भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished506 पृष्ठ

पृष्ठ 201, कुल 506 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 201

* अध्याय ३० *

१९१


समभ्यर्च्य तथा शिष्यैर्माहात्म्यं कृत्तिवाससः ।<br>कथयामास शिष्येभ्यो भगवान् ब्रह्मवित्तमः ॥ १५ ॥ब्रह्मज्ञानियोंमें श्रेष्ठ भगवान् व्यासने शिष्योंके साथ लिङ्गका पूजनकर शिष्योंको कृत्तिवासेश्वरका माहात्म्य बतलाया ॥ १५ ॥
अस्मिन् स्थाने पुरा दैत्यो हस्ती भूत्वा भवान्तिकम् ।<br>ब्राह्मणान् हन्तुमायातो येऽत्र नित्यमुपासते ॥ १६ ॥प्राचीन कालमें एक दैत्य हाथीका रूप धारणकर यहाँ शंकरके समीप नित्य उपासना करनेवाले ब्राह्मणोंको मारनेके लिये आया। द्विजश्रेष्ठो! उन भक्तोंकी रक्षाके लिये इस लिङ्गसे भक्तवत्सल महादेव त्रिलोचन प्रकट हुए। हाथीकी आकृतिवाले उस दैत्यको अवज्ञा-पूर्वक शूलसे मारकर शंकरने उसके चर्मका वस्त्र धारण किया। उसी समयसे वे कृत्तिवासेश्वर* हो गये ॥ १६—१८ ॥
तेषां लिङ्गान्महादेवः प्रादुरासीत् त्रिलोचनः ।<br>रक्षणार्थं द्विजश्रेष्ठा भक्तानां भक्तवत्सलः ॥ १७ ॥
हत्वा गजाकृतिं दैत्यं शूलेनावज्ञया हरः ।<br>वासस्तस्याकरोत् कृत्तिं कृत्तिवासेश्वरस्ततः ॥ १८ ॥
अत्र सिद्धिं परां प्राप्ता मुनयो मुनिपुंगवाः ।<br>तेनैव च शरीरेण प्राप्तास्तत् परमं पदम् ॥ १९ ॥श्रेष्ठ मुनियो! यहाँ मुनियोंने परम सिद्धि प्राप्त की और उसी शरीरसे परम पद अर्थात् मोक्ष भी प्राप्त किया। विद्या, विद्येश्वर, रुद्र एवं शिव नामसे कहे जानेवाले कृत्तिवासेश्वर लिङ्गको सभी देवता नित्य आवृत्तकर स्थित रहते हैं। घोर कलियुग और अधार्मिक लोगोंकी बहुलताको समझकर जो लोग कृत्तिवासेश्वरका परित्याग नहीं करते वे निःसंदेह कृतार्थ हो जाते हैं। हजारों जन्मान्तरोंमें भी दूसरे स्थानपर मोक्ष प्राप्त होता हो अथवा नहीं, किंतु कृत्तिवास-क्षेत्रमें एक जन्ममें ही मोक्ष प्राप्त हो जाता है ॥ १९—२२ ॥
विद्या विद्येश्वरा रुद्राः शिवा ये च प्रकीर्तिताः ।<br>कृत्तिवासेश्वरं लिङ्गं नित्यमावृत्य संस्थिताः ॥ २० ॥
ज्ञात्वा कलियुगं घोरमधर्मबहुलं जनाः ।<br>कृत्तिवासं न मुञ्चन्ति कृतार्थास्ते न संशयः ॥ २१ ॥
जन्मान्तरसहस्रेण मोक्षोऽन्यत्राप्यते न वा ।<br>एकेन जन्मना मोक्षः कृत्तिवासे तु लभ्यते ॥ २२ ॥
आलयः सर्वसिद्धानामेतत् स्थानं वदन्ति हि ।<br>गोपितं देवदेवेन महादेवेन शम्भुना ॥ २३ ॥लोगोंका कहना है कि सभी सिद्धोंका आश्रयरूप यह स्थान देवाधिदेव महादेव शम्भुके द्वारा सुरक्षित है। प्रत्येक युगमें वेदमें पारंगत इन्द्रियनिग्रही ब्राह्मण यहाँ महादेवकी उपासना करते हैं और शतरुद्रियका जप करते हैं। हृदयमें सर्वान्तरात्मा स्थाणुदेव शिवका ध्यान करते हुए कृत्तिवासा त्र्यम्बक देव (त्रिलोचन महादेव) - की निरन्तर स्तुति करते हैं ॥ २३—२५ ॥
युगे युगे ह्यत्र दान्ता ब्राह्मणा वेदपारगाः ।<br>उपासते महादेवं जपन्ति शतरुद्रियम् ॥ २४ ॥
स्तुवन्ति सततं देवं त्र्यम्बकं कृत्तिवाससम् ।<br>ध्यायन्ति हृदये देवं स्थाणुं सर्वान्तरं शिवम् ॥ २५ ॥
गायन्ति सिद्धाः किल गीतकानि<br>ये वाराणस्यां निवसन्ति विप्राः ।<br>तेषामथैकेन भवेन्मुक्ति-<br>र्ये कृत्तिवासं शरणं प्रपन्नाः ॥ २६ ॥विप्रो! सिद्धजन यह गीत गाते हैं कि जो लोग वाराणसीमें निवास करते हैं और कृत्तिवासा भगवान् शिवकी शरण ग्रहण करते हैं, उनकी एक ही जन्ममें मुक्ति हो जाती है। इस लोकमें संसारको अभीष्ट अत्यन्त दुर्लभ विप्रकुलमें जन्म प्राप्तकर संयमी लोग ध्यानमें समाधिस्थ होकर रुद्रका जप करते हैं और चित्तमें महेश्वरका ध्यान करते रहते हैं ॥ २६-२७ ॥
सम्प्राप्य लोके जगतामभीष्टं<br>सुदुर्लभं विप्रकुलेषु जन्म ।<br>ध्याने समाधाय जपन्ति रुद्रं<br>ध्यायन्ति चित्ते यतयो महेशम् ॥ २७ ॥

* कृत्ति चर्मको कहते हैं।