संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- अध्याय २८ * १८१
विनिन्दन्ति हृषीकेशं ब्राह्मणान् ब्रह्मवादिनः ।
वेदबाह्यव्रताचारा दुराचारा वृथाश्रमाः ॥ ३० ॥
मोहयन्ति जनान् सर्वान् दर्शयित्वा फलानि च ।
तमसाविष्टमनसो वैडालवृत्तिकाधमाः ॥ ३१ ॥
कलौ रुद्रो महादेवे लोकानामीश्वरः परः ।
न देवता भवेन्नॄणां देवतानां च दैवतम् ॥ ३२ ॥
करिष्यत्यवताराणि शंकरो नीललोहितः ।
श्रौतस्मार्तप्रतिष्ठार्थं भक्तानां हितकाम्यया ॥ ३३ ॥
उपदेक्ष्यति तज्ज्ञानं शिष्याणां ब्रह्मसंज्ञितम् ।
सर्ववेदान्तसारं हि धर्मान् वेदनिदर्शितान् ॥ ३४ ॥
ये तं विप्रा निषेवन्ते येन केनोपचारतः ।
विजित्य कलिजान् दोषान् यान्ति ते परमं पदम् ॥ ३५ ॥
अनायासेन सुमहत् पुण्यमाप्नोति मानवः ।
अनेकदोषदुष्टस्य कलेरेष महान् गुणः ॥ ३६ ॥
तस्मात् सर्वप्रयत्नेन प्राप्य माहेश्वरं युगम् ।
विशेषाद् ब्राह्मणो रुद्रमीशानं शरणं व्रजेत् ॥ ३७ ॥
ये नमन्ति विरूपाक्षमीशानं कृत्तिवाससम् ।
प्रसन्नचेतसो रुद्रं ते यान्ति परमं पदम् ॥ ३८ ॥
यथा रुद्रनमस्कारः सर्वकर्मफलो ध्रुवम् ।
अन्यदेवनमस्कारान्न तत्फलमवाप्नुयात् ॥ ३९ ॥
एवंविधे कलियुगे दोषाणामेकशोधनम् ।
महादेवनमस्कारो ध्यानं दानमिति श्रुतिः ॥ ४० ॥
तस्मादनीश्वरानन्यांस्त्यक्त्वा देवं महेश्वरम् ।
समाश्रयेद् विरूपाक्षं यदीच्छेत् परमं पदम् ॥ ४१ ॥
नार्चयन्तीह ये रुद्रं शिवं त्रिदशवन्दितम् ।
तेषां दानं तपो यज्ञो वृथा जीवितमेव च ॥ ४२ ॥
नमो रुद्राय महते देवदेवाय शूलिने ।
त्र्यम्बकाय त्रिनेत्राय योगिनां गुरवे नमः ॥ ४३ ॥
वेदोंमें निषिद्ध व्रत और आचारका पालन करनेवाले, दुराचारी तथा व्यर्थका श्रम (धर्म-मोक्षविरोधी अर्थमात्र साधक काम अथवा दुर्जनतावश लोगोंको पीड़ा देनेवाले काम) करनेवाले लोग हृषीकेश (श्रीविष्णु) तथा ब्रह्मवादी ब्राह्मणोंकी निन्दा करेंगे ॥ ३० ॥
तमोगुणसे आविष्ट मनवाले तथा दिखावटी धर्माचरण करनेवाले अधम लोग अनेक प्रलोभनोंको दिखाकर सब लोगोंको मोहित करेंगे। कलियुगमें लोकोंके ईश्वर, देवताओंके भी देव श्रेष्ठ महादेव रुद्र मनुष्योंकी दृष्टिमें देव (आराध्य) नहीं रहेंगे, पर भक्तोंके कल्याणकी कामनासे तथा श्रौत एवं स्मार्त धर्मकी प्रतिष्ठाके लिये नीललोहित शंकर अनेक अवतार धारण करेंगे। वे समस्त वेदान्तके साररूप उस ब्रह्मसंज्ञक ज्ञानको और वेदमें बताये गये धर्मोंको शिष्योंको प्रदान करेंगे। जो ब्राह्मण जिस-किसी भी उपायसे उन (शंकर)-की सेवा करेंगे, वे कलिके दोषोंको जीतकर परमपदको प्राप्त करेंगे ॥ ३१–३५ ॥
अनेक दोषोंसे दूषित कलिका यह महान् गुण है कि इसके युगमें मनुष्य अनायास महान् पुण्य प्राप्त कर लेता है। इसलिये महेश्वर-सम्बन्धी युग प्राप्तकर विशेषरूपसे ब्राह्मणोंको सभी प्रकारके प्रयत्नोंसे ईशान रुद्रकी शरण ग्रहण करनी चाहिये। जो प्रसन्न-मनसे विरूपाक्ष, कृत्तिवासा, ईशान रुद्रको नमस्कार करते हैं, वे परमपदको प्राप्त करते हैं। जिस प्रकार रुद्रको किया गया नमस्कार निश्चितरूपसे सभी कामनाओंको पूर्ण करता है, उस प्रकार अन्य देवोंको नमस्कार करनेसे वैसा फल नहीं होता। इस प्रकारके कलियुगमें दोषोंको दूर करनेका एकमात्र उपाय है महादेवको नमस्कार, उनका ध्यान और शास्त्रानुसार दान—ऐसा वेदका मत है ॥ ३६–४० ॥
इसलिये यदि परमपद प्राप्त करनेकी इच्छा हो तो अन्य अनीश्वरों (महेश्वरकी कृपासे ही शक्ति प्राप्त करनेवाले अन्य देवों)-को छोड़कर एकमात्र देव विरूपाक्ष महेश्वरका आश्रय ग्रहण करना चाहिये। जो देवताओंके द्वारा वन्दित रुद्र शिवकी अर्चना नहीं करते हैं, उनका किया हुआ दान, तप, यज्ञ और जीवन व्यर्थ ही होता है ॥ ४१–४२ ॥
त्रिशूल धारण करनेवाले देवाधिदेव महान् रुद्रको नमस्कार है। त्र्यम्बक, त्रिलोचन, योगियोंके गुरुके लिये नमस्कार है ॥ ४३ ॥