भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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१८२* कूर्मपुराण *

| नमोऽस्तु वामदेवाय महादेवाय वेधसे।<br>शम्भवे स्थाणवे नित्यं शिवाय परमेष्ठिने।<br>नमः सोमाय रुद्राय महाग्रासाय हेतवे॥ ४४॥ | महादेव, वेधा, वामदेव, शम्भु, स्थाणु, परमेष्ठी शिवको नित्य नमस्कार है। सोम, रुद्र, महाग्रास (महाप्रलयमें समस्त प्रपञ्चको अपनेमें लीन कर लेनेवाले) तथा कारणरूपको नमस्कार है॥ ४४॥ | | प्रपद्येऽहं विरूपाक्षं शरण्यं ब्रह्मचारिणम्।<br>महादेवं महायोगमीशानं चाम्बिकापतिम्॥ ४५॥ | मैं विरूपाक्ष, शरण ग्रहण करने योग्य, ब्रह्मचारी, महायोगस्वरूप, ईशान तथा अम्बिकापति महादेवकी शरण ग्रहण करता हूँ। योगियोंको योग प्रदान करनेवाले, योगमायासे आवृत, योगियोंके गुरु, आचार्य, योगिगम्य पिनाकी, संसारसे उद्धार करनेवाले, रुद्र, ब्रह्मा, ब्रह्माधिपति, शाश्वत, सर्वव्यापी, शान्त, ब्राह्मणोंके रक्षक तथा ब्राह्मणप्रिय, जटाधारी, कालमूर्ति, अमूर्ति, एकमूर्ति, महामूर्ति, वेदवेद्य और द्युलोकके स्वामी परमेश्वर तथा नीलकण्ठ, विश्वमूर्ति, सर्वत्र व्यास रहनेवाले, विश्वरेता (जिनके वीर्यसे ही समस्त विश्वकी उत्पत्ति हुई है), कालाग्निरूप, कालका दहन करनेवाले, कामनाओंको प्रदान करनेवाले एवं कामदेवका नाश करनेवाले, चन्द्रमाके अवयवको अर्थात् द्वितीयाके चन्द्रमाको आभूषणके रूपमें धारण करनेवाले देव गिरिश, विशेषरूपसे रक्तवर्णवाले, ग्रास बना लेनेवाले (महाप्रलयमें सबको अपने उदरमें डाल लेनेवाले), आदित्य, उग्र, पशुपति, भीम, भास्कर तथा अन्धकारसे परे रहनेवाले परमेष्ठीको मैं नमस्कार करता हूँ॥ ४५-५०॥ | | योगिनां योगदातारं योगमायासमावृतम्।<br>योगिनां गुरुमाचार्यं योगिगम्यं पिनाकिनम्॥ ४६॥ | | | संसारतारणं रुद्रं ब्रह्माणं ब्रह्मणोऽधिपम्।<br>शाश्वतं सर्वगं शान्तं ब्रह्मण्यं ब्राह्मणप्रियम्॥ ४७॥ | | | कपर्दिनं कालमूर्तिममूर्तिं परमेश्वरम्।<br>एकमूर्तिं महामूर्तिं वेदवेद्यं दिवस्पतिम्॥ ४८॥ | | | नीलकण्ठं विश्वमूर्तिं व्यापिनं विश्वरेतसम्।<br>कालाग्निं कालदहनं कामदं कामनाशनम्॥ ४९॥ | | | नमस्ये गिरिशं देवं चन्द्रावयवभूषणम्।<br>विलोहितं लेलिहानमादित्यं परमेष्ठिनम्।<br>उग्रं पशुपतिं भीमं भास्करं तमसः परम्॥ ५०॥ | | | इत्येतल्लक्षणं प्रोक्तं युगानां वै समासतः।<br>अतीतानागतानां वै यावन्मन्वन्तरक्षयः॥ ५१॥ | मन्वन्तरकी समाप्तिपर्यन्त बीते हुए तथा भविष्यमें आनेवाले युगों (कलियुगों)-का संक्षेपमें यह लक्षण बताया गया है, निःसंदेह एक मन्वन्तर (-के कथन)-से सभी मन्वन्तरों तथा एक कल्प (-के कथन)-से अन्य कल्पोंका भी कथन हो गया। बीते हुए तथा आनेवाले सभी मन्वन्तरोंमें समान नाम एवं रूपवाले सभी अधिष्ठाता (देवता, सप्तर्षि तथा इन्द्र आदि) होते हैं॥ ५१-५३॥ | | मन्वन्तरेण चैकेन सर्वाण्येवान्तराणि वै।<br>व्याख्यातानि न संदेहः कल्पः कल्पेन चैव हि॥ ५२॥ | | | मन्वन्तरेषु सर्वेषु अतीतानागतेषु वै।<br>तुल्याभिमानिनः सर्वे नामरूपैर्भवन्त्युत॥ ५३॥ | | | एवमुक्तो भगवता किरीटी श्वेतवाहनः।<br>बभार परमां भक्तिमीशानेऽव्यभिचारिणीम्॥ ५४॥ | भगवान् (व्यास)-के ऐसा कहनेपर श्वेतवाहन किरीटधारी (अर्जुन)-ने ईशान (भगवान् शंकर)-में निश्चल परम भक्ति धारण की। उन्होंने उन सर्वज्ञ, सब कुछ करनेवाले, साक्षात् विष्णुके रूपमें अवस्थित प्रभु कृष्णद्वैपायन ऋषिको नमस्कार किया॥ ५४-५५॥ | | नमश्चकार तमृषिं कृष्णद्वैपायनं प्रभुम्।<br>सर्वज्ञं सर्वकर्तारं साक्षाद् विष्णुं व्यवस्थितम्॥ ५५॥ | | | तमुवाच पुनर्व्यासः पार्थं परपुरञ्जयम्।<br>कराभ्यां सुशुभाभ्यां च संस्पृश्य प्रणतं मुनिः॥ ५६॥ | शत्रुके नगरको जीतनेवाले तथा विनीत उन पार्थ (अर्जुन)-को व्यासमुनिने अपने दोनों सुन्दर, शुभ हाथोंसे स्पर्श करते हुए पुनः कहा॥ ५६॥ |