संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished506 पृष्ठ
पृष्ठ 203, कुल 506 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 203
| * अध्याय ३१ * | १९३ |
|---|---|
| त्रिनेत्रा नीलकण्ठा च शशाङ्काङ्कितमूर्धजा ।<br>वृषाधिरूढा पुरुषैस्तादृशैरेव संवृता ॥ ८ ॥<br><br>पुष्पवृष्टिं विमुञ्चन्ति खेचरास्तस्य मूर्धनि ।<br>गणेश्वरः स्वयं भूत्वा न दृष्टस्तत्क्षणात् ततः ॥ ९ ॥<br><br>दृष्ट्वैतदाश्चर्यवरं जैमिनिप्रमुखा द्विजाः ।<br>कपर्दीश्वरमाहात्म्यं पप्रच्छुर्गुरुमच्युतम् ॥ १० ॥ | तीन नेत्रोंवाली, नीलकण्ठवाली, चन्द्रमासे सुशोभित मस्तकवाली और वृषभपर आरूढ़ तथा शिवके समान ही पुरुषोंसे समन्वित दिखलायी पड़ी। उसके मस्तकपर आकाशचारी (गन्धर्व आदि) फूलोंकी वर्षा कर रहे थे। तदनन्तर वह स्वयं गणेश्वर होकर तत्क्षण ही अदृश्य हो गयी। जैमिनि आदि प्रमुख द्विजोंने ऐसा महान् आश्चर्य देखकर अच्युतस्वरूप गुरु (व्यास)-से कपर्दीश्वरका माहात्म्य पूछा ॥ ६-१० ॥ |
| तेषां प्रोवाच भगवान् देवाग्रे चोपविश्य सः ।<br>कपर्दीशस्य माहात्म्यं प्रणम्य वृषभध्वजम् ॥ ११ ॥<br><br>इदं देवस्य तल्लिङ्गं कपर्दीश्वरमुत्तमम् ।<br>स्मृत्वैवाशेषपापौघं क्षिप्रमस्य विमुञ्चति ॥ १२ ॥ | उन भगवान् व्यासने (कपर्दीश्वर) देवके समीपमें बैठकर वृषभध्वजको प्रणाम करके कपर्दीशका माहात्म्य उन्हें बतलाया। यह देवका वही श्रेष्ठ कपर्दीश्वर नामक लिङ्ग है, जिसका स्मरणमात्र करनेसे ही स्मरण करनेवालेका अशेष पापसमूह शीघ्र ही नष्ट हो जाता है ॥ ११-१२ ॥ |
| कामक्रोधादयो दोषा वाराणसीनिवार्सिनाम् ।<br>विघ्नाः सर्वे विनश्यन्ति कपर्दीश्वरपूजनात् ॥ १३ ॥<br><br>तस्मात् सदैव द्रष्टव्यं कपर्दीश्वरमुत्तमम् ।<br>पूजितव्यं प्रयत्नेन स्तोतव्यं वैदिकैः स्तवैः ॥ १४ ॥<br><br>ध्यायतामत्र नियतं योगिनां शान्तचेतसाम् ।<br>जायते योगसंसिद्धिः सा षण्मासे न संशयः ॥ १५ ॥ | वाराणसीमें निवास करनेवाले लोगोंके काम, क्रोध आदि दोष और सभी विघ्न कपर्दीश्वरका पूजन करनेसे विनष्ट हो जाते हैं। इसलिये श्रेष्ठ कपर्दीश्वरका सदा ही दर्शन करना चाहिये, प्रयत्नपूर्वक पूजन करना चाहिये और वैदिक स्तोत्रोंसे उनकी स्तुति करनी चाहिये। शान्त चित्तवाले योगियोंको यहाँ नियमित ध्यान करते हुए छः महीनेमें ही उत्कृष्ट योगसिद्धि प्राप्त हो जाती है, इसमें कोई संशय नहीं है ॥ १३-१५ ॥ |
| ब्रह्महत्यादयः पापा विनश्यन्त्यस्य पूजनात् ।<br>पिशाचमोचने कुण्डे स्नातस्यात्र समीपतः ॥ १६ ॥<br><br>अस्मिन् क्षेत्रे पुरा विप्रास्तपस्वी शंसितव्रतः ।<br>शंकुकर्ण इति ख्यातः पूजयामास शंकरम् ।<br>जजाप रुद्रमनिशं प्रणवं ब्रह्मरूपिणम् ॥ १७ ॥<br><br>पुष्पधूपादिभिः स्तोत्रैर्नमस्कारैः प्रदक्षिणैः ।<br>उवास तत्र योगात्मा कृत्वा दीक्षां तु नैष्ठिकीम् ॥ १८ ॥<br><br>कदाचिदागतं प्रेतं पश्यति स्म क्षुधान्वितम् ।<br>अस्थिचर्मपिनद्धाङ्गं निःश्वसन्तं मुहुर्मुहुः ॥ १९ ॥<br><br>तं दृष्ट्वा स मुनिश्रेष्ठः कृपया परया युतः ।<br>प्रोवाच को भवान् कस्माद् देशाद् देशमिमं श्रितः ॥ २० ॥ | यहाँ समीपमें स्थित पिशाचमोचन कुण्डमें स्नानकर इस लिङ्गका पूजन करनेसे ब्रह्महत्या आदि सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। ब्राह्मणो ! प्राचीन कालमें शंकुकर्ण नामसे प्रसिद्ध कठोर व्रतवाले तपस्वीने इस क्षेत्रमें शंकरकी पूजा की थी। वह रात-दिन प्रणव एवं ब्रह्मस्वरूप रुद्रका जप करता था। निष्ठापूर्वक दीक्षा ग्रहण कर वह योगात्मा पुष्प, धूप आदिसे तथा स्तोत्र, नमस्कार एवं प्रदक्षिणाके द्वारा (पूजा करता हुआ) वहाँ रहने लगा। किसी दिन उसने भूखसे व्याकुल अस्थि एवं चर्मसे व्याप्त शरीरवाले और बार-बार साँस ले रहे एक आते हुए प्रेतको देखा। उसे देखकर उस श्रेष्ठ मुनिने अत्यन्त कृपासे युक्त होकर उससे कहा—आप कौन हैं? कहाँसे इस देशमें आये हैं ? ॥ १६—२० ॥ |
| तस्मै पिशाचः क्षुधया पीड्यमानोऽब्रवीद् वचः ।<br>पूर्वजन्मन्यहं विप्रो धनधान्यसमन्वितः ।<br>पुत्रपौत्रादिभिर्युक्तः कुटुम्बभरणोत्सुकः ॥ २१ ॥ | क्षुधासे पीड़ित पिशाचने उससे कहा—पूर्वजन्ममें मैं धनधान्यसे सम्पन्न, पुत्र-पौत्रादिकोंसे युक्त, परिवारके भरण-पोषणमें उत्सुक रहनेवाला एक ब्राह्मण था, |