमेघसमप्रभम्।<br>किरीटिनं शार्ङ्गपाणिं श्रीवत्साङ्कितवक्षसम्॥ ३ ॥
दीर्घबाहुं विशालाक्षं पीतवाससमच्युतम्।<br>दधानमुरसा मालां वैजयन्तीमनुत्तमाम्॥ ४ ॥
भ्राजमानं श्रिया दिव्यं युवानमतिकोमलम्।<br>पद्माङ्घ्रिनयनं चारु सुस्मितं सुगतिप्रदम्॥ ५ ॥
कदाचित् तत्र लीलार्थं देवकीनन्दवर्धनः।<br>भ्राजमानः श्रिया कृष्णश्चचार गिरिकन्दरे॥ ६ ॥वहाँ किसी समय माता देवकीके आनन्दको बढ़ानेवाले शोभासम्पन्न श्रीकृष्ण लीलाके निमित्त कैलास पर्वतकी गुहामें विचरण करने लगे। सभी प्रमुख गन्धर्वों, अप्सराओं, नागकन्याओं, सिद्धों, यक्षों तथा गन्धर्वोंने वहाँ उन जगन्मय (श्रीकृष्ण)-को देखा और परम आश्चर्यचकित होकर वे आनन्दसे प्रफुल्लित नेत्रवाले हो गये तथा उन महात्माके मस्तकपर पुष्पोंकी वर्षा करने लगे। दिव्य गन्धर्वोंकी कन्याएँ तथा उसी प्रकार श्रेष्ठ अप्सराएँ कृष्णको देखकर अव्यवस्थित वस्त्राभूषणवाली होकर उनकी कामना करने लगीं। गायनमें पारंगत कुछ सुन्दरियाँ काममोहित होकर देवकीपुत्रकी ओर देखकर विविध प्रकारके गीत गाने लगीं॥ ६-१०॥
गन्धर्वाप्सरसां मुख्या नागकन्याश्च कृत्स्नशः।<br>सिद्धा यक्षाश्च गन्धर्वास्तत्र तत्र जगन्मयम्॥ ७ ॥
दृष्ट्वाश्चर्यं परं गत्वा हर्षादुत्फुल्ललोचनाः।<br>मुमुचुः पुष्पवर्षाणि तस्य मूर्ध्नि महात्मनः॥ ८ ॥
गन्धर्वकन्यका दिव्यास्तद्वदप्सरसां वराः।<br>दृष्ट्वा चकमिरे कृष्णं स्रस्तवस्त्रविभूषणाः॥ ९ ॥
काश्चिद् गायन्ति विविधां गीतिं गीतविशारदाः।<br>सम्प्रेक्ष्य देवकीसूनुं सुन्दर्यः काममोहिताः॥ १०॥
काश्चिद्विलासबहुला नृत्यन्ति स्म तदग्रतः।<br>सम्प्रेक्ष्य संस्थिताः काश्चित् पपुस्तद्वदनामृतम्॥ ११ ॥कुछ अत्यन्त विलासप्रिय (कन्याएँ) उनके आगे नृत्य करने लगीं और कुछ वहीं स्थित होकर उनकी ओर देखकर उनके वदनामृतका पान करने लगीं॥ ११॥
* अध्याय २५ *१६५
काश्चिद् भूषणवर्याणि स्वाङ्गादादाय सादरम्।<br>भूषयाञ्चक्रिरे कृष्णं कामिन्यो लोकभूषणम्॥ १२॥<br><br>काश्चिद् भूषणवर्याणि समादाय तदङ्गतः।<br>स्वात्मानं भूषयामासुः स्वात्मगैरपि माधवम्॥ १३॥<br><br>काश्चिदागत्य कृष्णस्य समीपं काममोहिताः।<br>चुचुम्बुर्वदनाम्भोजं हरेर्मुग्धमृगेक्षणाः॥ १४॥<br><br>प्रगृह्य काश्चिद् गोविन्दं करेण भवनं स्वकम्।<br>प्रापयामासुर्लोकादिं मायया तस्य मोहिताः॥ १५॥<br><br>तासां स भगवान् कृष्णः कामान् कमलोचनः।<br>बहूनि कृत्वा रूपाणि पूरयामास लीलया॥ १६॥<br><br>एवं वै सुचिरं कालं देवदेवपुरे हरिः।<br>रेमे नारायणः श्रीमान् मायया मोहयज्जगत्॥ १७॥<br><br>गते बहुतिथे काले द्वारवत्यां निवासिनः।<br>बभूवुर्विह्वला भीता गोविन्दविरहे जनाः॥ १८॥<br><br>ततः सुपर्णो बलवान् पूर्वमेव विसर्जितः।<br>कृष्णेन मार्गमाणस्तं हिमवन्तं ययौ गिरिम्॥ १९॥<br><br>अदृष्ट्वा तत्र गोविन्दं प्रणम्य शिरसा मुनिम्।<br>आजगामोपमन्युं तं पुरीं द्वारवतीं पुनः॥ २०॥<br><br>तदन्तरे महादैत्या राक्षसाश्चातिभीषणाः।<br>आजग्मुर्द्वारकां शुभ्रां भीषयन्तः सहस्रशः॥ २१॥<br><br>स तान् सुपर्णो बलवान् कृष्णतुल्यपराक्रमः।<br>हत्वा युद्धेन महता रक्षति स्म पुरीं शुभाम्॥ २२॥<br><br>एतस्मिन्नेव काले तु नारदो भगवानृषिः।<br>दृष्ट्वा कैलासशिखरे कृष्णं द्वारवतीं गतः॥ २३॥<br><br>तं दृष्ट्वा नारदमृषिं सर्वे तत्र निवासिनः।<br>प्रोचुर्नारायणो नाथः कुत्रास्ते भगवान् हरिः॥ २४॥<br><br>स तानुवाच भगवान् कैलासशिखरे हरिः।<br>रमतेऽद्य महायोगिन् तं दृष्ट्वाहमिहागतः॥ २५॥<br><br>तस्योपश्रुत्य वचनं सुपर्णः पततां वरः।<br>जगामाकाशगो विप्राः कैलासं गिरिमुत्तमम्॥ २६॥<br><br>ददर्श देवकीसूनुं भवने रत्नमण्डिते।<br>वरासनस्थं गोविन्दं देवदेवान्तिके हरिम्॥ २७॥<br><br>उपास्यमानममरैर्दिव्यस्त्रीभिः समन्ततः।<br>महादेवगणैः सिद्धैर्योगिभिः परिवारितम्॥ २८॥कुछ कामिनियाँ (कन्याएँ) अपने अङ्गोंसे श्रेष्ठ आभूषणोंको उतारकर उनसे लोकभूषण कृष्णको आदरपूर्वक आभूषित करने लगीं। कुछ उनके अङ्गोंसे श्रेष्ठ आभूषणोंको लेकर अपनेको तथा अपने आभूषणोंसे माधवको सजाने लगीं। कतिपय मुग्ध मृगके समान नयनोंवाली काम-मोहित (कन्याएँ) हरि कृष्णके समीपमें जाकर उनके मुखकमलका स्पर्श करने लगीं। उनकी मायासे मोहित कुछ अप्सराएँ लोकोंके आदि कारण गोविन्दका हाथ पकड़कर उन्हें अपने भवनमें ले गयीं॥ १२-१५॥<br><br>उन कमललोचन भगवान् श्रीकृष्णने बहुतसे रूप धारणकर लीलापूर्वक उनकी अभीष्ट कामनाओंकी पूर्ति की। इस प्रकार श्रीमान् नारायण हरिने संसारको (अपनी) मायासे मोहित करते हुए देवाधिदेव शंकरके नगरमें बहुत समयतक रमण किया॥ १६-१७॥<br><br>बहुत दिन व्यतीत होनेपर द्वारिकापुरीके रहनेवाले लोग गोविन्दके विरहमें भयभीत एवं विह्वल हो गये। तब पहले कृष्णद्वारा छोड़ दिये गये बलवान् गरुड उनको ढूँढ़ते हुए उस हिमालय पर्वतपर गये। वहाँ गोविन्दको न देखकर उन उपमन्युको विनयपूर्वक प्रणामकर पुनः द्वारवतीपुरीमें लौट आये। इसी बीच अत्यन्त भयंकर हजारों महादैत्य तथा राक्षस भय उत्पन्न करते हुए सुन्दर द्वारकामें आ पहुँचे। कृष्णके समान पराक्रमवाले बलवान् सुपर्ण (गरुड)-ने महान् युद्धद्वारा उन्हें मारकर उस शुभ पुरीकी रक्षा की॥ १८-२२॥<br><br>इसी समय भगवान् नारद ऋषि कैलास शिखरपर श्रीकृष्णका दर्शनकर द्वारकापुरीमें गये। उन नारद ऋषिको देखकर वहाँ (द्वारकामें) निवास करनेवाले सभीने पूछा—'नारायण, नाथ, भगवान् हरि कहाँ हैं?' उन्होंने (नारदने) उनसे कहा कि भगवान् हरि कैलास शिखरपर रमण कर रहे हैं, मैं उन महायोगीको देखकर आज यहाँ आया हूँ॥ २३-२५॥<br><br>विप्रो! उनका वचन सुनकर आकाशमें चलनेवाले पक्षियोंमें श्रेष्ठ वे गरुड श्रेष्ठ पर्वत कैलासपर गये। उन्होंने देवकीपुत्र गोविन्द हरिको देवाधिदेव (शंकर)-के समीप रत्नमण्डित भवनमें एक श्रेष्ठ आसनपर विराजमान देखा। (वहाँ) देवता, दिव्य स्त्रियाँ, महादेवके गण, सिद्ध तथा योगीजन चारों ओरसे घेरकर उनकी उपासना कर रहे थे॥ २६-२८॥

१६६ * कूर्मपुराण *

प्रणम्य दण्डवद् भूमौ सुपर्णः शंकरं शिवम्। निवेदयामास हरेः प्रवृत्तिं द्वारके पुरे॥ २९॥

ततः प्रणम्य शिरसा शंकरं नीललोहितम्। आजगाम पुरीं कृष्णः सोऽनुज्ञातो हरेण तु॥ ३०॥

आरुह्य कश्यपसुतं स्त्रीगणैरभिपूजितः। वचोभिरमृतास्वादैर्मानितो मधुसूदनः॥ ३१॥

वीक्ष्य यान्तममित्रघ्नं गन्धर्वाप्सरसां वराः। अन्वगच्छन् महायोगिन् शङ्खचक्रगदाधरम्॥ ३२॥

विसर्जयित्वा विश्वात्मा सर्वा एवाङ्गना हरिः। ययौ स तूर्णं गोविन्दो दिव्यां द्वारवतीं पुरीम्॥ ३३॥

गते मुररिपौ नैव कामिन्यो मुनिपुङ्गवाः। निशेव चन्द्ररहिता विना तेन चकाशिरे॥ ३४॥

श्रुत्वा पौरजनास्तूर्णं कृष्णागमनमुत्तमम्। मण्डयाञ्चक्रिरे दिव्यां पुरीं द्वारवतीं शुभाम्॥ ३५॥

पताकाभिर्विशालाभिर्ध्वजै रत्नपरिष्कृतैः। लाजादिभिः पुरीं रम्यां भूषयाञ्चक्रिरे तदा॥ ३६॥

अवादयन्त विविधान् वादित्रान् मधुरस्वनान्। शङ्खान् सहस्त्रशो दध्मुर्वीणावादान् वितेनिरे॥ ३७॥

प्रविष्टमात्रे गोविन्दे पुरीं द्वारवतीं शुभाम्। अगायन् मधुरं गानं स्त्रियो यौवनशालिनः॥ ३८॥

दृष्ट्वा ननृतुरीशानं स्थिताः प्रासादमूर्धसु। मुमुचुः पुष्पवर्षाणि वसुदेवसुतोपरि॥ ३९॥

प्रविश्य भवनं कृष्ण आशीर्वादाभिवर्धितः। वरासने महायोगी भाति देवीभिरन्वितः॥ ४०॥

सुरम्ये मण्डपे शुभ्रे शङ्खाद्यैः परिवारितः। आत्मजैरभितो मुख्यैः स्त्रीसहस्त्रैश्च संवृतः॥ ४१॥

तत्रासनवरे रम्ये जाम्बवत्या सहाच्युतः। भ्राजते मालया देवो यथा देव्या समन्वितः॥ ४२॥

आजग्मुर्देवगन्धर्वा द्रष्टुं लोकादिमव्ययम्। महर्षयः पूर्वजाता मार्कण्डेयादयो द्विजाः॥ ४३॥

ततः स भगवान् कृष्णो मार्कण्डेयं समागतम्। ननामोत्थाय शिरसा स्वासनं च ददौ हरिः॥ ४४॥

गरुडने कल्याणकारी शंकरको भूमिपर दण्डवत् प्रणाम किया और द्वारकापुरीका समाचार हरिसे निवेदन किया। तदनन्तर नीललोहित शंकरको विनयपूर्वक प्रणामकर और उन हरकी आज्ञा प्राप्तकर स्त्रीसमूहोंद्वारा पूजित और अमृतके समान मधुर स्वादुयुक्त वचनोंसे सत्कृत वे मधुसूदन श्रीकृष्ण कश्यपपुत्र गरुडपर आरूढ होकर अपनी पुरीको चले। शंख, चक्र तथा गदाधारी शत्रुहन्ता महायोगीको जाते हुए देखकर गन्धर्व तथा श्रेष्ठ अप्सराओंने उनका अनुगमन किया। विश्वात्मा गोविन्द हरि उन सभी अङ्गनाओंको विदाकर शीघ्र ही उस दिव्य पुरी द्वारवतीको गये॥ २९–३३॥

मुनिश्रेष्ठो! उन मुरारिके चले जानेपर वे कामिनियाँ चन्द्रमारहित रात्रिके समान शोभाहीन हो गयीं। पुरवासियोंने श्रीकृष्णके आगमनके शुभ समाचारको सुनकर शीघ्र दिव्य एवं मङ्गलमयी द्वारवती पुरीको सुसज्जित किया। श्रीकृष्णके आगमनसे अति प्रसन्न द्वारकावासियोंने विशाल पताकाओं और रत्नोंसे जटित ध्वजों तथा लाजा आदि माङ्गलिक वस्तुओंसे सुन्दर पुरीको सजा दिया। मधुर स्वरवाले विविध वाद्यों, हजारों शंखों तथा वीणाओंको वे लोग बजाने लगे। गोविन्दके शुभपुरी द्वारवतीमें प्रवेश करते ही युवती स्त्रियाँ मधुर स्वरमें गान करने लगीं। उन ईशान (कृष्ण)-को देखकर वे नृत्य करने लगीं और महलोंके ऊपर स्थित स्त्रियाँ वसुदेवपुत्र श्रीकृष्णके ऊपर फूल बरसाने लगीं॥ ३४–३९॥

भवनमें प्रवेशकर महायोगी कृष्ण आशीर्वादोंसे अभिनन्दित होते हुए अत्यन्त रमणीय शुक्लवर्णके मण्डपमें स्थित एक श्रेष्ठ आसनपर अपनी पत्नियोंके साथ सुशोभित हुए। वे चारों ओरसे शङ्ख आदि प्रमुख पुत्रों तथा हजारों स्त्रियोंसे घिरे हुए थे॥ ४०-४१॥

वैजयन्ती मालासे विभूषित उस रमणीय श्रेष्ठ आसनपर अच्युत श्रीकृष्ण जाम्बवतीके साथ उसी प्रकार सुशोभित हुए जैसे देवी उमाके साथ महादेव। ब्राह्मणो! उन अव्यय तथा लोकोंके आदि कारण (श्रीकृष्ण)-का दर्शन करनेके लिये देवता, गन्धर्व और पूर्वज मार्कण्डेय आदि महर्षि वहाँ आये। तब उन भगवान् श्रीकृष्ण हरिने मार्कण्डेयजीको आया देखकर आसनसे उठकर विनयपूर्वक प्रणाम किया और उन्हें आसन दिया॥ ४२-४४॥

* अध्याय २५ *१६७

| सम्पूज्य तानृषिगणान् प्रणामेन महाभुजः ।<br>विसर्जयामास हरिर्दत्त्वा तदभिवाञ्छितान् ॥ ४५ ॥ | लम्बी भुजाओंवाले हरिने प्रणामके द्वारा उन ऋषिगणोंकी पूजा करके और उनके मनोरथोंको प्रदान करके उन्हें विदा किया ॥ ४५ ॥ | | तदा मध्याह्नसमये देवदेवः स्वयं हरिः।<br>स्नात्वा शुक्लाम्बरो भानुमुपातिष्ठत् कृताञ्जलिः ॥ ४६ ॥ | तदनन्तर मध्याह्नकालमें स्वयं देवाधिदेव हरिने स्नानकर शुक्ल वस्त्र धारण किये और हाथ जोड़कर सूर्यकी आराधना की। दिवाकर सूर्यकी ओर देखते हुए उन्होंने | | जजाप जाप्यं विधिवत् प्रेक्षमाणो दिवाकरम् ।<br>तर्पयामास देवेशो देवान् मुनिगणान् पितॄन् ॥ ४७ ॥ | विधिपूर्वक मन्त्रोंका जप किया। उन देवेश्वरने देवताओं, मुनिगणों और पितरोंका तर्पण किया ॥ ४६-४७ ॥ | | प्रविश्य देवभवनं मार्कण्डेयेन चैव हि।<br>पूजयामास लिङ्गस्थं भूतेशं भूतिभूषणम् ॥ ४८ ॥ | (मुनि) मार्कण्डेयके साथ देवमन्दिरमें प्रवेशकर उन्होंने लिङ्गमें प्रतिष्ठित भस्मविभूषित भूतेश्वर (श्रीशंकर)-की पूजा की। मनुष्योंके नियामक उन्होंने स्वयं सभी | | समाप्य नियमं सर्वं नियन्तासौ नृणां स्वयम् ।<br>भोजयित्वा मुनिवरं ब्राह्मणानभिपूज्य च ॥ ४९ ॥ | नियमोंको पूर्णकर ब्राह्मणोंकी पूजा की और मुनीश्वर (मार्कण्डेय)-को भोजन कराया। विप्रेन्द्रो! तदुपरान्त | | कृत्वात्मयोगं विप्रेन्द्रा मार्कण्डेयेन चाच्युतः ।<br>कथाः पौराणिकीः पुण्याश्चक्रे पुत्रादिभिर्वृतः ॥ ५० ॥ | पुत्रों आदिसे घिरे हुए अच्युतने आत्मनिष्ठ होकर मार्कण्डेयजीसे पुराणोंकी पुण्यदायिनी कथाको सुना। | | अथैतत् सर्वमखिलं दृष्ट्वा कर्म महामुनिः ।<br>मार्कण्डेयो हसन् कृष्णं बभाषे मधुरं वचः ॥ ५१ ॥ | इन सारे कर्मोंको देखकर महामुनि मार्कण्डेयने श्रीकृष्णसे हँसते हुए मधुर वचन कहा— ॥ ४८-५१ ॥ | | मार्कण्डेय उवाच | मार्कण्डेयजी बोले—(देव!) कर्मोंद्वारा आपकी | | कः समाराध्यते देवो भवता कर्मभिः शुभैः ।<br>ब्रूहि त्वं कर्मभिः पूज्यो योगिनां ध्येय एव च ॥ ५२ ॥ | ही पूजा की जाती है और योगियोंके ध्येय भी आप ही हैं, फिर आप शुभ कर्मोंके द्वारा किस देवताकी आराधना कर रहे हैं, यह मुझे बतलायें। आप ही वे | | त्वं हि तत् परमं ब्रह्म निर्वाणममलं पदम् ।<br>भारावतरणार्थाय जातो वृष्णिकुले प्रभुः ॥ ५३ ॥ | परम ब्रह्म हैं, निर्वाणरूप हैं और निर्मल पद हैं। (पृथ्विका) भार उतारनेके लिये आप प्रभु ही वृष्णिकुलमें अवतरित हुए हैं। सभी पुत्रोंके सुनते हुए ही | | तमब्रवीन्महाबाहुः कृष्णो ब्रह्मविदां वरः ।<br>शृण्वतामेव पुत्राणां सर्वेषां प्रहसन्निव ॥ ५४ ॥ | ब्रह्मज्ञानियोंमें श्रेष्ठ महाबाहु कृष्णने उनसे (मार्कण्डेयजीसे) हँसते हुए कहा— ॥ ५२-५४ ॥ | | श्रीभगवानुवाच | **श्रीभगवान्‌ने कहा—**आपने जो कुछ भी कहा, सब | | भवता कथितं सर्वं तथ्यमेव न संशयः ।<br>तथापि देवमीशानं पूजयामि सनातनम् ॥ ५५ ॥ | सत्य ही कहा है, इसमें संशय नहीं है तथापि मैं सनातनदेव ईशान (शंकर)-की पूजा करता हूँ। विप्र! मुझे न तो | | न मे विप्रास्ति कर्तव्यं नानवाप्तं कथञ्चन ।<br>पूजयामि तथापीशं जानन्नेतत् परं शिवम् ॥ ५६ ॥ | कुछ करना है और न मुझे कुछ अप्राप्त है, फिर भी यह जानते हुए भी मैं परम शिव ईशकी पूजा करता हूँ। मायासे | | न वै पश्यन्ति तं देवं मायया मोहिता जनाः ।<br>ततोऽहं स्वात्मनो मूलं ज्ञापयन् पूजयामि तम् ॥ ५७ ॥ | मोहित लोग उन देव (शंकर)-का साक्षात्कार नहीं कर पाते। परंतु मैं अपने मूलका* परिचय देते हुए उनकी पूजा करता हूँ। इस संसारमें लिङ्गार्चनसे अधिक कोई | | न च लिङ्गार्चनात् पुण्यं लोकेऽस्मिन् भीतिनाशनम् ।<br>तथा लिङ्गे हितायैषां लोकानां पूजयेच्छिवम् ॥ ५८ ॥ | पुण्य और भयका नाश करनेवाला (कर्म) नहीं है। अतः इन लोकों (प्राणिमात्र)-के कल्याणके लिये लिङ्गमें शिवकी पूजा करनी चाहिये ॥ ५५-५८ ॥ |


* मेरे भी मूल (सर्वाधिष्ठान) महादेव शंकर ही हैं—यह सबको बतानेके लिये मैं लिङ्गस्वरूप भगवान् शंकरकी पूजा करता हूँ।

१६८* कूर्मपुराण *
योऽहं तल्लिङ्गमित्याहुर्वेदवादविदो जनाः।<br>ततोऽहमात्ममीशानं पूजयाम्यात्मनैव तु ॥ ५९ ॥<br><br>तस्यैव परमा मूर्तिस्तन्मयोऽहं न संशयः।<br>नावयोर्विद्यते भेदो वेदेष्वेवं विनिश्चयः ॥ ६० ॥<br><br>एष देवो महादेवः सदा संसारभीरुभिः।<br>ध्येयः पूज्यश्च वन्द्यश्च ज्ञेयो लिङ्गे महेश्वरः ॥ ६१ ॥वैदिक सिद्धान्तोंको जाननेवाले लोग इस लिङ्गको मेरा ही स्वरूप कहते हैं। इसीलिये मैं स्वयमेव आत्मस्वरूप ईशानका पूजन करता हूँ। मैं उन्हीं (शंकर)-की परम मूर्ति हूँ, मैं शिवस्वरूप ही हूँ, इसमें कोई संदेह नहीं। वेदोंमें ऐसा ही निश्चय किया गया है कि हम दोनोंमें कोई भेद विद्यमान नहीं है। संसारसे भयभीत लोगोंको इन देव महादेवका सदा ध्यान, पूजन और वन्दन करना चाहिये तथा लिङ्गमें महेश्वरको सदा प्रतिष्ठित समझना चाहिये॥ ५९—६१॥
मार्कण्डेय उवाच<br>किं तल्लिङ्गं सुरश्रेष्ठ लिङ्गे सम्पूज्यते च कः।<br>ब्रूहि कृष्ण विशालाक्ष गहनं ह्येतदुत्तमम् ॥ ६२ ॥श्रीमार्कण्डेयजीने पूछा—विशाल नेत्रोंवाले देवश्रेष्ठ कृष्ण! आप इस गूढ़ एवं श्रेष्ठ विषयको बतलायें कि लिङ्ग क्या है और लिङ्गमें किसकी पूजा होती है? ॥ ६२ ॥
श्रीभगवानुवाच<br>अव्यक्तं लिङ्गमित्याहुरानन्दं ज्योतिरक्षरम्।<br>वेदा महेश्वरं देवमाहुर्लिङ्गिनमव्ययम् ॥ ६३ ॥<br><br>पुरा चैकार्णवे घोरे नष्टे स्थावरजङ्गमे।<br>प्रबोधार्थं ब्रह्मणो मे प्रादुर्भूतः स्वयं शिवः ॥ ६४ ॥<br><br>तस्मात् कालात् समारभ्य ब्रह्मा चाहं सदैव हि।<br>पूजयावो महादेवं लोकानां हितकाम्यया ॥ ६५ ॥श्रीभगवान्ने कहा—ज्योतिःस्वरूप, अक्षर, अव्यक्त आनन्दको लिङ्ग* कहा गया है और वेद महेश्वरदेवको अव्यय तथा लिङ्ग धारण करनेवाला कहते हैं। प्राचीन कालमें जब सर्वत्र जल-ही-जल एकार्णव हो गया और स्थावर-जङ्गम सब नष्ट हो गया, तब ब्रह्मा तथा मुझे प्रबोधित करनेके लिये उसी एकार्णवमें शिवका प्रादुर्भाव हुआ। उसी समयसे लोकोंके कल्याणकी कामनासे ब्रह्मा तथा मैं दोनों ही सदा महादेवकी पूजा करते हैं॥ ६३—६५॥
मार्कण्डेय उवाच<br>कथं लिङ्गमभूत् पूर्वमैश्वरं परमं पदम्।<br>प्रबोधार्थं स्वयं कृष्ण वक्तुमर्हसि साम्प्रतम् ॥ ६६ ॥श्रीमार्कण्डेयजी बोले—श्रीकृष्ण! अब आप यह बतलायें कि पूर्वकालमें आप लोगोंको ज्ञान देनेके लिये वह ईश्वरका परम पदरूप लिङ्ग किस प्रकार स्वयं प्रकट हुआ॥ ६६॥
श्रीभगवानुवाच<br>आसीदेकार्णवं घोरमविभागं तमोमयम्।<br>मध्ये चैकार्णवे तस्मिन् शङ्खचक्रगदाधरः ॥ ६७ ॥<br><br>सहस्रशीर्षा भूत्वाहं सहस्राक्षः सहस्रपात्।<br>सहस्रबाहुर्युक्तात्मा शयितोऽहं सनातनः ॥ ६८ ॥<br><br>एतस्मिन्नन्तरे दूरात् पश्यामि ह्यमितप्रभम्।<br>कोटिसूर्यप्रतीकाशं भ्राजमानं श्रियावृतम् ॥ ६९ ॥<br><br>चतुर्वक्त्रं महायोगिन् पुरुषं काञ्चनप्रभम्।<br>कृष्णाजिनधरं देवमृग्यजुःसामभिः स्तुतम् ॥ ७० ॥श्रीभगवान्ने कहा—(प्रलयकालमें) विभाग-रहित, तमोमय भयंकर एकमात्र समुद्र (एकार्णव) ही था। उस एकार्णवके मध्यभागमें शंख, चक्र, गदा धारण करनेवाला युक्तात्मा सनातन मैं हजारों सिर, हजारों आँख, हजारों चरण, हजारों बाहुवाला होकर शयन कर रहा था। इसी बीच मैंने दूर स्थित अमित प्रभाववाले, करोड़ों सूर्यके समान प्रकाशमान, शोभासम्पन्न, कृष्णमृगका चर्म धारण किये हुए, ऋक्, यजुः तथा सामवेदद्वारा स्तुत...

* लिङ्गका अर्थ है कारण। यहाँ प्रसंगानुसार लिङ्गका अर्थ मूल कारण है। मूल कारण परमेश्वर ही हैं। वे ज्योतिःस्वरूप अक्षर एवं आनन्दस्वरूप हैं, इसीलिये यहाँ लिङ्गको ज्योतिःस्वरूप, आनन्दरूप कहा है।

* अध्याय २५ *१६९
निमेषमात्रेण स मां प्राप्तो योगविदां वरः।<br>व्याजहार स्वयं ब्रह्मा स्मयमानो महाद्युतिः॥ ७१ ॥स्तुत हो रहे काञ्चनके समान आभावाले महायोगी चतुर्मुख देव पुरुषको देखा। क्षणभरमें ही वे योगज्ञानियोंमें श्रेष्ठ, महाद्युति ब्रह्मा मुसकराते हुए स्वयं मेरे पास आये और कहने लगे- ॥ ६७-७१ ॥
कस्त्वं कुतो वा किं चेह तिष्ठसे वद मे प्रभो।<br>अहं कर्ता हि लोकानां स्वयम्भूः प्रपितामहः॥ ७२ ॥प्रभो! मुझे बतलायें कि आप कौन हैं, कहाँसे आये हैं और किस कारणसे यहाँ स्थित हैं। मैं लोकोंका निर्माण करनेवाला स्वयम्भू प्रपितामह (ब्रह्मा) हूँ। उन ब्रह्माके द्वारा ऐसा कहे जानेपर मैंने उनसे (ब्रह्मासे) कहा-मैं पुनः-पुनः लोकोंकी सृष्टि करनेवाला हूँ और मैं ही संहार करनेवाला हूँ। परमेष्ठीकी मायाके कारण इस प्रकारका विवाद बढ़नेपर (हम लोगोंको) यथार्थ स्थितिका ज्ञान करानेके लिये (उस समय) शिवरूप परम लिङ्ग प्रादुर्भूत हुआ। वह लिङ्ग प्रलय-कालीन अग्निके समान अनेक ज्वालामालाओंसे व्याप्त, क्षय एवं वृद्धिसे मुक्त और आदि, मध्य तथा अन्तसे रहित था॥ ७२-७५ ॥
एवमुक्तस्तदा तेन ब्राह्मणामहुवाच ह।<br>अहं कर्तास्मि लोकानां संहर्ता च पुनः पुनः॥ ७३ ॥
एवं विवादे वितते मायया परमेष्ठिनः।<br>प्रबोधार्थं परं लिङ्गं प्रादुर्भूतं शिवात्मकम्॥ ७४ ॥
कालानलसमप्रख्यं ज्वालामालासमाकुलम्।<br>क्षयवृद्धिविनिर्मुक्तमादिमध्यान्तवर्जितम् ॥ ७५ ॥
ततो मामाह भगवानधो गच्छ त्वमाशु वै।<br>अन्तमस्य विजानीम ऊर्ध्वं गच्छेऽहमित्यजः॥ ७६ ॥तब भगवान् शंकरने मुझसे कहा-तुम शीघ्र ही (इस लिङ्गके) नीचेकी ओर जाओ और इसके अन्तका पता लगाओ और ये अजन्मा ब्रह्मा (इसके) ऊपरकी ओर जायें। तदनन्तर शीघ्र ही प्रतिज्ञा करके हम दोनों ऊपर तथा नीचेकी ओर गये, किंतु पितामह तथा मैं सैकड़ों वर्षोंमें भी उसका अन्त नहीं जान सके। तदनन्तर त्रिशूलधारी देवकी मायासे मोहित, भयभीत एवं आश्चर्यचकित हम दोनों उन विश्वरूप ईश्वरका ध्यान करने लगे और परमपद महानाद ओंकारका उच्चारण करते हुए नम्रतापूर्वक हाथ जोड़कर श्रेष्ठ शम्भुकी स्तुति करने लगे- ॥ ७६-७९ ॥
तदाशु समयं कृत्वा गतावूर्ध्वमधश्च द्वौ।<br>पितामहोऽप्यहं नान्तं ज्ञातवन्तौ समाः शतम्॥ ७७॥
ततो विस्मयमापन्नौ भीतौ देवस्य शूलिनः।<br>मायया मोहितौ तस्य ध्यायन्तौ विश्वमीश्वरम्॥ ७८ ॥
प्रोच्चरन्तौ महानादमोङ्कारं परमं पदम्।<br>प्रह्लाञ्जलिपुटोपेतौ शम्भुं तुष्टुवतुः परम्॥ ७९ ॥
ब्रह्मविष्णू ऊचतुः**ब्रह्मा तथा विष्णुने कहा-**विविध अनादि विकारोंसे मुक्त संसाररूपी रोगके अनादि वैद्यस्वरूप शम्भु, शिव, शान्त, लिङ्गमूर्तिवाले ब्रह्माको नमस्कार है। प्रलयकालीन समुद्रमें स्थित रहनेवाले, सृष्टि और प्रलयके कारणरूप शिव, शान्त, लिङ्गमूर्तिधारी ब्रह्मको नमस्कार है। ज्वालामालाओंसे घिरे हुए शरीरवाले, प्रज्वलित स्तम्भरूप शिव, शान्त, लिङ्गमूर्तिवाले ब्रह्मको नमस्कार है। आदि, मध्य और अन्तसे रहित स्वभावतः निर्मल तेजोरूप शिव, शान्त तथा लिङ्गरूपी मूर्तिको धारण करनेवाले ब्रह्मको नमस्कार है॥ ८०-८३ ॥
अनादिमलसंसाररोगवैद्याय शम्भवे।<br>नमः शिवाय शान्ताय ब्रह्मणे लिङ्गमूर्तये॥ ८० ॥
प्रलयार्णवसंस्थाय प्रलयोद्भूतिहेतवे।<br>नमः शिवाय शान्ताय ब्रह्मणे लिङ्गमूर्तये॥ ८१ ॥
ज्वालामालावृताङ्गाय ज्वलनस्तम्भरूपिणे।<br>नमः शिवाय शान्ताय ब्रह्मणे लिङ्गमूर्तये॥ ८२ ॥
आदिमध्यान्तहीनाय स्वभावामलदीप्तये।<br>नमः शिवाय शान्ताय ब्रह्मणे लिङ्गमूर्तये॥ ८३ ॥

१७० * कूर्मपुराण *


महादेवाय महते ज्योतिषेऽनन्ततेजसे ।<br>नमः शिवाय शान्ताय ब्रह्मणे लिङ्गमूर्तये ॥ ८४ ॥<br>प्रधानपुरुषेशाय व्योमरूपाय वेधसे ।<br>नमः शिवाय शान्ताय ब्रह्मणे लिङ्गमूर्तये ॥ ८५ ॥<br>निर्विकाराय सत्याय नित्यायामलतेजसे ।<br>नमः शिवाय शान्ताय ब्रह्मणे लिङ्गमूर्तये ॥ ८६ ॥<br>वेदान्तसाररूपाय कालरूपाय धीमते ।<br>नमः शिवाय शान्ताय ब्रह्मणे लिङ्गमूर्तये ॥ ८७ ॥महादेव, महान्, ज्योतिःस्वरूप, अनन्त तेजस्वी लिङ्गविग्रह शिव, शान्त, ब्रह्मको नमस्कार है। प्रधान पुरुषके भी ईश, व्योमस्वरूप, वेधा (ब्रह्म) और लिङ्गविग्रह शिव, शान्त ब्रह्मको नमस्कार है। निर्विकार, सत्य, नित्य विमल तेजरूप लिङ्गविग्रह शान्त, शिव ब्रह्मको नमस्कार है। वेदान्तसार-स्वरूप, कालरूप, धीमान् लिङ्गमूर्ति शिव, शान्त ब्रह्मको नमस्कार है ॥ ८४-८७ ॥
एवं संस्तूयमानस्तु व्यक्तो भूत्वा महेश्वरः ।<br>भाति देवो महायोगी सूर्यकोटिसमप्रभः ॥ ८८ ॥<br>वक्त्रकोटिसहस्रेण ग्रसमान इवाम्बरम् ।<br>सहस्रहस्तचरणः सूर्यसोमाग्निलोचनः ॥ ८९ ॥<br>पिनाकपाणिर्भगवान् कृत्तिवासास्त्रिशूलभृत् ।<br>व्यालयज्ञोपवीतश्च मेघदुन्दुभिनिःस्वनः ॥ ९० ॥<br>अथोवाच महादेवः प्रीतोऽहं सुरसत्तमौ ।<br>पश्येतं मां महादेवं भयं सर्वं प्रमुच्यताम् ॥ ९१ ॥<br>युवां प्रसूतौ गात्रेभ्यो मम पूर्वं सनातनौ ।<br>अयं मे दक्षिणे पार्श्वे ब्रह्मा लोकपितामहः ।<br>वामपार्श्वे च मे विष्णुः पालको हृदये हरः ॥ ९२ ॥<br>प्रीतोऽहं युवयोः सम्यक् वरं दद्मि यथेप्सितम् ।<br>एवमुक्त्वाथ मां देवो महादेवः स्वयं शिवः ।<br>आलिङ्ग्य देवं ब्रह्माणं प्रसादाभिमुखोऽभवत् ॥ ९३ ॥इस प्रकार स्तुति करते रहनेपर महायोगी महेश्वर देव प्रकट हो गये और हजारों करोड़ मुखसे आकाशको मानो ग्रास बनाते हुए करोड़ों सूर्यके समान सुशोभित होने लगे। हजारों हाथ और पैरवाले, सूर्य, चन्द्रमा तथा अग्निरूप (तीन) नयनवाले, पिनाकधनुषको हाथमें धारण करनेवाले, चर्माम्बरधारी, त्रिशूलधारी, सर्पका यज्ञोपवीत धारण करनेवाले और मेघ तथा दुन्दुभिके सदृश स्वरवाले भगवान् महादेवने कहा—श्रेष्ठ देवो! मैं प्रसन्न हूँ। मुझ महादेवकी ओर देखो और समस्त भयका परित्याग करो। पूर्वकालमें तुम दोनों सनातन (देव) मेरे शरीरसे उत्पन्न हुए थे। मेरे दक्षिण पार्श्वमें ये लोकपितामह ब्रह्मा, वाम पार्श्वमें पालनकर्ता विष्णु और हृदयमें हर स्थित हैं। मैं तुम दोनोंपर भलीभाँति प्रसन्न हूँ, इसलिये यथेष्ट वर प्रदान करूँगा। ऐसा कहकर महादेव शिव स्वयं मुझे तथा देव ब्रह्माका आलिङ्गन कर अनुग्रह प्रदान करनेके लिये उद्यत हुए ॥ ८८-९३ ॥
ततः प्रहृष्टमनसौ प्रणिपत्य महेश्वरम् ।<br>ऊचतुः प्रेक्ष्य तद्वक्त्रं नारायणपितामहौ ॥ ९४ ॥<br>यदि प्रीतिः समुत्पन्ना यदि देयो वरश्च नौ ।<br>भक्तिर्भवतु नौ नित्यं त्वयि देव महेश्वरे ॥ ९५ ॥<br>ततः स भगवानीशः प्रहसन् परमेश्वरः ।<br>उवाच मां महादेवः प्रीतः प्रीतेन चेतसा ॥ ९६ ॥तदनन्तर प्रसन्न मनवाले नारायण तथा पितामहने महेश्वरको प्रणामकर उनके मुखकी ओर देखते हुए कहा—देव! यदि प्रीति उत्पन्न हुई है और यदि आप हम दोनोंको वर देना चाहते हैं तो (यह वर दें कि) हम दोनोंकी आप महेश्वरमें नित्य भक्ति बनी रहे। तब उन प्रसन्न हुए परम ईश्वर भगवान् ईश महादेवने प्रसन्न मनसे हँसते हुए मुझसे कहा— ॥ ९४-९६ ॥
### देव उवाच<br>प्रलयस्थितिसर्गाणां कर्ता त्वं धरणीपते ।<br>वत्स वत्स हरे विश्वं पालयैतच्चराचरम् ॥ ९७ ॥<br>त्रिधा भिन्नोऽस्म्यहं विष्णो ब्रह्मविष्णुहराख्यया ।<br>सर्गक्षालयगुणैर्निर्गुणोऽपि निरञ्जनः ॥ ९८ ॥<br>सम्मोहं त्यज भो विष्णो पालयैनं पितामहम् ।<br>भविष्यत्येष भगवांस्तव पुत्रः सनातनः ॥ ९९ ॥**देव बोले—**धरणीपते! वत्स हरि! तुम सृष्टि, पालन और प्रलयके कर्ता हो। इस चराचर विश्वका पालन करो। हे विष्णो! मैं निर्गुण तथा निरञ्जन होते हुए भी सृष्टि, रक्षा तथा प्रलयके लिये अपेक्षित गुणोंके द्वारा ब्रह्मा, विष्णु तथा हर नामसे तीन रूपोंमें विभक्त हूँ। विष्णो ! मोहका परित्याग करो, इन पितामहका पालन करो। ये सनातन भगवान् आपके पुत्र होंगे ॥ ९७-९९ ॥
* अध्याय २५ *१७१
अहं च भवतो वक्त्रात् कल्पादौ घोररूपधृक्।<br>शूलपाणिर्भविष्यामि क्रोधजस्तव पुत्रकः॥ १००॥कल्पके आदिमें मैं भी आपके मुखसे प्रकट होकर घोर रूप धारणकर हाथमें शूल धारण किये आपका क्रोधज पुत्र बनूँगा॥ १००॥
एवमुक्त्वा महादेवो ब्रह्माणं मुनिसत्तम।<br>अनुगृह्य च मां देवस्तत्रैवान्तरधीयत॥ १०१॥मुनिश्रेष्ठ! इस प्रकार कहकर भगवान् महादेव मुझपर तथा ब्रह्मापर कृपा करके वहींपर अन्तर्धान हो गये। ब्रह्मन्! तबसे लोकमें लिङ्गका पूजन प्रतिष्ठित हो गया। लीन होनेसे वह लिङ्ग कहा जाता है। लिङ्ग ब्रह्मका श्रेष्ठ शरीर है॥ १०१-१०२॥
ततः प्रभृति लोकेषु लिङ्गार्चा सुप्रतिष्ठिता।<br>लिङ्गं तल्लयनाद् ब्रह्मन् ब्रह्मणः परमं वपुः॥ १०२॥<br>एतल्लिङ्गस्य माहात्म्यं भाषितं ते मयानघ।<br>एतद् बुध्यन्ति योगज्ञा न देवा न च दानवाः॥ १०३॥अनघ! मैंने इस लिङ्गका माहात्म्य तुम्हें बताया। इसे न देवता जानते हैं न दानव, केवल योगज्ञ लोग ही जानते हैं। यह शिव नामवाला अव्यक्त परम ज्ञान है। ज्ञानदृष्टिवाले इसीके द्वारा उस सूक्ष्म अचिन्त्य (तत्त्व)-का दर्शन करते हैं। इस लिङ्गस्वरूप देवाधि-देव महादेव भगवान् रुद्रको हम नित्य नमस्कार करते हैं॥ १०३-१०५॥
एतद्वि परमं ज्ञानमव्यक्तं शिवसञ्ज्ञितम्।<br>येन सूक्ष्ममचिन्त्यं तत् पश्यन्ति ज्ञानचक्षुषः॥ १०४॥
तस्मै भगवते नित्यं नमस्कारं प्रकुर्महे।<br>महादेवाय रुद्राय देवदेवाय लिङ्गिने॥ १०५॥
नमो वेदरहस्याय नीलकण्ठाय वै नमः।<br>विभीषणाय शान्ताय स्थाणवे हेतवे नमः॥ १०६॥वेदके रहस्यरूप आपको नमस्कार है, नीलकण्ठको नमस्कार है। विशेष भय* उत्पन्न करनेवाले, शान्त, स्थाणु तथा कारणरूपको नमस्कार है। वामदेव, त्रिलोचन, महिमावान्, ब्रह्म, शंकर, महेश, गिरीश तथा शिवको नमस्कार है। सदा इन्हें नमस्कार करो, मनसे शंकरका ध्यान करो। इससे शीघ्र ही संसारसागरसे पार हो जाओगे॥ १०६-१०८॥
ब्रह्मणे वामदेवाय त्रिनेत्राय महीयसे।<br>शंकराय महेशाय गिरीशाय शिवाय च॥ १०७॥
नमः कुरुष्व सततं ध्यायस्व मनसा हरम्।<br>संसारसागरादस्मादचिरादुत्तरिष्यसि ॥ १०८॥
एवं स वासुदेवेन व्याहृतो मुनिपुङ्गवः।<br>जगाम मनसा देवमीशानं विश्वतोमुखम्॥ १०९॥इस प्रकार वासुदेवके द्वारा कहे जानेपर उन मुनिश्रेष्ठ (मार्कण्डेय)-ने विश्वतोमुख देव ईशान (शंकर)-का ध्यान किया। श्रीकृष्णको विनयपूर्वक प्रणामकर उनकी आज्ञा प्राप्तकर महामुनि (मार्कण्डेय) त्रिशूल धारण करनेवाले देवाधिदेवके अभीष्ट स्थानको चले गये॥ १०९-११०॥
प्रणम्य शिरसा कृष्णमनुज्ञातो महामुनिः।<br>जगाम चेप्सितं देशं देवदेवस्य शूलिनः॥ ११०॥
य इमं श्रावयेन्नित्यं लिङ्गाध्यायमनुत्तमम्।<br>शृणुयाद् वा पठेद् वापि सर्वपापैः प्रमुच्यते॥ १११॥जो इस श्रेष्ठ लिङ्गाध्यायको सुनेगा, सुनायेगा अथवा पढ़ेगा, वह सभी पापोंसे मुक्त हो जायगा। विप्रेन्द्रो! वासुदेवके इस श्रेष्ठ तपश्चरणको एक बार भी सुननेवाला मनुष्य पापसे मुक्त हो जाता है अथवा प्रतिदिन इसका निरन्तर जप करनेसे ब्रह्मलोकमें प्रतिष्ठित होता है—ऐसा महायोगी प्रभु कृष्णद्वैपायनने कहा है॥ १११-११३॥
श्रुत्वा सकृदपि ह्येतत् तपश्चरणमुत्तमम्।<br>वासुदेवस्य विप्रेन्द्राः पापं मुञ्चति मानवः॥ ११२॥
जपेद् वाहरहर्नित्यं ब्रह्मलोके महीयते।<br>एवमाह महायोगी कृष्णद्वैपायनः प्रभुः॥ ११३॥

इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायां पूर्वविभागे पञ्चविंशोऽध्यायः॥ २५॥

इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें पचीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ २५॥


* प्राणीको पापसे विरत करनेके लिये अन्य उपाय न होनेपर भगवान् शंकर भय भी उत्पन्न करते हैं।

१७२* कूर्मपुराण *

छब्बीसवाँ अध्याय

श्रीकृष्णको महेश्वरकी कृपासे साम्ब नामक पुत्रकी प्राप्ति, कंसादिका वध, भृगु आदि महर्षियोंका द्वारकामें आना, भृगु आदि मुनियोंसे श्रीकृष्णद्वारा स्वधामगमनकी बात बताना, शिवसे द्वेष करनेवालोंको नरककी प्राप्तिका वर्णन तथा शिवकी महिमा बताना, नारायणका अपने कुलका संहारकर स्वधामगमन तथा वंश-वर्णनका उपसंहार

सूत उवाच<br>ततो लब्धवरः कृष्णो जाम्बवत्यां महेश्वरात्।<br>अजीजनन्महात्मानं साम्बमात्मजमुत्तमम्॥ १ ॥<br>प्रद्युम्नस्याप्यभूत् पुत्रो ह्यनिरुद्धो महाबलः।<br>तावुभौ गुणसम्पन्नौ कृष्णस्यैवापरे तनू॥ २ ॥<br>हत्वा च कंसं नरकमन्यांश्च शतशोऽसुरान्।<br>विजित्य लीलया शक्रं जित्वा बाणं महासुरम्॥ ३ ॥<br>स्थापयित्वा जगत् कृत्स्नं लोके धर्मांश्च शाश्वतान्।<br>चक्रे नारायणो गन्तुं स्वस्थानं बुद्धिमुत्तमाम्॥ ४ ॥<br>एतस्मिन्नन्तरे विप्रा भृग्वाद्याः कृष्णमीश्वरम्।<br>आजग्मुर्द्वारकां द्रष्टुं कृतकार्यं सनातनम्॥ ५ ॥**सूतजी बोले—**तदनन्तर महेश्वरसे वर प्राप्त किये हुए कृष्णने जाम्बवतीसे महात्मा साम्ब नामक श्रेष्ठ पुत्रको उत्पन्न किया। प्रद्युम्नको भी महाबलवान् अनिरुद्ध नामक पुत्र हुआ। गुणोंसे सम्पन्न वे दोनों कृष्णके ही दूसरे शरीर (-रूप) थे। कंस, नरक तथा अन्य सैकड़ों असुरोंको मारकर लीलापूर्वक इन्द्रको जीतकर तथा महान् असुर बाणको पराजितकर, सम्पूर्ण संसारको प्रतिष्ठितकर और लोकमें शाश्वत धर्मोंकी स्थापनाकर नारायणने अपने धाममें जानेका श्रेष्ठ विचार किया। ब्राह्मणो! इसी बीच भृगु आदि (महर्षि) अवतारके समस्त प्रयोजनोंसे निवृत्त सनातन ईश्वर कृष्णका दर्शन करनेके लिये द्वारकामें आये॥ १—५॥
स तानुवाच विश्वात्मा प्रणिपत्याभिपूज्य च।<br>आसनेषूपविष्टान् वै सह रामेण धीमता॥ ६ ॥<br>गमिष्ये तत् परं स्थानं स्वकीयं विष्णुसंज्ञितम्।<br>कृतानि सर्वकार्याणि प्रसीदध्वं मुनीश्वराः॥ ७ ॥<br>इदं कलियुगं घोरं सम्प्राप्तमधुनाशुभम्।<br>भविष्यन्ति जनाः सर्वे ह्यस्मिन् पापानुवर्तिनः॥ ८ ॥<br>प्रवर्तयध्वं मज्ज्ञानं ब्राह्मणानां हितावहम्।<br>येनेमे कलिजैः पापैर्मुच्यन्ते हि द्विजोत्तमाः॥ ९ ॥विश्वात्मा (कृष्ण)-ने बुद्धिमान् बलरामके साथ आसनोंपर विराजमान भृगु आदि महर्षियोंको प्रणामकर और पूजनकर उनसे कहा—मुनीश्वरो! सभी कार्य किये जा चुके हैं। अब मैं विष्णुसंज्ञक अपने उस परमधामको जाऊँगा, आप लोग प्रसन्न हों। इस समय अशुभ घोर कलियुग आ गया है। इसमें सभी लोग पापाचरण करनेवाले हो जायेंगे। श्रेष्ठ ब्राह्मणो! आप लोग ब्राह्मणोंके लिये कल्याणकारी मेरा ज्ञान प्रवर्तित करें, जिससे ये लोग कलिद्वारा उत्पन्न पापोंसे मुक्त हो सकें॥ ६—९॥
ये मां जनाः संस्मरन्ति कलौ सकृदपि प्रभुम्।<br>तेषां नश्यतु तत् पापं भक्तानां पुरुषोत्तमे॥ १०॥कलियुगमें जो लोग एक बार भी मुझ प्रभुका स्मरण करेंगे, उन पुरुषोत्तमके भक्तोंका पाप नष्ट हो जायगा। द्विजो! जो कलियुगमें भक्तिपूर्वक वैदिक विधि-विधानसे नित्य मेरा पूजन करेंगे, वे मेरे पदको प्राप्त करेंगे॥ १०-११॥
येऽर्चयिष्यन्ति मां भक्त्या नित्यं कलियुगे द्विजाः।<br>विधिना वेददृष्टेन ते गमिष्यन्ति तत् पदम्॥ ११॥
ये ब्राह्मणा वंशजाता युष्माकं वै सहस्त्रशः।<br>तेषां नारायणे भक्तिर्भविष्यति कलौ युगे॥ १२॥<br>परात् परतरं यान्ति नारायणपरायणाः।<br>न ते तत्र गमिष्यन्ति ये द्विषन्ति महेश्वरम्॥ १३॥आप लोगोंके वंशमें जो हजारों ब्राह्मण उत्पन्न होंगे, उनकी कलियुगमें नारायणमें भक्ति होगी। नारायणके भक्तजन परसे परतर स्थानको प्राप्त करते हैं, किंतु जो महेश्वरसे द्वेष रखते हैं, वे वहाँ नहीं जाते॥ १२-१३॥
  • अध्याय २६ * | १७३ ---|--- ध्यानं होमं तपस्तप्तं ज्ञानं यज्ञादिको विधिः।<br>तेषां विनश्यति क्षिप्रं ये निन्दन्ति पिनाकिनम्॥ १४॥|जो पिनाक धारण करनेवाले शिवकी निन्दा करते हैं, उनका ध्यान, होम, किया गया तप, ज्ञान तथा यज्ञादि सभी विधान शीघ्र ही नष्ट हो जाता है॥ १४॥ यो मां समाश्रयेन्नित्यमेकान्तं भावमाश्रितः।<br>विनिन्द्य देवमीशानं स याति नरकायुतम्॥ १५॥<br><br>तस्मात् सा परिहर्तव्या निन्दा पशुपतौ द्विजाः।<br>कर्मणा मनसा वाचा तद्भक्तेष्वपि यत्नतः॥ १६॥<br><br>ये तु दक्षाध्वरे शप्ता दधीचेन द्विजोत्तमाः।<br>भविष्यन्ति कलौ भक्तैः परिहार्याः प्रयत्नतः॥ १७॥<br><br>द्विषन्तो देवमीशानं युष्माकं वंशसम्भवाः।<br>शप्ताश्च गौतमेनोर्व्यां न सम्भाष्या द्विजोत्तमैः॥ १८॥|जो ईशान (शंकर) देवकी निन्दा कर नित्य अनन्य भावसे मेरा आश्रय ग्रहण करता है, वह दस हजार वर्षोंतक नरकमें रहता है। इसलिये द्विजो! मन, वाणी तथा कर्मसे पशुपति तथा उनके भक्तोंकी भी निन्दाका प्रयत्नपूर्वक परित्याग करना चाहिये। द्विजोत्तमो! दक्ष प्रजापतिके यज्ञमें दधीचने आपके वंशमें उत्पन्न जिन ब्राह्मणोंको देव ईशानसे द्वेष करनेके कारण शाप दिया था, वे सभी कलियुगमें पृथ्वीपर उत्पन्न होंगे। भक्तोंद्वारा प्रयत्नपूर्वक उनका परित्याग करना चाहिये। महर्षि गौतमद्वारा शापप्राप्त लोगोंसे भी श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको बात नहीं करनी चाहिये॥ १५-१८॥ इत्येवमुक्ताः कृष्णेन सर्व एव महर्षयः।<br>ओमित्युक्त्वा ययुस्तूर्णं स्वानि स्थानानि सत्तमाः॥ १९॥<br><br>ततो नारायणः कृष्णो लीलयैव जगन्मयः।<br>संहृत्य स्वकुलं सर्वं ययौ तत् परमं पदम्॥ २०॥|कृष्णद्वारा इस प्रकार कहे जानेपर वे सभी श्रेष्ठ महर्षि 'ठीक है' ऐसा कहकर शीघ्र ही अपने स्थानोंको चले गये। तदनन्तर जगन्मय नारायण कृष्ण लीलापूर्वक अपने सारे कुलका संहारकर अपने परमधामको पधार गये॥ १९-२०॥ इत्येष वः समासेन राज्ञां वंशोऽनुकीर्तितः।<br>न शक्यो विस्तराद् वक्तुं किं भूयः श्रोतुमिच्छथ॥ २१॥|(सूतजीने ऋषियोंसे कहा—) संक्षेपमें यह राजवंश आप लोगोंको बताया गया, विस्तारपूर्वक इसका वर्णन नहीं हो सकता। अब आप पुनः क्या सुनना चाहते हैं? यः पठेच्छृणुयाद् वापि वंशानां कथनं शुभम्।<br>सर्वपापविनिर्मुक्तः स्वर्गलोके महीयते॥ २२॥|जो इन वंशोंके शुभ वर्णनको पढ़ता है अथवा सुनता है, वह सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है तथा स्वर्गलोकमें आदर प्राप्त करता है॥ २१-२२॥

इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायां पूर्वविभागे षड्विंशोऽध्यायः॥ २६॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें छब्बीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ २६॥

१७४* कूर्मपुराण *

सत्ताईसवाँ अध्याय

व्यासदेवद्वारा अर्जुनको सत्ययुगादि चारों युगोंके धर्मोंका उपदेश, व्यासद्वारा एक वेद-संहिताका चतुर्धा विभाजन, चारों युगोंमें चतुष्पाद धर्मकी विभिन्न स्थितिका निदर्शन तथा कलियुगमें धर्मके ह्रासका प्रतिपादन

ऋषय ऊचुः<br>कृतं त्रेता द्वापरं च कलिश्चेति चतुर्युगम्।<br>एषां स्वभावं सूताद्य कथयस्व समासतः॥ १ ॥ऋषियोंने कहा—सूतजी! सत्य, त्रेता, द्वापर तथा कलि—ये चार युग हैं, अब (आप) इनके स्वभावका संक्षेपमें वर्णन कीजिये॥ १॥
सूत उवाच<br>गते नारायणे कृष्णे स्वमेव परमं पदम्।<br>पार्थः परमधर्मात्मा पाण्डवः शत्रुतापनः॥ २ ॥<br>कृत्वा चैवोत्तरविधिं शोकेन महतावृत्तः।<br>अपश्यत् पथि गच्छन्तं कृष्णद्वैपायनं मुनिम्॥ ३ ॥<br>शिष्यैः प्रशिष्यैरभितः संवृतं ब्रह्मवादिनम्।<br>पपात दण्डवद् भूमौ त्यक्त्वा शोकं तदार्जुनः॥ ४ ॥<br>उवाच परमप्रीतः कस्माद् देशान्महामुने।<br>इदानीं गच्छसि क्षिप्रं कं वा देशं प्रति प्रभो॥ ५ ॥<br>संदर्शनाद् वै भवतः शोको मे विपुलोगतः।<br>इदानीं मम यत् कार्यं ब्रूहि पद्मदलेक्षण॥ ६ ॥<br>तमुवाच महायोगी कृष्णद्वैपायनः स्वयम्।<br>उपविश्य नदीतीरे शिष्यैः परिवृतो मुनिः॥ ७ ॥सूतजी बोले—नारायण कृष्णके अपने परमधाम चले जानेपर शत्रुओंको पीड़ा पहुँचानेवाले परम धर्मात्मा पाण्डुपुत्र पार्थ (अर्जुन) और्ध्वदैहिक क्रिया करके महान् शोकसे आवृत हो गये। (उन्होंने) मार्गमें जाते हुए ब्रह्मवादी कृष्णद्वैपायन (व्यास) मुनिको शिष्यों, प्रशिष्योंसे चारों ओरसे घिरे हुए देखा। तब शोकका परित्यागकर अर्जुनने भूमिपर दण्डवत् गिरकर प्रणाम किया और परम प्रीतिसे कहा—महामुने! प्रभो! आप कहाँसे आ रहे हैं और किस देशकी ओर इस समय शीघ्रतापूर्वक जा रहे हैं? आपका दर्शन करनेसे ही मेरा महान् शोक दूर हो गया है। कमलपत्रके समान नेत्रवाले (व्यासजी महाराज)! इस समय मेरा जो कर्तव्य हो, उसे आप बतलायें। तब शिष्योंसे घिरे हुए महायोगी कृष्णद्वैपायन मुनिने नदीके किनारे बैठकर स्वयं कहा—॥ २–७॥
व्यास उवाच<br>इदं कलियुगं घोरं सम्प्राप्तं पाण्डुनन्दन।<br>ततो गच्छामि देवस्य वाराणसीं महापुरीम्॥ ८ ॥<br>अस्मिन् कलियुगे घोरे लोकाः पापानुवर्तिनः।<br>भविष्यन्ति महापापा वर्णाश्रमविवर्जिताः॥ ९ ॥<br>नान्यत् पश्यामि जन्तूनां मुक्त्वा वाराणसीं पुरीम्।<br>सर्वपापप्रशमनं प्रायश्चित्तं कलौ युगे॥ १०॥व्यासजी बोले—पाण्डुके पुत्र (अर्जुन)! यह घोर कलियुग आ गया है। इसलिये मैं भगवान् शंकरकी महापुरी वाराणसी जा रहा हूँ। इस भयंकर कलियुगमें लोग पापाचरण करनेवाले, वर्ण तथा आश्रमधर्मसे रहित महान् पापी होंगे। कलियुगमें सभी पापोंका शमन करनेके लिये वाराणसीपुरीके सेवनको छोड़कर अन्य दूसरा कोई प्रायश्चित्त मैं नहीं देखता॥ ८—१०॥
कृतं त्रेता द्वापरं च सर्वेष्वेतेषु वै नराः।<br>भविष्यन्ति महात्मानो धर्मिकाः सत्यवादिनः॥ ११॥<br>त्वं हि लोकेषु विख्यातो धृतिमाञ् जनवत्सलः।<br>पालयाद्य परं धर्मं स्वकीयं मुच्यसे भयात्॥ १२॥<br>एवमुक्तो भगवता पार्थः परपुरञ्जयः।<br>पृष्टवान् प्रणिपत्यासौ युगधर्मान् द्विजोत्तमाः॥ १३॥<br>तस्मै प्रोवाच सकलं मुनिः सत्यवतीसुतः।<br>प्रणम्य देवमीशानं युगधर्मान् सनातनान्॥ १४॥सत्य, त्रेता तथा द्वापर—इन सभी (युगों) में मनुष्य महात्मा, धार्मिक तथा सत्यवादी होते हैं। आप संसारमें प्रजावत्सल तथा धृतिमान्‌के रूपमें विख्यात हैं, अतः अपने परम धर्मका पालन करें, इससे आप भयसे मुक्त हो जायेंगे। द्विजोत्तमो! भगवान् (व्यास)-के द्वारा ऐसा कहनेपर शत्रुके पुरको जीतनेवाले पृथा (कुन्ती)-के पुत्र पार्थ (अर्जुन)-ने इन्हें प्रणामकर युगधर्मोंको पूछा। सत्यवतीके पुत्र व्यासमुनिने भगवान् शंकरको प्रणामकर सम्पूर्ण सनातन युगधर्मोंको उन्हें बतलाया॥ ११–१४॥
* अध्याय २७ *१७५

| व्यास उवाच | व्यासजी बोले—नरेश्वर! पार्थ! संक्षेपमें युगधर्मोंको तुम्हें बतलाता हूँ, मैं विस्तारसे वर्णन नहीं कर सकता हूँ। पार्थ! विद्वानोंद्वारा पहला कृतयुग कहा गया है, तदनन्तर दूसरा त्रेतायुग, तीसरा द्वापर तथा चौथा कलियुग कहा गया है। कृतयुगमें ध्यान, त्रेतामें ज्ञान, द्वापरमें यज्ञ तथा कलियुगमें एकमात्र दान ही श्रेष्ठ साधन बताया गया है। कृतयुगमें ब्रह्मा देवता होते हैं, इसी प्रकार त्रेतामें भगवान् सूर्य, द्वापरमें देवता विष्णु और कलियुगमें महेश्वर रुद्र ही मुख्य देवता हैं। ब्रह्मा, विष्णु तथा सूर्य—ये सभी कलियुगमें पूजित होते हैं, किंतु पिनाकधारी भगवान् रुद्र चारों युगोंमें पूजे जाते हैं। सर्वप्रथम कृतयुगमें सनातनधर्म चार चरणोंवाला था, त्रेतामें तीन चरणोंवाला तथा द्वापरमें दो चरणोंसे स्थित हुआ, किंतु कलियुगमें तीन चरणोंसे रहित होकर केवल सत्तामात्रसे स्थित रहता है॥ १५—२०॥ | | वक्ष्यामि ते समासेन युगधर्मान् नरेश्वर।<br>न शक्यते मया पार्थ विस्तरेणाभिभाषितुम् ॥ १५ ॥<br>आद्यं कृतयुगं प्रोक्तं ततस्त्रेतायुगं बुधैः।<br>तृतीयं द्वापरं पार्थ चतुर्थं कलिरुच्यते ॥ १६ ॥<br>ध्यानं परं कृतयुगे त्रेतायां ज्ञानमुच्यते।<br>द्वापरे यज्ञमेवाहुर्दानमेव कलौ युगे ॥ १७ ॥<br>ब्रह्मा कृतयुगे देवस्त्रेतायां भगवान् रविः।<br>द्वापरे दैवतं विष्णुः कलौ रुद्रो महेश्वरः ॥ १८ ॥<br>ब्रह्मा विष्णुस्तथा सूर्यः सर्व एव कलिष्वपि।<br>पूज्यते भगवान् रुद्रश्चतुर्ष्वपि पिनाकधृक् ॥ १९ ॥<br>आद्ये कृतयुगे धर्मश्चतुष्पादः सनातनः।<br>त्रेतायुगे त्रिपादः स्याद् द्विपादो द्वापरे स्थितः।<br>त्रिपादहीनस्तिष्ये तु सत्तामात्रेण तिष्ठति ॥ २० ॥ | | | कृते तु मिथुनोत्पत्तिर्वृत्तिः साक्षाद् रसोल्लसा।<br>प्रजास्तृप्ताः सदा सर्वाः सदानन्दाश्च भोगिनः ॥ २१ ॥<br><br>अधमोत्तमत्वं नास्त्यासां निर्विशेषाः पुरञ्जय।<br>तुल्यमायुः सुखं रूपं तासां तस्मिन् कृते युगे ॥ २२ ॥<br><br>विशोकाः सत्त्वबहुला एकान्तबहुलास्तथा।<br>ध्याननिष्ठास्तपोनिष्ठा महादेवपरायणाः ॥ २३ ॥<br><br>ता वै निष्कामचारिण्यो नित्यं मुदितमानसाः।<br>पर्वतोदधिवासिन्यो ह्यनिकेताः परंतप ॥ २४ ॥ | कृतयुगमें स्त्री-पुरुषके संयोगसे उत्पत्ति होती थी और लोगोंकी आजीविका साक्षात् (आनन्द) रससे उल्लसित रहती थी। सारी प्रजाएँ सर्वदा सात्त्विक आनन्दसे तृप्त और भोगसे सम्पन्न रहती थीं। पुरञ्जय! उन प्रजाओंमें उत्तम और अधमका भेद नहीं था, सभी निर्विशेष थे। उस कृतयुगमें प्रजाकी आयु, सुख और रूप समान था। सम्पूर्ण प्रजा शोकसे रहित, सत्त्वगुणके बाहुल्यसे युक्त, एकान्तप्रेमी, ध्याननिष्ठ, तपोनिष्ठ तथा महादेव शंकरकी भक्त थी। परंतप ! वे प्रजाएँ निष्कामकर्म करनेवाली, नित्य प्रसन्न मनवाली और पर्वतों एवं समुद्रके किनारे रहनेवाली थीं, उनका कोई घर नहीं होता था॥ २१—२४॥ | | रसोल्लासा कालयोगात् त्रेताख्ये नश्यते ततः।<br>तस्यां सिद्धौ प्रणष्टायामन्या सिद्धिरवर्तत ॥ २५ ॥<br>अपां सौक्ष्म्ये प्रतिहते तदा मेघात्मना तु वै।<br>मेघेभ्यः स्तनयित्नुभ्यः प्रवृत्तं वृष्टिसर्जनम् ॥ २६ ॥<br>सकृदेव तया वृष्ट्या संयुक्ते पृथिवीतले।<br>प्रादुरासंस्तदा तासां वृक्षा वै गृहसंज्ञिताः ॥ २७ ॥<br>सर्वप्रत्युपयोगस्तु तासां तेभ्यः प्रजायते।<br>वर्तयन्ति स्म तेभ्यस्तास्त्रेतायुगमुखे प्रजाः ॥ २८ ॥ | तदनन्तर कालके प्रभावसे त्रेता नामक युगमें (सत्य-युगका) आनन्दोल्लास नष्ट हो जाता है, (कृतयुगकी) उस सिद्धिका लोप होनेपर अन्य सिद्धि प्रवर्तित होती है। मेघमें जलकी कमी होनेपर मेघ और विद्युत्से वृष्टि उत्पन्न हुई।* पृथ्वीतलपर एक बार ही उस वृष्टिका संयोग होनेसे उन प्रजाओंके लिये गृहसंज्ञक वृक्षोंका प्रादुर्भाव हुआ। उन (वृक्षों)-से ही उनके सब कार्य सम्पन्न होने लगे। त्रेतायुगके प्रारम्भमें वह समस्त प्रजा उनसे ही (अपनी जीविकाका) निर्वाह करती थी॥ २५—२८॥ |


* सत्ययुगमें स्वयं मेघ जलमय होते थे। उनमें इतनी जलकी प्रचुरता होती थी कि किसी अन्यके सहयोगके बिना ही वे वृष्टि करते थे। पर त्रेतायुगमें मेघोंकी जलमयता प्रतिहत हो गयी। फलतः विद्युत्के सहयोगसे ही मेघ वृष्टि कर पाते थे।

१७६ * कूर्मपुराण *

ततः कालेन महता तासामेव विपर्ययात्। रागलोभात्मको भावस्तदा ह्याकस्मिकोऽभवत्॥ २९॥

विपर्ययेण तासां तु तेन तत्कालभाविना। प्रणश्यन्ति ततः सर्वे वृक्षास्ते गृहसंज्ञिताः॥ ३०॥ ततस्तेषु प्रणष्टेषु विभ्रान्ता मैथुनोद्भवाः। अभिध्यायन्ति तां सिद्धिं सत्याभिध्यायिनस्तदा॥ ३१॥

प्रादुर्बभूवुस्तासां तु वृक्षास्ते गृहसंज्ञिताः। वस्त्राणि ते प्रसूयन्ते फलान्याभरणानि च॥ ३२॥

तेष्वेव जायते तासां गन्धवर्णरसान्वितम्। अमाक्षिकं महावीर्यं पुटके पुटके मधु॥ ३३॥

तेन ता वर्तयन्ति स्म त्रेतायुगमुखे प्रजाः। हृष्टपुष्टास्तया सिद्ध्या सर्वा वै विगतज्वराः॥ ३४॥

ततः कालान्तरेणैव पुनर्लोभावृतास्तदा। वृक्षांस्तान् पर्यगृह्णन्त मधु चामाक्षिकं बलात्॥ ३५॥ तासां तेनापचारेण पुनर्लोभकृतेन वै। प्रणष्टा मधुना सार्धं कल्पवृक्षाः क्वचित् क्वचित्॥ ३६॥

शीतवर्षातपैस्तीव्रैस्ततस्ता दुःखिता भृशम्। द्वन्द्वैः सम्पीड़्यमानास्तु चक्रुरावरणानि च॥ ३७॥

कृत्वा द्वन्द्वप्रतीघातान् वार्तोपायमचिन्तयन्। नष्टेषु मधुना सार्धं कल्पवृक्षेषु वै तदा॥ ३८॥

ततः प्रादुर्बभौ तासां सिद्धिस्त्रेतायुगे पुनः। वार्तायाः साधिका ह्यान्या वृष्टिस्तासां निकामतः॥ ३९॥ तासां वृष्ट्युदकानीह यानि निम्नैर्गतानि तु। अवहन् वृष्टिसंतत्या स्रोतःस्थानानि निम्नगाः॥ ४०॥

ये पुनस्तदपां स्तोका आपन्नाः पृथिवीतले। अपां भूमेश्च संयोगादोषध्यस्तास्तदाभवन्॥ ४१॥

तदनन्तर बहुत समय व्यतीत होनेपर उन प्रजाओंके ही विपर्ययसे* उनमें अचानक ही राग और लोभका भाव उत्पन्न हो गया। तदनन्तर उनके उलट-फेर (दिनचर्यामें व्यत्यय)-के कारण उस समयके प्रभाववश वे गृह-संज्ञक सभी वृक्ष नष्ट हो गये॥ २९-३०॥

तब उन (वृक्षों)-के नष्ट हो जानेपर मिथुनधर्मसे उत्पन्न सत्यका ध्यान करनेवाले वे सभी प्रजाजन विभ्रान्त होकर उस पूर्व वर्णित सिद्धिका ध्यान करने लगे। उस समय (सत्यका ध्यान करनेके कारण) उन प्रजाओंके (लुप्त) वे गृह-संज्ञक वृक्ष पुनः प्रादुर्भूत हो गये। वे वस्त्रों, आभूषणों तथा फलोंको उत्पन्न करने लगे। उन प्रजाओंके लिये उन वृक्षोंके प्रत्येक पत्रपुटोंमें गन्ध, वर्ण और रससे समन्वित, बिना मधु-मक्खियोंके बना हुआ महान् शक्तिशाली मधु उत्पन्न होता था। उसी (मधु)-से त्रेतायुगके आरम्भमें वे प्रजाएँ जीवन-निर्वाह करती थीं। उस सिद्धिके कारण वे सारी प्रजाएँ हृष्ट-पुष्ट तथा ज्वरसे रहित थीं। तदनन्तर कालान्तरमें वे सभी पुनः लोभके वशीभूत हो गये। अब वे उन वृक्षों तथा उनसे उत्पन्न अमाक्षिक (मक्षिकाद्वारा न बनाये हुए) मधुको बलपूर्वक ग्रहण करने लगे॥ ३१-३५॥

उनके इस प्रकार पुनः लोभ करनेके कारण उत्पन्न दुष्कर्मसे वे कल्पवृक्ष कहीं-कहीं मधुके साथ ही नष्ट हो गये। तब अत्यन्त शीत, वर्षा एवं धूपसे अत्यधिक दुःखी उन्होंने (शीत-उष्ण आदि) द्वन्द्वोंसे पीड़ित होते हुए आवरणोंकी रचना की। तब मधुसहित कल्पवृक्षोंके नष्ट हो जानेपर उन्होंने द्वन्द्वोंके निराकरणका उपाय विचारकर जीविका-निर्वाहके साधनोंका चिन्तन किया। तदनन्तर त्रेतायुगमें उन प्रजाओंकी जीविकाको सिद्ध करनेवाली अन्य सिद्धि पुनः प्रादुर्भूत हुई और उनकी इच्छाके अनुकूल वृष्टि हुई॥ ३६-३९॥

निरन्तर वर्षाके कारण जो जल नीचेकी ओर प्रवाहित हुआ, उससे उन (प्रजाओं)-के लिये अनेक स्रोतों तथा नदियोंकी उत्पत्ति हुई। जब पृथ्वीतलपर थोड़ा जल एकत्र हो गया तो भूमि और जलका संयोग होनेसे अनेक प्रकारकी ओषधियाँ उत्पन्न हो गयीं॥ ४०-४१॥


* कर्तव्य-पालनमें प्रमाद होनेसे विपर्यय (करने योग्य कर्मका न करना, न करने योग्य कर्मका करना) होता है। यह विपर्यय ही परम्परया दुर्दुष्टका कारण होता है। यह दुर्दुष्ट ही राग, द्वेष तथा लोभकी भावना उत्पन्न करता है।

  • अध्याय २७ * । १७७

अफालकृष्टाश्चानुग्मा ग्राम्यारण्याश्चतुर्दश ।<br>ऋतुपुष्पफलैश्चैव वृक्षगुल्माश्च जज्ञिरे ॥ ४२ ॥बिना जोते-बोये ही विभिन्न ऋतुओंमें होनेवाले पुष्प एवं फलोंसे युक्त चौदह प्रकारके ग्राम्य एवं जंगली वृक्ष और गुल्म उत्पन्न हो गये। तदनन्तर त्रेतायुगके प्रभावसे भवितव्यतावश उन प्रजाओंमें निश्चितरूपसे सब प्रकारसे राग और लोभ^१ व्याप्त हो गया। तदुपरान्त उन लोगोंने अपनी-अपनी शक्तिके अनुसार बलपूर्वक नदियों, क्षेत्रों, पर्वतों, वृक्षों, गुल्मों तथा औषधियोंपर अधिकार जमाना प्रारम्भ किया। उनके विपरीत आचरणके कारण वे सभी औषधियाँ पृथ्वीमें प्रविष्ट हो गयीं। तब महाराज पृथुने पितामहके आदेशसे पृथ्वीका दोहन किया॥ ४२–४५॥
ततः प्रादुरभूत् तासां रागो लोभश्च सर्वशः ।<br>अवश्यं भाविनाऽर्थेन त्रेतायुगवशेन वै ॥ ४३ ॥
ततस्ताः पर्यगृह्णन्त नदीक्षेत्राणि पर्वतान् ।<br>वृक्षगुल्मौषधीश्चैव प्रसह्य तु यथाबलम् ॥ ४४ ॥
विपर्ययेण तासां ता ओषध्यो विविशुर्महीम् ।<br>पितामहनियोगेन दुदोह पृथिवीं पृथुः ॥ ४५ ॥
ततस्ता जगृहुः सर्वा अन्योन्यं क्रोधमूर्च्छिताः ।<br>वसुदारधनाद्यांस्तु बलात् कालबलेन तु ॥ ४६ ॥तदनन्तर कालके प्रभावसे वे सभी प्रजाएँ क्रोधाभिभूत होकर एक-दूसरेकी जमीन, धन, स्त्री आदिको बलपूर्वक ग्रहण करने लगे। ऐसी अव्यवस्था देखकर भगवान् ब्रह्माने मर्यादाकी रक्षा करनेके लिये और ब्राह्मणोंके कल्याणके लिये क्षत्रियोंकी सृष्टि की। प्रभुने त्रेतायुगमें वर्ण तथा आश्रमकी व्यवस्था और पशुहिंसासे रहित यज्ञोंका प्रवर्तन किया। द्वापरमें लोगोंमें सदा मतभेद, राग, लोभ, युद्ध तथा तत्त्वोंके निश्चयका असामर्थ्य रहता है। एक ही वेद त्रेतामें चार पादोंमें विभक्त किया जाता है और द्वापर आदि युगोंमें वेदव्यासके द्वारा वही वेद चार भागोंमें बाँटा जाता है^२॥ ४६–५०॥
मर्यादायाः प्रतिष्ठार्थं ज्ञात्वैतद् भगवानजः ।<br>ससर्ज क्षत्रियान् ब्रह्मा ब्राह्मणानां हिताय च ॥ ४७ ॥
वर्णाश्रमव्यवस्थां च त्रेतायां कृतवान् प्रभुः ।<br>यज्ञप्रवर्तनं चैव पशुहिंसाविवर्जितम् ॥ ४८ ॥
द्वापरेष्वथ विद्यन्ते मतिभेदाः सदा नृणाम् ।<br>रागो लोभस्तथा युद्धं तत्त्वानामविनिश्चयः ॥ ४९ ॥
एको वेदश्चतुष्पादस्त्रेतास्विह विधीयते ।<br>वेदव्यासैश्चतुर्धा तु व्यस्यते द्वापरादिषु ॥ ५० ॥
ऋषिपुत्रैः पुनर्भेद्राद् भिद्यन्ते दृष्टिविभ्रमैः ।<br>मन्त्रब्राह्मणविन्यासैः स्वरवर्णविपर्ययैः ॥ ५१ ॥ऋषिपुत्रोंने पुनः भ्रान्तदृष्ट्या मन्त्र और ब्राह्मणोंके विन्यास तथा स्वर एवं वर्णके व्यतिक्रमसे विभक्त वेदोंके पुनः विभाग किये। वैदिक ऋषियोंने कहीं-कहीं समानता, विशेषता और दृष्टि-भेदके आधारपर ऋक्, यजुः एवं साम-संज्ञक मन्त्रोंकी संहिताओंका संकलन किया। हे सुव्रत! (उन ऋषियोंने) ब्राह्मण, कल्पसूत्र, मन्त्रों, इतिहास-पुराण और धर्मशास्त्रोंका उपदेश किया है॥ ५१–५३॥
संहिता ऋग्यजुःसाम्नां संहन्यन्ते श्रुतर्षिभिः ।<br>सामान्याद् वैकृताच्चैव दृष्टिभेदैः क्वचित् क्वचित् ॥ ५२ ॥
ब्राह्मणं कल्पसूत्राणि मन्त्रप्रवचनानि च ।<br>इतिहासपुराणानि धर्मशास्त्राणि सुव्रत ॥ ५३ ॥
अवृष्टिर्मरणं चैव तथैव व्याध्युपद्रवाः ।<br>वाङ्मनःकायजैर्दुःखैर्निर्वेदो जायते नृणाम् ॥ ५४ ॥अवर्षण, मृत्यु, अनेक व्याधियों, उपद्रवों और मन, वाणी तथा शरीर-सम्बन्धी दुःखोंके कारण मनुष्योंको निर्वेद उत्पन्न होता है। फिर निर्वेदके कारण उनमें दुःखसे मुक्ति पानेका विचार पैदा होता है और विचारसे वैराग्य उत्पन्न होता है तथा वैराग्यसे अपने दोष दिखलायी पड़ते हैं॥ ५४-५५॥
निर्वेदाज्जायते तेषां दुःखमोक्षविचारणा ।<br>विचारणाच्च वैराग्यं वैराग्याद् दोषदर्शनम् ॥ ५५ ॥

१-सुख-सुविधाकी अधिकता भी राग आदिका कारण बनती है।
२-सत्य एवं त्रेतायुगमें वेद एक ही होता है, उसके पाद चार होते हैं। द्वापर एवं कलियुगमें एक वेद चार वेदके रूपमें विभक्त हो जाता है। इन चार वेदोंकी ११३ शाखाएँ होती हैं। अध्येताओंके सामर्थ्यकी दृष्टिसे इसे व्यास कहते हैं।

१७८ * कूर्मपुराण *


दोषाणां दर्शनाच्चैव द्वापरे ज्ञानसम्भवः।<br>एषा रजस्तमोयुक्ता वृत्तिर्वै द्वापरे स्मृता॥ ५६॥<br><br>आद्ये कृते तु धर्मोऽस्ति स त्रेतायां प्रवर्तते।<br>द्वापरे व्याकुलीभूत्वा प्रणश्यति कलौ युगे॥ ५७॥दोष-दर्शनके कारण द्वापरमें ज्ञान उत्पन्न होता है। द्वापरमें यह वृत्ति रजोगुण और तमोगुणसे युक्त कही गयी है। आद्य (सर्वप्रथम) कृतयुगमें धर्म प्रतिष्ठित था, वह त्रेतामें भी रहता है, द्वापरमें व्याकुल होकर वह धर्म कलियुगमें विलुप्त हो जाता है॥ ५६-५७॥

इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायां पूर्वविभागे सप्तविंशोऽध्यायः॥ २७॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें सत्ताईसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ २७॥


अट्ठाईसवाँ अध्याय

कलियुगके धर्मोंका वर्णन, कलियुगमें शिव-पूजनकी विशेष महिमाका ख्यापन, व्यासकृत शिवस्तुति, व्यासप्रेरित अर्जुनका शिवपुरीमें जाना और व्यासद्वारा शिवभक्त अर्जुनकी महिमा

व्यास उवाचव्यासजीने कहा—कलियुगमें मनुष्य सदा तमोगुणसे आवृत रहते हैं, इसीलिये माया, असूया (गुणोंमें दोषदर्शन) तथा तपस्वियोंके वधमें ही लगे रहते हैं। कलियुगमें प्राणहन्ता रोग, निरन्तर भूखका कष्ट, अवर्षणका भयंकर भय तथा देशोंका उलट-फेर होता रहता है। कलियुगमें उत्पन्न हुए दुष्ट मनुष्य अधार्मिक, सदाचारसे रहित, अत्यन्त क्रोधी, दुर्बल चित्तवाले तथा लोभी होते हैं और झूठ बोलते हैं। ब्राह्मणोंके असत् उद्देश्य, असत् अध्ययन, दुराचार तथा दूषित शास्त्रोंके अभ्यास और बुरे कर्मके दोषसे प्रजामें भय उत्पन्न होता है। द्विजाति लोग कलियुगमें वेदोंका अध्ययन नहीं करते और न यज्ञ ही करते हैं। अल्प बुद्धिवाले (यज्ञ करनेकी योग्यतासे रहित) लोग यज्ञ करते हैं और अन्यायपूर्वक वेदोंको पढ़ते हैं॥ १—५॥
तिष्ये मायामसूयां च वधं चैव तपस्विनाम्।<br>साधयन्ति नरा नित्यं तमसा व्याकुलीकृताः॥ १॥<br><br>कलौ प्रमारको रोगः सततं क्षुद्भयं तथा।<br>अनावृष्टिभयं घोरं देशानां च विपर्ययः॥ २॥<br><br>अधार्मिका अनाचारा महाकोपाल्पचेतसः।<br>अनृतं वदन्ति ते लुब्धास्तिष्ये जाताः सुदुःप्रजाः॥ ३॥<br><br>दुरिष्टैर्दुरधीतैश्च दुराचारैर्दुरागमौः।<br>विप्राणां कर्मदोषैश्च प्रजानां जायते भयम्॥ ४॥<br><br>नाधीयते कलौ वेदान् न यजन्ति द्विजातयः।<br>यजन्त्यन्यायतो वेदान् पठन्ते चाल्पबुद्धयः॥ ५॥
शूद्राणां मन्त्रयौनैश्च सम्बन्धो ब्राह्मणैः सह।<br>भविष्यति कलौ तस्मिञ् शयनासनभोजनैः॥ ६॥<br><br>राजानः शूद्रभूयिष्ठा ब्राह्मणान् बाधयन्ति च।<br>भ्रूणहत्या वीरहत्या प्रजायते नरेश्वर॥ ७॥कलियुगमें शूद्रोंका ब्राह्मणोंके साथ मन्त्र, योनि, शयन, आसन और भोजनके द्वारा सम्बन्ध हो जायगा*। नरेश्वर! अधिकांश राजा शूद्र होंगे, जो वस्तुतः राजा होनेके लिये अयोग्य होंगे; वे ब्राह्मणोंको पीड़ित करेंगे। भ्रूणहत्या और वीरहत्या प्रचलित हो जायगी॥ ६-७॥

* ब्राह्मणोंके शूद्र छोटे भाई हैं। बड़े भाईका छोटे भाईके प्रति अतिशय स्नेह होता है, अतः ब्राह्मण शूद्रोंसे स्नेहपूर्ण व्यवहार करते ही हैं और यही अन्य युगोंमें था, पर कलिमें सत्त्वगुणकी कमी होनेसे ऐसे व्यवहारका प्रायः अभाव हो जाता है तथा अधिकार, योग्यता एवं मर्यादाका अतिक्रमण कर लोभ या भयवश ब्राह्मण मन्त्रदीक्षा, योनि (वैवाहिक सम्बन्ध) आदि करने लगते हैं। यह यथार्थतः अनुचित है ही।

* अध्याय २८ *१७९
स्नानं होमं जपं दानं देवतानां तथार्चनम्।<br>अन्यानि चैव कर्माणि न कुर्वन्ति द्विजातयः॥ ८ ॥<br><br>विनिन्दन्ति महादेवं ब्राह्मणान् पुरुषोत्तमम्।<br>आम्नायधर्मशास्त्राणि पुराणानि कलौ युगे॥ ९ ॥<br><br>कुर्वन्त्यवेददृष्टानि कर्माणि विविधानि तु।<br>स्वधर्मेऽभिरुचिर्नैव ब्राह्मणानां प्रजायते॥ १०॥<br><br>कुशीलचर्याः पाषण्डैर्वृथारूपैः समावृताः।<br>बहुयाचनको लोको भविष्यति परस्परम्॥ ११॥<br><br>अट्टशूला जनपदाः शिवशूलाश्चतुष्पथाः।<br>प्रमदाः केशशूलिन्यो भविष्यन्ति कलौ युगे॥ १२॥<br><br>शुक्लदन्ता जिनाख्याश्च मुण्डाः काषायवाससः।<br>शूद्रा धर्मं चरिष्यन्ति युगान्ते समुपस्थिते॥ १३॥<br><br>शस्यचौरा भविष्यन्ति तथा चैलाभिमर्षिणः।<br>चौराश्चौरस्य हर्तारो हर्तुर्हर्ता तथापरः॥ १४॥<br><br>दुःखप्रचुरताल्पायुर्देहोत्साहः सरोगता।<br>अधर्माभिनिवेशित्वात् तमोवृत्तं कलौ स्मृतम्॥ १५॥<br><br>काषायिणोऽथ निर्ग्रन्थास्तथा कापालिकाश्च ये।<br>वेदविक्रयिणश्चान्ये तीर्थविक्रयिणः परे॥ १६॥<br><br>आसनस्थान् द्विजान् दृष्ट्वा न चलन्त्यल्पबुद्धयः।<br>ताडयन्ति द्विजेन्द्रांश्च शूद्रा राजोपजीविनः॥ १७॥<br><br>उच्चासनस्थाः शूद्रास्तु द्विजमध्ये परंतप।<br>ज्ञात्वा न हिंसते राजा कलौ कालबलेन तु॥ १८॥<br><br>पुष्पैश्च हसितैश्चैव तथान्यैर्मङ्गलैर्द्विजाः।<br>शूद्रानभ्यर्चयन्त्यल्पश्रुतभाग्यबलान्विताः ॥ १९॥<br><br>न प्रेक्षन्तेऽर्चितांश्चापि शूद्रा द्विजवरान् नृप।<br>सेवावसरमालोक्य द्वारि तिष्ठन्ति च द्विजाः॥ २०॥(कलियुगमें) द्विजाति लोग स्नान, होम, जप, दान, देवताओंका पूजन तथा अन्य (शुभ) कर्मोंको भी नहीं करेंगे। कलियुगमें महादेव शंकर, पुरुषोत्तम विष्णु, ब्राह्मणों, वेदों, धर्मशास्त्रों और पुराणोंकी लोग निन्दा करते हैं। (सभी लोग) वेदमें अविहित अनेक प्रकारके कर्मोंको करते हैं तथा ब्राह्मणोंकी अपने धर्ममें रुचि नहीं रहती॥ ८-१०॥<br><br>लोग कुत्सित आचारवाले एवं व्यर्थके पाखण्डोंसे युक्त हो जायँगे और संसार परस्परमें बहुत याचना करनेवाला हो जायगा। कलियुगमें जनपद अन्नविक्रयी, चौराहे वेदके विक्रयस्थल तथा स्त्रियाँ वेश्यावृत्तिवाली हो जायँगी। युगका अन्त आनेपर सफेद दाँतोंवाले, जिन नामवाले, मुण्डित, काषायवस्त्रधारी शूद्र पर-धर्माचरण करने लगेंगे। (लोग) अनाज और वस्त्रकी चोरी करनेवाले होंगे। चोर लोग चोरोंकी ही चोरी करेंगे और दूसरे चोर उस चोरका चुरायेंगे। दुःखकी अधिकता होगी, अल्प आयु होगी, देहमें आलस्य तथा रोग रहेगा। अधर्ममें विशेष प्रवृत्तिके कारण कलियुगमें सभी व्यवहार तामस होंगे॥ ११-१५॥<br><br>कुछ लोग काषायवस्त्र धारण करनेवाले, कुछ निर्ग्रन्थ (यज्ञोपवीत, शिखा आदिसे विहीन पंथवाले), कापालिक<sup></sup>, वेदविक्रयी तथा कुछ लोग तीर्थविक्रयी<sup></sup> हो जायँगे। (कलियुगमें) राजाका संरक्षण प्राप्तकर अल्पबुद्धिवाले शूद्र आसनपर स्थित द्विजोंको देखकर नहीं चलते (द्विजोचित व्यवहार नहीं करते) तथा श्रेष्ठ द्विजोंको प्रताड़ित करते हैं। परंतप! कलियुगमें समयके प्रभावसे द्विजोंके मध्यमें शूद्र उच्च आसनपर बैठते हैं, किंतु राजा जानकर भी उन्हें दण्ड नहीं देता। अल्प ज्ञान, अल्प भाग्य तथा अल्प बलवाले द्विज लोग पुष्पोंके द्वारा, मनोविनोदके साधन 'हास' आदिसे तथा अन्य माङ्गलिक पदार्थोंसे शूद्रोंकी पूजा करते हैं<sup></sup>। राजन्! शूद्र लोग पूजित श्रेष्ठ द्विजोंकी ओर देखतेतक नहीं और द्विज सेवाके अवसरकी प्रतीक्षा करते हुए उनके दरवाजेपर खड़े रहते हैं॥ १६-२०॥

१-पंथ-विशेष। २-अपने पुण्यको बेचनेवाले।
३-यदि कोई बड़ा लोभ या भयवश अपनेसे छोटेकी पूजा या अमर्यादित ढंगसे चापलूसी करे तो यह उचित नहीं है, निषिद्ध है।

१८०

  • कूर्मपुराण *

वाहनस्थान् समावृत्य शूद्रान् शूद्रोपजीविनः।<br>सेवन्ते ब्राह्मणास्तत्र स्तुवन्ति स्तुतिभिः कलौ ॥ २१ ॥<br><br>अध्यापयन्ति वै वेदान् शूद्रान् शूद्रोपजीविनः।<br>पठन्ति वैदिकान् मन्त्रान् नास्तिक्यं घोरमाश्रिताः ॥ २२ ॥<br><br>तपोयज्ञफलानां च विक्रेतारो द्विजोत्तमाः।<br>यतयश्च भविष्यन्ति शतशोऽथ सहस्रशः ॥ २३ ॥<br><br>नाशयन्ति ह्यधीतानि नाधिगच्छन्ति चानघ।<br>गायन्ति लौकिकैर्गानैर्देवतानि नराधिप ॥ २४ ॥<br><br>वामपाशुपताचारास्तथा वै पाञ्चरात्रिकाः।<br>भविष्यन्ति कलौ तस्मिन् ब्राह्मणाः क्षत्रियास्तथा ॥ २५ ॥<br><br>ज्ञानकर्मण्युपरते लोके निष्क्रियतां गते।<br>कीटमूषकसर्पाश्च धर्षयिष्यन्ति मानवान् ॥ २६ ॥<br><br>कुर्वन्ति चावताराणि ब्राह्मणानां कुलेषु वै।<br>दधीचशापनिर्दग्धाः पुरा दक्षाध्वरे द्विजाः ॥ २७ ॥<br><br>निन्दन्ति च महादेवं तमसाविष्टचेतसः।<br>वृथा धर्मं चरिष्यन्ति कलौ तस्मिन् युगान्तिके ॥ २८ ॥<br><br>ये चान्ये शापनिर्दग्धा गौतमस्य महात्मनः।<br>सर्वे ते च भविष्यन्ति ब्राह्मणाद्याः स्वजातिषु ॥ २९ ॥कलियुगमें शूद्रसे जीविका पानेवाले ब्राह्मण वाहनमें स्थित शूद्रोंको घेरकर स्तुतियोंद्वारा उनकी प्रशंसा करते हैं और सेवा करते हैं। शूद्रोंसे जीविका प्राप्त करनेवाले (ब्राह्मण) शूद्रोंको वेद^१ पढ़ाते हैं। घोर नास्तिकतावादी (शूद्र) वैदिक मन्त्रोंको पढ़ते हैं। जिनकी श्रेष्ठ द्विजके रूपमें समाजमें मान्यता होती है, वे लोग (अपने) तप एवं यज्ञके फलोंका विक्रय करनेवाले होते हैं। (आलस्य या प्रतिष्ठाके लिये) सैकड़ों एवं हजारोंकी संख्यामें लोग संन्यासी हो जायेंगे। हे निष्पाप राजन्! (कलियुगमें लोग) पढ़े हुएको भूल जाते हैं, अध्ययनके फल ज्ञानके लिये उत्सुक नहीं रहते। (वे) लौकिक गीतोंसे देवताओंकी स्तुति करते हैं॥ २१—२४॥<br><br>कलियुगमें ब्राह्मण तथा क्षत्रिय वाममार्गी, पाशुपताचारी तथा पाञ्चरात्रिक हो जायेंगे^२। ज्ञान तथा कर्मका लोप हो जाने और लोगोंके निष्क्रिय हो जानेपर कीड़े, चूहे तथा सर्प लोगोंको कष्ट पहुँचायेंगे। प्राचीन कालमें दक्ष प्रजापतिके यज्ञमें दधीचके शापसे दग्ध हुए द्विज ब्राह्मणोंके कुलमें उत्पन्न होंगे। कलियुगके अन्त समयमें तमोगुणसे व्याप्त मनवाले लोग महादेवकी निन्दा करेंगे और व्यर्थके धर्मों (धर्माभासों)-का आचरण करेंगे तथा जो दूसरे महात्मा गौतमके शापसे दग्ध हुए लोग थे, वे सभी ब्राह्मण आदि अपनी-अपनी जातियोंमें उत्पन्न होंगे॥ २५—२९॥

१-शूद्र चौथे वर्णका नाम है। शूद्र शब्दसे किसी हीनभावको समझना कथमपि शास्त्रसम्मत नहीं है। अपने छोटे भाईके प्रति हीनभाव अपनाना सर्वथा अनुचित है। वेदोंके अध्ययनसे विरत रहनेके लिये शूद्रोंको आदेश अवश्य दिया गया है, पर इसके मूलमें उनके प्रति कल्याणकी भावना ही निहित है। यह वास्तविकता है कि समग्र वेदोंका यथावत् अध्ययन करनेपर ही उनके द्वारा वह ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है, जो अधूरा न होकर परिपूर्ण होता है तथा सही अर्थमें कल्याणका साधन बनता है। जिन मनीषियोंने समग्र वेदोंका आकलन किया है, उन लोगोंने निरपेक्ष-भावसे यह भलीभाँति समझा है तथा परीक्षापूर्वक अनुभव किया है कि समग्र वेदोंका अध्ययन तीव्रतम तप एवं कठोरतम परिश्रम (सुदीर्घकालिक)-के बिना कथमपि सम्भव नहीं है और यह सुदीर्घकालिक तीव्रतम तप एवं कठोरतम परिश्रम प्रिय अनुज (छोटे भाई) शूद्र एवं अति कोमल प्रकृतिवाली स्त्रियाँ कथमपि नहीं कर सकतीं। अतएव विशेषकर इन्हींके कल्याणके लिये महाभारत तथा अन्यान्य पुराण आदि ग्रन्थोंका आविर्भाव हुआ। इन ग्रन्थोंमें सरल एवं रोचक पद्धतिसे वे ही ज्ञान-विज्ञान वर्णित हैं, जो वेदोंमें वर्णित हैं। योग्यता, अधिकार एवं अध्ययनके विधानके अनुसार इन (महाभारत आदि)-को अपनी अपेक्षाके अनुकूल जान-समझकर करनेसे कल्याण अवश्य ही प्राप्त होता है, जो वेदोंके समग्र अध्ययनसे प्राप्त होता है। इससे स्पष्ट है कि ज्ञानरूप फलकी दृष्टिसे मानव क्या प्राणिमात्र अपनी सामर्थ्यके अनुसार समान हैं। अतः वेदोंको पढ़नेके विषयमें जो शास्त्रीय व्यवस्था है, उसके प्रति अन्यथा-दृष्टि अपनाना भूल है।
२-यहाँ वाममार्ग आदिकी निन्दामें तात्पर्य नहीं है। वैदिक मार्गकी स्तुतिमें तात्पर्य है। शुद्ध सात्त्विक भावकी प्रमुखता वैदिक मार्गमें है, अतः वैदिक मार्ग प्रशस्ततम है। वाममार्ग आदिमें तो तामस-भाव एवं राजस-भावकी प्रमुखता है। अतः ये प्रशस्त नहीं हैं।