भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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१९६ * कूर्मपुराण *


यं योगिनस्त्यक्तसबीजयोगा लब्ध्वा समाधिं परमार्थभूताः। पश्यन्ति देवं प्रणतोऽस्मि नित्यं तं ब्रह्मपारं भवतः स्वरूपम्॥ ४१ ॥ न यत्र नामादिविशेषक्लृप्ति- र्न संदृशे तिष्ठति यत्स्वरूपम्। तं ब्रह्मपारं प्रणतोऽस्मि नित्यं स्वयम्भुवं त्वां शरणं प्रपद्ये॥ ४२ ॥ यद् वेदवादाभिरता विदेहं सब्रह्मविज्ञानमभेदमेकम् । पश्यन्त्यनेकं भवतः स्वरूपं तं ब्रह्मपारं प्रणतोऽस्मि नित्यम्॥ ४३ ॥ यतः प्रधानं पुरुषः पुराणो विवर्तते यं प्रणमन्ति देवाः। नमामि तं ज्योतिषि संनिविष्टं कालं बृहन्तं भवतः स्वरूपम्॥ ४४ ॥ व्रजामि नित्यं शरणं गुहेशं स्थाणुं प्रपद्ये गिरिशं पुरारिम्। शिवं प्रपद्ये हरमिन्दुमौलिं पिनाकिनं त्वां शरणं व्रजामि॥ ४५ ॥

स्तुत्वैवं शङ्कुकर्णोऽसौ भगवन्तं कपर्दिनम्। पपात दण्डवद् भूमौ प्रोच्चरन् प्रणवं परम्॥ ४६ ॥

तत्क्षणात् परमं लिङ्गं प्रादुर्भूतं शिवात्मकम्। ज्ञानमानन्दमद्वैतं कोटिकालाग्निसंनिभम्॥ ४७ ॥

शङ्कुकर्णोऽथ मुक्तात्मा तदात्मा सर्वगोऽमलः। निलिल्ये विमले लिङ्गे तदद्भुतमिवाभवत्॥ ४८ ॥

एतद् रहस्यमाख्यातं माहात्म्यं वः कपर्दिनः। न कश्चिद् वेत्ति तमसा विद्वानप्यत्र मुह्यति॥ ४९ ॥

य इमां शृणुयान्नित्यं कथां पापप्रणाशिनीम्। भक्तः पापविशुद्धात्मा रुद्रसामीप्यमाप्नुयात्॥ ५० ॥

पठेच्च सततं शुद्धो ब्रह्मपारं महास्तवम्। प्रातर्मध्याह्नसमये स योगं प्राप्नुयात् परम्॥ ५१ ॥


सबीज योग (सविकल्पक समाधि)-का त्याग करनेवाले परमार्थभूत योगिजन निर्विकल्पक समाधि लगाकर आपके जिस रूपका दर्शन करते हैं, मैं आपके उसी ज्ञानातीत स्वरूपको नित्य प्रणाम करता हूँ। जिनमें न तो किसी नाम (तथा रूप) आदि विशेष (गुणों)-की कोई कल्पना है और जिनका न कोई स्वरूप दिखलायी पड़ता है, प्रणामपूर्वक उन ब्रह्मपार स्वयम्भूकी शरणमें मैं जाता हूँ। वैदिक सिद्धान्तोंके अनुगामी आपके जिस स्वरूपको विदेह, ब्रह्मविज्ञानमय, अभेदरूप (अद्वितीय)—इन अनेक प्रकारोंसे जानते हैं, आपके उस ब्रह्मपार स्वरूपको मैं नित्य प्रणाम करता हूँ। जिसके प्रधान (प्रकृति) और पुराण पुरुष विवर्त (परिणाम) हैं तथा देवता जिसे प्रणाम करते हैं, उस ज्योतिमें संनिविष्ट ज्योतिर्मय आपके बृहत् काल-स्वरूपको मैं नमस्कार करता हूँ। मैं सनातन गुहेशकी* शरणमें जाता हूँ। मैं स्थाणु, गिरिश पुरारिके शरणागत हूँ, मैं चन्द्रमौलि हर, शिवकी शरण ग्रहण करता हूँ। मैं पिनाक धारण करनेवाले आपकी शरणमें जाता हूँ॥ ४१-४५॥

इस प्रकार भगवान् कपर्दीकी स्तुति कर श्रेष्ठ ओंकारका उच्चारण करता हुआ वह शंकुकर्ण दण्डवत् भूमिपर गिर पड़ा। उसी क्षण ज्ञान और आनन्दस्वरूप, अद्वितीय, करोड़ों प्रलयकालीन अग्निके समान, शिवात्मक श्रेष्ठ लिङ्ग प्रादुर्भूत हुआ। तब मुक्त आत्मावाला, तादात्म्यस्वरूपवाला, सर्वव्यापी, विशुद्ध हुआ वह शंकुकर्ण निर्मल लिङ्गमें विलीन हो गया। यह एक अद्भुत-सी बात हुई॥ ४६-४८॥

यह मैंने आप लोगोंको कपर्दीका रहस्य एवं माहात्म्य बतलाया। इसे कोई नहीं जानता। विद्वान् भी इस विषयमें अज्ञानसे मोहित हो जाते हैं। जो भक्त पापका नाश करनेवाली इस कथाको नित्य सुनता है, वह पापसे विमुक्त शुद्धात्मा होकर रुद्रकी समीपताको प्राप्त कर लेता है—॥ ४९-५०॥

और जो मनुष्य नित्य प्रातः एवं मध्याह्नकालमें शुद्धतापूर्वक इस ब्रह्मपार नामक महान् स्तवका पाठ करेगा, वह परम योगको प्राप्त कर लेगा॥ ५१॥


* गुहा (बुद्धि)-के ईश।