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संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished506 पृष्ठ
१८२* कूर्मपुराण *

| नमोऽस्तु वामदेवाय महादेवाय वेधसे।<br>शम्भवे स्थाणवे नित्यं शिवाय परमेष्ठिने।<br>नमः सोमाय रुद्राय महाग्रासाय हेतवे॥ ४४॥ | महादेव, वेधा, वामदेव, शम्भु, स्थाणु, परमेष्ठी शिवको नित्य नमस्कार है। सोम, रुद्र, महाग्रास (महाप्रलयमें समस्त प्रपञ्चको अपनेमें लीन कर लेनेवाले) तथा कारणरूपको नमस्कार है॥ ४४॥ | | प्रपद्येऽहं विरूपाक्षं शरण्यं ब्रह्मचारिणम्।<br>महादेवं महायोगमीशानं चाम्बिकापतिम्॥ ४५॥ | मैं विरूपाक्ष, शरण ग्रहण करने योग्य, ब्रह्मचारी, महायोगस्वरूप, ईशान तथा अम्बिकापति महादेवकी शरण ग्रहण करता हूँ। योगियोंको योग प्रदान करनेवाले, योगमायासे आवृत, योगियोंके गुरु, आचार्य, योगिगम्य पिनाकी, संसारसे उद्धार करनेवाले, रुद्र, ब्रह्मा, ब्रह्माधिपति, शाश्वत, सर्वव्यापी, शान्त, ब्राह्मणोंके रक्षक तथा ब्राह्मणप्रिय, जटाधारी, कालमूर्ति, अमूर्ति, एकमूर्ति, महामूर्ति, वेदवेद्य और द्युलोकके स्वामी परमेश्वर तथा नीलकण्ठ, विश्वमूर्ति, सर्वत्र व्यास रहनेवाले, विश्वरेता (जिनके वीर्यसे ही समस्त विश्वकी उत्पत्ति हुई है), कालाग्निरूप, कालका दहन करनेवाले, कामनाओंको प्रदान करनेवाले एवं कामदेवका नाश करनेवाले, चन्द्रमाके अवयवको अर्थात् द्वितीयाके चन्द्रमाको आभूषणके रूपमें धारण करनेवाले देव गिरिश, विशेषरूपसे रक्तवर्णवाले, ग्रास बना लेनेवाले (महाप्रलयमें सबको अपने उदरमें डाल लेनेवाले), आदित्य, उग्र, पशुपति, भीम, भास्कर तथा अन्धकारसे परे रहनेवाले परमेष्ठीको मैं नमस्कार करता हूँ॥ ४५-५०॥ | | योगिनां योगदातारं योगमायासमावृतम्।<br>योगिनां गुरुमाचार्यं योगिगम्यं पिनाकिनम्॥ ४६॥ | | | संसारतारणं रुद्रं ब्रह्माणं ब्रह्मणोऽधिपम्।<br>शाश्वतं सर्वगं शान्तं ब्रह्मण्यं ब्राह्मणप्रियम्॥ ४७॥ | | | कपर्दिनं कालमूर्तिममूर्तिं परमेश्वरम्।<br>एकमूर्तिं महामूर्तिं वेदवेद्यं दिवस्पतिम्॥ ४८॥ | | | नीलकण्ठं विश्वमूर्तिं व्यापिनं विश्वरेतसम्।<br>कालाग्निं कालदहनं कामदं कामनाशनम्॥ ४९॥ | | | नमस्ये गिरिशं देवं चन्द्रावयवभूषणम्।<br>विलोहितं लेलिहानमादित्यं परमेष्ठिनम्।<br>उग्रं पशुपतिं भीमं भास्करं तमसः परम्॥ ५०॥ | | | इत्येतल्लक्षणं प्रोक्तं युगानां वै समासतः।<br>अतीतानागतानां वै यावन्मन्वन्तरक्षयः॥ ५१॥ | मन्वन्तरकी समाप्तिपर्यन्त बीते हुए तथा भविष्यमें आनेवाले युगों (कलियुगों)-का संक्षेपमें यह लक्षण बताया गया है, निःसंदेह एक मन्वन्तर (-के कथन)-से सभी मन्वन्तरों तथा एक कल्प (-के कथन)-से अन्य कल्पोंका भी कथन हो गया। बीते हुए तथा आनेवाले सभी मन्वन्तरोंमें समान नाम एवं रूपवाले सभी अधिष्ठाता (देवता, सप्तर्षि तथा इन्द्र आदि) होते हैं॥ ५१-५३॥ | | मन्वन्तरेण चैकेन सर्वाण्येवान्तराणि वै।<br>व्याख्यातानि न संदेहः कल्पः कल्पेन चैव हि॥ ५२॥ | | | मन्वन्तरेषु सर्वेषु अतीतानागतेषु वै।<br>तुल्याभिमानिनः सर्वे नामरूपैर्भवन्त्युत॥ ५३॥ | | | एवमुक्तो भगवता किरीटी श्वेतवाहनः।<br>बभार परमां भक्तिमीशानेऽव्यभिचारिणीम्॥ ५४॥ | भगवान् (व्यास)-के ऐसा कहनेपर श्वेतवाहन किरीटधारी (अर्जुन)-ने ईशान (भगवान् शंकर)-में निश्चल परम भक्ति धारण की। उन्होंने उन सर्वज्ञ, सब कुछ करनेवाले, साक्षात् विष्णुके रूपमें अवस्थित प्रभु कृष्णद्वैपायन ऋषिको नमस्कार किया॥ ५४-५५॥ | | नमश्चकार तमृषिं कृष्णद्वैपायनं प्रभुम्।<br>सर्वज्ञं सर्वकर्तारं साक्षाद् विष्णुं व्यवस्थितम्॥ ५५॥ | | | तमुवाच पुनर्व्यासः पार्थं परपुरञ्जयम्।<br>कराभ्यां सुशुभाभ्यां च संस्पृश्य प्रणतं मुनिः॥ ५६॥ | शत्रुके नगरको जीतनेवाले तथा विनीत उन पार्थ (अर्जुन)-को व्यासमुनिने अपने दोनों सुन्दर, शुभ हाथोंसे स्पर्श करते हुए पुनः कहा॥ ५६॥ |

  • अध्याय २८ * | १८३ ---|---
धन्योऽस्यनुगृहीतोऽसि त्वादृशोऽन्यो न विद्यते।<br>त्रैलोक्ये शंकरे नूनं भक्तः परपुरञ्जय॥ ५७॥<br><br>दृष्टवानसि तं देवं विश्वाक्षं विश्वतोमुखम्।<br>प्रत्यक्षमेव सर्वेशं रुद्रं सर्वजगद्गुरुम्॥ ५८॥<br><br>ज्ञानं तदैश्वरं दिव्यं यथावद् विदितं त्वया।<br>स्वयमेव हृषीकेशः प्रीत्योवाच सनातनः॥ ५९॥<br><br>गच्छ गच्छ स्वकं स्थानं न शोकं कर्तुमर्हसि।<br>व्रजस्व परया भक्त्या शरण्यं शरणं शिवम्॥ ६०॥<br><br>एवमुक्त्वा स भगवाननुगृह्यार्जुनं प्रभुः।<br>जगाम शंकरपुरीं समाराधयितुं भवम्॥ ६१॥<br><br>पाण्डवेयोऽपि तद्वाक्यात् सम्प्राप्य शरणं शिवम्।<br>संत्यज्य सर्वकर्माणि तद्भक्तिपरमोऽभवत्॥ ६२॥<br><br>नार्जुनेन समः शम्भोर्भक्त्या भूतो भविष्यति।<br>मुक्त्वा सत्यवतीसूनुं कृष्णं वा देवकीसूतम्॥ ६३॥<br><br>तस्मै भगवते नित्यं नमः सत्याय धीमते।<br>पाराशर्याय मुनये व्यासायामिततेजसे॥ ६४॥<br><br>कृष्णद्वैपायनः साक्षाद् विष्णुरेव सनातनः।<br>को ह्यन्यस्तत्त्वतो रुद्रं वेत्ति तं परमेश्वरम्॥ ६५॥<br><br>नमः कुरुध्वं तमृषिं कृष्णं सत्यवतीसुतम्।<br>पाराशर्यं महात्मानं योगिनं विष्णुमव्ययम्॥ ६६॥<br><br>एवमुक्तास्तु मुनयः सर्व एव समाहिताः।<br>प्रणेमुस्तं महात्मानं व्यासं सत्यवतीसुतम्॥ ६७॥शत्रुके नगरको जीतनेवाले (अर्जुन!) निश्चय ही तीनों लोकोंमें तुम्हारे समान शंकरका भक्त कोई दूसरा नहीं है, तुम धन्य हो, अनुगृहीत (भगवान् शंकरके अनुग्रहके भाजन) हो। तुमने सभी ओर नेत्र तथा सभी ओर मुखवाले, सारे संसारके गुरु, सर्वेश, रुद्रदेवका प्रत्यक्ष ही दर्शन किया है। ईश्वर (शंकर)-सम्बन्धी दिव्य ज्ञान तुम्हें यथार्थरूपसे विदित है। स्वयं सनातन हृषीकेशने प्रीतिपूर्वक तुम्हें सब बतलाया था। शीघ्र अपने स्थानको जाओ, तुम शोक करने योग्य नहीं हो। शरणागतवत्सल शिवकी परा भक्तिकी शरण ग्रहण करो॥ ५७–६०॥<br><br>ऐसा कहकर वे भगवान् प्रभु (व्यास) अर्जुनपर कृपा करके शंकरकी आराधना करनेके लिये शंकरकी पुरीको गये। पाण्डुपुत्र अर्जुन भी उनके कहनेसे शिवकी शरणमें पहुँचे और सभी कर्मोंका परित्यागकर उनकी भक्तिमें ही दत्तचित्त हो गये॥ ६१–६२॥<br><br>सत्यवतीके पुत्र व्यास या देवकीके पुत्र कृष्णको छोड़कर अन्य कोई भी अर्जुनके समान शंकरकी भक्ति करनेवाला न तो हुआ और न होगा। उन सत्यस्वरूप, धीमान् पराशरके पुत्र अमित तेजस्वी भगवान् व्यासमुनिको नित्य नमस्कार है। कृष्णद्वैपायन (व्यास) साक्षात् सनातन विष्णु ही हैं, इनके अतिरिक्त उन परमेश्वर रुद्रको यथार्थरूपसे अन्य कौन जानता है। इन सत्यवतीनन्दन, पराशरपुत्र, महात्मा योगी, अव्यय विष्णुस्वरूप कृष्णद्वैपायन (व्यास) ऋषिको आपलोग नमस्कार करें। इस प्रकारसे कहे जानेपर सभी मुनियोंने एकाग्रचित्त होकर सत्यवतीके पुत्र उन महात्मा व्यासको नमस्कार किया॥ ६३–६७॥

इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायां पूर्वविभागे अष्टाविंशोऽध्यायः॥ २८॥

इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें अट्ठाईसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ २८॥

१८४

  • कूर्मपुराण *

उनतीसवाँ अध्याय

व्यासजीका वाराणसी-गमन, व्याससे जैमिनि आदि ऋषियोंका धर्मसम्बन्धी प्रश्न, व्यासका उन्हें शिव-पार्वती-संवाद बताना, अविमुक्तक्षेत्र वाराणसीका माहात्म्य, वाराणसी-सेवनका विशेष फल

ऋषय ऊचुःऋषियोंने कहा—(सूतजी!) महाबुद्धिमान् कृष्णद्वैपायन (व्यास) मुनिने दिव्य वाराणसीपुरीमें पहुँचकर क्या किया? इस विषयको सुननेके लिये हम लोगोंको कौतूहल है॥ १॥
प्राप्य वाराणसीं दिव्यां कृष्णद्वैपायनो मुनिः।<br>किंमकार्षीन्महाबुद्धिः श्रोतुं कौतूहलं हि नः॥ १ ॥
सूत उवाच**सूतजी बोले—**दिव्य वाराणसीमें पहुँचकर महामुनिने गङ्गामें आचमनकर (स्नानकर) विश्वेश्वर देव शिवका पूजन किया। उन मुनि (व्यासजी)-को आया देखकर वहाँ निवास करनेवाले मुनियोंने मुनिश्रेष्ठ व्यासकी पूजा की। उन सभीने महादेवसे सम्बद्ध पापोंका नाश करनेवाली पुण्यदायिनी कथा तथा सनातन मोक्षधर्मोंको विनयपूर्वक पूछा। सर्वज्ञ उन भगवान् (व्यास) ऋषिने भी देवाधिदेव (शिव)-का माहात्म्य तथा वेदमें निर्दिष्ट धर्मोंका वर्णन किया। उन मुनियोंके मध्य व्यासके शिष्य महामुनि जैमिनिने व्यासजीसे सनातन गूढ़ अर्थ पूछा॥ २—६॥
प्राप्य वाराणसीं दिव्यामुपस्पृश्य महामुनिः।<br>पूजयामास जाह्नव्यां देवं विश्वेश्वरं शिवम्॥ २ ॥<br>तमागतं मुनिं दृष्ट्वा तत्र ये निवसन्ति वै।<br>पूजयाञ्चक्रिरे व्यासं मुनयो मुनिपुङ्गवम्॥ ३ ॥<br>पप्रच्छुः प्रणताः सर्वे कथाः पापविनाशिनीः।<br>महादेवाश्रयाः पुण्या मोक्षधर्मान् सनातनान्॥ ४ ॥<br>स चापि कथयामास सर्वज्ञो भगवानृषिः।<br>माहात्म्यं देवदेवस्य धर्मान् वेदनिदर्शितान्॥ ५ ॥<br>तेषां मध्ये मुनीन्द्राणां व्यासशिष्यो महामुनिः।<br>पृष्टवान् जैमिनिर्व्यासं गूढमर्थं सनातनम्॥ ६ ॥
जैमिनिरुवाच**जैमिनिने कहा—**भगवन्! एक संशयको आप यथार्थरूपसे दूर करें, क्योंकि आप परम ऋषिको कुछ भी अविदित नहीं है। कुछ लोग ध्यानकी प्रशंसा करते हैं, कुछ दूसरे धर्मकी ही प्रशंसा करते हैं। अन्य लोग सांख्य तथा योगको, कुछ महर्षि तपको, कोई ब्रह्मचर्यको और दूसरे महर्षि मौन धारणको, कुछ अहिंसा एवं सत्यको तथा कुछ विद्वान् संन्यासको श्रेष्ठ बताते हैं। कुछ लोग दयाकी प्रशंसा करते हैं तो कुछ दान तथा अध्ययनकी। इसी प्रकार कुछ तीर्थयात्राको तथा दूसरे लोग इन्द्रियनिग्रहको महत्त्व देते हैं। मुनिश्रेष्ठ! इनमेंसे बतलायें कि कौन सर्वाधिक श्रेष्ठ है अथवा अन्य भी यदि कोई गुह्य साधन हो तो उसे आप बतलायें॥ ७—११॥
भगवन् संशयं त्वेकं छेत्तुमर्हसि तत्त्वतः।<br>न विद्यते ह्यविदितं भवता परमर्षिणा॥ ७ ॥<br>केचिद् ध्यानं प्रशंसन्ति धर्ममेवापरे जनाः।<br>अन्ये सांख्यं तथा योगं तपस्त्वन्ये महर्षयः॥ ८ ॥<br>ब्रह्मचर्यमथो मौनमन्ये प्राहुर्महर्षयः।<br>अहिंसां सत्यमप्यन्ये संन्यासमपरे विदुः॥ ९ ॥<br>केचिद् दयां प्रशंसन्ति दानमध्ययनं तथा।<br>तीर्थयात्रां तथा केचिदन्ये चेन्द्रियनिग्रहम्॥ १०॥<br>किमेतेषां भवेज्ज्यायः प्रब्रूहि मुनिपुङ्गव।<br>यदि वा विद्यतेऽप्यन्यद् गुह्यं तद्वक्तुमर्हसि॥ ११॥
श्रुत्वा स जैमिनेर्वाक्यं कृष्णद्वैपायनो मुनिः।<br>प्राह गम्भीरया वाचा प्रणम्य वृषकेतनम्॥ १२॥जैमिनिकी बात सुनकर वे कृष्णद्वैपायन मुनि वृषभध्वज (शंकर)-को प्रणाम करते हुए गम्भीर वाणीमें बोले—॥ १२॥
भगवानुवाच**भगवान् (व्यास)-ने कहा—**महाभाग्यशाली मुने! आप धन्य हैं, धन्य हैं। आपने जो पूछा है, मैं उस गुह्यतमसे भी गुह्य (तत्त्व)-को कहता हूँ, अन्य सभी महर्षि भी सुनें—॥ १३॥
साधु साधु महाभाग यत्पृष्टं भवता मुने।<br>वक्ष्ये गुह्यतमाद् गुह्यं शृण्वन्त्वन्ये महर्षयः॥ १३॥
  • अध्याय २९ * १८५
ईश्वरेण पुरा प्रोक्तं ज्ञानमेतत् सनातनम्।<br>गूढमप्राज्ञविद्विष्टं सेवितं सूक्ष्मदर्शिभिः॥ १४॥अज्ञानी लोग जिससे द्वेष करते हैं और सूक्ष्मदर्शी जिसका सेवन करते हैं, वह गूढ़ सनातन ज्ञान प्राचीन कालमें ईश्वर (शंकर)-के द्वारा कहा गया है।
नाश्रद्दधाने दातव्यं नाभक्ते परमेष्ठिनः।<br>न वेदविद्विषि शुभं ज्ञानानां ज्ञानमुत्तमम्॥ १५॥जो श्रद्धारहित हो, परमेष्ठी (शंकर)-का भक्त न हो और वेदसे द्वेष रखता हो, ऐसे व्यक्तिको सभी ज्ञानोंमें उत्तम इस शुभ ज्ञानको नहीं प्रदान करना चाहिये।
मेरुशृङ्गे पुरा देवमीशानं त्रिपुरद्विषम्।<br>देवासनगता देवी महादेवमपृच्छत॥ १६॥प्राचीन कालमें मेरु-शिखरपर भगवान् शंकरके साथ एक ही आसनपर स्थित देवी पार्वती ने त्रिपुरारि देव, ईशान महादेवसे पूछा— ॥ १४-१६ ॥
देव्युवाच<br>देवदेव महादेव भक्तानामार्तिनाशन।<br>कथं त्वां पुरुषो देवमचिरादेव पश्यति॥ १७॥<br>सांख्ययोगस्तथा ध्यानं कर्मयोगोऽथ वैदिकः।<br>आयासबहुला लोके यानि चान्यानि शंकर॥ १८॥<br>येन विभ्रान्तचित्तानां योगिनां कर्मणामपि।<br>दृश्यो हि भगवान् सूक्ष्मः सर्वेषामथ देहिनाम्॥ १९॥<br>एतद् गुह्यतमं ज्ञानं गूढं ब्रह्मादिसेवितम्।<br>हिताय सर्वभक्तानां ब्रूहि कामाङ्गनाशन॥ २०॥देवीने कहा—देवाधिदेव महादेव! आप भक्तोंके कष्टको दूर करनेवाले हैं। पुरुष किस प्रकार शीघ्र ही आप देवका दर्शन कर सकता है? कामदेवका विनाश करनेवाले शंकर! लोकमें सांख्ययोग, ध्यान, वैदिक कर्मयोग और अन्य भी अनेक अधिक परिश्रमसाध्य (उपाय) बतलाये गये हैं। (उनमें) जो ब्रह्मा आदिद्वारा सेवित उपाय या अत्यन्त गुह्य एवं गूढ़ ज्ञान हो, उसे आप हम सभी भक्तोंके कल्याणके लिये बतलायें, जिससे भ्रान्तचित्तवालों अथवा कर्मयोगी मनुष्यों एवं समस्त देहधारियोंको सूक्ष्म भगवान्‌का दर्शन हो सके॥ १७-२०॥
ईश्वर उवाच<br>अवाच्यमेतद् विज्ञानं ज्ञानमज्ञैर्बहिष्कृतम्।<br>वक्ष्ये तव यथातत्त्वं यदुक्तं परमर्षिभिः॥ २१॥<br>परं गुह्यतमं क्षेत्रं मम वाराणसी पुरी।<br>सर्वेषामेव भूतानां संसारार्णवतारिणी॥ २२॥<br>तत्र भक्ता महादेवि मदीयं व्रतमास्थिताः।<br>निवसन्ति महात्मानः परं नियममास्थिताः॥ २३॥<br>उत्तमं सर्वतीर्थानां स्थानानामुत्तमं च तत्।<br>ज्ञानानामुत्तमं ज्ञानमविमुक्तं परं मम॥ २४॥ईश्वर बोले—परम ऋषियोंने जिस विज्ञानको कहा है, अज्ञानियोंने जिस ज्ञानका विरोध किया है और जो अकथनीय है, उसे मैं तत्त्वतः तुमसे कहता हूँ। पुरी वाराणसी मेरा परम गुह्यतम क्षेत्र है। यह सभी प्राणियोंको संसारसागरसे पार उतारनेवाली है। महादेवि! यहाँ मेरे व्रतको धारण करनेवाले भक्त तथा श्रेष्ठ नियमका आश्रय ग्रहण करनेवाले महात्मा निवास करते हैं। यह मेरा अविमुक्त (काशीक्षेत्र) सभी तीर्थोंमें उत्तम, सभी स्थानोंमें श्रेष्ठ और सभी ज्ञानोंमें उत्तम ज्ञानरूप है॥ २१-२४॥
स्थानान्तरं पवित्राणि तीर्थान्यायतनौनि च।<br>श्मशानसंस्थितान्येव दिव्यभूमिगतानि च॥ २५॥<br>भूलोके नैव संलग्नमन्तरिक्षे ममालयम्।<br>अयुक्तास्तन्न पश्यन्ति युक्ताः पश्यन्ति चेतसा॥ २६॥<br>श्मशानमेतद् विख्यातमविमुक्तमिति श्रुतम्।<br>कालो भूत्वा जगदिदं संहराम्यत्र सुन्दरि॥ २७॥इस दिव्य भूमिमें महाश्मशानरूपी* काशीमें अन्य अनेक पवित्र स्थान, तीर्थ तथा मन्दिर प्रतिष्ठित हैं। मेरा गृहस्वरूप (यह वाराणसी क्षेत्र) भूलोकसे सम्बद्ध नहीं है, अपितु अन्तरिक्षमें (अवस्थित) है, अयोगियोंको इसके दर्शन नहीं होते। जो योगी हैं वे ध्यानमें इसका दर्शन करते हैं। सुन्दरी! यह महाश्मशानके नामसे विख्यात है और इसे अविमुक्त (क्षेत्र) भी कहा जाता है। मैं कालरूप होकर यहाँ इस संसारका संहार करता हूँ॥ २५-२७॥

* काशीमें मरण होनेपर स्थूल, सूक्ष्म एवं कारण—इन तीनों शरीरोंका सदाके लिये नाश हो जाता है, इसीलिये काशीको महाश्मशान कहते हैं।

१८६ | * कूर्मपुराण *


देवीदं सर्वगुह्यानां स्थानं प्रियतमं मम।<br>मद्भक्तास्तत्र गच्छन्ति मामेव विशन्ति ते ॥ २८ ॥<br><br>दत्तं जप्तं हुतं चेष्टं तपस्तप्तं कृतं च यत्।<br>ध्यानमध्ययनं ज्ञानं सर्वं तत्राक्षयं भवेत् ॥ २९ ॥<br><br>जन्मान्तरसहस्रेषु यत्पापं पूर्वसंचितम्।<br>अविमुक्तं प्रविष्टस्य तत्सर्वं व्रजति क्षयम् ॥ ३० ॥देवि! सभी गुह्य स्थानोंमें यह मेरा सर्वाधिक प्रिय स्थान है। मेरे भक्त यहाँ आते ही मुझमें ही प्रविष्ट हो जाते हैं। यहाँ किया हुआ दान, जप, होम, यज्ञ, तप, कर्म, ध्यान, अध्ययन और ज्ञानार्जन—सब कुछ अक्षय हो जाता है। अविमुक्त क्षेत्रमें प्रविष्ट होनेवालेका हजारों जन्मान्तरोंमें किया हुआ जो पूर्वसंचित पाप है, वह सब नष्ट हो जाता है॥ २८-३०॥
ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्रा ये वर्णसंकराः।<br>स्त्रियो म्लेच्छाश्च ये चान्ये संकीर्णाः पापयोनयः ॥ ३१ ॥<br><br>कीटाः पिपीलिकाश्चैव ये चान्ये मृगपक्षिणः।<br>कालेन निधनं प्राप्ता अविमुक्ते वरानने ॥ ३२ ॥<br><br>चन्द्रार्धमौल्यस्त्र्यक्षा महावृषभवाहनाः।<br>शिवे मम पुरे देवि जायन्ते तत्र मानवाः ॥ ३३ ॥<br><br>नाविमुक्ते मृतः कश्चिन्नरकं याति किल्बिषी।<br>ईश्वरानुगृहीता हि सर्वे यान्ति परां गतिम् ॥ ३४ ॥<br><br>मोक्षं सुदुर्लभं मत्वा संसारं चातिभीषणम्।<br>अश्मना चरणौ हत्वा वाराणस्यां वसेन्नरः ॥ ३५ ॥वरानने! अविमुक्त (वाराणसी) क्षेत्रमें कालवश मृत्युको प्राप्त—ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, वर्णसंकर, स्त्री, म्लेच्छ, अन्य संकीर्ण पाप योनिवाले सभी मानव प्राणी, कीड़े, चींटी तथा जो भी अन्य मृग-पक्षी आदि हैं—ये सभी सिरपर अर्धचन्द्र धारण करनेवाले, त्रिनेत्र तथा महावृषभ (नन्दी)- को वाहन बनानेवाले (शिव-स्वरूप) मानव बनकर मेरे कल्याणमय पुरमें उत्पन्न होते हैं। अविमुक्त क्षेत्रमें मरा हुआ कोई पापी नरकमें नहीं जाता है, ईश्वर (शंकर)-से कृपा-प्राप्त वे सभी परम गति प्राप्त करते हैं। मोक्षको अत्यन्त दुर्लभ और संसारको अत्यन्त भीषण समझकर पत्थरद्वारा पैरोंको तोड़कर मनुष्यको वाराणसीमें निवास करना चाहिये॥ ३१-३५॥
दुर्लभा तपसा चापि पूतस्य परमेश्वरि।<br>यत्र तत्र विपन्नस्य गतिः संसारमोक्षिणी ॥ ३६ ॥<br><br>प्रसादाज्जायते ह्येतन्मम शैलेन्द्रनन्दिनि।<br>अप्रबुद्धा न पश्यन्ति मम मायाविमोहिताः ॥ ३७ ॥<br><br>अविमुक्तं न सेवन्ते मूढा ये तमसावृताः।<br>विण्मूत्ररेतसां मध्ये ते वसन्ति पुनः पुनः ॥ ३८ ॥<br><br>हन्यमानोऽपि यो विद्वान् वसेद् विघ्नशतैरपि।<br>स याति परमं स्थानं यत्र गत्वा न शोचति ॥ ३९ ॥परमेश्वरी! तपस्याद्वारा पवित्र हुए प्राणीके लिये भी जहाँ-कहीं मरनेपर संसारसे मुक्त करनेवाली गति दुर्लभ होती है। शैलपुत्री! मेरे अनुग्रहसे (वह गति) यहाँ प्राप्त हो जाती है। मेरी मायासे विमोहित अज्ञानी लोग इस तत्त्वको नहीं समझते हैं। अज्ञानसे आवृत मूढ़ लोग अविमुक्त क्षेत्रका सेवन नहीं करते, वे मल-मूत्र और रजोवीर्य (-से युक्त नरक)-के बीच बार-बार निवास करते हैं। सैकड़ों विघ्नोंसे आहत होनेपर भी जो विद्वान् (वाराणसीमें) निवास करते हैं, वे उस परम स्थानको प्राप्त करते हैं, जहाँ जानेपर शोक नहीं करना पड़ता ॥ ३६-३९॥
जन्ममृत्युजरामुक्तं परं यान्ति शिवालयम्।<br>अपुनर्मरणानां हि सा गतिर्मोक्षकाङ्क्षिणाम्।<br>यां प्राप्य कृतकृत्यः स्यादिति मन्यन्ति पण्डिताः ॥ ४० ॥<br><br>न दानैर्न तपोभिश्च न यज्ञैर्नापि विद्यया।<br>प्राप्यते गतिरुत्कृष्टा याविमुक्ते तु लभ्यते ॥ ४१ ॥(वे) जन्म, मृत्यु और जरारहित होकर शिवके श्रेष्ठ निवासस्थानको प्राप्त करते हैं। पुनः मरणको न प्राप्त करनेवाले मोक्षार्थिंयोंकी वह सद्गति होती है, जिसे प्राप्तकर पण्डित लोग (स्वयंको) कृतकृत्य मानते हैं। अविमुक्त क्षेत्रमें जो उत्कृष्ट गति प्राप्त होती है, वह न दानोंसे, न विविध तपोंसे, न यज्ञोंसे और न विद्याद्वारा ही प्राप्त की जा सकती है॥ ४०-४१॥
  • अध्याय २९ * | १८७ ---|---
नानावर्णा विवर्णांश्च चण्डालाद्या जुगुप्सिताः।<br>किल्बिषैः पूर्णदेहा ये विशिष्टैः पातकैस्तथा।<br>भेषजं परमं तेषामविमुक्तं विदुर्बुधाः॥ ४२॥<br><br>अविमुक्तं परं ज्ञानमविमुक्तं परं पदम्।<br>अविमुक्तं परं तत्त्वमविमुक्तं परं शिवम्॥ ४३॥<br><br>कृत्वा वै नैष्ठिकीं दीक्षामविमुक्ते वसन्ति ये।<br>तेषां तत्परमं ज्ञानं ददाम्यन्ते परं पदम्॥ ४४॥<br>प्रयागं नैमिषं पुण्यं श्रीशैलोऽथ महालयः।<br>केदारं भद्रकर्णं च गया पुष्करमेव च॥ ४५॥<br>कुरुक्षेत्रं रुद्रकोटिर्नर्मदाम्रातकेश्वरम्।<br>शालिग्रामं च कुब्जाम्रं कोकामुखमनुत्तमम्।<br>प्रभासं विजयेशानं गोकर्णं भद्रकर्णकम्॥ ४६॥<br>एतानि पुण्यस्थानानि त्रैलोक्ये विश्रुतानि ह।<br>न यास्यन्ति परं मोक्षं वाराणस्यां यथा मृताः॥ ४७॥<br>वाराणस्यां विशेषेण गङ्गा त्रिपथगामिनी।<br>प्रविष्टा नाशयेत् पापं जन्मान्तरशतैः कृतम्॥ ४८॥<br>अन्यत्र सुलभा गङ्गा श्राद्धं दानं तपो जपः।<br>व्रतानि सर्वमेवैतद् वाराणस्यां सुदुर्लभम्॥ ४९॥<br>यजेत जुहुयान्नित्यं ददात्यर्चयतेऽमरान्।<br>वायुभक्षश्च सततं वाराणस्यां स्थितो नरः॥ ५०॥<br>यदि पापो यदि शठो यदि वाऽधार्मिको नरः।<br>वाराणसीं समासाद्य पुनाति सकलं नरः॥ ५१॥<br>वाराणस्यां महादेवं येऽर्चयन्ति स्तुवन्ति वै।<br>सर्वपापविनिर्मुक्तास्ते विज्ञेया गणेश्वराः॥ ५२॥<br>अन्यत्र योगज्ञानाभ्यां संन्यासादथवान्यतः।<br>प्राप्यते तत् परं स्थानं सहस्रेणैव जन्मना॥ ५३॥<br>ये भक्ता देवदेवेशे वाराणस्यां वसन्ति वै।<br>ते विन्दन्ति परं मोक्षमेकेनैव तु जन्मना॥ ५४॥<br>यत्र योगस्तथा ज्ञानं मुक्तिरेकेन जन्मना।<br>अविमुक्तं समासाद्य नान्यद् गच्छेत् तपोवनम्॥ ५५॥विद्वानोंका यह कहना है कि अनेक (ब्राह्मणादि) वर्णवाले मनुष्यों, वर्णरहित चण्डालादिकों, घृणित व्यक्तियों तथा जो पापों तथा विशिष्ट पापों (महापापों)-से युक्त देहवाले हैं, उनके लिये अविमुक्त क्षेत्र (वाराणसीका सेवन ही) परम ओषधि है। अविमुक्त (क्षेत्र) परम ज्ञान है। अविमुक्त (क्षेत्र) परम पद है। अविमुक्त (क्षेत्र) परम तत्त्व है और अविमुक्त (क्षेत्र) परम कल्याण है। नैष्ठिकी दीक्षा ग्रहण कर जो अविमुक्त (क्षेत्र)-में निवास करते हैं, उन्हें मैं श्रेष्ठ ज्ञान और अन्तमें परम पद प्रदान करता हूँ॥ ४२-४४॥<br><br>प्रयाग, पुण्यदायी नैमिषारण्य, महालय श्रीशैल, केदार, भद्रकर्ण, गया, पुष्कर, कुरुक्षेत्र, रुद्रकोटि, नर्मदा, आम्रातकेश्वर, शालिग्राम, कुब्जाम्र, श्रेष्ठ कोकामुख, प्रभास, विजयेशान, गोकर्ण तथा भद्रकर्ण—ये सभी पवित्र तीर्थ तीनों लोकोंमें विख्यात हैं, किंतु जिस प्रकार वाराणसीमें मरे हुए व्यक्तियोंको परम मोक्ष प्राप्त होता है, वैसा अन्यत्र प्राप्त नहीं होता। वाराणसीमें प्रविष्ट त्रिपथगामिनी (स्वर्ग, पाताल एवं भूलोक इस प्रकार तीन पथोंमें प्रवाहित होनेवाली) गङ्गा सैकड़ों जन्मोंमें किये हुए पापोंको नष्ट करनेमें अपना विशिष्ट स्थान रखती है॥ ४५-४८॥<br><br>गङ्गा, श्राद्ध, दान, तप, जप तथा व्रत वाराणसीमें सभी सुलभ हैं, परंतु अन्यत्र दुर्लभ हैं। वाराणसीमें स्थित मनुष्य ऐसा ज्ञान अत्यल्प परिश्रमसे प्राप्त कर लेता है, जिसके सहारे वायुभक्षी होकर नित्य हवन करता है, यज्ञ करता है, दान देता है तथा देवताओंकी पूजा करता है। मनुष्य पापी हो, शठ हो अथवा अधार्मिक हो, तब भी वाराणसीमें पहुँचकर अपने संसर्गमें रहनेवाले सबको पवित्र कर देता है। वाराणसीमें जो महादेवकी स्तुति करते हैं, अर्चना करते हैं, उन्हें सभी पापोंसे मुक्त (शंकरके) गणेश्वर समझना चाहिये॥ ४९-५२॥<br><br>दूसरे स्थानमें योग, ज्ञान, संन्यास अथवा अन्य उपायोंसे हजारों जन्मोंमें वह परमपद—मोक्ष प्राप्त होता है, किंतु देवदेवेश शंकरके जो भक्त वाराणसीमें निवास करते हैं, वे एक ही जन्ममें परमपद—मोक्षको प्राप्त कर लेते हैं। जहाँ एक ही जन्ममें योग, ज्ञान अथवा मुक्ति मिल जाती है, उस अविमुक्त (वाराणसी) क्षेत्रमें पहुँचकर फिर किसी दूसरे तपोवनमें नहीं जाना चाहिये॥ ५३-५५॥

१८८ * कूर्मपुराण *

यतो मया न मुक्तं तदविमुक्तं ततः स्मृतम्।<br>तदेव गुह्यं गुह्यानामेतद् विज्ञाय मुच्यते॥५६॥चूँकि मैं वाराणसी क्षेत्र कभी नहीं छोड़ता, इसलिये वह अविमुक्त (क्षेत्र) कहलाता है, यही गुह्योंमें अत्यन्त गुह्य (ज्ञान) है। इसे जानकर मनुष्य मुक्त हो जाता है। हे सुभ्रु (सुन्दर भौंहोंवाली)! ज्ञान* (ब्रह्मज्ञान) और अज्ञान (ब्रह्मज्ञानका साधनरूप ज्ञान)-में निरत तथा परमानन्दकी इच्छा करनेवालोंकी जो गति बतलायी गयी है, वह अविमुक्त (क्षेत्र)-में मरनेवालोंको प्राप्त होती है। अविमुक्तरूप देह (विराट्)-में जिन क्षेत्रोंका वर्णन हुआ है, उन सभी क्षेत्रोंमें वाराणसीपुरी अधिक शुभ है॥५६-५८॥
ज्ञानाज्ञानाभिनिष्ठानां परमानन्दमिच्छताम्।<br>या गतिर्विहिता सुभ्रु साविमुक्ते मृतस्य तु॥५७॥
यानि चैवाविमुक्तस्य देहे तूक्तानि कृत्स्नशः।<br>पुरी वाराणसी तेभ्यः स्थानेभ्यो ह्यधिका शुभा॥५८॥
यत्र साक्षान्महादेवो देहान्ते स्वयमीश्वरः।<br>व्याचष्टे तारकं ब्रह्म तत्रैव ह्यविमुक्तकम्॥५९॥यह अविमुक्त क्षेत्र ऐसा है, जहाँ साक्षात् महादेव ईश्वर देहान्त होनेके समय तारक ब्रह्मका उपदेश देते हैं। देवि! जो वह परतर तत्त्व 'अविमुक्त' नामसे कहा जाता है, वह वाराणसीमें एक जन्ममें ही प्राप्त हो जाता है। (विराट्के) भौंहोंके मध्य, नाभिके मध्य, हृदयमें, मूर्धमें तथा आदित्यमें जिस प्रकार अविमुक्त स्थित है, उसी प्रकार वाराणसीमें अविमुक्त क्षेत्र प्रतिष्ठित है॥५९-६१॥
यत् तत् परतरं तत्त्वमविमुक्तमिति श्रुतम्।<br>एकेन जन्मना देवि वाराणस्यां तदाप्नुयात्॥६०॥
भ्रूमध्ये नाभिमध्ये च हृदये चैव मूर्धनि।<br>यथाविमुक्तमादित्ये वाराणस्यां व्यवस्थितम्॥६१॥
वरणायास्तथा चास्या मध्ये वाराणसी पुरी।<br>तत्रैव संस्थितं तत्त्वं नित्यमेवाविमुक्तकम्॥६२॥वरुणा और असीके मध्य वाराणसीपुरी है। वहाँ अविमुक्त नामक नित्य तत्त्व स्थित है। जहाँ नारायण देव और महादेव दिवेश्वर (सुरलोकके अधिपति) स्थित हैं, उस वाराणसीसे श्रेष्ठ स्थान न कोई हुआ है और न कोई होगा। वहाँ गन्धर्वों, यक्षों, नागों तथा राक्षसोंसहित सभी देवता मुझ देवाधिदेव पितामहकी सतत उपासना करते हैं॥६२-६४॥
वाराणस्याः परं स्थानं न भूतं न भविष्यति।<br>यत्र नारायणो देवो महादेवो दिवेश्वरः॥६३॥
तत्र देवाः सगन्धर्वाः सयक्षोरगराक्षसाः।<br>उपासते मां सततं देवदेवं पितामहम्॥६४॥
महापातकिनो ये च ये तेभ्यः पापकृत्तमाः।<br>वाराणसीं समासाद्य ते यान्ति परमां गतिम्॥६५॥जो महापापी हैं और उनसे भी जो अधिक पाप करनेवाले (अतिपातकी) हैं, वे वाराणसी पहुँचकर परम गतिको प्राप्त करते हैं। इसलिये मोक्षार्थीको मरणपर्यन्त वाराणसीमें निश्चितरूपसे निवास करना चाहिये। वाराणसीमें महादेवसे ज्ञान प्राप्तकर मनुष्य मुक्त हो जाता है। किंतु पापसे आक्रान्त चित्तवालोंको विघ्न होते हैं। इसलिये शरीर, मन और वाणीसे पाप नहीं करना चाहिये। सुव्रतो! (उत्तम व्रतोंका पालन करनेवाले) यह वेदों और पुराणोंका रहस्य है। अविमुक्तसे सम्बद्ध ज्ञानको कोई तत्त्वतः जानता नहीं है॥६५-६८॥
तस्मान्मुमुक्षुर्नियतो वसेद् वै मरणांतिकम्।<br>वाराणस्यां महादेवाज्ज्ञानं लब्ध्वा विमुच्यते॥६६॥
किन्तु विघ्ना भविष्यन्ति पापोपहतचेतसः।<br>ततो नैव चरेत् पापं कायेन मनसा गिरा॥६७॥
एतद् रहस्यं वेदानां पुराणानां च सुव्रताः।<br>अविमुक्ताश्रयं ज्ञानं न कश्चिद् वेत्ति तत्त्वतः॥६८॥
देवतानामृषीणां च शृण्वतां परमेष्ठिनाम्।<br>देव्यै देवेन कथितं सर्वपापविनाशनम्॥६९॥महादेवने देवताओं, ऋषियों तथा परमेष्ठियोंके समक्ष देवी पार्वतीसे सभी पापोंको विनष्ट करनेवाले इस ज्ञानको कहा था॥६९॥

* यहाँ मूलमें 'ज्ञान' का अर्थ है विज्ञान (ब्रह्मज्ञान) तथा अज्ञानका अर्थ है किंचित् न्यून ज्ञान (ब्रह्मज्ञानका साधन ज्ञान)।

* अध्याय २९ *१८९
यथा नारायणः श्रेष्ठो देवानां पुरुषोत्तमः।<br>यथेश्वराणां गिरिशः स्थानानां चैतदुत्तमम्॥ ७० ॥जिस प्रकार देवताओंमें पुरुषोत्तम नारायण श्रेष्ठ हैं, जिस प्रकार ईश्वरोंमें गिरिश (महादेव) श्रेष्ठ हैं, वैसे ही सभी स्थानोंमें यह (अविमुक्त क्षेत्र) श्रेष्ठ है। जिन्होंने पूर्वजन्ममें रुद्रकी उपासना की है, वे ही परम अविमुक्त क्षेत्र नामक शिवके निवासस्थानको प्राप्त करते हैं। कलिके दोषोंके कारण जिनकी बुद्धि उपहत हो गयी है, वह परमेष्ठीके उस स्थानको जान नहीं सकते॥ ७०-७२॥
यैः समाराधितो रुद्रः पूर्वस्मिन्नेव जन्मनि।<br>ते विन्दन्ति परं क्षेत्रमविमुक्तं शिवालयम्॥ ७१ ॥
कलिकल्मषसम्भूता येषामुपहता मतिः।<br>न तेषां विदितुं शक्यं स्थानं तत् परमेष्ठिनः॥ ७२ ॥
ये स्मरन्ति सदा कालं विन्दन्ति च पुरीमिमाम्।<br>तेषां विनश्यति क्षिप्रमिहामुत्र च पातकम्॥ ७३ ॥जो सर्वदा कालरूप शिवका और इस पुरी (वाराणसी)-का स्मरण करते रहते हैं, उनका इस लोक और अन्य लोकका पाप शीघ्र ही नष्ट हो जाता है। यहाँ निवास करनेवाले जो पाप करते हैं, कालस्वरूप देव शिव उन सबको नष्ट कर देते हैं॥ ७३-७४॥
यानि चेह प्रकुर्वन्ति पातकानि कृतालयाः।<br>नाशयेत् तानि सर्वाणि देवः कालतनुः शिवः॥ ७४ ॥
आगच्छतामिदं स्थानं सेवितुं मोक्षकाङ्क्षिणाम्।<br>मृतानां च पुनर्जन्म न भूयो भवसागरे॥ ७५ ॥मोक्षकी इच्छासे इस स्थानका सेवन करनेके लिये जो यहाँ आते हैं, उन्हें मृत्युके अनन्तर पुनः भवसागरमें जन्म नहीं लेना पड़ता। इसीलिये चाहे योगी हो, अयोगी हो अथवा पापी हो या श्रेष्ठ पुण्यकर्मा हो, जैसा भी हो, उसे सभी प्रयत्नोंसे वाराणसीमें ही निवास करना चाहिये। वेदके वचनसे, माता-पिताके कहनेसे अथवा गुरुके वचनसे भी अविमुक्त क्षेत्र—वाराणसीमें आनेके विचारका परित्याग नहीं करना चाहिये*॥ ७५-७७॥
तस्मात् सर्वप्रयत्नेन वाराणस्यां वसेन्नरः।<br>योगी वाप्यथवाऽयोगी पापी वा पुण्यकृत्तमः॥ ७६ ॥
न वेदवचनात् पित्रोर्न चैव गुरुवादतः।<br>मतिरुत्क्रमणीया स्यादविमुक्तगतिं प्रति॥ ७७ ॥
सूत उवाच<br>इत्येवमुक्त्वा भगवान् व्यासो वेदविदां वरः।<br>सहैव शिष्यप्रवरैर्वाराणस्यां चचार ह॥ ७८ ॥सूतजी बोले—ऐसा कहकर वेदविदोंमें श्रेष्ठ भगवान् व्यास प्रधान शिष्योंके साथ वाराणसीमें विचरण करने लगे॥ ७८॥

इति श्रीकूर्मपुराणे षत्साहस्र्यां संहितायां पूर्वविभागे एकोनत्रिंशोऽध्यायः॥ २९ ॥

इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें उनतीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ २९ ॥


* वाराणसीकी स्तुतिमें तात्पर्य है न कि वेदवाक्यों, माता-पिता एवं गुरुके वचनोंके उल्लङ्घनमें तात्पर्य है।

१९० * कूर्मपुराण *

तीसवाँ अध्याय

वाराणसीके ओंकारेश्वर और कृत्तिवासेश्वर लिङ्गोंका माहात्म्य, शंकरके कृत्तिवासा नाम पड़नेका वृत्तान्त

सूत उवाच
स शिष्यैः संवृतो धीमान् गुरुद्वैपायनो मुनिः।
जगाम विपुलं लिङ्गमोंकारं मुक्तिदायकम्॥ १ ॥
तत्राभ्यर्च्य महादेवं शिष्यैः सह महामुनिः।
प्रोवाच तस्य माहात्म्यं मुनीनां भावितात्मनाम्॥ २ ॥
इदं तद् विमलं लिङ्गमोंकारं नाम शोभनम्।
अस्य स्मरणमात्रेण मुच्यते सर्वपातकैः॥ ३ ॥
एतत् परतरं ज्ञानं पञ्चायतनमुत्तमम्।
सेवितं सूरिभिर्नित्यं वाराणस्यां विमोक्षदम्॥ ४ ॥
अत्र साक्षान्महादेवः पञ्चायतनविग्रहः।
रमते भगवान् रुद्रो जन्तूनामपवर्गदः॥ ५ ॥
यत् तत् पाशुपतं ज्ञानं पञ्चार्थमिति शब्द्यते।
तदेतद् विमलं लिङ्गमोंङ्कारे समवस्थितम्॥ ६ ॥
शान्त्यतीता तथा शान्तिर्विद्या चैव परा कला।
प्रतिष्ठा च निवृत्तिश्च पञ्चार्थं लिङ्गमैश्र्वरम्॥ ७ ॥
पञ्चानामपि देवानां ब्रह्मादीनां सदाश्रयम्।
ओंकारबोधकं लिङ्गं पञ्चायतनमुच्यते॥ ८ ॥
संस्मरेदैश्र्वरं लिङ्गं पञ्चायतनमव्ययम्।
देहान्ते तत्परं ज्योतिरानन्दं विशते बुधः॥ ९ ॥
अत्र देवर्षयः पूर्वं सिद्धा ब्रह्मर्षयस्तथा।
उपास्य देवमीशानं प्राप्तवन्तः परं पदम्॥ १० ॥
मत्स्योदर्यास्तटे पुण्यं स्थानं गुह्यतमं शुभम्।
गोचर्ममात्रं विप्रेन्द्रा ओङ्कारेश्वरमुत्तमम्॥ ११ ॥
कृत्तिवासेश्वरं लिङ्गं मध्यमेश्वरमुत्तमम्।
विश्वेश्वरं तथोंकारं कपर्दीश्र्वरमेव च॥ १२ ॥
एतानि गुह्यलिङ्गानि वाराणस्यां द्विजोत्तमाः।
न कश्चिदिह जानाति विना शम्भोरनुग्रहात्॥ १३ ॥
एवमुक्त्वा ययौ कृष्णः पाराशर्यो महामुनिः।
कृत्तिवासेश्वरं लिङ्गं द्रष्टुं देवस्य शूलिनः॥ १४ ॥

सूतजी बोले— शिष्योंसे घिरे हुए बुद्धिमान् वे गुरु द्वैपायन मुनि मुक्ति प्रदान करनेवाले विशाल ओङ्कार लिङ्गकी संनिधिमें गये। शिष्योंके साथ महामुनिने वहाँ महादेवकी भलीभाँति पूजा करके पवित्र आत्मावाले मुनियोंको उस ओङ्कार लिङ्गका माहात्म्य बताया॥ १-२॥

ओङ्कार नामवाला यह लिङ्ग पवित्र एवं सुन्दर है, इसके स्मरणमात्रसे सभी पापोंसे मुक्ति मिल जाती है। वाराणसीमें विद्वानोंके द्वारा मुक्ति प्रदान करनेवाले इस अतिश्रेष्ठ ज्ञानरूप उत्तम पञ्चायतनकी नित्य पूजा की जाती है। यहाँ प्राणियोंको मोक्ष देनेवाले साक्षात् महादेव भगवान् रुद्र पञ्चायतन-शरीर धारणकर रमण करते रहते हैं॥ ३—५॥

जो वह पाशुपत ज्ञान 'पञ्चार्थ' शब्दसे कहा जाता है, वही ज्ञान इस पवित्र लिङ्गके रूपमें ओङ्कारमें अवस्थित है। अतीता शान्ति, शान्ति, उत्कृष्ट कलावाली विद्या, प्रतिष्ठा और निवृत्ति—इन्हीं पाँच अर्थोंके लिये इनके प्रतिनिधि-रूपमें महादेवका (ओङ्कार) लिङ्ग प्रतिष्ठित है। ब्रह्मा आदि पाँच देवोंका भी नित्य आश्रयरूप यही ओङ्कारबोधक लिङ्ग पञ्चायतन कहलाता है। अविनाशी पञ्चायतनरूप ईश्वरीय लिङ्गका स्मरण करना चाहिये, ऐसा करनेसे मनुष्य देहान्त होनेपर आनन्दस्वरूप परम ज्योतिमें प्रवेश करता है। पूर्वकालमें देवर्षियों, ब्रह्मर्षियों तथा सिद्धोंने यहींपर भगवान् ईशानकी उपासना कर परमपद प्राप्त किया था। विप्रेन्द्रो! मत्स्योदरीके किनारे गोचर्म*के बराबर गुह्यतम शुभ पुण्य स्थान है, वही ओङ्कारेश्वरका उत्तम क्षेत्र है॥ ६—११॥

द्विजोत्तमो! कृत्तिवासेश्वर, श्रेष्ठ मध्यमेश्वर, विश्वेश्वर, ओङ्कारेश्वर तथा कपर्दीश्वर—ये वाराणसीके गुह्य लिङ्ग हैं, बिना शंकरकी कृपाके कोई इन्हें यहाँ जान नहीं सकता। ऐसा कहकर पराशरके पुत्र महामुनि कृष्णद्वैपायन शूलधारी महादेवके कृत्तिवासेश्वर नामक लिङ्गका दर्शन करने गये॥ १२—१४॥


* भूमिकी एक विशिष्ट माप।

* अध्याय ३० *

१९१


समभ्यर्च्य तथा शिष्यैर्माहात्म्यं कृत्तिवाससः ।<br>कथयामास शिष्येभ्यो भगवान् ब्रह्मवित्तमः ॥ १५ ॥ब्रह्मज्ञानियोंमें श्रेष्ठ भगवान् व्यासने शिष्योंके साथ लिङ्गका पूजनकर शिष्योंको कृत्तिवासेश्वरका माहात्म्य बतलाया ॥ १५ ॥
अस्मिन् स्थाने पुरा दैत्यो हस्ती भूत्वा भवान्तिकम् ।<br>ब्राह्मणान् हन्तुमायातो येऽत्र नित्यमुपासते ॥ १६ ॥प्राचीन कालमें एक दैत्य हाथीका रूप धारणकर यहाँ शंकरके समीप नित्य उपासना करनेवाले ब्राह्मणोंको मारनेके लिये आया। द्विजश्रेष्ठो! उन भक्तोंकी रक्षाके लिये इस लिङ्गसे भक्तवत्सल महादेव त्रिलोचन प्रकट हुए। हाथीकी आकृतिवाले उस दैत्यको अवज्ञा-पूर्वक शूलसे मारकर शंकरने उसके चर्मका वस्त्र धारण किया। उसी समयसे वे कृत्तिवासेश्वर* हो गये ॥ १६—१८ ॥
तेषां लिङ्गान्महादेवः प्रादुरासीत् त्रिलोचनः ।<br>रक्षणार्थं द्विजश्रेष्ठा भक्तानां भक्तवत्सलः ॥ १७ ॥
हत्वा गजाकृतिं दैत्यं शूलेनावज्ञया हरः ।<br>वासस्तस्याकरोत् कृत्तिं कृत्तिवासेश्वरस्ततः ॥ १८ ॥
अत्र सिद्धिं परां प्राप्ता मुनयो मुनिपुंगवाः ।<br>तेनैव च शरीरेण प्राप्तास्तत् परमं पदम् ॥ १९ ॥श्रेष्ठ मुनियो! यहाँ मुनियोंने परम सिद्धि प्राप्त की और उसी शरीरसे परम पद अर्थात् मोक्ष भी प्राप्त किया। विद्या, विद्येश्वर, रुद्र एवं शिव नामसे कहे जानेवाले कृत्तिवासेश्वर लिङ्गको सभी देवता नित्य आवृत्तकर स्थित रहते हैं। घोर कलियुग और अधार्मिक लोगोंकी बहुलताको समझकर जो लोग कृत्तिवासेश्वरका परित्याग नहीं करते वे निःसंदेह कृतार्थ हो जाते हैं। हजारों जन्मान्तरोंमें भी दूसरे स्थानपर मोक्ष प्राप्त होता हो अथवा नहीं, किंतु कृत्तिवास-क्षेत्रमें एक जन्ममें ही मोक्ष प्राप्त हो जाता है ॥ १९—२२ ॥
विद्या विद्येश्वरा रुद्राः शिवा ये च प्रकीर्तिताः ।<br>कृत्तिवासेश्वरं लिङ्गं नित्यमावृत्य संस्थिताः ॥ २० ॥
ज्ञात्वा कलियुगं घोरमधर्मबहुलं जनाः ।<br>कृत्तिवासं न मुञ्चन्ति कृतार्थास्ते न संशयः ॥ २१ ॥
जन्मान्तरसहस्रेण मोक्षोऽन्यत्राप्यते न वा ।<br>एकेन जन्मना मोक्षः कृत्तिवासे तु लभ्यते ॥ २२ ॥
आलयः सर्वसिद्धानामेतत् स्थानं वदन्ति हि ।<br>गोपितं देवदेवेन महादेवेन शम्भुना ॥ २३ ॥लोगोंका कहना है कि सभी सिद्धोंका आश्रयरूप यह स्थान देवाधिदेव महादेव शम्भुके द्वारा सुरक्षित है। प्रत्येक युगमें वेदमें पारंगत इन्द्रियनिग्रही ब्राह्मण यहाँ महादेवकी उपासना करते हैं और शतरुद्रियका जप करते हैं। हृदयमें सर्वान्तरात्मा स्थाणुदेव शिवका ध्यान करते हुए कृत्तिवासा त्र्यम्बक देव (त्रिलोचन महादेव) - की निरन्तर स्तुति करते हैं ॥ २३—२५ ॥
युगे युगे ह्यत्र दान्ता ब्राह्मणा वेदपारगाः ।<br>उपासते महादेवं जपन्ति शतरुद्रियम् ॥ २४ ॥
स्तुवन्ति सततं देवं त्र्यम्बकं कृत्तिवाससम् ।<br>ध्यायन्ति हृदये देवं स्थाणुं सर्वान्तरं शिवम् ॥ २५ ॥
गायन्ति सिद्धाः किल गीतकानि<br>ये वाराणस्यां निवसन्ति विप्राः ।<br>तेषामथैकेन भवेन्मुक्ति-<br>र्ये कृत्तिवासं शरणं प्रपन्नाः ॥ २६ ॥विप्रो! सिद्धजन यह गीत गाते हैं कि जो लोग वाराणसीमें निवास करते हैं और कृत्तिवासा भगवान् शिवकी शरण ग्रहण करते हैं, उनकी एक ही जन्ममें मुक्ति हो जाती है। इस लोकमें संसारको अभीष्ट अत्यन्त दुर्लभ विप्रकुलमें जन्म प्राप्तकर संयमी लोग ध्यानमें समाधिस्थ होकर रुद्रका जप करते हैं और चित्तमें महेश्वरका ध्यान करते रहते हैं ॥ २६-२७ ॥
सम्प्राप्य लोके जगतामभीष्टं<br>सुदुर्लभं विप्रकुलेषु जन्म ।<br>ध्याने समाधाय जपन्ति रुद्रं<br>ध्यायन्ति चित्ते यतयो महेशम् ॥ २७ ॥

* कृत्ति चर्मको कहते हैं।

१९२ * कूर्मपुराण *


आराध्यन्ति प्रभुमीशितारं
वाराणसीमध्यगता मुनीन्द्राः।
यजन्ति यज्ञैरभिसंधिहीनाः
स्तुवन्ति रुद्रं प्रणमन्ति शम्भुम्॥ २८॥

वाराणसीमें निवास करनेवाले श्रेष्ठ मुनिजन प्रभु शंकरकी आराधना करते हैं, फलकी आकांक्षा किये बिना यज्ञोंद्वारा (उनका) यजन करते हैं, रुद्र-रूपमें उनकी स्तुति करते हैं और शम्भु-रूपमें उन्हें प्रणाम करते हैं॥ २८॥

नमो भवायामलयोगधाम्ने
स्थाणुं प्रपद्ये गिरिशं पुराणम्।
स्मरामि रुद्रं हृदये निविष्टं
जाने महादेवमनेकरूपम्॥ २९॥

विशुद्ध योगके आश्रयरूप भवको नमस्कार है, मैं स्थाणु पुराण गिरिशकी शरण ग्रहण करता हूँ, हृदयमें अवस्थित रुद्रका स्मरण करता हूँ और महादेवको अनेक रूपोंमें स्थित मानता हूँ॥ २९॥

इति श्रीकूर्मपुराणे षट्साहस्र्यां संहितायां पूर्वविभागे त्रिंशोऽध्यायः॥ ३०॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें तीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ३०॥


इकतीसवाँ अध्याय

वाराणसीके कपर्दीश्वर लिङ्गका माहात्म्य, पिशाचमोचन-कुण्डमें स्नान करनेकी महिमा, वहाँ स्नान करनेसे पिशाचयोनिसे मुक्ति प्राप्त करनेका आख्यान, शंकुकर्णकी कथा तथा शंकुकर्णकृत ब्रह्मपार-स्तव

सूत उवाच

समाभाष्य मुनीन् धीमान् देवदेवस्य शूलिनः।
जगाम लिङ्गं तद् द्रष्टुं कपर्दीश्वरमव्ययम्॥ १॥

स्नात्वा तत्र विधानेन तर्पयित्वा पितॄन् द्विजाः।
पिशाचमोचने तीर्थे पूजयामास शूलिनम्॥ २॥

सूतजी बोले— मुनियोंसे इस प्रकार कहकर बुद्धिमान् (व्यासजी) देवाधिदेव त्रिशूली (भगवान् शंकर)-के कपर्दीश्वर नामक अव्यय लिङ्गका दर्शन करने गये। ब्राह्मणो! वहाँ पिशाचमोचन तीर्थमें स्नानकर विधिपूर्वक पितरोंका तर्पणकर उन्होंने त्रिशूल धारण करनेवाले शंकरकी पूजा की॥ १-२॥

तत्राश्चर्यमपश्यंस्ते मुनयो गुरुणा सह।
मेनिरे क्षेत्रमाहात्म्यं प्रणेमुर्गिरिशं हरम्॥ ३॥

कश्चिदभ्याजगामेदं शार्दूलो घोररूपधृक्।
मृगीमेकां भक्षयितुं कपर्दीश्वरमुत्तमम्॥ ४॥

तत्र सा भीतहृदया कृत्वा कृत्वा प्रदक्षिणम्।
धावमाना सुसम्भ्रान्ता व्याघ्रस्य वशमागता॥ ५॥

वहाँ गुरुदेव (व्यास)-के साथ उन मुनियोंने एक आश्चर्य देखा। उन्होंने इसे क्षेत्रका माहात्म्य समझा और गिरिश हरको प्रणाम किया। कोई भयंकर रूपवाला व्याघ्र एक मृगीका भक्षण करनेके लिये वहाँ श्रेष्ठ कपर्दीश्वरके समीपमें आया। भयभीत मनवाली वह मृगी वहाँ प्रदक्षिणा करते-करते दौड़ती हुई अत्यन्त व्याकुल हो जानेसे व्याघ्रके वशीभूत हो गयी॥ ३-५॥

तां विदार्य नखैस्तीक्ष्णैः शार्दूलः सुमहाबलः।
जगाम चान्यं विजनं देशं दृष्ट्वा मुनीश्वरान्॥ ६॥

अपने तीक्ष्ण नखोंसे उसे विदीर्णकर वह महान् बलशाली व्याघ्र उन मुनियोंको देखकर दूसरे जनशून्य स्थानकी ओर चला गया। कपर्दीशके समक्ष ही मृत्युको प्राप्त वह बाल-अवस्थावाली मृगी आकाशमें चमकते हुए सूर्यके समान प्रभाव्राली, महाज्वालारूपा,

मृतमात्रा च सा बाला कपर्दीशाग्रतो मृगी।
अदृश्यत महाज्वाला व्योम्नि सूर्यसमप्रभा॥ ७॥

* अध्याय ३१ *१९३
त्रिनेत्रा नीलकण्ठा च शशाङ्काङ्कितमूर्धजा ।<br>वृषाधिरूढा पुरुषैस्तादृशैरेव संवृता ॥ ८ ॥<br><br>पुष्पवृष्टिं विमुञ्चन्ति खेचरास्तस्य मूर्धनि ।<br>गणेश्वरः स्वयं भूत्वा न दृष्टस्तत्क्षणात् ततः ॥ ९ ॥<br><br>दृष्ट्वैतदाश्चर्यवरं जैमिनिप्रमुखा द्विजाः ।<br>कपर्दीश्वरमाहात्म्यं पप्रच्छुर्गुरुमच्युतम् ॥ १० ॥तीन नेत्रोंवाली, नीलकण्ठवाली, चन्द्रमासे सुशोभित मस्तकवाली और वृषभपर आरूढ़ तथा शिवके समान ही पुरुषोंसे समन्वित दिखलायी पड़ी। उसके मस्तकपर आकाशचारी (गन्धर्व आदि) फूलोंकी वर्षा कर रहे थे। तदनन्तर वह स्वयं गणेश्वर होकर तत्क्षण ही अदृश्य हो गयी। जैमिनि आदि प्रमुख द्विजोंने ऐसा महान् आश्चर्य देखकर अच्युतस्वरूप गुरु (व्यास)-से कपर्दीश्वरका माहात्म्य पूछा ॥ ६-१० ॥
तेषां प्रोवाच भगवान् देवाग्रे चोपविश्य सः ।<br>कपर्दीशस्य माहात्म्यं प्रणम्य वृषभध्वजम् ॥ ११ ॥<br><br>इदं देवस्य तल्लिङ्गं कपर्दीश्वरमुत्तमम् ।<br>स्मृत्वैवाशेषपापौघं क्षिप्रमस्य विमुञ्चति ॥ १२ ॥उन भगवान् व्यासने (कपर्दीश्वर) देवके समीपमें बैठकर वृषभध्वजको प्रणाम करके कपर्दीशका माहात्म्य उन्हें बतलाया। यह देवका वही श्रेष्ठ कपर्दीश्वर नामक लिङ्ग है, जिसका स्मरणमात्र करनेसे ही स्मरण करनेवालेका अशेष पापसमूह शीघ्र ही नष्ट हो जाता है ॥ ११-१२ ॥
कामक्रोधादयो दोषा वाराणसीनिवार्सिनाम् ।<br>विघ्नाः सर्वे विनश्यन्ति कपर्दीश्वरपूजनात् ॥ १३ ॥<br><br>तस्मात् सदैव द्रष्टव्यं कपर्दीश्वरमुत्तमम् ।<br>पूजितव्यं प्रयत्नेन स्तोतव्यं वैदिकैः स्तवैः ॥ १४ ॥<br><br>ध्यायतामत्र नियतं योगिनां शान्तचेतसाम् ।<br>जायते योगसंसिद्धिः सा षण्मासे न संशयः ॥ १५ ॥वाराणसीमें निवास करनेवाले लोगोंके काम, क्रोध आदि दोष और सभी विघ्न कपर्दीश्वरका पूजन करनेसे विनष्ट हो जाते हैं। इसलिये श्रेष्ठ कपर्दीश्वरका सदा ही दर्शन करना चाहिये, प्रयत्नपूर्वक पूजन करना चाहिये और वैदिक स्तोत्रोंसे उनकी स्तुति करनी चाहिये। शान्त चित्तवाले योगियोंको यहाँ नियमित ध्यान करते हुए छः महीनेमें ही उत्कृष्ट योगसिद्धि प्राप्त हो जाती है, इसमें कोई संशय नहीं है ॥ १३-१५ ॥
ब्रह्महत्यादयः पापा विनश्यन्त्यस्य पूजनात् ।<br>पिशाचमोचने कुण्डे स्नातस्यात्र समीपतः ॥ १६ ॥<br><br>अस्मिन् क्षेत्रे पुरा विप्रास्तपस्वी शंसितव्रतः ।<br>शंकुकर्ण इति ख्यातः पूजयामास शंकरम् ।<br>जजाप रुद्रमनिशं प्रणवं ब्रह्मरूपिणम् ॥ १७ ॥<br><br>पुष्पधूपादिभिः स्तोत्रैर्नमस्कारैः प्रदक्षिणैः ।<br>उवास तत्र योगात्मा कृत्वा दीक्षां तु नैष्ठिकीम् ॥ १८ ॥<br><br>कदाचिदागतं प्रेतं पश्यति स्म क्षुधान्वितम् ।<br>अस्थिचर्मपिनद्धाङ्गं निःश्वसन्तं मुहुर्मुहुः ॥ १९ ॥<br><br>तं दृष्ट्वा स मुनिश्रेष्ठः कृपया परया युतः ।<br>प्रोवाच को भवान् कस्माद् देशाद् देशमिमं श्रितः ॥ २० ॥यहाँ समीपमें स्थित पिशाचमोचन कुण्डमें स्नानकर इस लिङ्गका पूजन करनेसे ब्रह्महत्या आदि सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। ब्राह्मणो ! प्राचीन कालमें शंकुकर्ण नामसे प्रसिद्ध कठोर व्रतवाले तपस्वीने इस क्षेत्रमें शंकरकी पूजा की थी। वह रात-दिन प्रणव एवं ब्रह्मस्वरूप रुद्रका जप करता था। निष्ठापूर्वक दीक्षा ग्रहण कर वह योगात्मा पुष्प, धूप आदिसे तथा स्तोत्र, नमस्कार एवं प्रदक्षिणाके द्वारा (पूजा करता हुआ) वहाँ रहने लगा। किसी दिन उसने भूखसे व्याकुल अस्थि एवं चर्मसे व्याप्त शरीरवाले और बार-बार साँस ले रहे एक आते हुए प्रेतको देखा। उसे देखकर उस श्रेष्ठ मुनिने अत्यन्त कृपासे युक्त होकर उससे कहा—आप कौन हैं? कहाँसे इस देशमें आये हैं ? ॥ १६—२० ॥
तस्मै पिशाचः क्षुधया पीड्यमानोऽब्रवीद् वचः ।<br>पूर्वजन्मन्यहं विप्रो धनधान्यसमन्वितः ।<br>पुत्रपौत्रादिभिर्युक्तः कुटुम्बभरणोत्सुकः ॥ २१ ॥क्षुधासे पीड़ित पिशाचने उससे कहा—पूर्वजन्ममें मैं धनधान्यसे सम्पन्न, पुत्र-पौत्रादिकोंसे युक्त, परिवारके भरण-पोषणमें उत्सुक रहनेवाला एक ब्राह्मण था,
१९४* कूर्मपुराण *
न पूजिता मया देवा गावोऽप्यतिथयस्तथा।<br>न कदाचित् कृतं पुण्यमल्पं वा स्वल्पमेव वा ॥ २२ ॥<br><br>एकदा भगवान् देवो गोवृषेश्वरवाहनः।<br>विश्वेश्वरो वाराणस्यां दृष्टः स्पृष्टो नमस्कृतः ॥ २३ ॥<br><br>तदाचिरेण कालेन पञ्चत्वमहमागतः।<br>न दृष्टं तन्मया घोरं यमस्य वदनं मुने ॥ २४ ॥<br><br>ईदृशीं योनिमापन्नः पैशाचीं क्षुधयान्वितः।<br>पिपासयाधुनाक्रान्तो न जानामि हिताहितम् ॥ २५ ॥<br><br>यदि कंचित् समुद्धर्तुमुपायं पश्यसि प्रभो।<br>कुरुष्व तं नमस्तुभ्यं त्वामहं शरणं गतः ॥ २६ ॥<br><br>इत्युक्तः शङ्कुकर्णोऽथ पिशाचमिदमब्रवीत्।<br>त्वादृशो न हि लोकेऽस्मिन् विद्यते पुण्यकृत्तमः ॥ २७ ॥<br><br>यत् त्वया भगवान् पूर्वं दृष्टो विश्वेश्वरः शिवः।<br>संस्पृष्टो वन्दितो भूयः कोऽन्यस्त्वत्सदृशो भुवि ॥ २८ ॥<br><br>तेन कर्मविपाकेन देशमेतं समागतः।<br>स्नानं कुरुष्व शीघ्रं त्वमस्मिन् कुण्डे समाहितः।<br>येनेमां कुत्सितां योनिं क्षिप़्रमेव प्रहास्यसि ॥ २९ ॥<br><br>स एवमुक्तो मुनिना पिशाचो<br>  दयालुना देववरं त्रिनेत्रम्।<br>स्मृत्वा कपर्दीश्वरमीशितारं<br>  चक्रे समाधाय मनोऽवगाहम् ॥ ३० ॥<br><br>तदावगाढो मुनिसंनिधाने<br>  ममार दिव्याभरणोपपन्नः।<br>अदृश्यतार्कप्रतिमे विमाने<br>  शशाङ्कचिह्नाङ्कितचारुमौलिः ॥ ३१ ॥<br><br><br>विभाति रुद्रैरभितो दिविस्थैः<br>  समावृतो योगिभिरप्रमेयैः।<br>सबालखिल्यादिभिरेष देवो<br>  यथॊदये भानुरशेषदेवः ॥ ३२ ॥किंतु मैंने न तो कभी देवताओंकी पूजा की न गायोंकी और न तो अतिथियोंकी, मैंने कभी छोटे-से भी छोटा पुण्य नहीं किया। एक बारकी बात है कि वाराणसीमें मैंने वृषभवाहन भगवान् विश्वेश्वरदेवका दर्शन किया, स्पर्श किया और उन्हें नमस्कार किया। तदनन्तर बहुत थोड़े ही समयके बाद मेरी मृत्यु हो गयी। हे मुने! (इसी पुण्यके कारण) मुझे यमके भयानक मुखको तो नहीं देखना पड़ा, पर इस प्रकारकी पिशाचयोनि प्राप्तकर भूख और प्याससे व्याकुल मैं वाराणसीमें ही भटक रहा हूँ। इस समय मुझे हित और अहितका कुछ भी ज्ञान नहीं है। प्रभो! मेरे उद्धारका यदि कोई उपाय आप देखते हों तो उसे करें, आपको नमस्कार है, मैं आपकी शरणमें आया हूँ ॥ २१–२६ ॥<br><br>ऐसा कहे जानेपर शंकुकर्णने पिशाचसे कहा—तुम्हारे समान इस संसारमें श्रेष्ठ पुण्य कर्म करनेवाला और कोई नहीं है, जो कि तुमने पूर्वकालमें विश्वेश्वर भगवान् शिवका दर्शन किया, उनका स्पर्श किया और वन्दना की, फिर संसारमें तुम्हारे समान और कौन हो सकता है? उस कर्मके परिणामस्वरूप ही तुम इस स्थानपर पहुँचे हो। अब तुम एकाग्रमन होकर इस कुण्डमें शीघ्र ही स्नान करो। जिससे इस कुत्सित (पिशाचकी) योनिसे तुम शीघ्र ही छुटकारा प्राप्त कर सको ॥ २७–२९ ॥<br><br>दयालु मुनिके ऐसा कहनेपर उस पिशाचने देवश्रेष्ठ त्रिलोचन, अनुशास्ता भगवान् कपर्दीश्वरका स्मरण कर मनको एकाग्र करते हुए (कुण्डमें) स्नान किया ॥ ३० ॥<br><br>तदनन्तर स्नान किया हुआ वह मुनिके समीप ही मृत्युको प्राप्त हो गया और पुनः सूर्यके समान प्रकाशित विमानमें स्थित हो वह दिव्य आभूषणोंको धारण किये तथा चन्द्रमाके चिह्नसे सुशोभित सुन्दर मस्तकसे युक्त (पुरुषके रूपमें) दिखायी पड़ा। वह आकाशमें स्थित रहनेवाले रुद्रों, अप्रमेय योगियों तथा बालखिल्य आदि ऋषियोंसे चारों ओरसे आवृत होते हुए उसी प्रकार सुशोभित हो रहा था, जिस प्रकार सभी देवताओंके भी देवता सूर्यदेवता उदयकालमें दिखलायी पड़ते हैं ॥ ३१-३२ ॥
* अध्याय ३१ *१९५
स्तुवन्ति सिद्धा दिवि देवसङ्घा<br>  नृत्यन्ति दिव्याप्सरसोऽभिरामाः।<br>मुञ्चन्ति वृष्टिं कुसुमाम्बुमिश्रां<br>  गन्धर्वविद्याधरकिंनराद्याः ॥ ३३॥आकाशमें सिद्ध तथा देवताओंके समूह (उसकी) स्तुति कर रहे थे। दिव्य सुन्दर अप्सराएँ नृत्य कर रही थीं और गन्धर्व, विद्याधर तथा किंनर आदि जलसे स्निग्ध पुष्पोंकी वृष्टि कर रहे थे॥ ३३॥
संस्तूयमानोऽथ मुनीन्द्रसङ्घै-<br>  रवाप्य बोधं भगवत्प्रसादात्।<br>समाविशन्मण्डलमेतदग्र्यं<br>  त्रयीमयं यत्र विभाति रुद्रः॥ ३४॥मुनियोंके समूहोंसे स्तुति किये जाते हुए उसने भगवान्‌की कृपासे ज्ञान प्राप्त किया और वह उस त्रयीमय श्रेष्ठ मण्डलमें प्रविष्ट हो गया जहाँ रुद्र प्रकाशित होते हैं। पिशाचयोनिको प्राप्त उस (पुरुष)-
दृष्ट्वा विमुक्तं स पिशाचभूतं<br>  मुनिः प्रहृष्टो मनसा महेशम्।<br>विचिन्त्य रुद्रं कविमेकमग्निं<br>  प्रणम्य तुष्टाव कपर्दिने तम्॥ ३५॥को मुक्त हुआ देखकर वह मुनि अत्यन्त प्रसन्न-मनसे महेशका ध्यानकर और कवि अद्वितीय रुद्राग्निको प्रणामकर उन जटाधारी (शिव)-की स्तुति करने लगे— ॥ ३४-३५॥
शङ्कुकर्ण उवाचशंकुकर्णने कहा—मैं परात्पर, अद्वितीय, सबके
कपर्दिनं त्वां परतः परस्ताद्<br>  गोप्तारमेकं पुरुषं पुराणम्।<br>व्रजामि योगेश्वरमीशितार-<br>  मादित्यमग्निं कपिलाधिरूढम्॥ ३६॥रक्षक, पुराणपुरुष, योगेश्वर, नियामक, आदित्य, अग्निरूप एवं कपिल (वृषभ)-पर अधिष्ठित आप कपर्दीकी शरण ग्रहण करता हूँ॥ ३६॥
त्वां ब्रह्मपारं हृदि संनिविष्टं<br>  हिरण्मयं योगिनमादिमन्तम्।<br>व्रजामि रुद्रं शरणं दिविस्थं<br>  महामुनिं ब्रह्ममयं पवित्रम्॥ ३७॥मैं हृदयमें संनिविष्ट, हिरण्मय, योगी, आदि एवं अन्तरूप, द्युलोकमें स्थित, महामुनि, पवित्र और ब्रह्मस्वरूप आप ब्रह्मपार रुद्रकी शरणमें जाता हूँ।
सहस्रपादाक्षिशिरोऽभियुक्तं<br>  सहस्रबाहुं तमसः परस्तात्।<br>त्वां ब्रह्मपारं प्रणमामि शम्भुं<br>  हिरण्यगर्भाधिपतिं त्रिनेत्रम्॥ ३८॥मैं हजारों चरण, नेत्र और सिरोंसे युक्त, हजारों बाहुवाले, अन्धकारसे परे रहनेवाले, हिरण्यगर्भके अधिपति और तीन नेत्रवाले आप ज्ञानातीत शम्भुको प्रणाम करता हूँ। जिनसे संसारकी उत्पत्ति तथा विनाश
यतः प्रसूतिर्जगतो विनाशो<br>  येनावृतं सर्वमिदं शिवेन।<br>तं ब्रह्मपारं भगवन्तमीशं<br>  प्रणम्य नित्यं शरणं प्रपद्ये॥ ३९॥होता है और जिन शिवने इस सम्पूर्ण (विश्व)-को आवृत कर रखा है, उन्हीं ज्ञानातीत भगवान् ईशको प्रणाम कर मैं उनकी नित्य शरण ग्रहण करता हूँ। मैं अलिङ्ग-(निराकार) और आलोकरहित*
अलिङ्गमालोकविहीनरूपं<br>  स्वयम्प्रभं चित्पतिमेकरुद्रम्।<br>तं ब्रह्मपारं परमेश्वरं त्वां<br>  नमस्करिष्ये न यतोऽन्यदस्ति॥ ४०॥रूपवाले, स्वयं प्रभावान्, चित्-शक्तिके स्वामी, अद्वितीय रुद्ररूप, ज्ञानसे अतीत आप परमेश्वरको नमस्कार करता हूँ, क्योंकि आपसे भिन्न अन्य कुछ है ही नहीं॥ ३७-४०॥

* महेश्वरका रूप किसी भी आलोक (प्रकाश)-से आलोकित (प्रकाशित) नहीं होता, अपितु स्वयं प्रकाशमान है और उसीके प्रकाशसे समस्त प्रपञ्च सूर्य, चन्द्र आदि प्रकाशित हैं।

१९६ * कूर्मपुराण *


यं योगिनस्त्यक्तसबीजयोगा लब्ध्वा समाधिं परमार्थभूताः। पश्यन्ति देवं प्रणतोऽस्मि नित्यं तं ब्रह्मपारं भवतः स्वरूपम्॥ ४१ ॥ न यत्र नामादिविशेषक्लृप्ति- र्न संदृशे तिष्ठति यत्स्वरूपम्। तं ब्रह्मपारं प्रणतोऽस्मि नित्यं स्वयम्भुवं त्वां शरणं प्रपद्ये॥ ४२ ॥ यद् वेदवादाभिरता विदेहं सब्रह्मविज्ञानमभेदमेकम् । पश्यन्त्यनेकं भवतः स्वरूपं तं ब्रह्मपारं प्रणतोऽस्मि नित्यम्॥ ४३ ॥ यतः प्रधानं पुरुषः पुराणो विवर्तते यं प्रणमन्ति देवाः। नमामि तं ज्योतिषि संनिविष्टं कालं बृहन्तं भवतः स्वरूपम्॥ ४४ ॥ व्रजामि नित्यं शरणं गुहेशं स्थाणुं प्रपद्ये गिरिशं पुरारिम्। शिवं प्रपद्ये हरमिन्दुमौलिं पिनाकिनं त्वां शरणं व्रजामि॥ ४५ ॥

स्तुत्वैवं शङ्कुकर्णोऽसौ भगवन्तं कपर्दिनम्। पपात दण्डवद् भूमौ प्रोच्चरन् प्रणवं परम्॥ ४६ ॥

तत्क्षणात् परमं लिङ्गं प्रादुर्भूतं शिवात्मकम्। ज्ञानमानन्दमद्वैतं कोटिकालाग्निसंनिभम्॥ ४७ ॥

शङ्कुकर्णोऽथ मुक्तात्मा तदात्मा सर्वगोऽमलः। निलिल्ये विमले लिङ्गे तदद्भुतमिवाभवत्॥ ४८ ॥

एतद् रहस्यमाख्यातं माहात्म्यं वः कपर्दिनः। न कश्चिद् वेत्ति तमसा विद्वानप्यत्र मुह्यति॥ ४९ ॥

य इमां शृणुयान्नित्यं कथां पापप्रणाशिनीम्। भक्तः पापविशुद्धात्मा रुद्रसामीप्यमाप्नुयात्॥ ५० ॥

पठेच्च सततं शुद्धो ब्रह्मपारं महास्तवम्। प्रातर्मध्याह्नसमये स योगं प्राप्नुयात् परम्॥ ५१ ॥


सबीज योग (सविकल्पक समाधि)-का त्याग करनेवाले परमार्थभूत योगिजन निर्विकल्पक समाधि लगाकर आपके जिस रूपका दर्शन करते हैं, मैं आपके उसी ज्ञानातीत स्वरूपको नित्य प्रणाम करता हूँ। जिनमें न तो किसी नाम (तथा रूप) आदि विशेष (गुणों)-की कोई कल्पना है और जिनका न कोई स्वरूप दिखलायी पड़ता है, प्रणामपूर्वक उन ब्रह्मपार स्वयम्भूकी शरणमें मैं जाता हूँ। वैदिक सिद्धान्तोंके अनुगामी आपके जिस स्वरूपको विदेह, ब्रह्मविज्ञानमय, अभेदरूप (अद्वितीय)—इन अनेक प्रकारोंसे जानते हैं, आपके उस ब्रह्मपार स्वरूपको मैं नित्य प्रणाम करता हूँ। जिसके प्रधान (प्रकृति) और पुराण पुरुष विवर्त (परिणाम) हैं तथा देवता जिसे प्रणाम करते हैं, उस ज्योतिमें संनिविष्ट ज्योतिर्मय आपके बृहत् काल-स्वरूपको मैं नमस्कार करता हूँ। मैं सनातन गुहेशकी* शरणमें जाता हूँ। मैं स्थाणु, गिरिश पुरारिके शरणागत हूँ, मैं चन्द्रमौलि हर, शिवकी शरण ग्रहण करता हूँ। मैं पिनाक धारण करनेवाले आपकी शरणमें जाता हूँ॥ ४१-४५॥

इस प्रकार भगवान् कपर्दीकी स्तुति कर श्रेष्ठ ओंकारका उच्चारण करता हुआ वह शंकुकर्ण दण्डवत् भूमिपर गिर पड़ा। उसी क्षण ज्ञान और आनन्दस्वरूप, अद्वितीय, करोड़ों प्रलयकालीन अग्निके समान, शिवात्मक श्रेष्ठ लिङ्ग प्रादुर्भूत हुआ। तब मुक्त आत्मावाला, तादात्म्यस्वरूपवाला, सर्वव्यापी, विशुद्ध हुआ वह शंकुकर्ण निर्मल लिङ्गमें विलीन हो गया। यह एक अद्भुत-सी बात हुई॥ ४६-४८॥

यह मैंने आप लोगोंको कपर्दीका रहस्य एवं माहात्म्य बतलाया। इसे कोई नहीं जानता। विद्वान् भी इस विषयमें अज्ञानसे मोहित हो जाते हैं। जो भक्त पापका नाश करनेवाली इस कथाको नित्य सुनता है, वह पापसे विमुक्त शुद्धात्मा होकर रुद्रकी समीपताको प्राप्त कर लेता है—॥ ४९-५०॥

और जो मनुष्य नित्य प्रातः एवं मध्याह्नकालमें शुद्धतापूर्वक इस ब्रह्मपार नामक महान् स्तवका पाठ करेगा, वह परम योगको प्राप्त कर लेगा॥ ५१॥


* गुहा (बुद्धि)-के ईश।

  • अध्याय ३२ * । १९७

इहैव नित्यं वत्स्यामो देवदेवं कपर्दिनम्।
द्रक्ष्यामः सततं देवं पूजयामोऽथ शूलिनम्॥ ५२॥

इत्युक्त्वा भगवान् व्यासः शिष्यैः सह महामुनिः।
उवास तत्र युक्तात्मा पूजयन् वै कपर्दिनम्॥ ५३॥

'मैं यहीं नित्य निवास करूँगा, देवदेव कपर्दीका दर्शन करूँगा और त्रिशूल धारण करनेवाले देवकी निरन्तर पूजा करता रहूँगा।' ऐसा कहकर शिष्योंके साथ युक्तात्मा महामुनि व्यासने कपर्दीकी पूजा करते हुए वहीं निवास किया॥ ५२-५३॥

इति श्रीकूर्मपुराणे षट्साहस्र्यां संहितायां पूर्वविभागे एकत्रिंशोऽध्यायः॥ ३१॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें इकतीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ३१॥


बत्तीसावाँ अध्याय

व्यासजीद्वारा वाराणसीके मध्यमेश्वर महादेव तथा मन्दाकिनीकी महिमाका वर्णन

सूत उवाच
उषित्वा तत्र भगवान् कपर्दीशान्तिके पुनः।<br>द्रष्टुं ययौ मध्येशं बहुवर्षगणान् प्रभुः॥ १॥सूतजी बोले—वहाँ कपर्दीश (कपर्दीश्वर)-के समीपमें बहुत वर्षोंतक निवास कर भगवान् प्रभु (वेदव्यास) पुनः मध्यमेश्वर (लिङ्ग)-का दर्शन करने गये। वहाँ ऋषि-समूहोंसे सेवित स्वच्छ जलवाली पवित्र मन्दाकिनी नामक नदीका दर्शन कर मुनि (व्यास) प्रसन्न हो गये॥ १-२॥
तत्र मन्दाकिनीं पुण्यामृषिसङ्घनिषेविताम्।<br>नदीं विमलपानीयां दृष्ट्वा हृष्टोऽभवन्मुनिः॥ २॥
स तामन्वीक्ष्य मुनिभिः सह द्वैपायनः प्रभुः।<br>चकार भावपूतात्मा स्नानं स्नानविधानवित्॥ ३॥उसे देखकर पवित्र आत्मभाववाले तथा स्नानके विधानको जाननेवाले उन द्वैपायन प्रभुने मुनियोंके साथ स्नान किया। विधिपूर्वक देवताओं, ऋषियों तथा पितरोंका तर्पण किया और नाना प्रकारके पुष्पोंद्वारा लोकके आदि कारण भवकी पूजा की। प्रमुख शिष्योंके साथ सत्यवतीके पुत्र व्यासने (उस क्षेत्रमें) प्रवेशकर त्रिशूलधारी ईशान मध्यमेश्वरका पूजन किया। तदनन्तर सारे शरीरमें भस्म धारण किये हुए शान्त पाशुपत लोग अर्थात् पशुपतिके भक्तगण पाशुपत ईश्वर मध्यमेश्वर रुद्रका दर्शन करने आये॥ ३-६॥
संतर्प्य विधिवद् देवानृषीन् पितॄगणांस्तथा।<br>पूजयामास लोकादिं पुष्पैर्नानाविधैर्भवम्॥ ४॥
प्रविश्य शिष्यप्रवरैः सार्धं सत्यवतीसुतः।<br>मध्यमेश्वरमीशानमर्चयामास शूलिनम्॥ ५॥
ततः पाशुपताः शान्ता भस्मोद्धूलितविग्रहाः।<br>द्रष्टुं समागता रुद्रं मध्यमेश्वरमीश्वरम्॥ ६॥
ओंकारासक्तमनसो वेदाध्ययनतत्पराः।<br>जटिला मुण्डिताश्चापि शुक्लयज्ञोपवीतिनः॥ ७॥उनका मन ओंकारके जपमें लगा था, वे सभी वेदोंके अध्ययनमें तत्पर थे। वे शुक्ल यज्ञोपवीत धारण किये थे, कोई जटा रखाये थे और कोई मुण्डित थे। कुछ कौपीन वस्त्र धारण किये थे, तो दूसरे वस्त्ररहित थे। वे ब्रह्मचर्यपरायण, शान्त और वेदान्तके ज्ञानमें तत्पर थे। विप्रो! शिष्योंसे घिरे हुए द्वैपायन मुनिको देखकर यथोक्त विधिसे उनका पूजनकर उन्होंने (पाशुपत भक्तोंनें) यह वचन कहा—॥ ७-९॥
कौपीनवसनाः केचिदपरे चाप्यवाससः।<br>ब्रह्मचर्यरताः शान्ता वेदान्तज्ञानतत्पराः॥ ८॥
दृष्ट्वा द्वैपायनं विप्राः शिष्यैः परिवृतं मुनिम्।<br>पूजयित्वा यथान्यायमिदं वचनमब्रुवन्॥ ९॥
१९८* कूर्मपुराण *
को भवान् कुत आयातः सह शिष्यैर्महामुने ।<br>प्रोचुः पैलादयः शिष्यास्तानृषीन् ब्रह्मभावितान् ॥ १० ॥<br>अयं सत्यवतीसूनुः कृष्णद्वैपायनो मुनिः ।<br>व्यासः स्वयं हृषीकेशो येन वेदाः पृथक् कृताः ॥ ११ ॥<br>यस्य देवो महादेवः साक्षादेव पिनाकधृक् ।<br>अंशांशेनाभवत् पुत्रो नाम्ना शुक इति प्रभुः ॥ १२ ॥<br>यः स साक्षान्महादेवं सर्वभावेन शंकरम् ।<br>प्रपन्नः परया भक्त्या यस्य तज्ज्ञानमैश्वरम् ॥ १३ ॥<br>ततः पाशुपताः सर्वे हृष्टसर्वतनूरुहाः ।<br>नेमुरव्यग्रमनसः प्रोचुः सत्यवतीसुतम् ॥ १४ ॥<br>भगवन् भवता ज्ञातं विज्ञानं परमेष्ठिनः ।<br>प्रसादाद् देवदेवस्य यत् तन्माहेश्वरं परम् ॥ १५ ॥<br>तद्वदास्माकमव्यक्तं रहस्यं गुह्यमुत्तमम् ।<br>क्षिप्रं पश्येम तं देवं श्रुत्वा भगवतो मुखात् ॥ १६ ॥<br>विसर्जयित्वा ताञ्छिष्यान् सुमन्तुप्रमुखांस्ततः ।<br>प्रोवाच तत्परं ज्ञानं योगिभ्यो योगवित्तमः ॥ १७ ॥महामुने ! आप कौन हैं ? शिष्योंके साथ कहाँसे आये हैं। तब पैल आदि व्यास-शिष्योंने उन ब्रह्मभावको प्राप्त ऋषियोंसे कहा—ये सत्यवतीके पुत्र कृष्णद्वैपायन व्यास मुनि हैं। ये स्वयं हृषीकेश हैं, जिन्होंने वेदोंका विभाजन किया। पिनाकको धारण करनेवाले साक्षात् प्रभु महादेव ही अपने अंशांशसे इनके शुक नामक पुत्र हुए। वे सभी भावोंसे, परम भक्तिके द्वारा साक्षात् महादेव शंकरके शरणागत हुए हैं और जिन्हें ईश्वर-सम्बन्धी परम ज्ञान उपलब्ध है ॥ १०—१३ ॥<br><br>तब वे सभी पशुपतिके भक्त प्रसन्न हो गये, उन्हें रोमाञ्च हो आया। एकाग्रमनसे उन्होंने सत्यवतीके पुत्र व्यासको प्रणाम किया और कहा—भगवन् ! देवदेवकी कृपासे जो परमेष्ठीका श्रेष्ठ माहेश्वर विज्ञान है, वह आपको ज्ञात है। अतः आप हमें वह श्रेष्ठ अव्यक्त, गोपनीय रहस्य बतलायें, ताकि आपके मुखसे उसे सुनकर हम शीघ्र ही उन देवका दर्शन कर सकें ॥ १४—१६ ॥<br><br>तदनन्तर सुमन्तु आदि उन प्रमुख शिष्योंको विदाकर योगविदोंमें श्रेष्ठ व्यासने उन योगियोंको श्रेष्ठ ज्ञान बतलाया। विप्रो ! उसी क्षण एक निर्मल उत्तम ज्योति प्रकट हुई और क्षणभरमें ही वे पाशुपत भक्तगण उसीमें लीन हो गये और अन्तर्धान हो गये ॥ १७-१८ ॥
तत्क्षणादेव विमलं सम्भूतं ज्योतिरुत्तमम् ।<br>लीनास्तत्रैव ते विप्राः क्षणादन्तरधीयत ॥ १८ ॥<br>ततः शिष्यान् समाहूय भगवान् ब्रह्मवित्तमः ।<br>प्रोवाच मध्यमेशस्य माहात्म्यं पैलपूर्वकान् ॥ १९ ॥<br><br>अस्मिन् स्थाने स्वयं देवो देव्या सह महेश्वरः ।<br>रमते भगवान् नित्यं रुद्रैश्च परिवारितः ॥ २० ॥<br>अत्र पूर्वं हृषीकेशो विश्वात्मा देवकीसुतः ।<br>उवास वत्सरं कृष्णः सदा पाशुपतैर्वृतः ॥ २१ ॥<br>भस्मोद्धूलितसर्वाङ्गो रुद्राध्ययनतत्परः ।<br>आराधयन् हरिः शम्भुं कृत्वा पाशुपतं व्रतम् ॥ २२ ॥<br>तस्य ते बहवः शिष्या ब्रह्मचर्यपरायणाः ।<br>लब्ध्वा तद्वचनाज्ज्ञानं दृष्टवन्तो महेश्वरम् ॥ २३ ॥<br>तस्य देवो महादेवः प्रत्यक्षं नीललोहितः ।<br>ददौ कृष्णस्य भगवान् वरदो वरमुत्तमम् ॥ २४ ॥<br>येऽर्चयिष्यन्ति गोविन्दं मद्भक्ता विधिपूर्वकम् ।<br>तेषां तदैश्वरं ज्ञानमुत्पत्स्यति जगन्मय ॥ २५ ॥तदनन्तर पैल आदि प्रमुख शिष्योंको बुलाकर श्रेष्ठ ब्रह्मज्ञानी भगवान् (व्यास)-ने मध्यमेशका माहात्म्य उन्हें बतलाया। स्वयं भगवान् महेश्वर देव देवीके साथ तथा रुद्रगणोंसे घिरे नित्य इस स्थानपर रमण करते हैं ॥ १९-२० ॥<br><br>यहींपर पूर्वकालमें देवकीके पुत्र विश्वात्मा हृषीकेश कृष्ण हरि पाशुपतोंसे आवृत रहते हुए, समस्त शरीरमें भस्म धारणकर रुद्र-तत्त्वके अनुसंधानमें तत्पर हुए थे तथा पाशुपत व्रत धारणकर शम्भुकी आराधना करते हुए एक वर्षतक निवास किये थे। उनके (व्यासके) ब्रह्मचर्य-परायण बहुतसे विज्ञ शिष्योंने उनके वचनसे ज्ञान प्राप्तकर महेश्वरका दर्शन किया। वर प्रदान करनेवाले नीललोहित देव साक्षात् भगवान् 'महादेवने' उन कृष्णको उत्तम वर प्रदान किया। जगन्मय ! जो मेरे भक्त विधिपूर्वक आप गोविन्दकी अर्चना करेंगे, उन्हें ईश्वर-सम्बन्धी परम ज्ञान प्राप्त होगा ॥ २१—२५ ॥
* अध्याय ३३ *१९९

नमस्योऽर्चयितव्यश्च ध्यातव्यो मत्परैर्जनैः।
भविष्यसि न संदेहो मत्प्रसादाद् द्विजातिभिः॥ २६॥
येऽत्र द्रक्ष्यन्ति देवेशं स्नात्वा रुद्रं पिनाकिनम्।
ब्रह्महत्यादिकं पापं तेषामाशु विनश्यति॥ २७॥
प्राणांस्त्यजन्ति ये मर्त्याः पापकर्मरता अपि।
ते यान्ति तत् परं स्थानं नात्र कार्या विचारणा॥ २८॥
धन्यास्तु खलु ते विप्रा मन्दाकिन्यां कृतोदकाः।
अर्चयन्ति महादेवं मध्यमेश्वरमीश्वरम्॥ २९॥
स्नानं दानं तपः श्राद्धं पिण्डनिर्वपणं त्विह।
एकैकशः कृतं विप्राः पुनात्यासप्तमं कुलम्॥ ३०॥
संनिहत्यामुपस्पृश्य राहुग्रस्ते दिवाकरे।
यत् फलं लभते मर्त्यस्तस्माद् दशगुणं त्विह॥ ३१॥
एवमुक्त्वा महायोगी मध्यमेशान्तिके प्रभुः।
उवास सुचिरं कालं पूजयन् वै महेश्वरम्॥ ३२॥ | निस्संदेह मेरी कृपासे आप मेरे भक्त द्विजातियोंके प्रणम्य, आराध्य और ध्येय होंगे। जो यहाँ स्नानकर पिनाकी रुद्र देवेश्वरका दर्शन करेंगे, उनके ब्रह्महत्या आदि सभी पाप शीघ्र ही नष्ट हो जायँगे। जो पापकर्मपरायण भी मनुष्य यहाँ प्राणोंका त्याग करेंगे, वे परम स्थानको प्राप्त करेंगे, इसमें कोई विचार नहीं करना चाहिये॥ २६–२८॥ <br><br>विप्रो! वे निश्चय ही धन्य हैं जो मन्दाकिनीमें स्नानकर ईश्वर महादेव मध्यमेश्वरकी पूजा करते हैं। ब्राह्मणो! यहाँपर एक बार भी किया गया स्नान, दान, तप, श्राद्ध तथा पिण्डदान सात पीढ़ियोंतक कुलको पवित्र कर देता है॥ २९–३०॥ <br><br>सूर्यके राहुसे ग्रस्त किये जानेपर अर्थात् ग्रहणकालमें संनिहती (कुरुक्षेत्र तीर्थ)-में स्नान करनेसे जो फल मनुष्यको प्राप्त होता है, उससे दस गुना अधिक फल यहाँ मन्दाकिनीमें स्नानसे प्राप्त होता है। ऐसा कहकर महायोगी प्रभु (व्यास)-ने महेश्वरकी पूजा करते हुए मध्यमेश्वरके समीपमें ही बहुत समयतक निवास किया॥ ३१–३२॥

इति श्रीकूर्मपुराणे षट्साहस्र्यां संहितायां पूर्वविभागे द्वात्रिंशोऽध्यायः॥ ३२॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें बत्तीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ३२॥


तैंतीसवाँ अध्याय

वाराणसी-माहात्म्यके प्रसंगमें व्यासजीका शिष्योंके साथ विभिन्न तीर्थोंमें गमन, ब्रह्मतीर्थका आख्यान, व्यासजीद्वारा विश्वेश्वर लिङ्गका पूजन तथा वहाँ रहते हुए शिवाराधना, एक दिन भिक्षा न मिलनेपर क्रोधाविष्ट व्यासजीका वाराणसीके निवासियोंको शाप देनेके लिये उद्यत होना, उसी समय देवी पार्वतीका प्रकट होना, देवीका व्यासको वाराणसी त्यागनेकी आज्ञा, पुनः स्तुतिसे प्रसन्न देवीके द्वारा चतुर्दशी तथा अष्टमीको वहाँ (वाराणसीमें) रहनेकी अनुमति देना

सूत उवाच
ततः सर्वाणि गुह्यानि तीर्थान्यायतननि च।
जगाम भगवान् व्यासो जैमिनिप्रमुखैर्वृतः॥ १॥
प्रयागं परमं तीर्थं प्रयागादधिकं शुभम्।
विश्वरूपं तथा तीर्थं तालतीर्थमनुत्तमम्॥ २॥
आकाशाख्यं महातीर्थं तीर्थं चैवार्षभं परम्।

स्वर्णीलं च महातीर्थं गौरीतीर्थमनुत्तमम्॥ ३॥**सूतजी बोले—**तदनन्तर जैमिनि आदि प्रमुख शिष्योंसे आवृत भगवान् व्यास सभी गुह्य तीर्थों और देवमन्दिरोंमें गये। द्विजश्रेष्ठो! वे परम तीर्थ प्रयाग, प्रयागसे भी अधिक शुभ तीर्थ विश्वरूप, श्रेष्ठ तालतीर्थ, आकाश नामक महातीर्थ, श्रेष्ठ आर्षभ तीर्थ, स्वर्णील नामक महातीर्थ, श्रेष्ठ गौरीतीर्थ,

२०० * कूर्मपुराण *


| प्राजापत्यं तथा तीर्थं स्वर्गद्वारं तथैव च।<br>जम्बुकेश्वरमित्युक्तं धर्माख्यं तीर्थमुत्तमम्॥ ४ ॥<br>गयातीर्थं महातीर्थं तीर्थं चैव महानदी।<br>नारायणं परं तीर्थं वायुतीर्थमनुत्तमम्॥ ५ ॥<br>ज्ञानतीर्थं परं गुह्यं वाराहं तीर्थमुत्तमम्।<br>यमतीर्थं महापुण्यं तीर्थं संवर्तकं शुभम्॥ ६ ॥<br>अग्नितीर्थं द्विजश्रेष्ठाः कलशेश्वरमुत्तमम्।<br>नागतीर्थं सोमतीर्थं सूर्यतीर्थं तथैव च॥ ७ ॥<br>पर्वताख्यं महागुह्यं मणिकर्णमनुत्तमम्।<br>घटोत्कचं तीर्थवरं श्रीतीर्थं च पितामहम्॥ ८ ॥<br>गङ्गातीर्थं तु देवेशं ययातेस्तीर्थमुत्तमम्।<br>कापिलं चैव सोमेशं ब्रह्मतीर्थमनुत्तमम्॥ ९ ॥<br>अत्र लिङ्गं पुरानीय ब्रह्मा स्नातुं यदा गतः।<br>तदानीं स्थापयामास विष्णुस्तल्लिङ्गमेश्वरम्॥ १०॥<br>ततः स्नात्वा समागत्य ब्रह्मा प्रोवाच तं हरिम्।<br>मयानीतंमिदं लिङ्गं कस्मात् स्थापितवानसि॥ ११॥ | प्राजापत्य तीर्थ, स्वर्गद्वार, जम्बुकेश्वर, धर्म (धर्मारण्य) नामवाले उत्तम तीर्थ, गया तीर्थ, महातीर्थ, महानदीतीर्थ, परम नारायण तीर्थ, श्रेष्ठ वायु तीर्थ, परम गुह्य ज्ञानतीर्थ, श्रेष्ठ वाराह तीर्थ, महान् पवित्र यमतीर्थ, शुभ संवर्तक तीर्थ, अग्नितीर्थ, उत्तम कलशेश्वर, नागतीर्थ, सोमतीर्थ, सूर्यतीर्थ, महागुह्य पर्वत नामक तीर्थ, अनुत्तम मणिकर्ण, तीर्थश्रेष्ठ घटोत्कच तीर्थ, श्रीतीर्थ, पितामह तीर्थ, गङ्गातीर्थ, देवेश तीर्थ, उत्तम ययातितीर्थ, कपिल तीर्थ, सोमेश तीर्थ तथा अनुत्तम ब्रह्मतीर्थमें गये॥१-९॥<br>प्राचीन कालमें जब ब्रह्मा यहाँ (ब्रह्मतीर्थमें) लिङ्ग लाकर स्नान करने चले गये, तब विष्णुने उस ईश्वरके लिङ्गको यहाँ स्थापित कर दिया। जब स्नान करके ब्रह्मा आये तो उन्होंने विष्णुसे पूछा—मेरे द्वारा लाये गये इस लिङ्गको आपने क्यों स्थापित कर दिया। इसपर विष्णुने उनसे कहा—मेरी रुद्रमें आपसे भी अधिक दृढ़ भक्ति है, इसलिये मैंने लिङ्गको यहाँ प्रतिष्ठित कर दिया, यह आपके नामसे ही प्रसिद्ध होगा॥ १०-१२॥ | | तमाह विष्णुस्त्वत्तोऽपि रुद्रे भक्तिर्दृढा मम।<br>तस्मात् प्रतिष्ठितं लिङ्गं नाम्ना तव भविष्यति॥ १२॥<br>भूतेश्वरं तथा तीर्थं तीर्थं धर्मसमुद्भवम्।<br>गन्धर्वतीर्थं परमं वाह्येयं तीर्थमुत्तमम्॥ १३॥<br>दौर्वासिकं व्योमतीर्थं चन्द्रतीर्थं द्विजोत्तमाः।<br>चित्राङ्गदेश्वरं पुण्यं पुण्यं विद्याधरेश्वरम्॥ १४॥<br>केदारतीर्थमुग्राख्यं कालञ्जरमनुत्तमम्।<br>सारस्वतं प्रभासं च भद्रकर्णं हृदं शुभम्॥ १५॥<br>लौकिकाख्यं महीतीर्थं तीर्थं चैव महालयम्।<br>हिरण्यगर्भं गोप्रेक्ष्यं तीर्थं चैव वृषध्वजम्॥ १६॥<br>उपशान्तं शिवं चैव व्याघ्रेश्वरमनुत्तमम्।<br>त्रिलोचनं महातीर्थं लोलार्कं चोत्तराह्वयम्॥ १७॥<br>कपालमोचनं तीर्थं ब्रह्महत्याविनाशकम्।<br>शुक्रेश्वरं महापुण्यमानन्दपुरमुत्तमम्॥ १८॥<br>एवमादीनि तीर्थानि प्राधान्यात् कथितानि तु।<br>न शक्यं विस्तराद् वक्तुं तीर्थसंख्या द्विजोत्तमाः॥ १९॥<br>तेषु सर्वेषु तीर्थेषु स्नात्वाभ्यर्च्य पिनाकिनम्।<br>उपोष्य तत्र तत्रासौ पाराशर्यो महामुनिः॥ २०॥ | द्विजोत्तमो! (व्यासजी पुनः आगे कहे जानेवाले तीर्थोंमें गये) भूतेश्वर तीर्थ, धर्मसमुद्भव तीर्थ, परम गन्धर्वतीर्थ, उत्तम वाह्येयतीर्थ, दौर्वासिक तीर्थ, व्योमतीर्थ, चन्द्रतीर्थ, पवित्र चित्राङ्गदेश्वरतीर्थ, पवित्र विद्याधरेश्वर तीर्थ, केदारतीर्थ, उग्र नामक तीर्थ, अनुत्तम कालञ्जर तीर्थ, सारस्वत तीर्थ, प्रभासतीर्थ, भद्रकर्णह्रद नामक शुभ तीर्थ, लौकिक नामक महातीर्थ, महालयतीर्थ, हिरण्यगर्भ तीर्थ, गोप्रेक्ष्य तीर्थ, वृषध्वजतीर्थ, उपशान्त तीर्थ, शिवतीर्थ, अनुत्तम व्याघ्रेश्वरतीर्थ, त्रिलोचनतीर्थ, महातीर्थ, लोलार्क तीर्थ, उत्तर नामक तीर्थ, ब्रह्महत्या-विनाशक कपालमोचन तीर्थ, महापवित्र शुक्रेश्वर तीर्थ और उत्तम आनन्दपुर तीर्थ आदि मुख्य-मुख्य तीर्थोंका वर्णन किया गया है, तीर्थोंकी संख्याका विस्तार नहीं बताया जा सकता। पराशरके पुत्र महामुनि (व्यास) इन सभी तीर्थोंमें स्नानकर पिनाकी (भगवान् शंकर)-की पूजाकर, वहाँ-वहाँ उपवासकर |

* अध्याय ३३ *२०१
तर्पयित्वा पितॄन् देवान् कृत्वा पिण्डप्रदानकम्।<br>जगाम पुनरेवापि यत्र विश्वेश्वरः शिवः॥ २१॥देवताओं तथा पितरोंका तर्पणकर और उन्हें पिण्ड-दान कर पुनः वहीं गये, जहाँ विश्वेश्वर शिव स्थित हैं॥ १३—२१॥
स्नात्वाभ्यर्च्य परं लिङ्गं शिष्यैः सह महामुनिः।<br>उवाच शिष्यान् धर्मात्मा स्वान् देशान् गन्तुमर्हथ॥ २२॥शिष्योंके साथ धर्मात्मा महामुनिने स्नानकर उस परम (विश्वेश्वर) लिङ्गकी पूजा की और शिष्योंसे कहा—अब आप अपने-अपने स्थानोंको जा सकते हैं।
ते प्रणम्य महात्मानं जग्मुः पैलादयो द्विजाः।<br>वासं च तत्र नियतो वाराणस्यां चकार सः॥ २३॥द्विजो! महात्मा (व्यास)-को प्रणाम कर वे पैल आदि (शिष्य) चले गये और उन व्यासजीने नियमित-रूपसे वाराणसीमें वास किया। वे शान्त, जितेन्द्रिय, विशुद्धात्मा एवं ब्रह्मचर्य-परायण होकर तीनों संध्याओंमें स्नान करते थे तथा भिक्षाद्वारा प्राप्त आहार करते हुए पिनाकीकी आराधनामें लगे रहते थे॥ २२—२४॥
शान्तो दान्तस्त्रिषवणं स्नात्वाभ्यर्च्य पिनाकिनम्।<br>भैक्षाहारो विशुद्धात्मा ब्रह्मचर्यपरायणः॥ २४॥
कदाचिद् वसता तत्र व्यासेनामिततेजसा।<br>भ्रममाणेण भिक्षा तु नैव लब्धा द्विजोत्तमाः॥ २५॥द्विजोत्तमो! वहाँ रहते हुए एक दिन अमित तेजस्वी व्यासजीको भ्रमण करते रहनेपर भी भिक्षा नहीं प्राप्त हुई। तब उनका शरीर क्रोधाविष्ट हो गया, (उन्होंने विचार किया कि) यहाँ रहनेवाले मनुष्योंके लिये ऐसे विघ्नकी सृष्टि करूँ, जिससे उनकी सिद्धि नष्ट हो जाय, पर तत्क्षण ही शंकरकी अर्धाङ्गिनी साक्षात् महादेवी (पार्वती) मानुष-वेष धारणकर प्रसन्न-मुद्रामें प्रकट हो गयीं। (और बोलीं—)॥ २५—२७॥
ततः क्रोधावृततनुर्नराणामिह वासिनाम्।<br>विघ्नं सृजामि सर्वेषां येन सिद्धिर्विहीयते॥ २६॥
तत्क्षणे सा महादेवी शंकरार्धशरीरिणी।<br>प्रादुरासीत् स्वयं प्रीत्या वेषं कृत्वा तु मानुषम्॥ २७॥
भो भो व्यास महाबुद्धे शप्तव्या भवता न हि।<br>गृहाण भिक्षां मत्तस्त्वमुक्तवैवं प्रददौ शिवा॥ २८॥हे महाबुद्धिमान् व्यास! आप शाप न दें। आप मुझसे भिक्षा ग्रहण करें। ऐसा कहकर पार्वतींने (उन्हें) भिक्षा दीं॥ २८॥
उवाच च महादेवी क्रोधनस्त्वं भवान् यतः।<br>इह क्षेत्रे न वस्तव्यं कृतघ्नोऽसि त्वया सदा॥ २९॥महादेवीने कहा—मुने! आप क्रोधी तथा कृतघ्न हैं, अतः आपको सदा इस क्षेत्रमें नहीं रहना चाहिये। ऐसा कहे जानेपर व्यासजीने ध्यानद्वारा 'ये श्रेष्ठ पार्वती हैं'—ऐसा समझकर प्रणाम किया और श्रेष्ठ स्तुतियोंसे स्तुति कर उनसे कहा—हे शंकरवल्लभे! चतुर्दशी तथा अष्टमीको यहाँ (वाराणसीमें) प्रवेश करने दें। 'ऐसा ही हो' ऐसी आज्ञा देकर देवी अन्तर्धान हो गयीं॥ २९—३१॥
एवमुक्तः स भगवान् ध्यानाज्ज्ञात्वा परां शिवाम्।<br>उवाच प्रणतो भूत्वा स्तुत्वा च प्रवरैः स्तवैः॥ ३०॥
चतुर्दश्यामथाष्टम्यां प्रवेशं देहि शांकरि।<br>एवमस्त्वित्यनुज्ञाय देवी चान्तरधीयत॥ ३१॥
एवं स भगवान् व्यासो महायोगी पुरातनः।<br>ज्ञात्वा क्षेत्रगुणान् सर्वान् स्थितस्तस्याथ पार्श्वतः॥ ३२॥इस प्रकार महायोगी भगवान् व्यासजी क्षेत्र (वाराणसी)-के सभी गुणों (विशेषताओं)-को समझते हुए उस (वाराणसी)-के पार्श्वभागमें रहने लगे। इस प्रकार व्यासजीको स्थित हुआ जानकर विद्वान् लोग (उस) क्षेत्रका सेवन करते हैं। अतः मनुष्यको सभी प्रयत्नकर वाराणसीमें निवास करना चाहिये॥ ३२-३३॥
एवं व्यासं स्थितं ज्ञात्वा क्षेत्रं सेवन्ति पण्डिताः।<br>तस्मात् सर्वप्रयत्नेन वाराणस्यां वसेन्नरः॥ ३३॥