संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| * अध्याय ३१ * | १९५ |
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| स्तुवन्ति सिद्धा दिवि देवसङ्घा<br> नृत्यन्ति दिव्याप्सरसोऽभिरामाः।<br>मुञ्चन्ति वृष्टिं कुसुमाम्बुमिश्रां<br> गन्धर्वविद्याधरकिंनराद्याः ॥ ३३॥ | आकाशमें सिद्ध तथा देवताओंके समूह (उसकी) स्तुति कर रहे थे। दिव्य सुन्दर अप्सराएँ नृत्य कर रही थीं और गन्धर्व, विद्याधर तथा किंनर आदि जलसे स्निग्ध पुष्पोंकी वृष्टि कर रहे थे॥ ३३॥ |
| संस्तूयमानोऽथ मुनीन्द्रसङ्घै-<br> रवाप्य बोधं भगवत्प्रसादात्।<br>समाविशन्मण्डलमेतदग्र्यं<br> त्रयीमयं यत्र विभाति रुद्रः॥ ३४॥ | मुनियोंके समूहोंसे स्तुति किये जाते हुए उसने भगवान्की कृपासे ज्ञान प्राप्त किया और वह उस त्रयीमय श्रेष्ठ मण्डलमें प्रविष्ट हो गया जहाँ रुद्र प्रकाशित होते हैं। पिशाचयोनिको प्राप्त उस (पुरुष)- |
| दृष्ट्वा विमुक्तं स पिशाचभूतं<br> मुनिः प्रहृष्टो मनसा महेशम्।<br>विचिन्त्य रुद्रं कविमेकमग्निं<br> प्रणम्य तुष्टाव कपर्दिने तम्॥ ३५॥ | को मुक्त हुआ देखकर वह मुनि अत्यन्त प्रसन्न-मनसे महेशका ध्यानकर और कवि अद्वितीय रुद्राग्निको प्रणामकर उन जटाधारी (शिव)-की स्तुति करने लगे— ॥ ३४-३५॥ |
| शङ्कुकर्ण उवाच | शंकुकर्णने कहा—मैं परात्पर, अद्वितीय, सबके |
| कपर्दिनं त्वां परतः परस्ताद्<br> गोप्तारमेकं पुरुषं पुराणम्।<br>व्रजामि योगेश्वरमीशितार-<br> मादित्यमग्निं कपिलाधिरूढम्॥ ३६॥ | रक्षक, पुराणपुरुष, योगेश्वर, नियामक, आदित्य, अग्निरूप एवं कपिल (वृषभ)-पर अधिष्ठित आप कपर्दीकी शरण ग्रहण करता हूँ॥ ३६॥ |
| त्वां ब्रह्मपारं हृदि संनिविष्टं<br> हिरण्मयं योगिनमादिमन्तम्।<br>व्रजामि रुद्रं शरणं दिविस्थं<br> महामुनिं ब्रह्ममयं पवित्रम्॥ ३७॥ | मैं हृदयमें संनिविष्ट, हिरण्मय, योगी, आदि एवं अन्तरूप, द्युलोकमें स्थित, महामुनि, पवित्र और ब्रह्मस्वरूप आप ब्रह्मपार रुद्रकी शरणमें जाता हूँ। |
| सहस्रपादाक्षिशिरोऽभियुक्तं<br> सहस्रबाहुं तमसः परस्तात्।<br>त्वां ब्रह्मपारं प्रणमामि शम्भुं<br> हिरण्यगर्भाधिपतिं त्रिनेत्रम्॥ ३८॥ | मैं हजारों चरण, नेत्र और सिरोंसे युक्त, हजारों बाहुवाले, अन्धकारसे परे रहनेवाले, हिरण्यगर्भके अधिपति और तीन नेत्रवाले आप ज्ञानातीत शम्भुको प्रणाम करता हूँ। जिनसे संसारकी उत्पत्ति तथा विनाश |
| यतः प्रसूतिर्जगतो विनाशो<br> येनावृतं सर्वमिदं शिवेन।<br>तं ब्रह्मपारं भगवन्तमीशं<br> प्रणम्य नित्यं शरणं प्रपद्ये॥ ३९॥ | होता है और जिन शिवने इस सम्पूर्ण (विश्व)-को आवृत कर रखा है, उन्हीं ज्ञानातीत भगवान् ईशको प्रणाम कर मैं उनकी नित्य शरण ग्रहण करता हूँ। मैं अलिङ्ग-(निराकार) और आलोकरहित* |
| अलिङ्गमालोकविहीनरूपं<br> स्वयम्प्रभं चित्पतिमेकरुद्रम्।<br>तं ब्रह्मपारं परमेश्वरं त्वां<br> नमस्करिष्ये न यतोऽन्यदस्ति॥ ४०॥ | रूपवाले, स्वयं प्रभावान्, चित्-शक्तिके स्वामी, अद्वितीय रुद्ररूप, ज्ञानसे अतीत आप परमेश्वरको नमस्कार करता हूँ, क्योंकि आपसे भिन्न अन्य कुछ है ही नहीं॥ ३७-४०॥ |
* महेश्वरका रूप किसी भी आलोक (प्रकाश)-से आलोकित (प्रकाशित) नहीं होता, अपितु स्वयं प्रकाशमान है और उसीके प्रकाशसे समस्त प्रपञ्च सूर्य, चन्द्र आदि प्रकाशित हैं।