संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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१८८ * कूर्मपुराण *
| यतो मया न मुक्तं तदविमुक्तं ततः स्मृतम्।<br>तदेव गुह्यं गुह्यानामेतद् विज्ञाय मुच्यते॥५६॥ | चूँकि मैं वाराणसी क्षेत्र कभी नहीं छोड़ता, इसलिये वह अविमुक्त (क्षेत्र) कहलाता है, यही गुह्योंमें अत्यन्त गुह्य (ज्ञान) है। इसे जानकर मनुष्य मुक्त हो जाता है। हे सुभ्रु (सुन्दर भौंहोंवाली)! ज्ञान* (ब्रह्मज्ञान) और अज्ञान (ब्रह्मज्ञानका साधनरूप ज्ञान)-में निरत तथा परमानन्दकी इच्छा करनेवालोंकी जो गति बतलायी गयी है, वह अविमुक्त (क्षेत्र)-में मरनेवालोंको प्राप्त होती है। अविमुक्तरूप देह (विराट्)-में जिन क्षेत्रोंका वर्णन हुआ है, उन सभी क्षेत्रोंमें वाराणसीपुरी अधिक शुभ है॥५६-५८॥ |
| ज्ञानाज्ञानाभिनिष्ठानां परमानन्दमिच्छताम्।<br>या गतिर्विहिता सुभ्रु साविमुक्ते मृतस्य तु॥५७॥ | |
| यानि चैवाविमुक्तस्य देहे तूक्तानि कृत्स्नशः।<br>पुरी वाराणसी तेभ्यः स्थानेभ्यो ह्यधिका शुभा॥५८॥ | |
| यत्र साक्षान्महादेवो देहान्ते स्वयमीश्वरः।<br>व्याचष्टे तारकं ब्रह्म तत्रैव ह्यविमुक्तकम्॥५९॥ | यह अविमुक्त क्षेत्र ऐसा है, जहाँ साक्षात् महादेव ईश्वर देहान्त होनेके समय तारक ब्रह्मका उपदेश देते हैं। देवि! जो वह परतर तत्त्व 'अविमुक्त' नामसे कहा जाता है, वह वाराणसीमें एक जन्ममें ही प्राप्त हो जाता है। (विराट्के) भौंहोंके मध्य, नाभिके मध्य, हृदयमें, मूर्धमें तथा आदित्यमें जिस प्रकार अविमुक्त स्थित है, उसी प्रकार वाराणसीमें अविमुक्त क्षेत्र प्रतिष्ठित है॥५९-६१॥ |
| यत् तत् परतरं तत्त्वमविमुक्तमिति श्रुतम्।<br>एकेन जन्मना देवि वाराणस्यां तदाप्नुयात्॥६०॥ | |
| भ्रूमध्ये नाभिमध्ये च हृदये चैव मूर्धनि।<br>यथाविमुक्तमादित्ये वाराणस्यां व्यवस्थितम्॥६१॥ | |
| वरणायास्तथा चास्या मध्ये वाराणसी पुरी।<br>तत्रैव संस्थितं तत्त्वं नित्यमेवाविमुक्तकम्॥६२॥ | वरुणा और असीके मध्य वाराणसीपुरी है। वहाँ अविमुक्त नामक नित्य तत्त्व स्थित है। जहाँ नारायण देव और महादेव दिवेश्वर (सुरलोकके अधिपति) स्थित हैं, उस वाराणसीसे श्रेष्ठ स्थान न कोई हुआ है और न कोई होगा। वहाँ गन्धर्वों, यक्षों, नागों तथा राक्षसोंसहित सभी देवता मुझ देवाधिदेव पितामहकी सतत उपासना करते हैं॥६२-६४॥ |
| वाराणस्याः परं स्थानं न भूतं न भविष्यति।<br>यत्र नारायणो देवो महादेवो दिवेश्वरः॥६३॥ | |
| तत्र देवाः सगन्धर्वाः सयक्षोरगराक्षसाः।<br>उपासते मां सततं देवदेवं पितामहम्॥६४॥ | |
| महापातकिनो ये च ये तेभ्यः पापकृत्तमाः।<br>वाराणसीं समासाद्य ते यान्ति परमां गतिम्॥६५॥ | जो महापापी हैं और उनसे भी जो अधिक पाप करनेवाले (अतिपातकी) हैं, वे वाराणसी पहुँचकर परम गतिको प्राप्त करते हैं। इसलिये मोक्षार्थीको मरणपर्यन्त वाराणसीमें निश्चितरूपसे निवास करना चाहिये। वाराणसीमें महादेवसे ज्ञान प्राप्तकर मनुष्य मुक्त हो जाता है। किंतु पापसे आक्रान्त चित्तवालोंको विघ्न होते हैं। इसलिये शरीर, मन और वाणीसे पाप नहीं करना चाहिये। सुव्रतो! (उत्तम व्रतोंका पालन करनेवाले) यह वेदों और पुराणोंका रहस्य है। अविमुक्तसे सम्बद्ध ज्ञानको कोई तत्त्वतः जानता नहीं है॥६५-६८॥ |
| तस्मान्मुमुक्षुर्नियतो वसेद् वै मरणांतिकम्।<br>वाराणस्यां महादेवाज्ज्ञानं लब्ध्वा विमुच्यते॥६६॥ | |
| किन्तु विघ्ना भविष्यन्ति पापोपहतचेतसः।<br>ततो नैव चरेत् पापं कायेन मनसा गिरा॥६७॥ | |
| एतद् रहस्यं वेदानां पुराणानां च सुव्रताः।<br>अविमुक्ताश्रयं ज्ञानं न कश्चिद् वेत्ति तत्त्वतः॥६८॥ | |
| देवतानामृषीणां च शृण्वतां परमेष्ठिनाम्।<br>देव्यै देवेन कथितं सर्वपापविनाशनम्॥६९॥ | महादेवने देवताओं, ऋषियों तथा परमेष्ठियोंके समक्ष देवी पार्वतीसे सभी पापोंको विनष्ट करनेवाले इस ज्ञानको कहा था॥६९॥ |
* यहाँ मूलमें 'ज्ञान' का अर्थ है विज्ञान (ब्रह्मज्ञान) तथा अज्ञानका अर्थ है किंचित् न्यून ज्ञान (ब्रह्मज्ञानका साधन ज्ञान)।