भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished506 पृष्ठ

पृष्ठ 200, कुल 506 में से

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१९० * कूर्मपुराण *

तीसवाँ अध्याय

वाराणसीके ओंकारेश्वर और कृत्तिवासेश्वर लिङ्गोंका माहात्म्य, शंकरके कृत्तिवासा नाम पड़नेका वृत्तान्त

सूत उवाच
स शिष्यैः संवृतो धीमान् गुरुद्वैपायनो मुनिः।
जगाम विपुलं लिङ्गमोंकारं मुक्तिदायकम्॥ १ ॥
तत्राभ्यर्च्य महादेवं शिष्यैः सह महामुनिः।
प्रोवाच तस्य माहात्म्यं मुनीनां भावितात्मनाम्॥ २ ॥
इदं तद् विमलं लिङ्गमोंकारं नाम शोभनम्।
अस्य स्मरणमात्रेण मुच्यते सर्वपातकैः॥ ३ ॥
एतत् परतरं ज्ञानं पञ्चायतनमुत्तमम्।
सेवितं सूरिभिर्नित्यं वाराणस्यां विमोक्षदम्॥ ४ ॥
अत्र साक्षान्महादेवः पञ्चायतनविग्रहः।
रमते भगवान् रुद्रो जन्तूनामपवर्गदः॥ ५ ॥
यत् तत् पाशुपतं ज्ञानं पञ्चार्थमिति शब्द्यते।
तदेतद् विमलं लिङ्गमोंङ्कारे समवस्थितम्॥ ६ ॥
शान्त्यतीता तथा शान्तिर्विद्या चैव परा कला।
प्रतिष्ठा च निवृत्तिश्च पञ्चार्थं लिङ्गमैश्र्वरम्॥ ७ ॥
पञ्चानामपि देवानां ब्रह्मादीनां सदाश्रयम्।
ओंकारबोधकं लिङ्गं पञ्चायतनमुच्यते॥ ८ ॥
संस्मरेदैश्र्वरं लिङ्गं पञ्चायतनमव्ययम्।
देहान्ते तत्परं ज्योतिरानन्दं विशते बुधः॥ ९ ॥
अत्र देवर्षयः पूर्वं सिद्धा ब्रह्मर्षयस्तथा।
उपास्य देवमीशानं प्राप्तवन्तः परं पदम्॥ १० ॥
मत्स्योदर्यास्तटे पुण्यं स्थानं गुह्यतमं शुभम्।
गोचर्ममात्रं विप्रेन्द्रा ओङ्कारेश्वरमुत्तमम्॥ ११ ॥
कृत्तिवासेश्वरं लिङ्गं मध्यमेश्वरमुत्तमम्।
विश्वेश्वरं तथोंकारं कपर्दीश्र्वरमेव च॥ १२ ॥
एतानि गुह्यलिङ्गानि वाराणस्यां द्विजोत्तमाः।
न कश्चिदिह जानाति विना शम्भोरनुग्रहात्॥ १३ ॥
एवमुक्त्वा ययौ कृष्णः पाराशर्यो महामुनिः।
कृत्तिवासेश्वरं लिङ्गं द्रष्टुं देवस्य शूलिनः॥ १४ ॥

सूतजी बोले— शिष्योंसे घिरे हुए बुद्धिमान् वे गुरु द्वैपायन मुनि मुक्ति प्रदान करनेवाले विशाल ओङ्कार लिङ्गकी संनिधिमें गये। शिष्योंके साथ महामुनिने वहाँ महादेवकी भलीभाँति पूजा करके पवित्र आत्मावाले मुनियोंको उस ओङ्कार लिङ्गका माहात्म्य बताया॥ १-२॥

ओङ्कार नामवाला यह लिङ्ग पवित्र एवं सुन्दर है, इसके स्मरणमात्रसे सभी पापोंसे मुक्ति मिल जाती है। वाराणसीमें विद्वानोंके द्वारा मुक्ति प्रदान करनेवाले इस अतिश्रेष्ठ ज्ञानरूप उत्तम पञ्चायतनकी नित्य पूजा की जाती है। यहाँ प्राणियोंको मोक्ष देनेवाले साक्षात् महादेव भगवान् रुद्र पञ्चायतन-शरीर धारणकर रमण करते रहते हैं॥ ३—५॥

जो वह पाशुपत ज्ञान 'पञ्चार्थ' शब्दसे कहा जाता है, वही ज्ञान इस पवित्र लिङ्गके रूपमें ओङ्कारमें अवस्थित है। अतीता शान्ति, शान्ति, उत्कृष्ट कलावाली विद्या, प्रतिष्ठा और निवृत्ति—इन्हीं पाँच अर्थोंके लिये इनके प्रतिनिधि-रूपमें महादेवका (ओङ्कार) लिङ्ग प्रतिष्ठित है। ब्रह्मा आदि पाँच देवोंका भी नित्य आश्रयरूप यही ओङ्कारबोधक लिङ्ग पञ्चायतन कहलाता है। अविनाशी पञ्चायतनरूप ईश्वरीय लिङ्गका स्मरण करना चाहिये, ऐसा करनेसे मनुष्य देहान्त होनेपर आनन्दस्वरूप परम ज्योतिमें प्रवेश करता है। पूर्वकालमें देवर्षियों, ब्रह्मर्षियों तथा सिद्धोंने यहींपर भगवान् ईशानकी उपासना कर परमपद प्राप्त किया था। विप्रेन्द्रो! मत्स्योदरीके किनारे गोचर्म*के बराबर गुह्यतम शुभ पुण्य स्थान है, वही ओङ्कारेश्वरका उत्तम क्षेत्र है॥ ६—११॥

द्विजोत्तमो! कृत्तिवासेश्वर, श्रेष्ठ मध्यमेश्वर, विश्वेश्वर, ओङ्कारेश्वर तथा कपर्दीश्वर—ये वाराणसीके गुह्य लिङ्ग हैं, बिना शंकरकी कृपाके कोई इन्हें यहाँ जान नहीं सकता। ऐसा कहकर पराशरके पुत्र महामुनि कृष्णद्वैपायन शूलधारी महादेवके कृत्तिवासेश्वर नामक लिङ्गका दर्शन करने गये॥ १२—१४॥


* भूमिकी एक विशिष्ट माप।

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