भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished506 पृष्ठ

पृष्ठ 188, कुल 506 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 188

१७८ * कूर्मपुराण *


दोषाणां दर्शनाच्चैव द्वापरे ज्ञानसम्भवः।<br>एषा रजस्तमोयुक्ता वृत्तिर्वै द्वापरे स्मृता॥ ५६॥<br><br>आद्ये कृते तु धर्मोऽस्ति स त्रेतायां प्रवर्तते।<br>द्वापरे व्याकुलीभूत्वा प्रणश्यति कलौ युगे॥ ५७॥दोष-दर्शनके कारण द्वापरमें ज्ञान उत्पन्न होता है। द्वापरमें यह वृत्ति रजोगुण और तमोगुणसे युक्त कही गयी है। आद्य (सर्वप्रथम) कृतयुगमें धर्म प्रतिष्ठित था, वह त्रेतामें भी रहता है, द्वापरमें व्याकुल होकर वह धर्म कलियुगमें विलुप्त हो जाता है॥ ५६-५७॥

इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायां पूर्वविभागे सप्तविंशोऽध्यायः॥ २७॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें सत्ताईसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ २७॥


अट्ठाईसवाँ अध्याय

कलियुगके धर्मोंका वर्णन, कलियुगमें शिव-पूजनकी विशेष महिमाका ख्यापन, व्यासकृत शिवस्तुति, व्यासप्रेरित अर्जुनका शिवपुरीमें जाना और व्यासद्वारा शिवभक्त अर्जुनकी महिमा

व्यास उवाचव्यासजीने कहा—कलियुगमें मनुष्य सदा तमोगुणसे आवृत रहते हैं, इसीलिये माया, असूया (गुणोंमें दोषदर्शन) तथा तपस्वियोंके वधमें ही लगे रहते हैं। कलियुगमें प्राणहन्ता रोग, निरन्तर भूखका कष्ट, अवर्षणका भयंकर भय तथा देशोंका उलट-फेर होता रहता है। कलियुगमें उत्पन्न हुए दुष्ट मनुष्य अधार्मिक, सदाचारसे रहित, अत्यन्त क्रोधी, दुर्बल चित्तवाले तथा लोभी होते हैं और झूठ बोलते हैं। ब्राह्मणोंके असत् उद्देश्य, असत् अध्ययन, दुराचार तथा दूषित शास्त्रोंके अभ्यास और बुरे कर्मके दोषसे प्रजामें भय उत्पन्न होता है। द्विजाति लोग कलियुगमें वेदोंका अध्ययन नहीं करते और न यज्ञ ही करते हैं। अल्प बुद्धिवाले (यज्ञ करनेकी योग्यतासे रहित) लोग यज्ञ करते हैं और अन्यायपूर्वक वेदोंको पढ़ते हैं॥ १—५॥
तिष्ये मायामसूयां च वधं चैव तपस्विनाम्।<br>साधयन्ति नरा नित्यं तमसा व्याकुलीकृताः॥ १॥<br><br>कलौ प्रमारको रोगः सततं क्षुद्भयं तथा।<br>अनावृष्टिभयं घोरं देशानां च विपर्ययः॥ २॥<br><br>अधार्मिका अनाचारा महाकोपाल्पचेतसः।<br>अनृतं वदन्ति ते लुब्धास्तिष्ये जाताः सुदुःप्रजाः॥ ३॥<br><br>दुरिष्टैर्दुरधीतैश्च दुराचारैर्दुरागमौः।<br>विप्राणां कर्मदोषैश्च प्रजानां जायते भयम्॥ ४॥<br><br>नाधीयते कलौ वेदान् न यजन्ति द्विजातयः।<br>यजन्त्यन्यायतो वेदान् पठन्ते चाल्पबुद्धयः॥ ५॥
शूद्राणां मन्त्रयौनैश्च सम्बन्धो ब्राह्मणैः सह।<br>भविष्यति कलौ तस्मिञ् शयनासनभोजनैः॥ ६॥<br><br>राजानः शूद्रभूयिष्ठा ब्राह्मणान् बाधयन्ति च।<br>भ्रूणहत्या वीरहत्या प्रजायते नरेश्वर॥ ७॥कलियुगमें शूद्रोंका ब्राह्मणोंके साथ मन्त्र, योनि, शयन, आसन और भोजनके द्वारा सम्बन्ध हो जायगा*। नरेश्वर! अधिकांश राजा शूद्र होंगे, जो वस्तुतः राजा होनेके लिये अयोग्य होंगे; वे ब्राह्मणोंको पीड़ित करेंगे। भ्रूणहत्या और वीरहत्या प्रचलित हो जायगी॥ ६-७॥

* ब्राह्मणोंके शूद्र छोटे भाई हैं। बड़े भाईका छोटे भाईके प्रति अतिशय स्नेह होता है, अतः ब्राह्मण शूद्रोंसे स्नेहपूर्ण व्यवहार करते ही हैं और यही अन्य युगोंमें था, पर कलिमें सत्त्वगुणकी कमी होनेसे ऐसे व्यवहारका प्रायः अभाव हो जाता है तथा अधिकार, योग्यता एवं मर्यादाका अतिक्रमण कर लोभ या भयवश ब्राह्मण मन्त्रदीक्षा, योनि (वैवाहिक सम्बन्ध) आदि करने लगते हैं। यह यथार्थतः अनुचित है ही।

संक्षिप्त कूर्मपुराण · पृष्ठ 188, कुल 506 में से · BharatKosha