संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१७६ * कूर्मपुराण *
ततः कालेन महता तासामेव विपर्ययात्। रागलोभात्मको भावस्तदा ह्याकस्मिकोऽभवत्॥ २९॥
विपर्ययेण तासां तु तेन तत्कालभाविना। प्रणश्यन्ति ततः सर्वे वृक्षास्ते गृहसंज्ञिताः॥ ३०॥ ततस्तेषु प्रणष्टेषु विभ्रान्ता मैथुनोद्भवाः। अभिध्यायन्ति तां सिद्धिं सत्याभिध्यायिनस्तदा॥ ३१॥
प्रादुर्बभूवुस्तासां तु वृक्षास्ते गृहसंज्ञिताः। वस्त्राणि ते प्रसूयन्ते फलान्याभरणानि च॥ ३२॥
तेष्वेव जायते तासां गन्धवर्णरसान्वितम्। अमाक्षिकं महावीर्यं पुटके पुटके मधु॥ ३३॥
तेन ता वर्तयन्ति स्म त्रेतायुगमुखे प्रजाः। हृष्टपुष्टास्तया सिद्ध्या सर्वा वै विगतज्वराः॥ ३४॥
ततः कालान्तरेणैव पुनर्लोभावृतास्तदा। वृक्षांस्तान् पर्यगृह्णन्त मधु चामाक्षिकं बलात्॥ ३५॥ तासां तेनापचारेण पुनर्लोभकृतेन वै। प्रणष्टा मधुना सार्धं कल्पवृक्षाः क्वचित् क्वचित्॥ ३६॥
शीतवर्षातपैस्तीव्रैस्ततस्ता दुःखिता भृशम्। द्वन्द्वैः सम्पीड़्यमानास्तु चक्रुरावरणानि च॥ ३७॥
कृत्वा द्वन्द्वप्रतीघातान् वार्तोपायमचिन्तयन्। नष्टेषु मधुना सार्धं कल्पवृक्षेषु वै तदा॥ ३८॥
ततः प्रादुर्बभौ तासां सिद्धिस्त्रेतायुगे पुनः। वार्तायाः साधिका ह्यान्या वृष्टिस्तासां निकामतः॥ ३९॥ तासां वृष्ट्युदकानीह यानि निम्नैर्गतानि तु। अवहन् वृष्टिसंतत्या स्रोतःस्थानानि निम्नगाः॥ ४०॥
ये पुनस्तदपां स्तोका आपन्नाः पृथिवीतले। अपां भूमेश्च संयोगादोषध्यस्तास्तदाभवन्॥ ४१॥
तदनन्तर बहुत समय व्यतीत होनेपर उन प्रजाओंके ही विपर्ययसे* उनमें अचानक ही राग और लोभका भाव उत्पन्न हो गया। तदनन्तर उनके उलट-फेर (दिनचर्यामें व्यत्यय)-के कारण उस समयके प्रभाववश वे गृह-संज्ञक सभी वृक्ष नष्ट हो गये॥ २९-३०॥
तब उन (वृक्षों)-के नष्ट हो जानेपर मिथुनधर्मसे उत्पन्न सत्यका ध्यान करनेवाले वे सभी प्रजाजन विभ्रान्त होकर उस पूर्व वर्णित सिद्धिका ध्यान करने लगे। उस समय (सत्यका ध्यान करनेके कारण) उन प्रजाओंके (लुप्त) वे गृह-संज्ञक वृक्ष पुनः प्रादुर्भूत हो गये। वे वस्त्रों, आभूषणों तथा फलोंको उत्पन्न करने लगे। उन प्रजाओंके लिये उन वृक्षोंके प्रत्येक पत्रपुटोंमें गन्ध, वर्ण और रससे समन्वित, बिना मधु-मक्खियोंके बना हुआ महान् शक्तिशाली मधु उत्पन्न होता था। उसी (मधु)-से त्रेतायुगके आरम्भमें वे प्रजाएँ जीवन-निर्वाह करती थीं। उस सिद्धिके कारण वे सारी प्रजाएँ हृष्ट-पुष्ट तथा ज्वरसे रहित थीं। तदनन्तर कालान्तरमें वे सभी पुनः लोभके वशीभूत हो गये। अब वे उन वृक्षों तथा उनसे उत्पन्न अमाक्षिक (मक्षिकाद्वारा न बनाये हुए) मधुको बलपूर्वक ग्रहण करने लगे॥ ३१-३५॥
उनके इस प्रकार पुनः लोभ करनेके कारण उत्पन्न दुष्कर्मसे वे कल्पवृक्ष कहीं-कहीं मधुके साथ ही नष्ट हो गये। तब अत्यन्त शीत, वर्षा एवं धूपसे अत्यधिक दुःखी उन्होंने (शीत-उष्ण आदि) द्वन्द्वोंसे पीड़ित होते हुए आवरणोंकी रचना की। तब मधुसहित कल्पवृक्षोंके नष्ट हो जानेपर उन्होंने द्वन्द्वोंके निराकरणका उपाय विचारकर जीविका-निर्वाहके साधनोंका चिन्तन किया। तदनन्तर त्रेतायुगमें उन प्रजाओंकी जीविकाको सिद्ध करनेवाली अन्य सिद्धि पुनः प्रादुर्भूत हुई और उनकी इच्छाके अनुकूल वृष्टि हुई॥ ३६-३९॥
निरन्तर वर्षाके कारण जो जल नीचेकी ओर प्रवाहित हुआ, उससे उन (प्रजाओं)-के लिये अनेक स्रोतों तथा नदियोंकी उत्पत्ति हुई। जब पृथ्वीतलपर थोड़ा जल एकत्र हो गया तो भूमि और जलका संयोग होनेसे अनेक प्रकारकी ओषधियाँ उत्पन्न हो गयीं॥ ४०-४१॥
* कर्तव्य-पालनमें प्रमाद होनेसे विपर्यय (करने योग्य कर्मका न करना, न करने योग्य कर्मका करना) होता है। यह विपर्यय ही परम्परया दुर्दुष्टका कारण होता है। यह दुर्दुष्ट ही राग, द्वेष तथा लोभकी भावना उत्पन्न करता है।