भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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  • कूर्मपुराण *

वाहनस्थान् समावृत्य शूद्रान् शूद्रोपजीविनः।<br>सेवन्ते ब्राह्मणास्तत्र स्तुवन्ति स्तुतिभिः कलौ ॥ २१ ॥<br><br>अध्यापयन्ति वै वेदान् शूद्रान् शूद्रोपजीविनः।<br>पठन्ति वैदिकान् मन्त्रान् नास्तिक्यं घोरमाश्रिताः ॥ २२ ॥<br><br>तपोयज्ञफलानां च विक्रेतारो द्विजोत्तमाः।<br>यतयश्च भविष्यन्ति शतशोऽथ सहस्रशः ॥ २३ ॥<br><br>नाशयन्ति ह्यधीतानि नाधिगच्छन्ति चानघ।<br>गायन्ति लौकिकैर्गानैर्देवतानि नराधिप ॥ २४ ॥<br><br>वामपाशुपताचारास्तथा वै पाञ्चरात्रिकाः।<br>भविष्यन्ति कलौ तस्मिन् ब्राह्मणाः क्षत्रियास्तथा ॥ २५ ॥<br><br>ज्ञानकर्मण्युपरते लोके निष्क्रियतां गते।<br>कीटमूषकसर्पाश्च धर्षयिष्यन्ति मानवान् ॥ २६ ॥<br><br>कुर्वन्ति चावताराणि ब्राह्मणानां कुलेषु वै।<br>दधीचशापनिर्दग्धाः पुरा दक्षाध्वरे द्विजाः ॥ २७ ॥<br><br>निन्दन्ति च महादेवं तमसाविष्टचेतसः।<br>वृथा धर्मं चरिष्यन्ति कलौ तस्मिन् युगान्तिके ॥ २८ ॥<br><br>ये चान्ये शापनिर्दग्धा गौतमस्य महात्मनः।<br>सर्वे ते च भविष्यन्ति ब्राह्मणाद्याः स्वजातिषु ॥ २९ ॥कलियुगमें शूद्रसे जीविका पानेवाले ब्राह्मण वाहनमें स्थित शूद्रोंको घेरकर स्तुतियोंद्वारा उनकी प्रशंसा करते हैं और सेवा करते हैं। शूद्रोंसे जीविका प्राप्त करनेवाले (ब्राह्मण) शूद्रोंको वेद^१ पढ़ाते हैं। घोर नास्तिकतावादी (शूद्र) वैदिक मन्त्रोंको पढ़ते हैं। जिनकी श्रेष्ठ द्विजके रूपमें समाजमें मान्यता होती है, वे लोग (अपने) तप एवं यज्ञके फलोंका विक्रय करनेवाले होते हैं। (आलस्य या प्रतिष्ठाके लिये) सैकड़ों एवं हजारोंकी संख्यामें लोग संन्यासी हो जायेंगे। हे निष्पाप राजन्! (कलियुगमें लोग) पढ़े हुएको भूल जाते हैं, अध्ययनके फल ज्ञानके लिये उत्सुक नहीं रहते। (वे) लौकिक गीतोंसे देवताओंकी स्तुति करते हैं॥ २१—२४॥<br><br>कलियुगमें ब्राह्मण तथा क्षत्रिय वाममार्गी, पाशुपताचारी तथा पाञ्चरात्रिक हो जायेंगे^२। ज्ञान तथा कर्मका लोप हो जाने और लोगोंके निष्क्रिय हो जानेपर कीड़े, चूहे तथा सर्प लोगोंको कष्ट पहुँचायेंगे। प्राचीन कालमें दक्ष प्रजापतिके यज्ञमें दधीचके शापसे दग्ध हुए द्विज ब्राह्मणोंके कुलमें उत्पन्न होंगे। कलियुगके अन्त समयमें तमोगुणसे व्याप्त मनवाले लोग महादेवकी निन्दा करेंगे और व्यर्थके धर्मों (धर्माभासों)-का आचरण करेंगे तथा जो दूसरे महात्मा गौतमके शापसे दग्ध हुए लोग थे, वे सभी ब्राह्मण आदि अपनी-अपनी जातियोंमें उत्पन्न होंगे॥ २५—२९॥

१-शूद्र चौथे वर्णका नाम है। शूद्र शब्दसे किसी हीनभावको समझना कथमपि शास्त्रसम्मत नहीं है। अपने छोटे भाईके प्रति हीनभाव अपनाना सर्वथा अनुचित है। वेदोंके अध्ययनसे विरत रहनेके लिये शूद्रोंको आदेश अवश्य दिया गया है, पर इसके मूलमें उनके प्रति कल्याणकी भावना ही निहित है। यह वास्तविकता है कि समग्र वेदोंका यथावत् अध्ययन करनेपर ही उनके द्वारा वह ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है, जो अधूरा न होकर परिपूर्ण होता है तथा सही अर्थमें कल्याणका साधन बनता है। जिन मनीषियोंने समग्र वेदोंका आकलन किया है, उन लोगोंने निरपेक्ष-भावसे यह भलीभाँति समझा है तथा परीक्षापूर्वक अनुभव किया है कि समग्र वेदोंका अध्ययन तीव्रतम तप एवं कठोरतम परिश्रम (सुदीर्घकालिक)-के बिना कथमपि सम्भव नहीं है और यह सुदीर्घकालिक तीव्रतम तप एवं कठोरतम परिश्रम प्रिय अनुज (छोटे भाई) शूद्र एवं अति कोमल प्रकृतिवाली स्त्रियाँ कथमपि नहीं कर सकतीं। अतएव विशेषकर इन्हींके कल्याणके लिये महाभारत तथा अन्यान्य पुराण आदि ग्रन्थोंका आविर्भाव हुआ। इन ग्रन्थोंमें सरल एवं रोचक पद्धतिसे वे ही ज्ञान-विज्ञान वर्णित हैं, जो वेदोंमें वर्णित हैं। योग्यता, अधिकार एवं अध्ययनके विधानके अनुसार इन (महाभारत आदि)-को अपनी अपेक्षाके अनुकूल जान-समझकर करनेसे कल्याण अवश्य ही प्राप्त होता है, जो वेदोंके समग्र अध्ययनसे प्राप्त होता है। इससे स्पष्ट है कि ज्ञानरूप फलकी दृष्टिसे मानव क्या प्राणिमात्र अपनी सामर्थ्यके अनुसार समान हैं। अतः वेदोंको पढ़नेके विषयमें जो शास्त्रीय व्यवस्था है, उसके प्रति अन्यथा-दृष्टि अपनाना भूल है।
२-यहाँ वाममार्ग आदिकी निन्दामें तात्पर्य नहीं है। वैदिक मार्गकी स्तुतिमें तात्पर्य है। शुद्ध सात्त्विक भावकी प्रमुखता वैदिक मार्गमें है, अतः वैदिक मार्ग प्रशस्ततम है। वाममार्ग आदिमें तो तामस-भाव एवं राजस-भावकी प्रमुखता है। अतः ये प्रशस्त नहीं हैं।