संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished506 पृष्ठ
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| * अध्याय २९ * | १८९ |
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| यथा नारायणः श्रेष्ठो देवानां पुरुषोत्तमः।<br>यथेश्वराणां गिरिशः स्थानानां चैतदुत्तमम्॥ ७० ॥ | जिस प्रकार देवताओंमें पुरुषोत्तम नारायण श्रेष्ठ हैं, जिस प्रकार ईश्वरोंमें गिरिश (महादेव) श्रेष्ठ हैं, वैसे ही सभी स्थानोंमें यह (अविमुक्त क्षेत्र) श्रेष्ठ है। जिन्होंने पूर्वजन्ममें रुद्रकी उपासना की है, वे ही परम अविमुक्त क्षेत्र नामक शिवके निवासस्थानको प्राप्त करते हैं। कलिके दोषोंके कारण जिनकी बुद्धि उपहत हो गयी है, वह परमेष्ठीके उस स्थानको जान नहीं सकते॥ ७०-७२॥ |
| यैः समाराधितो रुद्रः पूर्वस्मिन्नेव जन्मनि।<br>ते विन्दन्ति परं क्षेत्रमविमुक्तं शिवालयम्॥ ७१ ॥ | |
| कलिकल्मषसम्भूता येषामुपहता मतिः।<br>न तेषां विदितुं शक्यं स्थानं तत् परमेष्ठिनः॥ ७२ ॥ | |
| ये स्मरन्ति सदा कालं विन्दन्ति च पुरीमिमाम्।<br>तेषां विनश्यति क्षिप्रमिहामुत्र च पातकम्॥ ७३ ॥ | जो सर्वदा कालरूप शिवका और इस पुरी (वाराणसी)-का स्मरण करते रहते हैं, उनका इस लोक और अन्य लोकका पाप शीघ्र ही नष्ट हो जाता है। यहाँ निवास करनेवाले जो पाप करते हैं, कालस्वरूप देव शिव उन सबको नष्ट कर देते हैं॥ ७३-७४॥ |
| यानि चेह प्रकुर्वन्ति पातकानि कृतालयाः।<br>नाशयेत् तानि सर्वाणि देवः कालतनुः शिवः॥ ७४ ॥ | |
| आगच्छतामिदं स्थानं सेवितुं मोक्षकाङ्क्षिणाम्।<br>मृतानां च पुनर्जन्म न भूयो भवसागरे॥ ७५ ॥ | मोक्षकी इच्छासे इस स्थानका सेवन करनेके लिये जो यहाँ आते हैं, उन्हें मृत्युके अनन्तर पुनः भवसागरमें जन्म नहीं लेना पड़ता। इसीलिये चाहे योगी हो, अयोगी हो अथवा पापी हो या श्रेष्ठ पुण्यकर्मा हो, जैसा भी हो, उसे सभी प्रयत्नोंसे वाराणसीमें ही निवास करना चाहिये। वेदके वचनसे, माता-पिताके कहनेसे अथवा गुरुके वचनसे भी अविमुक्त क्षेत्र—वाराणसीमें आनेके विचारका परित्याग नहीं करना चाहिये*॥ ७५-७७॥ |
| तस्मात् सर्वप्रयत्नेन वाराणस्यां वसेन्नरः।<br>योगी वाप्यथवाऽयोगी पापी वा पुण्यकृत्तमः॥ ७६ ॥ | |
| न वेदवचनात् पित्रोर्न चैव गुरुवादतः।<br>मतिरुत्क्रमणीया स्यादविमुक्तगतिं प्रति॥ ७७ ॥ | |
| सूत उवाच<br>इत्येवमुक्त्वा भगवान् व्यासो वेदविदां वरः।<br>सहैव शिष्यप्रवरैर्वाराणस्यां चचार ह॥ ७८ ॥ | सूतजी बोले—ऐसा कहकर वेदविदोंमें श्रेष्ठ भगवान् व्यास प्रधान शिष्योंके साथ वाराणसीमें विचरण करने लगे॥ ७८॥ |
इति श्रीकूर्मपुराणे षत्साहस्र्यां संहितायां पूर्वविभागे एकोनत्रिंशोऽध्यायः॥ २९ ॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें उनतीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ २९ ॥
* वाराणसीकी स्तुतिमें तात्पर्य है न कि वेदवाक्यों, माता-पिता एवं गुरुके वचनोंके उल्लङ्घनमें तात्पर्य है।