भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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  • अध्याय २७ * । १७७

अफालकृष्टाश्चानुग्मा ग्राम्यारण्याश्चतुर्दश ।<br>ऋतुपुष्पफलैश्चैव वृक्षगुल्माश्च जज्ञिरे ॥ ४२ ॥बिना जोते-बोये ही विभिन्न ऋतुओंमें होनेवाले पुष्प एवं फलोंसे युक्त चौदह प्रकारके ग्राम्य एवं जंगली वृक्ष और गुल्म उत्पन्न हो गये। तदनन्तर त्रेतायुगके प्रभावसे भवितव्यतावश उन प्रजाओंमें निश्चितरूपसे सब प्रकारसे राग और लोभ^१ व्याप्त हो गया। तदुपरान्त उन लोगोंने अपनी-अपनी शक्तिके अनुसार बलपूर्वक नदियों, क्षेत्रों, पर्वतों, वृक्षों, गुल्मों तथा औषधियोंपर अधिकार जमाना प्रारम्भ किया। उनके विपरीत आचरणके कारण वे सभी औषधियाँ पृथ्वीमें प्रविष्ट हो गयीं। तब महाराज पृथुने पितामहके आदेशसे पृथ्वीका दोहन किया॥ ४२–४५॥
ततः प्रादुरभूत् तासां रागो लोभश्च सर्वशः ।<br>अवश्यं भाविनाऽर्थेन त्रेतायुगवशेन वै ॥ ४३ ॥
ततस्ताः पर्यगृह्णन्त नदीक्षेत्राणि पर्वतान् ।<br>वृक्षगुल्मौषधीश्चैव प्रसह्य तु यथाबलम् ॥ ४४ ॥
विपर्ययेण तासां ता ओषध्यो विविशुर्महीम् ।<br>पितामहनियोगेन दुदोह पृथिवीं पृथुः ॥ ४५ ॥
ततस्ता जगृहुः सर्वा अन्योन्यं क्रोधमूर्च्छिताः ।<br>वसुदारधनाद्यांस्तु बलात् कालबलेन तु ॥ ४६ ॥तदनन्तर कालके प्रभावसे वे सभी प्रजाएँ क्रोधाभिभूत होकर एक-दूसरेकी जमीन, धन, स्त्री आदिको बलपूर्वक ग्रहण करने लगे। ऐसी अव्यवस्था देखकर भगवान् ब्रह्माने मर्यादाकी रक्षा करनेके लिये और ब्राह्मणोंके कल्याणके लिये क्षत्रियोंकी सृष्टि की। प्रभुने त्रेतायुगमें वर्ण तथा आश्रमकी व्यवस्था और पशुहिंसासे रहित यज्ञोंका प्रवर्तन किया। द्वापरमें लोगोंमें सदा मतभेद, राग, लोभ, युद्ध तथा तत्त्वोंके निश्चयका असामर्थ्य रहता है। एक ही वेद त्रेतामें चार पादोंमें विभक्त किया जाता है और द्वापर आदि युगोंमें वेदव्यासके द्वारा वही वेद चार भागोंमें बाँटा जाता है^२॥ ४६–५०॥
मर्यादायाः प्रतिष्ठार्थं ज्ञात्वैतद् भगवानजः ।<br>ससर्ज क्षत्रियान् ब्रह्मा ब्राह्मणानां हिताय च ॥ ४७ ॥
वर्णाश्रमव्यवस्थां च त्रेतायां कृतवान् प्रभुः ।<br>यज्ञप्रवर्तनं चैव पशुहिंसाविवर्जितम् ॥ ४८ ॥
द्वापरेष्वथ विद्यन्ते मतिभेदाः सदा नृणाम् ।<br>रागो लोभस्तथा युद्धं तत्त्वानामविनिश्चयः ॥ ४९ ॥
एको वेदश्चतुष्पादस्त्रेतास्विह विधीयते ।<br>वेदव्यासैश्चतुर्धा तु व्यस्यते द्वापरादिषु ॥ ५० ॥
ऋषिपुत्रैः पुनर्भेद्राद् भिद्यन्ते दृष्टिविभ्रमैः ।<br>मन्त्रब्राह्मणविन्यासैः स्वरवर्णविपर्ययैः ॥ ५१ ॥ऋषिपुत्रोंने पुनः भ्रान्तदृष्ट्या मन्त्र और ब्राह्मणोंके विन्यास तथा स्वर एवं वर्णके व्यतिक्रमसे विभक्त वेदोंके पुनः विभाग किये। वैदिक ऋषियोंने कहीं-कहीं समानता, विशेषता और दृष्टि-भेदके आधारपर ऋक्, यजुः एवं साम-संज्ञक मन्त्रोंकी संहिताओंका संकलन किया। हे सुव्रत! (उन ऋषियोंने) ब्राह्मण, कल्पसूत्र, मन्त्रों, इतिहास-पुराण और धर्मशास्त्रोंका उपदेश किया है॥ ५१–५३॥
संहिता ऋग्यजुःसाम्नां संहन्यन्ते श्रुतर्षिभिः ।<br>सामान्याद् वैकृताच्चैव दृष्टिभेदैः क्वचित् क्वचित् ॥ ५२ ॥
ब्राह्मणं कल्पसूत्राणि मन्त्रप्रवचनानि च ।<br>इतिहासपुराणानि धर्मशास्त्राणि सुव्रत ॥ ५३ ॥
अवृष्टिर्मरणं चैव तथैव व्याध्युपद्रवाः ।<br>वाङ्मनःकायजैर्दुःखैर्निर्वेदो जायते नृणाम् ॥ ५४ ॥अवर्षण, मृत्यु, अनेक व्याधियों, उपद्रवों और मन, वाणी तथा शरीर-सम्बन्धी दुःखोंके कारण मनुष्योंको निर्वेद उत्पन्न होता है। फिर निर्वेदके कारण उनमें दुःखसे मुक्ति पानेका विचार पैदा होता है और विचारसे वैराग्य उत्पन्न होता है तथा वैराग्यसे अपने दोष दिखलायी पड़ते हैं॥ ५४-५५॥
निर्वेदाज्जायते तेषां दुःखमोक्षविचारणा ।<br>विचारणाच्च वैराग्यं वैराग्याद् दोषदर्शनम् ॥ ५५ ॥

१-सुख-सुविधाकी अधिकता भी राग आदिका कारण बनती है।
२-सत्य एवं त्रेतायुगमें वेद एक ही होता है, उसके पाद चार होते हैं। द्वापर एवं कलियुगमें एक वेद चार वेदके रूपमें विभक्त हो जाता है। इन चार वेदोंकी ११३ शाखाएँ होती हैं। अध्येताओंके सामर्थ्यकी दृष्टिसे इसे व्यास कहते हैं।