भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished506 पृष्ठ

पृष्ठ 204, कुल 506 में से

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१९४* कूर्मपुराण *
न पूजिता मया देवा गावोऽप्यतिथयस्तथा।<br>न कदाचित् कृतं पुण्यमल्पं वा स्वल्पमेव वा ॥ २२ ॥<br><br>एकदा भगवान् देवो गोवृषेश्वरवाहनः।<br>विश्वेश्वरो वाराणस्यां दृष्टः स्पृष्टो नमस्कृतः ॥ २३ ॥<br><br>तदाचिरेण कालेन पञ्चत्वमहमागतः।<br>न दृष्टं तन्मया घोरं यमस्य वदनं मुने ॥ २४ ॥<br><br>ईदृशीं योनिमापन्नः पैशाचीं क्षुधयान्वितः।<br>पिपासयाधुनाक्रान्तो न जानामि हिताहितम् ॥ २५ ॥<br><br>यदि कंचित् समुद्धर्तुमुपायं पश्यसि प्रभो।<br>कुरुष्व तं नमस्तुभ्यं त्वामहं शरणं गतः ॥ २६ ॥<br><br>इत्युक्तः शङ्कुकर्णोऽथ पिशाचमिदमब्रवीत्।<br>त्वादृशो न हि लोकेऽस्मिन् विद्यते पुण्यकृत्तमः ॥ २७ ॥<br><br>यत् त्वया भगवान् पूर्वं दृष्टो विश्वेश्वरः शिवः।<br>संस्पृष्टो वन्दितो भूयः कोऽन्यस्त्वत्सदृशो भुवि ॥ २८ ॥<br><br>तेन कर्मविपाकेन देशमेतं समागतः।<br>स्नानं कुरुष्व शीघ्रं त्वमस्मिन् कुण्डे समाहितः।<br>येनेमां कुत्सितां योनिं क्षिप़्रमेव प्रहास्यसि ॥ २९ ॥<br><br>स एवमुक्तो मुनिना पिशाचो<br>  दयालुना देववरं त्रिनेत्रम्।<br>स्मृत्वा कपर्दीश्वरमीशितारं<br>  चक्रे समाधाय मनोऽवगाहम् ॥ ३० ॥<br><br>तदावगाढो मुनिसंनिधाने<br>  ममार दिव्याभरणोपपन्नः।<br>अदृश्यतार्कप्रतिमे विमाने<br>  शशाङ्कचिह्नाङ्कितचारुमौलिः ॥ ३१ ॥<br><br><br>विभाति रुद्रैरभितो दिविस्थैः<br>  समावृतो योगिभिरप्रमेयैः।<br>सबालखिल्यादिभिरेष देवो<br>  यथॊदये भानुरशेषदेवः ॥ ३२ ॥किंतु मैंने न तो कभी देवताओंकी पूजा की न गायोंकी और न तो अतिथियोंकी, मैंने कभी छोटे-से भी छोटा पुण्य नहीं किया। एक बारकी बात है कि वाराणसीमें मैंने वृषभवाहन भगवान् विश्वेश्वरदेवका दर्शन किया, स्पर्श किया और उन्हें नमस्कार किया। तदनन्तर बहुत थोड़े ही समयके बाद मेरी मृत्यु हो गयी। हे मुने! (इसी पुण्यके कारण) मुझे यमके भयानक मुखको तो नहीं देखना पड़ा, पर इस प्रकारकी पिशाचयोनि प्राप्तकर भूख और प्याससे व्याकुल मैं वाराणसीमें ही भटक रहा हूँ। इस समय मुझे हित और अहितका कुछ भी ज्ञान नहीं है। प्रभो! मेरे उद्धारका यदि कोई उपाय आप देखते हों तो उसे करें, आपको नमस्कार है, मैं आपकी शरणमें आया हूँ ॥ २१–२६ ॥<br><br>ऐसा कहे जानेपर शंकुकर्णने पिशाचसे कहा—तुम्हारे समान इस संसारमें श्रेष्ठ पुण्य कर्म करनेवाला और कोई नहीं है, जो कि तुमने पूर्वकालमें विश्वेश्वर भगवान् शिवका दर्शन किया, उनका स्पर्श किया और वन्दना की, फिर संसारमें तुम्हारे समान और कौन हो सकता है? उस कर्मके परिणामस्वरूप ही तुम इस स्थानपर पहुँचे हो। अब तुम एकाग्रमन होकर इस कुण्डमें शीघ्र ही स्नान करो। जिससे इस कुत्सित (पिशाचकी) योनिसे तुम शीघ्र ही छुटकारा प्राप्त कर सको ॥ २७–२९ ॥<br><br>दयालु मुनिके ऐसा कहनेपर उस पिशाचने देवश्रेष्ठ त्रिलोचन, अनुशास्ता भगवान् कपर्दीश्वरका स्मरण कर मनको एकाग्र करते हुए (कुण्डमें) स्नान किया ॥ ३० ॥<br><br>तदनन्तर स्नान किया हुआ वह मुनिके समीप ही मृत्युको प्राप्त हो गया और पुनः सूर्यके समान प्रकाशित विमानमें स्थित हो वह दिव्य आभूषणोंको धारण किये तथा चन्द्रमाके चिह्नसे सुशोभित सुन्दर मस्तकसे युक्त (पुरुषके रूपमें) दिखायी पड़ा। वह आकाशमें स्थित रहनेवाले रुद्रों, अप्रमेय योगियों तथा बालखिल्य आदि ऋषियोंसे चारों ओरसे आवृत होते हुए उसी प्रकार सुशोभित हो रहा था, जिस प्रकार सभी देवताओंके भी देवता सूर्यदेवता उदयकालमें दिखलायी पड़ते हैं ॥ ३१-३२ ॥
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