संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| * अध्याय २८ * | १७९ |
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| स्नानं होमं जपं दानं देवतानां तथार्चनम्।<br>अन्यानि चैव कर्माणि न कुर्वन्ति द्विजातयः॥ ८ ॥<br><br>विनिन्दन्ति महादेवं ब्राह्मणान् पुरुषोत्तमम्।<br>आम्नायधर्मशास्त्राणि पुराणानि कलौ युगे॥ ९ ॥<br><br>कुर्वन्त्यवेददृष्टानि कर्माणि विविधानि तु।<br>स्वधर्मेऽभिरुचिर्नैव ब्राह्मणानां प्रजायते॥ १०॥<br><br>कुशीलचर्याः पाषण्डैर्वृथारूपैः समावृताः।<br>बहुयाचनको लोको भविष्यति परस्परम्॥ ११॥<br><br>अट्टशूला जनपदाः शिवशूलाश्चतुष्पथाः।<br>प्रमदाः केशशूलिन्यो भविष्यन्ति कलौ युगे॥ १२॥<br><br>शुक्लदन्ता जिनाख्याश्च मुण्डाः काषायवाससः।<br>शूद्रा धर्मं चरिष्यन्ति युगान्ते समुपस्थिते॥ १३॥<br><br>शस्यचौरा भविष्यन्ति तथा चैलाभिमर्षिणः।<br>चौराश्चौरस्य हर्तारो हर्तुर्हर्ता तथापरः॥ १४॥<br><br>दुःखप्रचुरताल्पायुर्देहोत्साहः सरोगता।<br>अधर्माभिनिवेशित्वात् तमोवृत्तं कलौ स्मृतम्॥ १५॥<br><br>काषायिणोऽथ निर्ग्रन्थास्तथा कापालिकाश्च ये।<br>वेदविक्रयिणश्चान्ये तीर्थविक्रयिणः परे॥ १६॥<br><br>आसनस्थान् द्विजान् दृष्ट्वा न चलन्त्यल्पबुद्धयः।<br>ताडयन्ति द्विजेन्द्रांश्च शूद्रा राजोपजीविनः॥ १७॥<br><br>उच्चासनस्थाः शूद्रास्तु द्विजमध्ये परंतप।<br>ज्ञात्वा न हिंसते राजा कलौ कालबलेन तु॥ १८॥<br><br>पुष्पैश्च हसितैश्चैव तथान्यैर्मङ्गलैर्द्विजाः।<br>शूद्रानभ्यर्चयन्त्यल्पश्रुतभाग्यबलान्विताः ॥ १९॥<br><br>न प्रेक्षन्तेऽर्चितांश्चापि शूद्रा द्विजवरान् नृप।<br>सेवावसरमालोक्य द्वारि तिष्ठन्ति च द्विजाः॥ २०॥ | (कलियुगमें) द्विजाति लोग स्नान, होम, जप, दान, देवताओंका पूजन तथा अन्य (शुभ) कर्मोंको भी नहीं करेंगे। कलियुगमें महादेव शंकर, पुरुषोत्तम विष्णु, ब्राह्मणों, वेदों, धर्मशास्त्रों और पुराणोंकी लोग निन्दा करते हैं। (सभी लोग) वेदमें अविहित अनेक प्रकारके कर्मोंको करते हैं तथा ब्राह्मणोंकी अपने धर्ममें रुचि नहीं रहती॥ ८-१०॥<br><br>लोग कुत्सित आचारवाले एवं व्यर्थके पाखण्डोंसे युक्त हो जायँगे और संसार परस्परमें बहुत याचना करनेवाला हो जायगा। कलियुगमें जनपद अन्नविक्रयी, चौराहे वेदके विक्रयस्थल तथा स्त्रियाँ वेश्यावृत्तिवाली हो जायँगी। युगका अन्त आनेपर सफेद दाँतोंवाले, जिन नामवाले, मुण्डित, काषायवस्त्रधारी शूद्र पर-धर्माचरण करने लगेंगे। (लोग) अनाज और वस्त्रकी चोरी करनेवाले होंगे। चोर लोग चोरोंकी ही चोरी करेंगे और दूसरे चोर उस चोरका चुरायेंगे। दुःखकी अधिकता होगी, अल्प आयु होगी, देहमें आलस्य तथा रोग रहेगा। अधर्ममें विशेष प्रवृत्तिके कारण कलियुगमें सभी व्यवहार तामस होंगे॥ ११-१५॥<br><br>कुछ लोग काषायवस्त्र धारण करनेवाले, कुछ निर्ग्रन्थ (यज्ञोपवीत, शिखा आदिसे विहीन पंथवाले), कापालिक<sup>१</sup>, वेदविक्रयी तथा कुछ लोग तीर्थविक्रयी<sup>२</sup> हो जायँगे। (कलियुगमें) राजाका संरक्षण प्राप्तकर अल्पबुद्धिवाले शूद्र आसनपर स्थित द्विजोंको देखकर नहीं चलते (द्विजोचित व्यवहार नहीं करते) तथा श्रेष्ठ द्विजोंको प्रताड़ित करते हैं। परंतप! कलियुगमें समयके प्रभावसे द्विजोंके मध्यमें शूद्र उच्च आसनपर बैठते हैं, किंतु राजा जानकर भी उन्हें दण्ड नहीं देता। अल्प ज्ञान, अल्प भाग्य तथा अल्प बलवाले द्विज लोग पुष्पोंके द्वारा, मनोविनोदके साधन 'हास' आदिसे तथा अन्य माङ्गलिक पदार्थोंसे शूद्रोंकी पूजा करते हैं<sup>३</sup>। राजन्! शूद्र लोग पूजित श्रेष्ठ द्विजोंकी ओर देखतेतक नहीं और द्विज सेवाके अवसरकी प्रतीक्षा करते हुए उनके दरवाजेपर खड़े रहते हैं॥ १६-२०॥ |
१-पंथ-विशेष। २-अपने पुण्यको बेचनेवाले।
३-यदि कोई बड़ा लोभ या भयवश अपनेसे छोटेकी पूजा या अमर्यादित ढंगसे चापलूसी करे तो यह उचित नहीं है, निषिद्ध है।