भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished506 पृष्ठ

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  • अध्याय ३२ * । १९७

इहैव नित्यं वत्स्यामो देवदेवं कपर्दिनम्।
द्रक्ष्यामः सततं देवं पूजयामोऽथ शूलिनम्॥ ५२॥

इत्युक्त्वा भगवान् व्यासः शिष्यैः सह महामुनिः।
उवास तत्र युक्तात्मा पूजयन् वै कपर्दिनम्॥ ५३॥

'मैं यहीं नित्य निवास करूँगा, देवदेव कपर्दीका दर्शन करूँगा और त्रिशूल धारण करनेवाले देवकी निरन्तर पूजा करता रहूँगा।' ऐसा कहकर शिष्योंके साथ युक्तात्मा महामुनि व्यासने कपर्दीकी पूजा करते हुए वहीं निवास किया॥ ५२-५३॥

इति श्रीकूर्मपुराणे षट्साहस्र्यां संहितायां पूर्वविभागे एकत्रिंशोऽध्यायः॥ ३१॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें इकतीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ३१॥


बत्तीसावाँ अध्याय

व्यासजीद्वारा वाराणसीके मध्यमेश्वर महादेव तथा मन्दाकिनीकी महिमाका वर्णन

सूत उवाच
उषित्वा तत्र भगवान् कपर्दीशान्तिके पुनः।<br>द्रष्टुं ययौ मध्येशं बहुवर्षगणान् प्रभुः॥ १॥सूतजी बोले—वहाँ कपर्दीश (कपर्दीश्वर)-के समीपमें बहुत वर्षोंतक निवास कर भगवान् प्रभु (वेदव्यास) पुनः मध्यमेश्वर (लिङ्ग)-का दर्शन करने गये। वहाँ ऋषि-समूहोंसे सेवित स्वच्छ जलवाली पवित्र मन्दाकिनी नामक नदीका दर्शन कर मुनि (व्यास) प्रसन्न हो गये॥ १-२॥
तत्र मन्दाकिनीं पुण्यामृषिसङ्घनिषेविताम्।<br>नदीं विमलपानीयां दृष्ट्वा हृष्टोऽभवन्मुनिः॥ २॥
स तामन्वीक्ष्य मुनिभिः सह द्वैपायनः प्रभुः।<br>चकार भावपूतात्मा स्नानं स्नानविधानवित्॥ ३॥उसे देखकर पवित्र आत्मभाववाले तथा स्नानके विधानको जाननेवाले उन द्वैपायन प्रभुने मुनियोंके साथ स्नान किया। विधिपूर्वक देवताओं, ऋषियों तथा पितरोंका तर्पण किया और नाना प्रकारके पुष्पोंद्वारा लोकके आदि कारण भवकी पूजा की। प्रमुख शिष्योंके साथ सत्यवतीके पुत्र व्यासने (उस क्षेत्रमें) प्रवेशकर त्रिशूलधारी ईशान मध्यमेश्वरका पूजन किया। तदनन्तर सारे शरीरमें भस्म धारण किये हुए शान्त पाशुपत लोग अर्थात् पशुपतिके भक्तगण पाशुपत ईश्वर मध्यमेश्वर रुद्रका दर्शन करने आये॥ ३-६॥
संतर्प्य विधिवद् देवानृषीन् पितॄगणांस्तथा।<br>पूजयामास लोकादिं पुष्पैर्नानाविधैर्भवम्॥ ४॥
प्रविश्य शिष्यप्रवरैः सार्धं सत्यवतीसुतः।<br>मध्यमेश्वरमीशानमर्चयामास शूलिनम्॥ ५॥
ततः पाशुपताः शान्ता भस्मोद्धूलितविग्रहाः।<br>द्रष्टुं समागता रुद्रं मध्यमेश्वरमीश्वरम्॥ ६॥
ओंकारासक्तमनसो वेदाध्ययनतत्पराः।<br>जटिला मुण्डिताश्चापि शुक्लयज्ञोपवीतिनः॥ ७॥उनका मन ओंकारके जपमें लगा था, वे सभी वेदोंके अध्ययनमें तत्पर थे। वे शुक्ल यज्ञोपवीत धारण किये थे, कोई जटा रखाये थे और कोई मुण्डित थे। कुछ कौपीन वस्त्र धारण किये थे, तो दूसरे वस्त्ररहित थे। वे ब्रह्मचर्यपरायण, शान्त और वेदान्तके ज्ञानमें तत्पर थे। विप्रो! शिष्योंसे घिरे हुए द्वैपायन मुनिको देखकर यथोक्त विधिसे उनका पूजनकर उन्होंने (पाशुपत भक्तोंनें) यह वचन कहा—॥ ७-९॥
कौपीनवसनाः केचिदपरे चाप्यवाससः।<br>ब्रह्मचर्यरताः शान्ता वेदान्तज्ञानतत्पराः॥ ८॥
दृष्ट्वा द्वैपायनं विप्राः शिष्यैः परिवृतं मुनिम्।<br>पूजयित्वा यथान्यायमिदं वचनमब्रुवन्॥ ९॥
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