संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 202, कुल 506 में से
संदर्भ में पढ़ें१९२ * कूर्मपुराण *
आराध्यन्ति प्रभुमीशितारं
वाराणसीमध्यगता मुनीन्द्राः।
यजन्ति यज्ञैरभिसंधिहीनाः
स्तुवन्ति रुद्रं प्रणमन्ति शम्भुम्॥ २८॥
वाराणसीमें निवास करनेवाले श्रेष्ठ मुनिजन प्रभु शंकरकी आराधना करते हैं, फलकी आकांक्षा किये बिना यज्ञोंद्वारा (उनका) यजन करते हैं, रुद्र-रूपमें उनकी स्तुति करते हैं और शम्भु-रूपमें उन्हें प्रणाम करते हैं॥ २८॥
नमो भवायामलयोगधाम्ने
स्थाणुं प्रपद्ये गिरिशं पुराणम्।
स्मरामि रुद्रं हृदये निविष्टं
जाने महादेवमनेकरूपम्॥ २९॥
विशुद्ध योगके आश्रयरूप भवको नमस्कार है, मैं स्थाणु पुराण गिरिशकी शरण ग्रहण करता हूँ, हृदयमें अवस्थित रुद्रका स्मरण करता हूँ और महादेवको अनेक रूपोंमें स्थित मानता हूँ॥ २९॥
इति श्रीकूर्मपुराणे षट्साहस्र्यां संहितायां पूर्वविभागे त्रिंशोऽध्यायः॥ ३०॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें तीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ३०॥
इकतीसवाँ अध्याय
वाराणसीके कपर्दीश्वर लिङ्गका माहात्म्य, पिशाचमोचन-कुण्डमें स्नान करनेकी महिमा, वहाँ स्नान करनेसे पिशाचयोनिसे मुक्ति प्राप्त करनेका आख्यान, शंकुकर्णकी कथा तथा शंकुकर्णकृत ब्रह्मपार-स्तव
सूत उवाच
समाभाष्य मुनीन् धीमान् देवदेवस्य शूलिनः।
जगाम लिङ्गं तद् द्रष्टुं कपर्दीश्वरमव्ययम्॥ १॥
स्नात्वा तत्र विधानेन तर्पयित्वा पितॄन् द्विजाः।
पिशाचमोचने तीर्थे पूजयामास शूलिनम्॥ २॥
सूतजी बोले— मुनियोंसे इस प्रकार कहकर बुद्धिमान् (व्यासजी) देवाधिदेव त्रिशूली (भगवान् शंकर)-के कपर्दीश्वर नामक अव्यय लिङ्गका दर्शन करने गये। ब्राह्मणो! वहाँ पिशाचमोचन तीर्थमें स्नानकर विधिपूर्वक पितरोंका तर्पणकर उन्होंने त्रिशूल धारण करनेवाले शंकरकी पूजा की॥ १-२॥
तत्राश्चर्यमपश्यंस्ते मुनयो गुरुणा सह।
मेनिरे क्षेत्रमाहात्म्यं प्रणेमुर्गिरिशं हरम्॥ ३॥
कश्चिदभ्याजगामेदं शार्दूलो घोररूपधृक्।
मृगीमेकां भक्षयितुं कपर्दीश्वरमुत्तमम्॥ ४॥
तत्र सा भीतहृदया कृत्वा कृत्वा प्रदक्षिणम्।
धावमाना सुसम्भ्रान्ता व्याघ्रस्य वशमागता॥ ५॥
वहाँ गुरुदेव (व्यास)-के साथ उन मुनियोंने एक आश्चर्य देखा। उन्होंने इसे क्षेत्रका माहात्म्य समझा और गिरिश हरको प्रणाम किया। कोई भयंकर रूपवाला व्याघ्र एक मृगीका भक्षण करनेके लिये वहाँ श्रेष्ठ कपर्दीश्वरके समीपमें आया। भयभीत मनवाली वह मृगी वहाँ प्रदक्षिणा करते-करते दौड़ती हुई अत्यन्त व्याकुल हो जानेसे व्याघ्रके वशीभूत हो गयी॥ ३-५॥
तां विदार्य नखैस्तीक्ष्णैः शार्दूलः सुमहाबलः।
जगाम चान्यं विजनं देशं दृष्ट्वा मुनीश्वरान्॥ ६॥
अपने तीक्ष्ण नखोंसे उसे विदीर्णकर वह महान् बलशाली व्याघ्र उन मुनियोंको देखकर दूसरे जनशून्य स्थानकी ओर चला गया। कपर्दीशके समक्ष ही मृत्युको प्राप्त वह बाल-अवस्थावाली मृगी आकाशमें चमकते हुए सूर्यके समान प्रभाव्राली, महाज्वालारूपा,
मृतमात्रा च सा बाला कपर्दीशाग्रतो मृगी।
अदृश्यत महाज्वाला व्योम्नि सूर्यसमप्रभा॥ ७॥